इस्लाम और आतंकवाद: समस्या और समाधान

Acharya Prashant

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इस्लाम और आतंकवाद: समस्या और समाधान
पुरानी कबीलाई रवायतें और इस्लामिक दर्शन — ये दोनों बातें आपस में गुथ गई हैं। बहुत सारी चीज़ें, जिनको आम मुसलमान मज़हब समझता है, वो वास्तव में बस अरब की प्रथाएँ हैं। धर्म के नाम पर जो चल रहा है, वो हज़ारों-लाखों लोगों की मौत बन रहा है। इसके प्रतिरोध में पूरी दुनिया कट्टर होती जा रही है। संसद, न्यायालय, कार्यालय, शैक्षिक संस्थाएँ — हर जगह से मुसलमान नदारद है। इस पिछड़ेपन का कारण अशिक्षा और ग़रीबी है। इसे दूर करने के लिए ज्ञान का प्रकाश चाहिए — विज्ञान, इतिहास, तर्क में शिक्षा चाहिए। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, जैसे आप जानते हैं कि मेरा बैकग्राउंड मुसलमान है, इस्लामिक बैकग्राउंड है। तो ये हाल ही के जो आतंकवादी अटैक्स हुए हैं इसने मुझे बहुत ज़्यादा क्रोधित कर दिया अंदर से। क्योंकि यही वजह थी जिसकी वजह से मैंने इस्लामिक स्क्रिप्चर को क्वेश्चन करना शुरू किया था। जबकि मैं ख़ुद एक स्टूडेंट रह चुकी हूँ। बहुत कम उम्र से मैं एक स्टूडेंट रही थी, एक दाई थी और बड़े-बड़े आपके इंडियन जितने इस्लामिक गुरु हैं सबके नीचे मैं पढ़ चुकी हूँ।

बट जब मैंने देखा ये अटैक जो है मुसलमानों, जो ख़ुद को मुसलमान कहते हैं वो अटैक कर रहे हैं और उस पे जो आक्रोश होना चाहिए मुसलमानों का और जो बदलाव आना चाहिए वो जब नहीं दिखा मुझे, खासतौर पर जो बड़े लेवल पर जो लोग बैठे हुए हैं; वो जब नहीं दिखा तो फिर मैं तो क्वेश्चन करने लगी क्वेश्चन भी करने लगी और पुरानी-पुरानी मान्यताओं को मैं छोड़ने लगी।

कैसे मुझे पर्सनल लाइफ़ में, फैमिली में बहुत सारी चीज़ें ज़ाहिर सी बातें झेलनी पड़ी, पर ठीक है। वो अपने आप ही वो बल आ जाता है जैसे आप बताते हैं कि उसको सामना करने का। तो वो तो अपने आप लोग फिल्टर हो जाते हैं। हालात फिल्टर हो जाते हैं बट ये मुसलसल चलता जा रहा है; इसका कोई नतीजा नज़र नहीं आता पर अंदर से एक बेचैनी होती है कि मैं अभी भी अपने आप को एसोसिएट तो करती हूँ एज़ अ मुसलमान। बट मुझे ऐसे बेचैनी होती है कि मैं क्या करूँ इसके लिए।

मुझे दोगलापन दिखता है कि आप ठीक है बहुत बड़े पैमाने पे जैसे फ़िलिस्तीन में हो रहा है जेनोसाइड हो रहा है। ठीक है, आप उसको कंपेयर नहीं कर सकते। बट जैसे लोग आक्रोश से निकलते हैं कि जब आप देखते हैं और जब आप ये ख़ुद कहते हैं कि क़ुरान में ये कहा है कि एक भी अगर सोल, इनोसेंट सोल को मासूम सोल को मारा गया है, हत्ता की पूरी ह्यूमैनिटी को मारा गया है।

जब आप ये देख रहे हैं और उस पर फिर ये अटैक देख रहे हो तो उतना बड़ा आपको तो, आपको होना चाहिए कि हमारे मुसलमान देशों में से ये चीज़ हो रही है। ऐसा भी नहीं कि कहीं बाहर हो रही है। तो फिर ये दोगलेपन से मुझे बड़ी परेशानी हो रही है। मुझे बड़ा टेंशन होता है। मुझे समझ में नहीं आता मैं इसको करुणा में कैसे तब्दील करूँ या अपना पर्सपेक्टिव कैसे बदलूँ। इसीलिए मैं आपसे मदद माँगने के लिए क्वेश्चन कर रही हूँ।

आचार्य प्रशांत: देखिए, इंसानियत का तक़ाज़ा तो ये होता है कि जो दुख से गुजरता है उसे दूसरे के दुख के प्रति और संवेदनशील हो जाना चाहिए लेकिन उतनी इंसानियत ज़्यादातर लोगों में होती नहीं है। तो देखा ये जाता है कि जिसको ये भाव आ जाता है कि मेरे साथ अत्याचार नाइंसाफी हुई है वो दूसरे के प्रति और कट्टर हो जाता है, और क्रूर हो जाता है और असहिष्णु हो जाता है।

कश्मीर में बर्बर हत्याकांड हुआ है। जिनको मारा उनका कोई लेना देना था नहीं किसी तरह की राजनीति से। वो तो और कई बातें होंगी। लेकिन एक बात ये भी है कि कश्मीरियों के आमंत्रण पर गए थे पर्यटक बनकर के। अब उनके निधन पर, उनकी हत्या पर अगर आप को दर्द नहीं हो रहा है। तो आप कह रहे हो कि आप उन अंधी ताकतों के साथ हो जिन्होंने ये हत्याकांड किया है। और अगर आप उन अंधी ताकतों के साथ हो तो फिर आप समझ भी नहीं रहे कि उन बर्बर ताकतों के ख़िलाफ़ जो आक्रोश है वो आप पर फूटेगा और आप ज़बरदस्ती अपने ऊपर आफ़त बुला रहे हो। आप ऐसी सज़ा को आमंत्रित कर रहे हो जो सज़ा भुगतने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है।

तो ये बड़ी विचित्र स्थिति होती है। बड़ी त्रासद स्थिति होती है। जब आपको अतीत ज़्यादा याद रहता है और अपने सामने जो खून बह रहा है वह कम दिखाई देता है। अतीत से आप इतना ज़्यादा आईडेंटिफाई करोगे ना, फिर अतीत में जिन्होंने गुनाह करे हैं उन गुनाहों की भरपाई भी फिर आपको करनी पड़ेगी। ऐसे समझिए कि एक पुरानी ढहती हुई हवेली पड़ी हुई है और उस हवेली के ऊपर 10 करोड़ का क़र्ज़ा चढ़ा हुआ है। लेकिन रहता कोई उस हवेली में है नहीं। उस हवेली में जो रहते थे वो सब मर चुके हैं, खत्म हो चुके हैं। इतिहास में वो ख़ाक़ हो चुके हैं। कोई नहीं रहता। पर उस हवेली के ऊपर एक क़र्ज़ चढ़ा हुआ है, कितने का? 10 करोड़ का। लेकिन वो बस है क़र्ज़। वहाँ कोई रहता ही नहीं तो क़र्ज़ वसूला किससे जाए?

और फिर एक दिन, एक सिरफ़िरा आदमी बिल्कुल ऐसे छाती तानकर बिल्कुल फ़ूलकर बड़ा गौरवान्वित होता हुआ जा के हवेली के सामने खड़ा हो जाए बोले, 'हवेली मेरी है।' तुम्हारी कैसे है? अजी साहब हम उसी खून के हैं। हम उन्हीं पुरखों के हैं जिन्होंने हवेली बनाई थी। हम उसी खून के हैं। हम उन्हीं पुरखों के हैं जिन्होंने हवेली बनाई थी। और उस हवेली पर चढ़ा हुआ है। तो अब ये 10 करोड़ का क़र्ज़ फिर वसूला किससे जाएगा? ये जो तुम वहाँ जाकर खड़े हो गए हो और कह रहे हो हवेली तुम्हारी, तुम्हें क्या लेना देना है उस हवेली से? तुम्हारे आज की दुनिया में आज के भारत में परिवार है, तुम्हारा भविष्य, तुम्हारे बाल बच्चे, तुम्हारी भलाई, तुम्हारी ख़ुशी, तुम्हारी सुरक्षा वो सब कुछ आज के हिंदुस्तान पर निर्भर करती है ना।

लेकिन जी रहे हो तुम 200-300 साल पहले की दुनिया में या 1200 साल पहले की दुनिया में और तुम्हारे सारे सरोकार भी उतने ही पुराने हैं। तो अतीत से इतना आइडेंटिफाई करोगे तो अतीत की जो डेट(क़र्ज़) है वो तुम पागलपन में अपने ऊपर ले लोगे। समझ में आ रही है बात? इसी को और दूसरे तरीक़े से ले लो। वो जो हवेली थी उस हवेली में 70 लाशें गढ़ी हुई हैं। और जिनकी लाशें गढ़ी हुई हैं उनके वंशज आसपास ही रहते हैं। पर वो भी किसी को कुछ कह नहीं रहे थे क्योंकि भई, जिन्होंने मारा था वह भी मर चुके हैं। तो किसी से क्या कहना? अब ज़िन्दगी चल रही है पुरानी बात हो गई। हाँ, हवेली में 70 लाशें ज़रूर गढ़ी हुई हैं।

और आप जाकर वहाँ खड़े हो जाओ। कह दो मैं हूँ इस हवेली का वंशधर और लेना एक ना देना दो; ज़बरदस्ती अहंकार की ख़ातिर सबको अच्छा लगता है ना बताना कि मेरा अतीत कितना ज़्यादा स्वर्णिम था, ग्लोरियस था। तो ज़बरदस्ती अहंकार की ख़ातिर तुम वहाँ जाकर के हवेली के सामने खड़े हो गए जहाँ 70 लाशें गढ़ी है। अब जिनकी लाशें गढ़ी हैं उनके वंशज भी तो आसपास ही हैं। उन्हें अब मिल गया कोई बोले, 'ये मिला अब कोई मिलता ही नहीं था बदला किससे निकाले?' तो तुम जाकर के खड़े हो गए हो कि आओ मुझसे बदला निकालो। ये क्यों कर रहे हो? उस हवेली से तुम्हें मिलना क्या है? ये तो बताओ। उस हवेली से तुम्हें क्या मिलना है? बताओ तो।

और आज क्योंकि जो अभी हालिया घटना है वह पहलगाम की है। एक बर्बर आतंकी हत्याकांड हुआ है। पृष्ठभूमि ये है। और क्योंकि आपने इस्लाम के संदर्भ में प्रश्न भी पूछा है तो बात हम मुसलमानों की कर रहे हैं। लेकिन ये बात दुनिया के हर आदमी पर लागू होती है। क्योंकि हर आदमी अतीत में कोई पुरानी हवेली पकड़ कर बैठा हुआ है। वहाँ है क्या तुम्हारे लिए? क्यों पकड़ कर बैठे हुए हो? क्या मिल रहा है? बताओ तो। कल्पनाओं, ख्वाबों एक खोखले प्राइड के अलावा तुम्हें क्या मिल रहा है? तुम्हारे बच्चों की फीस जाएगी उससे? तुम्हारी रोटी चलेगी उससे? तुम आज एक अच्छे बेहतर सुंदर इंसान बन पाओगे उससे? तुम रह सकते हो उस हवेली में? तुम्हें सर ढकने को जगह मिल सकती है वहाँ पर? कहोगे जा रहा हूँ सर छुपाऊँगा यहाँ पर, एक ईंटा गिरेगा पट उसी सर पर।

मूर्खता चली आ रही है, आज से कोई लेना देना नहीं। अभी-अभी हुआ है कहाँ हुआ था, बहराइच जिले में शायद उत्तर प्रदेश के आपलोग देख लीजिए बहराइच ही है। अभी एक दो दिन पहले की घटना है। वहाँ किसी मदरसे में जाकर निरीक्षण किया शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने। तो वहाँ जो ऊँची क्लासेस जो ऊँचे दर्जे के भी विद्यार्थी थे वह अंग्रेजी में ना तो अपना नाम लिख सकते थे ना अपने मदरसे का नाम लिख सकते थे। तो शिक्षा विभाग ने उनको कहा कि अरबी और फारसी के आगे भी कुछ पढ़ा दिया करो। तुम क्या करोगे अरबी और फारसी पढ़ के आज बताओ तो, क्या मिलेगा? पर पुरानी इमारत और उसका रुतबा, रुआब, शान। वो शान खाओगे? वो शान पहनोगे? वो धोती बनेगी? वो कुर्ता बनेगी? वो रोटी बनेगी? वो क्या बनेगी? तुम आज क्या कर लोगे फारसी पढ़ के? फ़ारसी के ज़माने तो बहुत पहले जा चुके हैं। मेरे ख़याल से भारतेन्दु हरिश्चंद्र थे जिन्होंने लिखा था “पढ़े फ़ारसी बेचे तेल ये देखो किस्मत का खेल।”

कोर्ट लैंग्वेज हुआ करती थी कभी फ़ारसी मुगलों तक, उसके बाद अंग्रेज़ आ गए धीरे-धीरे। अभी भी उसमें...सुंदर भाषा है काव्य की भाषा है पर व्यवहार में उसका क्या करोगे? और वही फिर पुरानी बातें पकड़ कर बैठने का नतीजा है। वही ये ना देख पाने का नतीजा है कि बहुत कुछ अतीत में ऐसा होता है जिसे अतीत में ही छोड़ देना चाहिए। वो वर्तमान में लाने लायक़ नहीं होता कि फिर पूरी दुनिया फब्तियाँ कसती है। किसी को अच्छा नहीं लगता।

कोई संवेदनशील इंसान नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर बार-बार व्यंग करा जाए, ताने मारे जाए पर चल रहा है। विज्ञान में कोई दखल नहीं, कलाओं से गायब हैं। विश्वविद्यालयों में उपस्थिति जनसंख्या के अनुपात से कम है।

क्या है अपने पास? बस अतीत का खोखला गौरव। जो पीछे हुआ था वो सबसे अच्छा है। पीछे की बहुत कम बातें होती हैं जो टाइमलेस होती हैं जो कालातीत होती हैं। है ना? जो हर समय हर युग में लाभकारी होंगी उन बातों को पकड़ना चाहिए। और बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो किसी शताब्दी में ठीक रही होंगी। किसी खास जगह पर हम किसी ज्योग्राफी में किसी स्थान पर उनकी हो सकता है कोई उपयोगिता रही हो कोई सार्थकता रही हो पर अब वो जगह बदल चुकी है वो दुनिया बदल चुकी है समय बदल चुका है। आप वही बातें पकड़ कर बैठे रहोगे तो आपको बदहाली और ग़रीबी, अशिक्षा और मुफलसी इसके अलावा क्या मिलेगा बताओ ना।

फिर जब दूसरे से और किसी तरीके से तुम कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चल सकते, दूसरे की और किसी मामले में बराबरी नहीं कर सकते तो आखिरी चीज़ आती है तुम्हारे पास बल के तौर पर बंदूक एके-47 कि तुम्हारे पास और कोई ताकत होगी, आर्थिक ताकत होगी, ज्ञान की ताकत होगी — हमारे पास गोली की ताकत है। ये क्या तरीका है? और तुम गोली चलाओगे तो सामने वाला मौन बैठा रहेगा क्या? अब युद्ध भी ना घोड़ों पर लड़े जाते हैं, ना तलवारों से लड़े जाते हैं। युद्ध भी अब ज्ञान से लड़े जाते हैं। वो ज़माने बीत गए जब आप अरबी घोड़ों पर बैठकर एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में आग लेकर विश्व विजय कर सकते थे।

अब तो जिसके पास ज्ञान होगा, साइंस होगी वही युद्ध में भी जीतेगा और 'साइंस' में आप कहाँ हो बताओ तो? 'साइंस' से तो आपको डर लग रहा है साहब।

पाकिस्तान की आप साइंस की किताबें देखिए। जिस दिन लगे कि आज मूड ऑफ है और मनोरंजन की ज़रूरत है, उस समय देखिए जाकर कि पाकिस्तान में वो बच्चों को साइंस के नाम पर क्या पढ़ा रहे हैं। जिसके पास साइंस नहीं है वो लड़ाईयाँ भी जीतेगा क्या? फिर जब आमने सामने की लड़ाई लड़ नहीं सकते तो फिर ब्लीडिंग थ्रू अ थाऊज़ेड कट्स कि चुपचाप पीछे चोरी-चोरी आ के कहीं पर बम फोड़ देंगे,कहीं पे निर्दोषों को मार देंगे। ये कर रहे हो क्योंकि आमने सामने की लड़ाई तो अब साइंस और टेक्नोलॉजी से लड़ी जाती है, वो है नहीं।

न्यूक्लियर बम भी बना रहे हो तो कैसे बना रहे हो? किसी और कि न्यूक्लियर सीक्रेट्स चुरा-चुरा कर या नॉर्थ स्टेट्स जो हैं नॉर्थ कोरिया जैसे उनको घूस खिलाकर। और अपनी ही बदहाली पर इनको रहम भी नहीं आता। इतना बुरा हाल अपना कर लिया है और कह रहे हमारा बुरा हाल है तो अब तुम्हारा भी बुरा हाल करेंगे। ये क्या है? इसको धर्म मज़हब तो नहीं बोलते। अपना भी नाम खराब करते हो। दीन का भी नाम खराब करते हो। बस एक बात पर ख़ुशी कि दुनिया का फास्टेस्ट ग्रोइंग रिलिजन है इस्लाम।

साहब पॉपुलेशन ग्रोथ आपको बहुत अच्छे से पता है कि किन चीज़ों से ड्राइव होती है। जहाँ औरतों की हालत जितनी खराब होती है वहाँ उतने ज़्यादा बच्चे पैदा होते हैं। जहाँ गरीबी और अशिक्षा एजुकेशन जितनी जहाँ कम होती है, पावर्टी जितनी ज़्यादा होती है वहाँ उतने ज़्यादा बच्चे पैदा होते हैं। ये दुनिया भर पर नियम लागू होता है। तो आप अगर कहते हो कि हमारी तादाद सबसे तेजी से बढ़ रही है तो आप यही दिखा रहे हो कि पावर्टी सबसे ज़्यादा है और इलिटरेसी सबसे ज़्यादा है। तो यह कोई फख़्र की बात है, इस बात पे नाज़ करने जैसा है?

कोई आपका हितचिंतक बनकर भी कोई बातें बोले तो सुनने को तैयार नहीं हो। एक गड़बड़ हो गई है। मालूम है क्या? जहाँ से इस्लाम आया वहाँ की जो पुरानी ट्राइबल रवायतें थी और जो इस्लामिक दर्शन है ये दोनों बातें आपस में गुथ गई हैं।

बहुत सारी चीज़ें जिनको आम मुसलमान मज़हब समझता है, वो वास्तव में बस अरब की प्रथाएँ हैं। पर वो उनका पालन करे जा रहा है यह सोच के कि यही तो मेरा मज़हब है।

वो तुम्हारा मज़हब नहीं है। वो अरेबिया की उस समय की कस्टम्स हैं जिनका इस्लाम से सीधे तौर पर कोई संबंध भी नहीं है।

प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं आइडलाइज़ेशन इसी को तो कहते हैं। माने ज़रूरी नहीं है कि आप मूर्ति पूजा कर रहे हैं। मैं तो यही कहती हूँ हमेशा कि यही मूर्ति पूजा होती है। आपने किसी को इतना किसी ट्राइब को किसी के कल्चर को इतना आइडियलाइज़ कर दिया है। आपने बहुत सही बात बोली है। इतने ज़्यादा मिस ट्रांसलेशन हुआ है आचार्य जी क्योंकि मैं तो उसकी स्टूडेंट हूँ तो मुझे ख़ुद पता है इस चीज़ के बारे में। एक बेसिक एग्जांपल आपको बताऊँ जिसपे मैं बहुत ज़्यादा स्टडी किया और जिसपे मैं काफी ज़्यादा लिखती भी हूँ वो है शेम। जैसे शेम जो है जो क़ुरान आया इस प्रथा को अबोलिश करने के लिए दैट वाज़ फीमेल इन्फैंटिसाइड जिसमें नवजात बच्चियों को ज़िन्दा दफनाया जाता था। तो क़ुरान में आया कि आप ये करना बंद कर दो बिकॉज़ इसका ये वजह शेम की वजह से।

तो हमने क्या किया? अच्छा हमने उसको गाड़ना तो बंद कर दिया, ज़िन्दा दफन करना तो बंद कर दिया पर हमने उसको लेयर्स में दफन कर दिया। वो नॉन एक्सिस्टेंट बना दिया। तो शेम तो आप अभी भी लेते हुए जा रहे हैं। है कि नहीं? वो शेम तो कहीं नहीं गया। ठीक है आपने उसको ज़िन्दा तो रखा है बट उसको एक तरीके से उसको मुर्दा ही रखा है। उसको कफ़न ही पहना दिया है उसको। तो ये इतना मिस ट्रांसलेशन हुआ है। तो खैर अब पता नहीं इसलिए मुझे बहुत ज़्यादा बेचैनी होती है, तकलीफ होती है।

फिर मुझे ये याद आता है कि ये आप जो ज्ञान दे रहे हैं हिंदुइज़म् में भी आप उसको सही करने के लिए कर रहे हैं। बहुत सारे मुसलमान थिंकर्स हैं, रिफॉर्मर्स हैं जो बहुत कोशिश करते हैं। मैं उनको पढ़ती हूँ पर वो इतनी माइनॉरिटी में क्योंकि हमारा जो पॉपुलेशन है वो इतना ज़्यादा बढ़ गया है और इग्नोरेंट पॉपुलेशन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है बनिस्पत जो एजुकेटेड है। है एजुकेटेड बहुत अच्छे एजुकेटेड है। पर वो इतने कम है कि कोई मुकाबला ही नहीं कर सकता इस पॉपुलेशन का। तो वो अपना खात्मा ऐसा लगता है ख़ुद ही लिखा के आए हैं। और बुरा लगता है क्योंकि उसमें मासूम मर रहे हैं, मासूमों की जान जा रही है।

आचार्य प्रशांत: इसमें एक बात सिर्फ़ ये भी नहीं है कि तादाद बहुत ज़्यादा है इग्नोरेंट लोगों की। बात सिर्फ़ संख्या की नहीं है, पैसे की भी है। जो सुन्नी वहाबिज़्म है पेट्रो डॉलर्स — उसने पूरी दुनिया में जो एक्सट्रीम फॉर्म हो सकता है रेडिकलिज़्म का, वो बहुत एक्सपोर्ट करा है। तो ये जो तेल है ना जिससे पैसा खूब मिलता है, इस पैसे का इस्तेमाल हुआ है। और दूसरा अमेरिका — जो पाकिस्तान फैक्ट्री बना पूरी दुनिया को टेररिज़्म एक्सपोर्ट करने की उसके पीछे बहुत बड़ा जो कारण है वो अफगानिस्तान वॉर है। सोवियत संघ अफगानिस्तान पर चढ़ ना जाए। कोल्ड वॉर के दिन थे, अफगानिस्तान कहीं कम्युनिस्टों की पकड़ में ना आ जाए। इसके लिए अमेरिका ने जो इस्लाम का रेडिकल वर्जन है डीपली इग्नोरेंट एक्सट्रीमली वायलेंट। अमेरिका ने उसको बहुत प्रमोट करा।

दुनिया भर के रेडिकलाइज्ड फाइटर पाकिस्तान में इकट्ठा हुए, सऊदी पैसे और अमेरिकन पॉलिटिकल माइट की बिनह पर। नए-नए मदरसे खड़े हुए पाकिस्तान, अफगानिस्तान बॉर्डर पर जिनमें सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंसा और हत्या की शिक्षा दी गई। और ये सब हुआ था ताकि जो अफगानिस्तान में युद्ध हुआ है रूसियों के खिलाफ उसको जीता जा सके। तो ये भी सोचना कि यह सदा से चली आ रही है समस्या ऐसी बात नहीं है। समस्या बहुत बढ़ी है पिछली शताब्दी के आखिरी दो-तीन दशकों में। तब फिर अफगानिस्तान युद्ध खत्म हो गया। लेकिन ये जो दुनिया भर से फाइटर इकट्ठा हुए थे ये कोई लौट के अपने घर थोड़ी चले गए। फिर वो वहाँ से कश्मीर गए, चेचनिया गए, वेस्ट एशिया गए। बोले अब हम यहाँ लड़ेंगे। इराक़ गए, उसी से फिर इस्लामिक स्टेट आगे बनता है।

तो इसके पीछे इकोनॉमिक और जियोपॉलिटिकल कारण भी हैं। बात बस इसकी नहीं है कि एक लोग हैं उनकी प्रथाएँ परंपराएँ कैसी रही हैं। उनके ग्रंथ कैसे रहे हैं? उसके पीछे अभी हाल के पॉलिटिकल कारण भी ज़िम्मेदार हैं। मेरे ख़याल से हिलरी क्लिंटन ने कहा था कि “व्हेन यू ब्रीड स्नेक्स इन योर बैकयार्ड इट इज़ स्टूपिड टू इमैजिन दे विल नॉट बाइट यू।” वहाँ आपने तालिबान खड़ा कर दिया। तो फिर उससे तहरीके तालिबान पाकिस्तान (Tehrik-i-Taliban Pakistan - TTP) भी खड़ा हुआ — टीटीपी। वो जो टीटीपी है वो पाकिस्तान के लिए नासूर बन गया। अज्ञान में व्यक्ति को समझ में ही नहीं आता कि दूसरों का नुकसान करने की होड़ में वो अपना कितना नुकसान करे ले रहा है। कहते हैं ना दूसरे का अपशगुन करने के लिए अपनी नाक काट लेना। ये चल रहा है।

प्रश्नकर्ता: तो इसमें इस हालत में आचार्य जी आपसे हेल्प चाहती हूँ कि इसमें जो ये बेचैनी होती है मुझे बहुत ज़्यादा और आक्रोश होता है। ये फिर कंपैशन करुणा में कैसे बदल सकता है इसका मैं पर्सपेक्टिव कैसे बदलूँ?

आचार्य प्रशांत: देखिए, ये तो ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ रही हैं। है ना? इनकी धारा को एक दिन में नहीं मोड़ा जा सकता। लेकिन अपने तल पर अपने स्तर पर व्यक्ति जो अधिकतम कर सकता है उसको करना चाहिए। ये गैर मुसलमानों में ही नहीं मुसलमानों में भी भावना है कि उनका मज़हब जो, वो किसी भी तरीके कि डेविएशन को बर्दाश्त नहीं करता। डेविएशन को और इनोवेशन को भी। बिदअत कि जो अर्थ किसी आयत का बिल्कुल पुराना था वही चलेगा। उसको कोई समसामयिक कंटेंपरेरी अर्थ मत दे देना। कंपैशन वर्ड, कंपैशन अपना नुकसान करा के भी दूसरे तक सच्चाई पहूँचाना। ये सब गायब सा है। कोशिश करिए जहाँ तक आप की समझ जाती है और पहुँच जाती है इन बातों को जनता के सामने लाने की।

अंधेरे का उपचार तो रोशनी ही होता है ना तो जहाँ-जहाँ आपको रोशनी दिखाई दे रही है उसको सामने लेकर के आइए।

ताकि जो धर्म का हिंसक और कट्टर रूप, अपनाया जा चुका है और जिसकी बहुत बदनामी भी हो रही है उस हिंसक और कट्टर रूप के अलावा भी कुछ है। ये लोगों तक बात पहुँच सके। शिक्षा बहुत बड़ी चीज होती है। शिक्षा चाहिए विज्ञान में, इतिहास में, तर्क में शिक्षा चाहिए। जिस जगह पर अंधेरा बहुत होता है ना, वहाँ पर कोई भी आकर कूड़ा डाल जाता है। ज्ञान का प्रकाश चाहिए। गली मोहल्लों में देखा है ना, कोई जगह ऐसी हो कोना कतरा जहाँ एकदम अंधेरा पड़ा रहता है वहीं पर लोग आकर के पूरी दुनिया आकर के वहाँ कूड़ा डालती है और फिर वहीं कीड़े मकोड़े पनपते हैं। प्रकाश चाहिए और प्रकाश तो ज्ञान का ही होता है।

समस्या सारी ये आनी है ना, जो मैं बात बोल रहा हूँ वो अगर किसी को ठीक भी लग जाए तो अगले ही पल उसको या तो ख़ुद ही तर्क उठेगा या कोई और आकर उसको बोल देगा। अच्छा तो हम तो अपनी गलती मान लें और बदलने लगे सुधरने लगे पर उनका क्या? उन्होंने अपनी गलती मानी क्या? ये जो एक दूसरे की ओर उंगली बाजी है इसने किसी को कहीं का नहीं छोड़ा। जिससे ही कहो कि तुम सुधर जाओ वही कहता है कि हमें सुधारने की बात कर रहे हो, जाओ पहले उनको सुधारो।

जैसे अस्पताल में एक वार्ड हो उसमें बिस्तरों पर मरीज़ ही मरीज़ पड़े हुए हैं एक के बाद और किसी भी मरीज़ को जाओ दवाई देने तो बोले, 'अच्छा हमें दवाई दे रहे हो, जाओ पहले पूरे वार्ड को ठीक करके आओ फिर हमें दवाई देना।' ये क्या तुक है? क्या तर्क है? और पूरी दुनिया रेडिकलाइज़ हुई जा रही है यही बोल-बोल करके कि जब मुसलमान इतने रेडिकल हैं तो हम क्यों ना हो जाएँ। बहुत कम देश बचे हैं जहाँ पर अब रिएक्शनरी राइट विंगिज्म हावी नहीं हो रहा है। और उन रिएक्शंस में एक बड़ी वजह ये भी रहती है कि देखा मुस्लिम क्या करते हैं? जब मुस्लिम ये सब करते हैं तो हमें भी तो विरोध में प्रतिरोध में कुछ करने का हक है ना। ये ठोस तर्क है। इसको आसानी से काटा नहीं जा सकता। अनुपयोगी तर्क है, घातक तर्क है लेकिन काटने में कठिन तर्क है।

नीदरलैंड्स, इटली, अमेरिका कितने ही देश यूरोप के और फ्रांस....

प्रश्नकर्ता: “एन आई फॉर एन आई मेक्स द होल वर्ल्ड ब्लाइंड।” तो वही मुझे हमेशा बुरा लगता है कि जब मैं अपने हिंदू दोस्तों से बात करती हूँ और खास तौर पर गीता के बारे में मैं कुछ बात करना चाहती हूँ बताना चाहती हूँ कि देखो इसमें आपको इतनी ज़बरदस्त विस्डम मिल रहा है जो आपको यही सारे जो हम लोग मुसलमानों में जो चीज़ें कमियाँ हो गई हैं। ये आप लोग ना करें इससे बहुत बड़ा खामियाजा हुआ है बहुत बड़ा नुकसान उठाया है।

और मैं जितने पाकिस्तानी मेरे जान पहचान वाले यहाँ पे हैं, कनाडा में जब मैं उन लोग से मिलती हूँ, 'आचार्य जी आप यकीन करें कोई वापस नहीं जाना चाहता।' कोई मुझसे पूछे, मुझे अगर मौका मिले मैं तो चली जाऊँ, इंडिया। मुझे तो बड़ा अच्छा लगता है, मैं जब यहाँ पे आती हूँ बट मैं एक भी पाकिस्तानी से अभी भी ऐसी नहीं मिली हूँ जो वापस जाना चाहता है सब भाग-भाग के आ रहे हैं। माने लोग चीटिंग कर-कर के ज़मींने-वमीनें बेच कर, जो उनके हाथ लगता है वो लगाकर ऐसे-ऐसे लोग यहाँ पर आकर बस जाते हैं। क्योंकि वो लोग रह ही नहीं सकते वहाँ पर।

आचार्य प्रशांत: देखिए पंजाब है पाकिस्तान में। ठीक है? उसको छोड़ कर के है। नीचे सिंध है। पश्चिम की ओर बलूचिस्तान है। उत्तर पश्चिम में खैबर पख्तूनख्वा है। ठीक है। ऊधर भारतीय कश्मीर का हिस्सा वो गिलगित बाल्टिस्तान फिर पीओके(POK- Pakistan Occupied Kashmir) इसमें से एक नाम बताइए, जो पाकिस्तान के साथ रहना चाहता हो। ये तो हटाइए कि जो बाहर के पाकिस्तानी हैं वो पाकिस्तान लौट के नहीं जाना चाहते। जो पाकिस्तान के पाकिस्तानी हैं वो भी कहाँ पाकिस्तान में रहना चाहते हैं। बलूचिस्तान बेचारे का तो ये है कि उसकी आबादी ज़रा सी है। वहाँ बारिश नहीं होती। मेरे ख़याल से कुल डेढ़ एक करोड़ की उनकी आबादी है। तो वहाँ पर बीएलए (बलूच लिबरेशन आर्मी), बीआरए (बलूच रिपब्लिकन आर्मी) ये सब हैं जो लगे हुए हैं कि हमें अलग होना है। पर वो ग़रीबी भी वहाँ बहुत है। वो अलग हो नहीं सकते।

ऊपर वहाँ वो बना लेना चाहते थे अपना पश्तूनिस्तान। खैबर पख्तूनख्वा वाले, सिंध वाले सिंध देश बनाना चाहते थे। क्योंकि लोग इकट्ठे भी तब रहते हैं ना जब भीतरी और बाहरी दोनों दिशाओं में वेलनेस हो रिचनेस हो। भीतरी रिचनेस भी चाहिए और बाहरी भी। भीतरी रिचनेस किस बात पर आती है कि हम में आपस में प्यार है, भाईचारा है। भाईचारा क्या है? जो पाकिस्तान की पूरी पॉलिटी है, इकोनॉमिक्स है उस पर पंजाबियों का कब्ज़ा है। तो क्या भाईचारा होगा? वो जब एक ही जो सूबा है वो डोमिनेट कर रहा है तो भाईचारा कहाँ से आ जाएगा? और बाहरी रिचनेस का तो हाल ये है कि अगर बार-बार, बार-बार आकर के सऊदी अरेबिया, यूएई जो पूरे जीसीसी(गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) देश हैं और अमेरिका और आईएमएफ ये बार-बार आकर बेल आउट ना करें तो इकॉनमी कब की कोलैप्स कर जाए?

यूएसएसआर का विघटन क्यों हुआ था? क्योंकि इकॉनमी कोलैप्स कर गई थी। एक घर होता है ना जहाँ खाने को नहीं बचता। वो घर बिखर जाता है। जिस घर में आर्थिक विपन्नता आ जाती है, वो घर बिखर जाता है। वो फिर घर कुछ दिनों तक बचा रह सकता है इस बुनियाद पर कि लोगों में आपस में प्रेम बहुत है। पर प्रेम भी ना हो और पैसा भी ना हो, तो वो घर बचा रहेगा क्या? आपने ऐसा कर लिया है हिंदुस्तान से नफरत कर करके आपने अपनी ऐसी हालत कर ली है कि ना प्रेम है ना पैसा है। ना प्रेम ना पैसा किसी तरीके से बस आपने अपने देश को एक करके रखा हुआ है किसी तरीके से। उसमे बहुत सारा मिलिट्री का, आप कहोगे साहब भारत में भी तो सेशनिस्ट टेंडेंसीज़ हैं पर कम है पाकिस्तान से। दूसरे पाकिस्तान में एक सेशन(Secession) पहले ही हो चुका है 1971 में, ठीक है। तो ये सब क्यों हो रहा है?

ये इसलिए हो रहा है। मूलतः ये इसलिए हो रहा है क्योंकि हो तो आप इस्लामिक देश। लेकिन आप धर्म का मतलब नहीं समझते।

धर्म के नाम पर आपने ना जाने क्या चला रखा है। और जो चला रखा है वो न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की मौत बन रहा है। और पूरी दुनिया के लिए वो दुख का कारण बन रहा है।

आपको माना जाता है द ग्लोबल एपिसेंटर ऑफ टेररिज़्म, द ग्लोबल एक्सपोर्टर ऑफ टेररिज़्म। और ये सब कुछ दुनिया भर में नालायकी करने के बाद भी आप ग्लोबल स्टेज पर इररेलेवेंट हो चुके हो। कोई आपको पूछने वाला नहीं। जिस दिन अमेरिका ने विदाई ली अफगानिस्तान से, तालिबान को कहा, 'ले भाई तेरा तू संभाल।' जिस दिन अमेरिका ने विदाई ली उस दिन से पाकिस्तान इररेलेवेंट अप्रासंगिक होना शुरू हो गया।

क्योंकि आपने कुछ अच्छा, ऊँचा जो मानवता को ऊँचा उठाए आपने कभी करा ही नहीं था। मुझे बताओ कितने आपने थिंकर्स राइटर्स पैदा करे? बताओ ना। कितने आपके नोबेल लोरिएट हैं? पूरी दुनिया आपसे प्रेम करे, आपका एहसान माने आपने ऐसे कौन से काम करे? बंदूक, गोलियों, विनाश और ज़हर के अलावा आपने दुनिया को क्या दिया है? और ये सब कुछ आप किसके नाम पर कर रहे हो? मज़हब के नाम पर। ये है मज़हब? और अभी भी जब आपके पास कोई और तरीका नहीं बचा अपने आपको रेलेवेंट बनाने का तो आपने फिर से टू नेशन थ्योरी की बात शुरू कर दी और कहना शुरू कर दिया कि मर जाएँगे, घासफूस खाएँगे लेकिन कश्मीर लेकर आएँगे।

और वो वहाँ पर गए हुए थे, आपसे लेना एक ना देना दो। वो जो वहाँ गए थे वो कोई मुसलमानों से नफरत करते थे जो आपने उनको मार दिया? सीधे साधे लोग थे। कोई बेचारा दो दिन की छुट्टी लेकर कोई कुछ करके वहाँ गया था कि जा रहे हैं पहलगाम में, घूम फिर करके वापस आ जाएँगे — आपने जान ले ली। क्यों जान ले ली? क्योंकि आपकी जो भीतरी विफलता है, आप में हिम्मत नहीं है कि उससे आप आँखें चार कर सको, उसके रूबरू खड़े हो सको। आप देख ही नहीं पा रहे हो कि आप जिन आदर्शों पर, जिन मान्यताओं पर चल रहे हो, वो गलत है, वो भ्रामक हैं। तो आप कर क्या रहे हो? आप पूरी दुनिया पर बस ज़हर बरसा रहे हो। और कोई आपको ये बातें बताने आए, तो आप कहते हो गला काट देंगे।

रिफॉर्म मूवमेंट्स कैसे शुरू होंगे? इस्लाम में भीतर से कैसे शुरू होंगे? कोई आकर के कुछ बोलना चाहता है तो उसको भगा दो कुछ कर दो। तस्लीमा नसरीन के साथ क्या हुआ? सलमान रुश्दी के साथ क्या हुआ? कोई अगर कोई ढंग की सेंसिबल बात बोलना चाहता है तो सीधे एक नुस्खा है जाकर के उसके ऊपर शारीरिक हमला कर दो। जान ही ले लो उसकी। रिग्रेसिव। टोटली रिग्रेसिव।

अभी बांग्लादेश में एक पता नहीं कौन सी पार्टी है। नाम नहीं याद आ रहा। ग्रीन समथिंग पता नहीं कुछ। अभी पढ़ा नॉट वन ऑफ द मेन स्ट्रीम पार्टीज। एक कोई फार राइट पार्टी है जो उभर के सामने आ रही है। और वो कह रही है कि ये जितने यहाँ गैर मुस्लिम है इनका वोटिंग राइट हटा दो। इनका वोटिंग राइट हटा दो। आर्मी रूल करो और ये जितने भी हैं नॉन मुसलिम्स इनको बस ये हक होगा कि, अगर मुसलमान इन पर अत्याचार करता है तो आप जाकर के कंप्लेंट कर सकते हो। और उस कंप्लेंट को भी बस शरीअत के दायरे में सुना जाएगा।

आप ये सब कुछ करोगे, तो क्या प्रतिक्रिया नहीं आएगी बाकी दुनिया से? ये सब कुछ करके आप किसका भला कर रहे हो? चलो दूसरों का भला नहीं चाहते। अपना भला तो सोच लो। सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आई थी हिंदुस्तान में। उन्होंने कहा हिंदुस्तान में पब्लिक इंस्टीट्युशंस में सिर्फ़ एक जगह मुसलिम्स ओवर रिप्रेजेंटेड हैं। बताइए कहाँ? जेलों में। बोले हर जगह से मुसलमान नदारद है। संसद से नदारद है। एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन से नदारद है। जुडिशरी से नदारद है एग्जीक्यूटिव से नदारद है। कहाँ पाया जाता है? जेलों में पाया जाता है। वहाँ पर वो आबादी के अनुपात से कई ज़्यादा पाया जाता है। ये हालत आपने कर रखी है अपनी। और आपको होश नहीं आ रहा है अभी। एजुकेशन की जगह और दुनिया भर की व्यर्थ की बातों में आपको ज़्यादा रुचि है।

प्रश्नकर्ता: वो बहुत छोटी-छोटी चीजों के ऊपर वैलिडेशन और विक्टिम प्लेइंग करते हैं। ये तो मैं हमेशा क्वेश्चन करती हूँ। लाइक छोटी-छोटी.....

आचार्य प्रशांत: क्या विक्टिम प्लेइंग करते हैं? विक्टिम क्या? भारत जैसा देश जिसने पारसियों से लेकर के आज तक सबको शरण ही दी है। हाँ, आज शरण देने में हम थोड़ा नाक भौं सिकोड़ते हैं पर आज भी हम ऐसे क्रूर नहीं हुए हैं कि कोई शरण माँगने आए तो उसका गला काट दें। कोई भारत में होकर के अपने आप को विक्टिम कैसे बोल सकता है? कोई भारत में होकर के विक्टिम कैसे बोल सकता है अपने आप को? हाँ, ठीक है अच्छे बुरे लोग हर जगह होते हैं। भारत में भी हिंदू कट्टरपंथी हैं बिल्कुल हैं। लेकिन कुल मिलाजुला के भारत एक बहुत सहिष्णु टॉलरेंट देश है। भारत में विक्टिम कैसे हो गए?

अभी आईआईटी में वो आउटस्टैंडिंग कंट्रीब्यूशन टू नेशनल डेवलपमेंट अवार्ड मिला। तो मेरे ख़याल पाँच लोगों को मिला था। तो सीनियोरिटी वाइज़ दे रहे तो उसमें मैं उम्र में बैच वाइज में सबसे छोटा था। मुझसे छोटा बस एक व्यक्ति था और मालूम है कौन था? वो एक कश्मीरी मुसलमान था। वो एक कश्मीरी मुसलमान था। जो आईआईटी से बीटेक करने के बाद आईएएस बना। फिर उसने अच्छे काम करे हैं। तो उसको भी यही अवार्ड कंट्रीब्यूशन टू नेशनल डेवलपमेंट अवार्ड उनको भी मिला है।

भारत कहाँ भेदभाव करता है? भारत जैसा संविधान और कहाँ पाओगे? बताओ ना। भारत में भी यह कहना है कि हमारे साथ नाइंसाफी हुई है हम बदला लेंगे; अगर भारत नाइंसाफी कर रहा है तो फिर तो छोड़ दो कि कहीं भी इंसाफ मिलेगा।

क्या मतलब मज़ारों पर दरगाहों पर आज भी ज़्यादा हिंदू ही दिखाई देते हैं। जैसा भी माहौल हो गया उसके बाद भी फिल्मों में सूफी गाने आज भी आते हैं तो हिट हो जाते हैं। भारत उस दर्शन से आ रहा है जहाँ आत्मविश्वास बहुत गहरा है। जहाँ ये नहीं है कि अगर हम किसी को स्वीकार कर लेंगे, गले लगा लेंगे तो हमें खतरा हो जाएगा। या कोई नई सोच, नया विचार अगर हम स्वीकार कर लेंगे तो हम मिट जाएँगे। भारत को ऐसी कोई हीन भावना या डर नहीं रहा है। इसीलिए भारत बहुत सहिष्णु रहा है। लाइक अ ह्यूज मेल्टिंग पॉट आओ सब आओ, सब आओ। सब स्वीकार कर लिए जाओगे तो भी जो हमारा केंद्र है जो हमारा मूल है वो यथावत बना रहेगा। उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: मैं अपने जो एक सोच और एक नज़रिए को हमेशा मेरे भारतीय रूट्स को ही मैं श्रेय देती हूँ। क्योंकि मेरी तो पैदाइश और रिहाइश सब बंबई में हुई थी। बिल्कुल कॉस्मोपॉलिटन सोसाइटी में हुई थी। और मेरे माँ-बाप ने हमेशा मुझे वो कल्चरली ऑर्थोडॉक्स थे पर रिलीजियस नहीं थे वो, तो हमेशा से मुझे दूसरे मज़हबों के बच्चों के साथ खेलना और एनकरेज किया है।

बट ओवर द इयर्स ना आचार्य जी मैं देख रही हूँ कि एक तो मॉडर्न मुस्लिम और हिंदू होते हैं उनको कोई परवाह नहीं होती क्योंकि उनका लाइफ स्टाइल ही अलग होता है। बट जो मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास है ना और यहाँ पर भी वही चीज मैं देख रही हूँ जो यहाँ पर लोअर मिडिल क्लास और मिडिल क्लास मुसलिम्स है वो लोग माने गैर मज़हब के बच्चों को खेलने भी नहीं देते। मैंने अपने बच्चों को यहाँ पे तो इस्लामिक स्कूल्स भी पूरे बने हुए हैं। माने ये जो आपने जो सेपरेशन कर दिया है अब आप कैसे चाह रहे हो कि कोई हमें समझे। कैसे समझेगा कोई? आपने तो बुर्खा ओढ़ लिया।

आचार्य प्रशांत: ये आप कहाँ का बता रही हैं? ये आप कनाडा का बता रही है कनाडा में ऐसा हो रहा है?

प्रश्नकर्ता: सब जगह पर, इंडिया में भी इस्लामिक स्कूल्स होते हैं। स्पेशली अब जैसे मैंने कभी स्पेशल हिंदू स्कूल्स नहीं देखे। स्पेशली क्रिश्चियन स्कूल्स बहुत कम देखे हैं। होते हैं बट उसमें सब लोग को एडमिशन मिलता है। बट एक इस्लामिक स्कूल और ये मैंने खासतौर पे इस्लामिक स्कूल के लोगों को भी मैंने कहा कि अगर आप चाहते हैं कि हमें दूसरे मज़हब के लोग समझे और हमें गलत आइडेंटिफाई नहीं करें देन ओपन योर स्कूल्स। आप अपने अदारे अपने इंस्टीट्यूशन अपने स्कूल्स को खोलें और दूसरों को आने दें। आप किस बात से डरते हैं? आप किस चीज़ से झिझकते हैं? अगर आपने उनको बंद कर दिया तो लोग बोलेंगे, 'अरे! इसके पीछे क्या हो रहा है? उस दीवार के पीछे क्या हो रहा? अपने बच्चों को क्या तालीम दे रहे हैं?' तो आपने तो बना के तो ऐसे ही रखा है। सेफगार्ड के चक्कर में आपने दूसरों से आपने एक दुश्मनी ही मोड़ ली ना। अपने आप को सेफगार्ड कर रहे हैं। भले दूसरा इंसान गया, तेल लेते हुए गए।

आचार्य प्रशांत: इसमें सेफगार्ड भी कहाँ हो रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: नहीं हो रहे।

आचार्य प्रशांत: देखिए ये जो विचारों का खुला आदान-प्रदान होता है ना जिसमें कि हम दूसरे को ये भी छूट देते हैं कि तुम हमारी बात को काट सकते हो। तुम तर्क दे कर के हमें गलत साबित कर सकते हो, ये बड़ी स्वस्थ बात होती है। बहुत हेल्दी बात लेकिन आप इस बात को अगर रोकोगे तो आपके भीतर भी जो फिर बुराइयाँ या बीमारियाँ या भ्रम पनप रहे होंगे आप कभी उन्हें पहचान नहीं पाओगे। आपको कभी उनसे मुक्ति नहीं मिलेगी। आप एक आप एक सेल्फ कंटेंड सिस्टम बन जाओगे। आप बस अपनी ही बात की अनुगूंज सुनते रहोगे। इको चेंबर होता है ना, कि मैंने जो बोला बस मुझे वही सुनाई दे रहा है। जो मैं बोल रहा हूँ उसमें अशुद्धि है, त्रुटि है ये बताने वाला मुझे कोई है ही नहीं क्योंकि बाहर वाले से मैं खुलकर के साफ-साफ बात करना ही नहीं चाहता।

साहब, अगर आप सत्य को समर्पित हैं अगर आपकी निष्ठा 'डिवोशन ट्रुथ' के प्रति है तो बातचीत करने में झिझक कैसी? और बातचीत का मतलब ये नहीं है कि आप बस दूसरे को हक दे रहे हैं कि वह आकर आपको ज्ञान पिला दे। बातचीत का मतलब ये है कि आपको भी अपनी बात रखकर दूसरे को जताने की पूरी आज़ादी है। वो अपनी बात कहे, आप अपनी बात कहें। उसकी जगह आप यह कह रहे हैं कि नहीं मुझे गैर मुस्लिमों को दोस्त नहीं बनाना है। छोटे बच्चों को कह रहे हैं कि नहीं तुम वहाँ जाकर के हिंदुओं के या किन्ही के बच्चों के साथ खेलना मत तो स्वस्थ बात नहीं है।

जहाँ कमरे में सब खिड़की दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, वहाँ भीतर बदबू फैल जाती है। कई बार आप जाते हो ना और कहते हो कि कमरे में कुछ गंध सी आ रही है तो आप तुरंत क्या करते हो? सारे खिड़की दरवाजे खोल देते हो और पंखा चालू कर देते हो। वो जो वेंटिलेशन है वो बहुत ज़रूरी होता है सबके लिए बहुत ज़रूरी होता है।

और भारत इस मामले में बड़ा शानदार देश रहा है। संवाद की जो परंपरा भारत में रही है अद्भुत है। आइए सामने बैठिए बात करते हैं। क्यों? क्योंकि हमें सच्चाई से प्यार है।

और वो जिस भी दिशा से आ रही होगी हम आतुर हैं उसको जानने के लिए, सुनने के लिए कि हम और बेहतर होना चाहते हैं। हम अपने आप को और निखारना चाहते हैं। तो आप अगर कोई नया नज़रिया लेकर आए हैं, कोई नई बात लेकर आए हैं, कोई नया तर्क लेकर आए हैं तो हमें अच्छा लगेगा आपकी बात सुन कर के। बताइए सुनते हैं। और ये लगातार होता रहा है, होता रहा है, होता रहा है।

कोई मुझसे कह रहा था अभी बिल्कुल पहलगाम घटना के बाद की बात है। वो बोले कि जो खाड़ी के मुसलमान होते हैं, वो तो बिल्कुल मॉडर्न हुए जा रहे हैं धीरे-धीरे लेकिन जो ये सबकॉन्टिनेंटल मुस्लिम् हैं, इनको ज़्यादा हीन भावना है। ये ज़्यादा ये प्रमाणित करने में लगे रहते हैं कि हम सच्चे मुसलमान हैं। तो जो जॉर्डन, अरब, सीरिया उधर के जितने मुसलिम्स हैं वहाँ प्रोस्पेरिटी भी है। तो वो आधुनिक तरीके अपनाते जा रहे हैं। वो पुरानी बातों को धीरे-धीरे करके छोड़ते जा रहे हैं। लेकिन जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश यहाँ के मुसलमान हैं, इन्होंने ज़्यादा ठेका ले रखा है पुरानी रूढ़ियों में ख़ुद को जकड़े रखने का।

दो वजह होती हैं जिनसे पिछड़ापन फैलता है। एक अशिक्षा और एक ग़रीबी और ग़रीबी तब तक दूर नहीं होगी जब तक शिक्षा नहीं आ जाएगी।

तो मैं बार-बार कह रहा हूँ शिक्षा चाहिए। शिक्षा नहीं रहेगी तो पिछड़ापन बना ही रहेगा और आप अपना भी नाश करोगे, दुनिया का भी नाश करोगे। आप सबके लिए तकलीफ का कारण बनोगे। मुझसे कहते हैं लोग, कहते हैं —जैसे आपके यहाँ बातचीत होती है हमें हैरत हो जाती है कि आपसे कोई कुछ भी पूछ लेता है। बोलते हैं जो हमारे मौलाना वगैरह होते हैं आम मस्जिदों में, एक बहुत छोटा और टाइट फ्रेमवर्क होता है जिसके भीतर आप उनसे बात कर सकते हो। अगर आपने उनसे कोई बिल्कुल ज्ञान मूलक तात्विक प्रश्न पूछ लिया; उदाहरण के लिए यही कि, 'अल्लाह क्या है?' बोले आपको बाहर निकाल देंगे। जबकि ये बहुत साधारण प्रश्न है बल्कि सुंदर प्रश्न है। पर आपको बाहर निकाल दिया जाएगा।

प्रश्नकर्ता: जबकि क़ुरान का पहला वर्ड जो नाज़िल हुआ था वो इकरा है। इकरा यानी पढ़ तो उन्होंने पढ़ को सिर्फ़ ये कर दिया कि बस क़ुरान पढ़।

आचार्य प्रशांत: नाओमा जी उल्लेख तो ये भी मिलता है कि "इल्म इबादत से ऊपर की बात है।" इल्म इबादत से ऊपर की बात है। पर इल्म है कहाँ? इबादत है। इबादत माने भक्ति, वो भी अंधभक्ति पूजा 'डिवोशन' अंध-पूजा 'ब्लाइंड डिवोशन।' शिक्षा — 'एजुकेशन' 'एजुकेशन एंड मटेरियल प्रोस्पेरिटी' ये दो चीज़ें हैं जो चाहिए। ये दो चीज़ें जब आने लगती हैं तो ज़्यादा संभव हो पाता है फिर दिमाग की खिड़कियाँ खोलना।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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