मज़हब पर सवाल होते ही लोग नाराज़ क्यों हो जाते हैं?

Acharya Prashant

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मज़हब पर सवाल होते ही लोग नाराज़ क्यों हो जाते हैं?
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरे पास्ट के जितने भी एक्सपीरियंसेस रहे हैं, रिलीजियस एक्सपीरियंसेस, और इस बार ख़ासतौर से फैमिली और सोसाइटी, इन चीज़ों से, इन चीज़ों की याद दिला दी मुझे। मैं जब यहाँ पे आई, आचार्य जी, कनाडा में, तो मैंने कई सारे दोस्त बनाए। मुस्लिम दोस्त काफ़ी बने मेरे यहाँ पे। क्योंकि शुरू में जब मैं यहाँ पर आई थी, तो मैं प्रैक्टिसिंग ही थी काफ़ी। पर जैसे-जैसे मैं खुली और जैसे-जैसे सवालात हुए, और गहराई होने लगी दोस्ती में, पता चला कि मैक्सिमम नंबर ऑफ़ द वुमेन एंड मेन, वो लोग धार्मिक, रिलीजियस ट्रॉमा के शिकार हैं। चाइल्डहुड ट्रॉमा बहुत ज़्यादा गहरे। ये सब पढ़े-लिखे प्रोफ़ेशनल्स हैं, जो एक तरीक़े से अपने मेंटल स्टेट को अपने कामों में ढाँक के रख रहे हैं।

ज़्यादातर, अगर मैं सिर्फ़ औरतों की ही बात करूँ, तो ज़्यादातर लोगों को, बच्चों को, लाइक एज बच्चियाँ थीं जब वो, तो सात-आठ साल की उम्र में शेम, जैसे कि न, ड्रिल किया गया। बहुत ज़्यादा शेम, शेम ये ड्रिल किया गया, उनको तो इस चीज़ का समझ भी नहीं था। बट ख़ैर, छोटे-छोटे कज़िंस के बीच में “बाल नहीं दिखना चाहिए।” अब न वो लड़के को समझ में आ रहा, न वो लड़की को समझ में आ रहा। और जैसे हमारे दीन को एक तरीके से, बचपन में ना ठूँसा गया है माँ-बाप से। और ये भी ठूँसा गया है कि यही क़ुरान के अंदर कहा गया कि माँ-बाप को उफ़ तक नहीं बोलो। और यही क़ुरान में लिखा गया है कि “देयर इज़ नो कंपल्शन इन दीन।” माने, कोई ज़बरदस्ती नहीं है आपको धर्म पे रहना। और फिर यही क़ुरान में यह भी लिखा हुआ है कि आप दीन को समझ के लो। और अगर तुम्हारे माँ-बाप तुम्हें हक़ के रास्ते पर से हटाने की बात कर रहे हैं, तो उनकी बात मत मानो। ये भी कहा गया।

तो समझ में भी नहीं आता था ये कि; मेरा तो ये था कि मैं थोड़ी-सी टिमिड और शाय क़िस्म की लड़की थी। तो अगर मैंने देखा कि मेरे ऊपर दीन की ज़बरदस्ती हो रही है, तो मैं उससे ज़्यादा उनसे, मेरे में अपने माँ-बाप से भी ज़्यादा दीन सीख लिया पंद्रह साल की उम्र में। मैंने कहा, "अच्छा, आप मुझ पे अगर ज़बरदस्ती कर रहे हो, तो मैं इसी के अंदर घुस जाती हूँ।" तो मैं इतनी घुस गई थी दीन के अंदर कि, एट अ वेरी यंग एज, इन बॉम्बे, मैं सारे मदरसों में, सारे जो हल्क़े होते हैं, दीनी हल्क़े, उन सब में मैं उठती-बैठती थी। और अब मैं उनसे पूछती थी, "क्या आपने नमाज़ पढ़ी? क्या आपने रोज़ा रखा?" तो ये हो गया था मेरा।

तो ख़ैर उसके बाद शादी, वो भी आठ-दस साल बड़े इंसान से। और उनका भी जो आपको, माने रिस्पेक्ट देना है, वो भी सब कुछ दीन के माने उसके लिहाज़ से ही हो रहा था। सब कुछ कि ऐसे हस्बैंड को इस तरीके से आपको इज़्ज़त देनी है, या ससुराल वालों को इस तरीके से, जैसे आमतौर पे होता है।

जब मैंने देखा कि ये सारी चीज़ें दीन के साथ होने के बावजूद, इसमें आपको कोई रिस्पेक्ट, एज इन, नहीं मिलेगी अगर आपने सवाल कर दिया, तो ये मैंने देखा कि देयर इज़ अ डायरेक्ट कनेक्शन बिटवीन सवाल एंड विरोध। अगर हमने सवाल किया, तो मैंने देखा कि उनको लगता था मैं विरोध कर रही हूँ। मैं तो सिर्फ़ अपना एक ज़ाहिर कर रही हूँ ये चीज़ कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों है कि यहाँ पे एक जगह पे तो अल्लाह कह रहा है कि, "अरे, तुम सबको एक जैसा बनाया है। तुम सब एक जैसे हो। तुम्हारा हिसाब-किताब एक जैसा होगा।" और एक जगह पे आप ये कह रहे हो कि अगर तुम्हारे ख़ाविंद को तुमने रात को सेक्स नहीं दिया, तो रात भर तुम्हारे ऊपर फ़रिश्ते लानत भेजेंगे। तो अगर तुम चाहो या नहीं चाहो, ये तो दीन में लिख दिया है कि तुम्हें ऑब्लाइज करना पड़ेगा।

तो ये सारी चीज़ें होती रहीं। ये मैरिटल रेप एंड ऑल ऑफ़ दैट। तो जब मैंने सवाल किया, जब मैंने देखा कि, भाई, इसमें तो आपको आंसर नहीं मिल रहा, तो ऑब्वियसली डिवोर्स हुआ, सारी चीज़ें हुईं और मैं बाहर निकली। जब मैं बाहर निकली और मैंने सवाल करना देखा, तो मैंने देखा मैं अकेली नहीं हूँ, ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो इसी सेम सवाल से जूझ रहे हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी तो निकाल दी। अब नेक्स्ट जनरेशन, इनको हम हक़ की बात कैसे पेश करें ताकि इनके ऊपर कोई रिलीजियस ट्रॉमा, कोई चाइल्डहुड ट्रॉमा हावी नहीं हो? ये मैं अध्यात्म की उससे समझना चाहती हूँ, क्योंकि ये बड़ा क्रिटिकली, क्योंकि काफ़ी कंट्राडिक्शन रहता है इसके अंदर।

आचार्य प्रशांत: आपने जवाब अपने सवाल में लगभग पूरा दे ही दिया है। जितनी भी बातें हैं आप रख दीजिए बच्चे के सामने, बस एक हक़ उससे मत छीनिए, सवाल करने का। ठीक है? आपकी कुछ मान्यताएँ हैं, आपकी किताबें हैं, आपकी बहुत लंबे अरसे की परंपराएँ हैं। ठीक है? ये सब है, चलता आ रहा है। ये चलता आ रहा है, तो तथ्य है, फ़ैक्ट है। आप रख दीजिए उसको बच्चे के सामने। लेकिन साथ ही यह भी कह दीजिए कि यह वह है जो आज तक चलता आया है। तुम्हारे सामने रखा है। चलता आया है, तो हो सकता है इसमें कुछ वज़न हो। इतने लोगों ने इतनी शताब्दियों तक किसी बात को माना है, हो सकता है वो बात ठीक हो। लेकिन हम नहीं कह रहे कि वो बात निश्चित रूप से ठीक है ही। क्योंकि धर्म का उद्देश्य आपसे कोई बात मनवाना नहीं होता भाई।

धर्म का मतलब क्या है? और धर्म किसके लिए है? धर्म जो भी मतलब, यानी अर्थ रखता है, वह किसके लिए रखता है? वो इंसान के लिए रखता है न? अगर इंसान न हो तो बताइए धर्म किसके लिए बचेगा? पेड़ों का और पौधों का, नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों का तो कोई धर्म होता नहीं। उन्हें किसी धर्म की ज़रूरत भी नहीं है। यह ठीक है न बात? दुनिया में जितनी भी धार्मिक परंपराएँ रही हैं, वह सब किनके लिए हैं? इंसानों के लिए हैं। तो धर्म किसके लिए है? इंसान के लिए है। इंसान के लिए धर्म क्यों हो? इंसान को धर्म चाहिए ही क्यों है? क्योंकि इंसान उलझा हुआ है, दुखी है, परेशान है। तो धर्म का उद्देश्य ये फिर थोड़ी है कि किसी से कोई बात मनवा ली। और जो बातें जितनी ज़्यादा मानता चले, उसको आपने कह दिया, "यह उतना ज़्यादा दीनी आदमी है। यह उतना धार्मिक आदमी है।" यह थोड़ी है धर्म।

भाई, बच्चा पैदा होता है, क्या उसकी यह समस्या होती है कि वो कुछ बातें मान नहीं रहा है? अगर यह समस्या होती, तो अच्छी बात है आप उसे धार्मिक बातें मनवा लेते, उसकी समस्या दूर हो जाती। बच्चा पैदा होता है, उसकी समस्या यह होती है कि वो कुछ जानता नहीं है। और इसीलिए इंसान के बच्चे को पच्चीस साल की शिक्षा देनी पड़ती है, क्योंकि वह कुछ जानता नहीं है। तो हमारी समस्या ये नहीं है कि कुछ बातें हैं, जो मनवा दी जाएँ। हमारी समस्या यह है कि हमें जानना है और हम जानते नहीं हैं। जानना बहुत अलग होता है मानने से।

क्योंकि हम जानते नहीं हैं, इसीलिए हम कैसे रहते हैं? उलझे हुए, बेचैन। इधर-उधर घूमते हैं। ये क्या चल रहा है? ये क्या चल रहा है? पुराने आदमी की हालत सोचिए, जिसको कुछ नहीं पता था। न भीतरी तौर पर, न बाहरी तौर पर। कुछ का कुछ माने बैठा था, नदी की लहर देखता था सोचता था नदी के नीचे साँप है, वह उछल रहा है या फुफकार रहा है। सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण देखता था। दुनिया के जितने पुराने लोग थे उन सबने ग्रहणों को, एक्लिप्स को लेकर कैसी-कैसी कथाएँ बुन रखी थीं। क्यों? क्योंकि कुछ जानते ही नहीं थे।

और हज़ार तरह की बीमारियाँ होती थीं। दुनिया की आबादी ही नहीं बढ़ने पाई। आपको मालूम है, दुनिया की आबादी बढ़नी ही अभी शुरू हुई है, बहुत हाल में। नहीं तो हज़ारों सालों तक दुनिया की आबादी बढ़ी ही नहीं। दुनिया की आबादी का आप कर्व देखेंगे न, बिल्कुल प्रागैतिहासिक समय से, तो ये मान लीजिए अगर यह टाइम का एक्सेस है तो वो आबादी ऐसी ही रही है, ऐसी, ऐसी, ऐसी, ऐसी, ऐसी, ऐसी। फिर जब थोड़ी समझदारी आई, दुनियादारी आई, दवाएँ बननी शुरू हुईं, तो अचानक से हमारी आबादी ऐसे खड़ी हो गई है। और यह हमारी आबादी ऐसे खड़ी हुई है पिछले सौ-दो सौ सालों में बस। और हम लोग हैं बहुत पुराने, हम हज़ारों साल पुराने लोग हैं पर हमारी आबादी नहीं बढ़ रही थी। सोचो, इतनी हमारी ख़राब हालत थी।

तो हमारी ख़राब हालत यह है कि हम कुछ जानते नहीं थे। हमारी ख़राब हालत यह थोड़ी थी कि हम उद्दंड थे और हमें अनुशासित करने की ज़रूरत थी। "बात नहीं मानता है बच्चा", ये समस्या है? ये समस्या थी कि बच्चा बात नहीं मानता है? समस्या ये थी कि बच्चा कुछ नहीं जानता, न बाहर का कुछ जानता, न भीतर का कुछ जानता। और इसीलिए बच्चा बहुत दुख में है, बेचैन है। उसका पूरा जीवन ही बर्बाद हो गया अज्ञान में।

और जब अज्ञान होता है, तो अज्ञान रहने नहीं पाता। अज्ञान को ढकने के लिए इधर-उधर की फ़ालतू कहानियाँ, धारणाएँ, मान्यताएँ, अंधविश्वास आ जाते हैं।

कौन माने कि हमें कुछ नहीं पता, इससे अच्छा कहानी बना लो। "माँ, माँ, रात में सूरज कहाँ चला जाता है?" चलो, बताओ। "रात में न सूरज, वो जो तेरे ताऊ जी मर गए थे उनके यहाँ जाता है और रोटी बनाता है। और फिर ताऊ जी को गाना गाकर के और पाँव दबा के सुला देता है। और यह सब करके फिर नहा-धो के सूरज फिर आ जाता है तुम्हारे पास।"

जब कुछ पता ही नहीं है, तो फिर इस तरह की कहानियाँ बनाओगे, और उन कहानियों को भी तुम धर्म का नाम दे सकते हो। यह सब धर्म नहीं होता कि तुमने कहानियाँ बना लीं और बच्चों से कह रहे हो, "इन कहानियों को मानो।" तुमने व्यवहार के नियम बना लिए और बच्चों से कह रहे हो, "इन बातों को मानो।" धर्म का अर्थ है निर्मम जिज्ञासा। मेरी समस्या यह है, मैं जानता नहीं। तो धर्म है जानना। यह बहुत अच्छे से समझ लो, तुम्हारी केंद्रीय समस्या यह है कि तुम कुछ जानते नहीं हो और चूँकि जानते नहीं हो, इसीलिए फिर कहानियाँ और अंधविश्वास ले आते हो और कहते हो, "यही सच्चाई है।"

धर्म माने जानना, जानना। तो धर्म का मतलब ही है फिर सवाल उठाने की आज़ादी। जहाँ सवालों का गला घोंट दिया जाता हो, उसको धर्म नहीं बोलते।

आप सब कुछ रख दीजिए। बच्चा बड़ा हो रहा है, उसके सामने सारी बातें रख दीजिए। बिल्कुल रख दीजिए, ठीक है हैं। और उसको पूरा हक़ दे दीजिए कि ये बातें हैं। अब हर बात पर सवाल करो, हर बात को गहराई से जानने की कोशिश करो। गहराई से जानना है, गहराई से स्वीकारने को नहीं बोल रहे, मानने को नहीं बोले दे रहे। नहीं कह रहे कि तुम पापी हो और नर्क में कि दोज़ख़ में जाओगे अगर तुमने सवाल उठा दिया या फलाँनी बात मान नहीं ली। क्योंकि धर्म मानने का नाम ही नहीं है। मान्यताओं को थोड़ी धर्म बोलते हैं। धर्म विश्वास का और आस्था का थोड़ी नाम है।

हाँ, जो सब मज़हब के ठेकेदार रहे हैं, उन्होंने पूरी दुनिया को डरा-धमकाकर दुनिया भर में धर्म का यही मतलब कर दिया है, मान्यता, आस्था, विश्वास, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। जहाँ मान्यता है, वहाँ धर्म नहीं हो सकता। जहाँ विश्वास है, वहाँ धर्म नहीं हो सकता। जहाँ आस्था है, वहाँ धर्म नहीं हो सकता। विश्वास माने अब विवेक की क्या ज़रूरत है। आस्था माने अब जिज्ञासा की क्या ज़रूरत है। और समस्या थी तुम्हारी ये कि कुछ जानते नहीं थे। जानते नहीं थे तो जानने की अपेक्षा ले आए उठाकर कहानी। जानने का विकल्प कल्पना कैसे हो सकती है, भाई? मैं तुमको बोलूँ, "जाकर के देखना, नीचे कितने लोग हैं।" तुम आँख बंद करो और बोलो, "आठ।"

15 अगस्त अभी बीता है और 15 अगस्त 1975 को शोले रिलीज़ हुई थी। और वो पूछ रहा है, "कितने आदमी थे रे, सांभा?" और सांभा आँख बंद करके कह रहा है, "सरकार, आठ।" अब क्या होता, बताओ? पिक्चर भी फ्लॉप हो जाती। पिक्चर तक नहीं चल सकती, ज़िंदगी कैसे चलेगी। वहाँ भी सांभा ने एक तथ्यात्मक उत्तर दिया है। क्या उत्तर दिया? "कितने आदमी थे?" "दो।" तो पिक्चर चली। सोचो, सांभा धार्मिक आदमी है, बाबा जी का चरणामृत पीता है। और जैसे ही सरदार उससे पूछ रहा है, "कितने आदमी थे रे?" तो एकदम उसके कानों में घंटियाँ बजने लग गई हैं। और आँख बंद कर रहा है, ध्यान में चला गया है और कह रहा है, "आठ। मुझे अभी-अभी अनुभूति हुई है, भीतर से दिव्य अनुभूति कि आठ आदमी थे।" चलती पिक्चर? कोई याद करता शोले को? पिक्चर नहीं चलेगी, ज़िंदगी कैसे चला रहे हो इन कल्पनाओं में? और बच्चा बेचारा मासूम पैदा हो रहा है। उसके ऊपर भी यही बात थोप रहे हो कि ऐसा था, ऐसा था, ऐसा था, ऐसा था।

धर्म माने कट्टरता। कौन-सी कट्टरता? "नहीं मानूँगा।" ये कट्टरता? क्या "नहीं मानूँगा" कट्टरता ना, कट्टर जिज्ञासा। कट्टर जिज्ञासा। यही फ़ंडामेंटल है, यही बुनियादी बात है। यही आधार है, जिज्ञासा।

और इस अर्थ में तुम फ़ंडामेंटलिस्ट हो जाओ, तो वाह! क्या बात है। इस अर्थ में तुम कट्टर हो जाओ, तो वाह! क्या बात है। नहीं मानते। ये नहीं कि कसम खाकर बैठे हैं कि नहीं मानेंगे। समझ लेंगे, तो ठीक है। समझने की हमारी पूरी कोशिश रहेगी, बेईमानी नहीं करेंगे, जान लगा देंगे समझने की। पर फिर दूध का दूध, पानी का पानी होगा। फिर हमसे मत कहना कि झूठ को स्वीकार कर लो। पूरी जाँच-पड़ताल होगी, निष्पक्ष होकर के बात की गहराई तक जाएँगे। और फिर जो चीज़ दिख गई, उससे आँखें नहीं चुराएँगे। यह धर्म होता है। चाहे बाहर की दुनिया हो, चाहे भीतर की दुनिया हो, मैं जानूँगा।

बाहर की दुनिया में इसी बात को विज्ञान कह देते हैं, निष्पक्ष होकर जानूँगा, जो चीज़ जैसी है जानूँगा। मेरे मूड की बात नहीं है, मेरी पसंद-नापसंद की बात नहीं है, तथ्य की बात है। आप ये नहीं कह सकते, "ये कोई बात है। हमें नहीं अच्छा लगता।" ये क्या है? एवोगाड्रो नंबर ही कैसा है? 6.023। "6 नहीं, इसको 9 कर दो न। यू लव मी न? मेक इट नाइन।" ऐसा थोड़ी होता है। "नहीं, वेलॉसिटी ऑफ़ लाइट 3 रखो न पूरी, ये 2.999 क्यों बोलते हो? डोंट यू लव मी? मेक इट 3।" ऐसे नहीं चलता, तथ्य, तथ्य है। उसमें ज़रा भी घपला, मिलावट बर्दाश्त नहीं की जा सकती, चाहे वो बाहरी दुनिया हो, चाहे वो भीतरी दुनिया हो। मैंने अगर इतनी भी बेईमानी करी है, तो करी है। 3 और 2.999 में अंतर होता है, उतनी भी बेईमानी नहीं चलेगी भीतरी तौर पर, न बाहरी तौर पर।

दिक़्क़त ये होती है कि बाहरी वैसी बेईमानी करो, तो पकड़ में आ जाती है क्योंकि वो सार्वजनिक होती है। क्योंकि वो दूसरे द्वारा जाँची जा सकती है। आपने कुछ गड़बड़ बात लिखी है, कोई दूसरा उसको परख सकता है। उसको कहते हैं कि बात फ़ॉल्सिफ़ायबल होती है। भीतरी बेईमानी कर लो, कोई कैसे पकड़ेगा। तुम्हारे भीतर ईर्ष्या है, यह सिर्फ़ तुम जान सकते हो। दूसरा इशारा कर सकता है, पर प्रमाण नहीं दे सकता। प्रमाण तो तुम्हारी ईमानदारी ही दे सकती है। तो तुम चाहो, तो ख़ुद को ही घोषित कर लो कि मैं तो हूँ ही नहीं ईर्ष्यालु। कट्टर ईमानदारी, बाहर भी और भीतर भी। तथ्य के प्रति संपूर्ण समर्पण। तथ्यों के सामने कल्पनाओं को, मान्यताओं को, कहानियों को नहीं खड़ा करूँगा। इसको धर्म कहते हैं।

और सबसे बड़ा प्रतीक अगर कोई हो सकता है धर्म का, तो वह है प्रश्नचिह्न। जो कहते हैं न, धार्मिक प्रतीक, सिंबल्स। कोई यह बनाता है, कोई वह बनाता है, कोई कुछ बनाता है। हम कहते हैं, ये (प्रश्नचिन्ह) बनाओ। बात मज़ेदार भी है, बढ़िया लगेगा। क्या? कि आपके यहाँ कोई आ रहा है और बैठक में किसी भी और धार्मिक चिन्ह या प्रतीक की अपेक्षा क्या बना हुआ है बहुत बड़ा, दीवार पर? प्रश्नचिह्न बना हुआ है। और आप जाकर उसके सामने ऐसे नमन कर रहे हो। बात मज़ेदार भी है, चुटकुले जैसी भी है, लेकिन बहुत गंभीर भी है, क्योंकि धार्मिकता वही है। और धार्मिक समाज भी फिर आप सिर्फ़ उसको कह सकते हैं, जिसमें सवाल करने को प्रोत्साहित किया जाता है। वो धार्मिक समाज है, जहाँ सब कुछ ज्ञान से चलता है, कल्पना से नहीं। हवाई मान्यता से नहीं। उसको फिर आप कह सकते हो कि लोग धार्मिक हैं, राष्ट्र धार्मिक है।

सबसे जो बुरी चीज़ हो सकती है न बच्चों के साथ, वो यही है। दवाई दो। जैसा आपने कहा कि वह बच्ची है, छोटी मुस्लिम बच्ची। उसके बाल दिख रहे हैं, इस बात को लेकर उसे लज्जित कर दिया। उसके भीतर शेम, शर्म डाल दी। कल्पना का घोड़ा उड़ता रहे, इसके लिए लज्जा की चाबुक बहुत ज़रूरी होती है। और ये सब जो तथाकथित धार्मिक समाज हैं, उनमें आप ये बात पाओगे। बहुत सारी लज्जा। जिसको देखो, वही उसी को ये है कि, "हाय! यह तो लाज की बात है।"

शर्म, हया, इज़्ज़त। इतनी बड़ी चीज़ हो जाती है, इज़्ज़त, कि जब आप हत्या करते हो अपनी ही बेटी की, तो उसको ही बोलते हो ऑनर किलिंग। इतनी बड़ी चीज़ हो गई इज़्ज़त। इज़्ज़त, ऑनर, कि हत्या को भी तुम इज़्ज़त से जोड़ रहे हो। और किसी का बलात्कार हो जाता है, तो बोलते हो, "हाय! उसकी इज़्ज़त लुट गई।" उसकी इज़्ज़त उसकी चड्डी में बैठी थी? इज़्ज़त लुट गई। समझ में आ रही है बात ये? जहाँ कहीं भी तुम धर्म का संबंध इन चीज़ों से जुड़ा हुआ देखना, जान लेना। यह समाज ऊपर से धार्मिक और भीतर से घोर अधार्मिक है। इतनी बातें इज़्ज़त की, लाज की।

"लज्जा स्त्री का आभूषण है।" क्यों भाई? ज्ञानियों ने तो कहा है कि एक लाज हम रखते हैं। कौन-सी लाज? राम की लाज। और राम माने संकेत के तौर पर कह रहे हैं, सत्य। बस एक वही लज्जा रखनी होती है कि कभी झूठ के आगे सर न झुका दूँ। उसके अलावा हमें कहीं नहीं लज्जा-वज्जा आती, बहुत हम बेशर्म हैं। हाँ, कभी झूठे का साथ दे दिया, ग़लत जगह घुटने टेक दिए तो वो ज़रूर हमारे लिए लज्जा की बात है। बाक़ी हमें तुम्हारी सामाजिक मान्यताओं को लेकर कोई लाज-शर्म नहीं है। यह होता है धार्मिक समाज। यह थोड़ी कि वह मरी जा रही है कि कहीं नक़ाब से किसी ने गाल तो नहीं देख लिया। सबके पास गाल होता है, किसके पास गाल नहीं होता? ज़्यादातर लोग जीवन भर बस गाल ही बजाते हैं। गाल किसके पास नहीं।

तेरा गाल किसी ने देख भी लिया, तो इतना तू क्या इसमें? “मेरी आँख देख ली, किसी ने मेरी नाक देख ली।” तेरे शरीर में जो कुछ है न, वो दुनिया की कम से कम आधी आबादी के पास है। और काफ़ी सारे तेरे शरीर के पुर्ज़े दुनिया की पूरी आबादी के पास हैं। तो ऐसा क्या छुपा रही है कि किसी ने देख लिया, तो क्या होगा? लाज आ गई? "हाय-हाय! मैं शर्म से लाल हुई।"

“लाली मेरे लाल की, जिधर देखूँ तित लाल।” तू शर्म से क्या हो रही है लाल? "लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।" ये लाल हुई जा रही है लाज के मारे। "हाय-हाय! फलाने ने मेरी एड़ी देख ली।" चलो, एड़ी हटाओ यार। "फलाने ने मेरा घुटना देख लिया।" ये कितनी लाज की बात है! उसके पास भी घुटना है। तो? तेरा देख ले कि अपना देख ले, का फ़र्क पड़ता है? अपना ही देख लिया करो।

प्रश्नकर्ता: बहुत डीप होता है, आचार्य जी। ये जो आइडिया है न, यह बहुत डीपली। फियर, भय, गिल्ट और शर्म, ये इन सबका एक मिक्सचर बनाकर डाला जाता है। माने, मुझे सिर्फ़ हिजाब निकालने के लिए, अगर मैंने 17-18 साल पहना था हिजाब, तो वो निकालने के लिए मुझे एक सीक्वेंस लगा तीन साल का। पहले मैं बंडाना पहनने लगी थी। फिर मैं इतना हाफ हेयर बैंड होता है, वो पहनने लगी थी, क्योंकि कुछ-न-कुछ कपड़ा चाहिए था सर पर। ऐसा लगता था कि मैं बिल्कुल नंगी हो गई हूँ। इतना डीपली वो इनग्रेन्ड होता है।

तो आप सोचिए, फिर ये सब लोगों को…, ज़्यादातर तो मैं लड़कियों से बात करा इसके बाद, तो वो तो फियर ऑफ़ फैमिली ऑर फियर ऑफ़ सोसाइटी की शेम से पहनती हैं। और अब तो ख़ैर, हिजाब इज़ बिकम मोर ऑफ़ अ पॉलिटिकल आइडेंटिटी। ऐसा कोई मॉडेस्टी से कुछ उसका रिलेटेड रिलेशन नहीं रहा है ज़्यादातर लड़कियों का। इट इज़ मोर ऑफ़ अ पॉलिटिकल और रिबेल आइडेंटिटी है वो। फ्लैग बेयरर्स बोलते हैं वो अपने आप को। तो मैं सिर्फ़ बताना चाह रही हूँ कि वो इतना डीप होता है, क्योंकि अगर आप छोटी उम्र से ये चीज़ें प्लांट कर दो न, और इसलिए वो लोग करते हैं, ताकि वो चीज़ उखाड़ने में बहुत अरसा लग जाए। बिल्कुल, ट्रांसफ़ॉर्मेशन।

आचार्य प्रशांत: एकदम मुश्किल हो जाता है। आपने किसी चीज़ का अभ्यास कर लिया 20-25 साल तक, वो जिसको कहते हैं न, सेकंड नेचर, वो बन जाता है आपका। अब आप कोशिश भी कर लें उससे कुछ करने की, तो आपको बड़ा असहज लगेगा। आपको लगेगा, "ये क्या है? अजीब लगता है। छोड़ो न, वैसे भी ठीक है। हाँ, मुझे मालूम है मैं ऐसे भी कर सकती हूँ, वैसे भी कर सकती हूँ। पर अगर वैसे भी कर लूँ, तो बुराई क्या है? ठीक है। अब आदत है, करने दो, कुछ नहीं हो गया।" ये सब शुरू हो जाता है, ये होता है। और लड़कियों में नहीं होता, लड़कों में भी होता है।

जब मैं बारहवीं में था और जेई की तैयारी कर रहा था, तो मेरा एक दोस्त था। वो बिहार से था, तो रूटीन था कि रात भर पढ़ता था और फिर सुबह दौड़ लगाते हुए मैं उसके घर तक चला जाता था। और फिर वहाँ से, अगर जिस दिन स्कूल जाना है, स्कूल चले गए। नहीं, तो अपना ऐसे ही घूम-फिरकर वापस आ गया, 7-8:00 बजे तक।

तो मैं दौड़ता हुआ जाता था शॉर्ट्स में। और मुझे उसी समय से छोटे शॉर्ट्स, बॉक्सर शॉर्ट्स पहनना पसंद था। वो सुबह-सुबह, भले ही मौसम अच्छा हो, सब हो, कोई समस्या नहीं, वो पूरी टाँग का पायजामा पहने बिना, लोअर पहने बिना, उससे निकला न जाए। मैं उसको बोलूँ कि, "तू पहन ले, भाई, यही पहन ले। तू निक्कर पहन ले, शॉर्ट्स पहन ले।" वो नहीं, वो लड़का है और वो एनसीआर में रहता है, उससे भी नहीं हो रहा था। वो कहे कि, "बड़ा अजीब-सा लगता है। टाँगें खुली-खुली।" लड़के भी घबराते हैं।

अब मैं आपको बताऊँ, मैंने उसका कन्वर्ज़न कैसे करा। हवसी वो एक नंबर का था, तो उसको लड़कियाँ देखनी होती थीं। तो फिर मैंने उसको इंस्पायर करा। मैंने कहा, "देख, अगर तू भी एग्ज़ाम्पल सेट नहीं करेगा, तो फिर उन बेचारियों का क्या होगा? अगर तू भी ये इतना लंबा लोअर नहीं छोड़ सकता, तो फिर तू क्यों उम्मीद कर रहा है कि तू सड़क पर निकलेगा और तुझे नज़ारे दिखेंगे?" धीरे-धीरे करके ये बात उसको समझ में आई और मेरा धर्मांतरण कार्यक्रम सफल हो गया। बहुत मुश्किल होता है, बहुत मुश्किल होता है। किसी से प्यार करते हैं, तो उसके भीतर गिल्ट मत बैठाइए। ये सब जो चीज़ें हैं न, संकोच। ये जो इधर पूरब की संस्कृतियाँ हैं, इनमें इनको बहुत बेवजह इज़्ज़त दे दी गई है, इन बातों को। "बड़ा संकोची है, लज्जालु है।"

घर पर लड़के वाले आए हैं, लड़की बाहर ही नहीं निकल रही। कह रहे, "अरे-अरे, लाजवंती है। निकल ही नहीं रही बाहर।" और बहुत इसको ऊँचे दर्जे की बात माना जाता है। "शीलवंती है, शील है।" ये शील है, इसको शील बोलते हो। तभी तो हमारे यहाँ सुशीला इतना प्रचलित नाम है, कि शीलवंती। शीलवंती का एक ही मतलब होता है। उसके पास कपड़े बहुत होंगे और आवाज़ बिल्कुल नहीं, कपड़े बहुत सारे डालकर रखेगी और मुँह से चूँ नहीं करेगी। बस, तो इतने से ही ज़ाहिर हो जाता है कि वह सुशीला है। और ये सब किसके नाम पर हम चला ले जाते हैं? धर्म के नाम पर।

यह धर्म नहीं है। मैं बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ कि कपड़े उतारना धर्म है। मैं आपसे कह रहा हूँ कि कपड़ों से धर्म का रिश्ता ही नहीं है। न पहनने से, न उतारने से। बहुत सारे कपड़े पहनकर भी तुम धार्मिक नहीं हो जाओगे और सारे कपड़े उतार देने से भी तुम धार्मिक नहीं हो जाओगे। बात बाहरी परिधान की नहीं है, आंतरिक केंद्र की है। पूरे शरीर को ढक लोगे तो तुम दीनी हो गए, मज़हबी हो गए? ये तो देह-भाव ही तुममें और प्रगाढ़ किया जा रहा है न। बुर्क़ा, हिजाब, पूरा ये क्या करा जा रहा है? सोच के देखिए तो बॉडी आइडेंटिफ़िकेशन ही तो और बढ़ाया जा रहा है न। और क्या करा जा रहा है?

प्रश्नकर्ता: बिल्कुल। उनकी पूरी, औरतों की पूरी हस्ती, क्योंकि मैंने इतने क्लोज़ली ऑब्ज़र्व किया है इस चीज़ को। और हिजाब के ऊपर मैं काफ़ी टॉक्स दे चुकी हूँ। ऑनलाइन भी हैं मेरे वीडियोज़। उनका पूरा जो, जैसे आपने कहा न, हमेशा सेंटर, केंद्र, वो बॉडी हो जाती है। अब तुम्हें कोई आदमी दिख रहा हो या नहीं दिख रहा। मैंने तो ऐसे यहाँ तक एक्सपीरियंस किया है कि औरतों के झुंड में भी औरतें अपना हिजाब नहीं निकालतीं कि, "अरे, किसी ने अगर मेरा बाय मिस्टेक वीडियो निकाल लिया तो? किसी ने मेरा पिक्चर ले लिया तो?" माने, और कुछ ऐसा नहीं है कि कोई हीरोइन दिख रही हैं, कुछ भी ऐसा नहीं है। इट्स जस्ट कि उनको बॉडी से इतना ज़्यादा आइडेंटिफ़ाई कर दिया, जोड़ दिया गया है। अब उसके अलावा कुछ और नज़र ही नहीं आता।

आचार्य प्रशांत: आपको यह पता होगा न। अब आप भारत हिंदुस्तान, मुंबई रही हैं, जानती हैं। भारत में ज़्यादातर महिलाएँ, ये तो छोड़िए कि दूसरी महिलाओं के सामने कपड़े हटाना, वो नहाते समय भी कपड़े नहीं हटातीं। वहाँ इतनी लाज रहती है कि बंद बाथरूम में, और कोई वहाँ सीसीटीवी नहीं लगा हुआ है, वो नहाते वक़्त भी कपड़े नहीं हटातीं। और लाज इतनी गहरी है कि जो स्त्री-रोग होते हैं, गायनी बीमारियाँ, उनसे लाखों महिलाएँ मर जाती हैं। पर लाज इतनी गहरी है कि इलाज नहीं करवाती हैं।

प्रश्नकर्ता: बहुत दुख की बात है ये।

आचार्य प्रशांत: लाज है। और इस चीज़ का अब आप गहरा संबंध ख़ुद ही सोच लीजिएगा, जो ये पोर्न एडिक्शन होता है, उससे। कि जब आप एक एक्सट्रीम खड़ा कर दोगे, तो दूसरा फिर अपने आप आएगा ही आएगा। दुनिया में सबसे ज़्यादा जो पोर्न कंज़म्प्शन है, वो सबसे ज़्यादा धार्मिक देशों में होता है, कीतनी अजीब बात है ये। जो देश जितने ज़्यादा धार्मिक हैं, वहाँ उतनी ज़्यादा पोर्नोग्राफ़ी कंज़्यूम होती है। अब तो शायद फिर भी...

प्रश्नकर्ता: बनाया जाता है। एक्चुअली ईस्ट की कंट्रीज़ के लिए पोर्न बनाया जाता है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, हाँ। क्योंकि देखने वाले वही हैं, तो उन्हीं के लिए बनेगा। अब तो आँकड़े बदल गए होंगे। जब भारत में नया-नया इंटरनेट आया था न, अब क्या आँकड़े हैं, देख लेना। तो 2005–2010 तक ये हालत थी कि 50% इंटरनेट यूसेज पोर्न के लिए था। क्यों? क्योंकि एक सिरा हमेशा दूसरे सिरे को, दूसरी अति को जन्म देता ही देता है।

प्रश्नकर्ता: अट्रैक्ट भी करता है ऑपोज़िट।

आचार्य प्रशांत: और सबसे ज़्यादा देखने वाले भी कौन हैं? आँकड़ा नहीं है मेरे पास, पर अनुमान लगा रहा हूँ। जितना ज़्यादा जहाँ पर ये दमन का, और लज्जा का, और इन सब बातों का खेल चलता है, वहाँ उतना ज़्यादा होगा पोर्न कंज़म्प्शन। वो लड़का ऊपर-ऊपर से दिन भर बिल्कुल संस्कारी बालक बनकर घूमेगा। और सब बंद-वंद कर-करके अपना रात में हाउसी भेड़िया बन जाएगा मोबाइल की स्क्रीन के सामने।

आप इंस्टाग्राम पर जाइएगा। बहुत मजेदार बात है। जितने धार्मिक बाबा लोग होते हैं, सबसे ज़्यादा इंस्टाग्राम पर आप पाओगे कि छाए हुए हैं। और सबसे ज़्यादा सॉफ़्ट पोर्न भी इंस्टाग्राम पर ही छाई हुई है। क्योंकि ये दोनों साथ चलते ही चलते हैं। जहाँ पर नकली क़िस्म की धार्मिकता होगी, देह को ही धर्म से जोड़ने की कोशिश करेंगे, वहीं फिर देह से संबंधित वासना-भाव भी सबसे ज़्यादा होगा। तो नकली बाबा जी इंस्टाग्राम पर सबसे ज़्यादा हैं, और इंस्टाग्राम अब सॉफ़्ट पोर्न का अड्डा भी बन रहा है। दोनों चीज़ें एक साथ चलेंगी, हमेशा समानांतर।

प्रश्नकर्ता: मेरे सर्किल में तो जो अरबी दोस्त मेरे बने थे, यह बहुत दिल दहलाने वाली बात मैं बता रही हूँ, जिससे मुझे सबसे ज़्यादा शॉक हुआ था कि जो सऊदी और उन इलाक़ों के जो लोग थे, यूएई, सऊदी के बचपन के जो बड़े हुए, वो चाइल्ड मोलेस्टेड और चाइल्ड रेप्ड भी थे, एंड दे आर कमिंग फ़्रॉम ऑर्थोडॉक्स फ़ैमिलीज़। तो बहुत मुझे तो ये हैरत हुई थी। ख़ैर, हमारे यहाँ इंडिया में इतना ज़्यादा मुझे याद नहीं।

आचार्य प्रशांत: नहीं, इंडिया में वो चीज़ इतनी नहीं है। बिल्कुल, जो मिडिल ईस्ट है, जितना होता है कि लड़कियों की ट्रैफ़िकिंग हुई है, वो ज़्यादातर सब गल्फ़ कंट्रीज़ की ओर ही जाती है।

प्रश्नकर्ता: बॉयज़ की बात करूँ, ज़्यादातर। दे आर स्पिरिचुअल टीचर, दे आर कुरान टीचर, और सम फ़ैमिली मेंबर। तो ये मुझे बहुत वो लगा था।

आचार्य प्रशांत: और इसमें कोई चौंकने की बात नहीं है। क्योंकि यह जो ऊपर-ऊपर वाली कट्टर धार्मिकता होती है, जो सिर्फ़ सतह से मतलब रखती है, जितनी ज़्यादा होगी, यह अपना जो डुअल ऑपोज़िट है, उसको भी इंड्यूस करके रखेगी ही रखेगी। आप दुनिया के सामने, समाज में बिल्कुल सफ़ेदपोश बनकर घूमोगे, सब कुछ ढका, साफ़-सुथरा, संयमित, मर्यादित, अनुशासित। और जितना ज़्यादा आप दुनिया के सामने, रोशनी में संयमित, मर्यादित और ऐसे बनकर घूमोगे, उतना ही ज़्यादा फिर बंद कमरों में और अँधेरों में आपका जानवर भौंकेगा। ये दोनों बातें एक साथ चलती हैं।

प्रश्नकर्ता: ऐसा भी मैंने लोगों का एक्सपीरियंस सुना है। मेरा ख़ुद का हो चुका है, पर मेरा बहुत कम था। तवाफ़ करते हैं न, जो काबे के अराउंड तवाफ़ करते हैं, उसके दौरान औरतों के साथ वहाँ बदतमीज़ी और मोलस्टेशन हुआ है। क्योंकि इतने क़रीब होते हैं न उसमें, तो वहाँ पर भी नहीं छोड़ा। यह हद हो गई कि यह सोचो कि अगर आप वो मानते हो कि यह अल्लाह का घर है, और वहाँ पर आपको अपना बेस्ट परफ़ॉर्मेंस देना है, तो ये आपका बेस्ट परफ़ॉर्मेंस आपने दिया है।

आचार्य प्रशांत: कोई स्क्रिप्चर भी होता है, वह भी अपनी असलियत आस्थावान के सामने नहीं ज़ाहिर करेगा, जिज्ञासु के सामने ज़ाहिर करेगा। आपको अपने धार्मिक ग्रंथ से भी अगर सच जानना हो, उसका कोर, उसका केंद्र, उसका दिल जानना हो, तो उसके सामने सिर मत झुकाइए, उससे सवाल करिए। जब आप उससे सवाल करते हैं न, तब वो अपना दिल खोलकर आपके सामने रखता है।

इस दुनिया को धार्मिक ग्रंथों से बात करने की तमीज़ भी नहीं आई है आज तक। ये सोचते हैं, ग्रंथ इसलिए हैं कि सिर पर रख लो और पूजा कर लो ग्रंथों की। और ग्रंथ बेचारा कब से इंतज़ार कर रहा है कि कोई आकर मुझसे सवाल-जवाब करे। कैसा सवाल? कट्टर सवाल। कट्टर जिज्ञासा। ग्रंथ मुस्कुराता है। ग्रंथ मुस्कुराता है, जब आप उससे कड़ा सवाल पूछते हैं। तब वो सच्चाई को रिवील करता है।

जो कोई सवाल-जवाब नहीं करते, बस आकर सिर झुका देते हैं या कुछ बातें दोहरा देते हैं, कुछ शब्द दोहरा दिए, ग्रंथ कहता है कि तुम्हारे लिए बस लिहाफ़ काफ़ी है और काग़ज़ काफ़ी है। तुम्हें असलियत से कोई मतलब नहीं, तुम्हें असलियत मिलेगी भी नहीं। तुम्हें किताब के नाम पर वज़न मिल जाएगा, सच्चाई नहीं मिलेगी।

प्रश्नकर्ता: आपने बहुत सही, अच्छी बात कही, क्योंकि इससे मैं कनेक्ट कर रही हूँ कि जो वर्ड 'हिजाब' है, वो कुरान में कहीं भी हेडस्कार्फ़ के लिए नहीं आया है। हिजाब के बारे में अगर बात हुई है, तो वो इंसान और अल्लाह के बीच में एक पार्टिशन, वेल डाल दिया है आपने। तो जब मैंने ये मायने जाने कि तुमने अपने और ख़ुदा या हक़ को जानने के लिए अपने बीच ये पार्टिशन, हिजाब डाल दिया है, अब तुम्हारे समझ कुछ नहीं आने वाला। अब तुम ये स्क्रिप्चर पढ़ते रहो, खोलते रहो, तुम्हें कुछ समझ में नहीं आएगा। सिवाय जब तुम वो हिजाब हटा दोगा।

आचार्य प्रशांत: आवरण, माया। और महिलाओं को आवरण पहना दो, फिर बोलो, "तू माया है।" उसके ऊपर ख़ुद ही माया डाल दो कि तुझे यह हमेशा पहनना है, तो फिर बोल, "अब तू माया है।" बढ़िया है। चलिए, और कुछ?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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