धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरे पास्ट के जितने भी एक्सपीरियंसेस रहे हैं, रिलीजियस एक्सपीरियंसेस, और इस बार ख़ासतौर से फैमिली और सोसाइटी, इन चीज़ों से, इन चीज़ों की याद दिला दी मुझे। मैं जब यहाँ पे आई, आचार्य जी, कनाडा में, तो मैंने कई सारे दोस्त बनाए। मुस्लिम दोस्त काफ़ी बने मेरे यहाँ पे। क्योंकि शुरू में जब मैं यहाँ पर आई थी, तो मैं प्रैक्टिसिंग ही थी काफ़ी। पर जैसे-जैसे मैं खुली और जैसे-जैसे सवालात हुए, और गहराई होने लगी दोस्ती में, पता चला कि मैक्सिमम नंबर ऑफ़ द वुमेन एंड मेन, वो लोग धार्मिक, रिलीजियस ट्रॉमा के शिकार हैं। चाइल्डहुड ट्रॉमा बहुत ज़्यादा गहरे। ये सब पढ़े-लिखे प्रोफ़ेशनल्स हैं, जो एक तरीक़े से अपने मेंटल स्टेट को अपने कामों में ढाँक के रख रहे हैं।
ज़्यादातर, अगर मैं सिर्फ़ औरतों की ही बात करूँ, तो ज़्यादातर लोगों को, बच्चों को, लाइक एज बच्चियाँ थीं जब वो, तो सात-आठ साल की उम्र में शेम, जैसे कि न, ड्रिल किया गया। बहुत ज़्यादा शेम, शेम ये ड्रिल किया गया, उनको तो इस चीज़ का समझ भी नहीं था। बट ख़ैर, छोटे-छोटे कज़िंस




