
आचार्य प्रशांत: आपके और इस आश्रम के बारे में, आपके और संसार के बारे में, आपके और मेरे बारे में, कुछ बातें समझ लेना ज़रूरी है। आप किसी बाहरी जगह पर नहीं आये हैं, लगता ऐसा ही है। पर इंसान की आँखों का कुछ खास भरोसा किया जा नहीं सकता।…

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी समझ में नहीं आता कि क्या गलती करी, असफलता क्यों मिली, बदलाव कैसे करूँ, तरक्की कैसे करूँ?





छात्र: सर, हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ क्यों नहीं सुन पाते? जैसे पहली बार शराब पीने से पहले पता होता है कि गलत है पर रुक नहीं पाते। ऐसा क्यों है?


एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।













आचार्य प्रशांत: जब समझ में न आये कि गलती कहाँ हुई तब गलती खोजना ही बन्द करो। पूरी प्रक्रिया को दोबारा शुरू करो ऐसे जैसे कि पहली बार कर रहे हो।…
प्रश्नकर्ता: आपके साइन (हस्ताक्षर) देखें। आप बिल्कुल सरल तरीके से अपना नाम ही हिंदी में लिख देते हैं। तो आप ऐसे साइन क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: आपत्ती क्या है? कुछ उसमें गलत दिख रहा है क्या? दो बातें तुमने कहीं। पहली कि सीधे-सीधे अपना नाम लिख देते हैं और…
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग। ~ जपुजी साहिब (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: फ़्री विल (मुक्त इच्छा) भी एब्सोल्यूट्ली फ़्री (पूर्णत: मुक्त) है। आपकी जो फ़्री विल है, वो भी इस मामले में तो बाउन्डेड (सीमित) है ही कि वो आपकी नहीं है। जो आपकी इच्छा है वो तो…
आचार्य प्रशांत (आचार्य): जब हम रत्न की बात कर रहे होते हैं और उसकी सफ़ाई करनी है क्योंकि वो मिट्टी में पड़ा था, मैला हो गया है, कीचड़ जम गया है, तो हम कीचड़ की बात ऐसे करते हैं जैसे कि वो कोई बात करने लायक चीज़ ही नहीं है,…
प्रश्नकर्ता: सर, स्वधर्म क्या है और कहाँ से आता है?
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म आपके होने से आता है। कैसे आता है? समझिए। आप जब ‘घर’ में होते हो तो आप कुछ नहीं होते हो। हम कहते हैं न कि तुम ‘घर’ से बिछड़ गए हो। तुम घर से बिछड़ते नहीं…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।
भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।
तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।
आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।
ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।

ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।

पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।

ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।

जीसस धर्म को आमूल-चूल हिला देते हैं। प्रेम के नए अर्थ, सत्य के नए अर्थ, प्रार्थना के नए अर्थ सामने आने लगते हैं। सत्ताधीशों के लिए मुसीबत हो जाती है, साज़िश करी जाती है। ऐसा नहीं था कि वो मरना चाहते थे। पर अब मौत सामने आ ही गई है, तो भागना भी कैसा? जीते रहते तो बढ़िया ही रहता, मौज आ रही थी जीने में। पर मर भी गए तो कोई बुराई नहीं, क्योंकि जितना जिए, पूरा जिए। और हँसते-हँसते जीसस एक दिन सूली चढ़ जाते हैं।

इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।

आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।

बच्चे को स्मॉल पॉक्स हुई है। और आपसे कोई कहेगा ये चेचक नहीं है, माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छानकर पिलाओ। ये बात कौन मान सकता है? सिर्फ ऐसा आदमी जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। आप अगर ऐसे आदमी हो जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, तो आप सवाल पूछोगे ना? जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे।

आपका हर assumption आपको भीतरी तौर पर और ज्यादा वह बना देता है जो आप पहले से ही हो। Assumption ऐसे ही नहीं उठते। जब भी कोई बोले ना, 'No but I assumed…हंसने लग जाइए।' यह assumption नहीं है। यह साजिश है। All assumptions are conspiracies.

अपने हिसाब से भगवान को आपने चुना, उसके बाद उम्मीद भी आपने ही लगाई कि अब ये मेरी कामना है, ये आप पूरी करो। और हम खुशामद करेंगे, पाँव पड़ेंगे, दूध चढ़ाएँगे, तो वो प्रसन्न हो जाएगा और हमारी डिज़ायर्स पूरी करेगा। भगवान को इन चीज़ों से क्या मतलब है? भगवान माने सत्य; जो पहले ही पूर्ण है, वो आपका पैसा लेकर क्या करेगा? जो आप चढ़ा रहे हो, किसी की जेब में तो जा रहा है न। जिसकी जेब में जा रहा है, उसी का स्वार्थ है और उसी ने सारी गड़बड़ फैलाई है।

श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…

हम कॉन्शियस बीइंग्स हैं, कॉन्शियसनेस का काम होता है जानना। कोई सुपरस्टिशस काम कर रहा है और कह रहा है, ‘ऐसे कर रहा हूँ, तुम भी करो।’ तर्क आपको नहीं देना है, तर्क उनके पास होने चाहिए जो ये सब कर रहे हैं। वो तर्क दें, फिर उन तर्कों का परीक्षण करा जा सकता है कि वे कितने फैक्चुअल हैं, उनमें हाइपोथेसिस कितना है, सपोज़िशन कितना है। आपके लिए इतना कहना पर्याप्त है कि आई एम अ कॉन्शियस बीइंग, जो तभी कुछ करती है जब वह पहले समझ लेती है।

देवी इत्यादि किसी के शरीर में नहीं प्रवेश करती, ये निश्चित रूप से एक मानसिक बात है। और इसीलिए ये चीज़ पाई वहीं पर जाती है ज़्यादा, जहाँ पर इस तरह की भ्रांतियाँ प्रचलित होती हैं। जिसके मन में ये बात पहले से होगी कि देवी इत्यादि प्रवेश करती हैं, वहाँ ये चीज़ खूब होगी। पुराने आदिवासी कबीलों में चले जाओ, वहाँ नियमित रूप से ऐसा होता है कि किसी पर कोई आकर के पुरखा सवार हो गया या किसी पर आकर के कुल देवता सवार हो गया।

ये सारी बात अपने लिए होती है, किसी दूसरे की जान लेने के लिए थोड़ी होती है। तीन साल की बच्ची है, उसकी तो अभी चेतना ही विकसित नहीं हुई है। संथारा जानने-समझने योग्य जो लोग हैं, उनके लिए प्रासंगिक हो सकती है, वहाँ प्रासंगिक। छोटी बच्ची के लिए थोड़ी उसकी कोई, वहाँ न उसकी प्रासंगिकता है, न कोई उपादेयता है। ये क्रूरता है, एक प्रकार की।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

सतत् अवलोकन ऐसा होता है – लगातार चलता रहे। अपने आप को देखते रहो। देखते रहो – क्या चल रहा है? क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो? कहाँ अपने आप को धकेल रहे हो? किन बातों में निवेशित हो रहे हो? किस बात से बिल्कुल घबरा के भाग ही जाते हो? क्या इरादे बना रखे हैं? योजनाएँ क्या हैं? यही सब। जो कुछ भी चल रहा है जीवन में, उसका सतत् निरीक्षण करना होता है। पिनपॉइंटेड निरीक्षण नहीं करना होता, फुल बॉडी स्कैन चाहिए।

समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है। दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है।

प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

जानते-बूझते कुछ नहीं, बस किए जा रहे हैं — यही अंधविश्वास है। कोई भी चीज़ इसलिए ठीक नहीं हो जाती, क्योंकि वो पीछे परंपरा से आ रही है। हमेशा पूछा करो — क्यों? जो सवाल नहीं पूछ सकता, वो इंसान ही नहीं है। आपकी जिज्ञासा ही आपको इंसान बनाती है। पीछे से सिर्फ़ वो लेना है जो कभी पीछे नहीं छूट सकता। पीछे से आप वेदांत दर्शन ले सकते हो, क्योंकि वो उस विषय की बात करते हैं, जो समय के साथ बदलता ही नहीं है।

हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।

श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में हैं, और मीरा भी। इन्हें मिलने दो, फिर आफ़तों में भी नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, तुम मौज में रहोगे। मीरा होना अनिवार्य है; जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। जिनमें यह मिलन नहीं होता, वे सूखे, उदास जीते हैं। समझ ही श्रीकृष्ण है; जब समझ जागेगी, तब मीरा नाचेगी। यही मिलन, यही योग, यही जीवन जीने की कला है।

“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।

हर पर्व आपको यही बताने के लिए आता है कि बदलो, रुको, देखो कि तुम दुखी हो, बंधन में हो; श्रीकृष्ण का भी यही संदेश है। जन्माष्टमी को मनाने का सुंदर तरीक़ा यही है कि इसे श्रीकृष्ण का नहीं, अपना जन्म-दिवस मानें और स्वयं को पुनः जन्म दें — “मैं जैसे साल भर जीता आ रहा हूँ, अब वैसे नहीं जिऊँगा।” आप एक बार फ़ैसला तो कीजिए कि सच्चाई में जीना है, फिर जो ताक़त अपने आप उभरती है, उस ताक़त का नाम श्रीकृष्ण है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

जब तक अपना कुछ नहीं होगा जीवन में, तब तक तो परायों पर आश्रित रहोगे ही न। अपने आप को किसी भी चीज़ से बाँधकर, जोड़कर मत देखो — जिससे भी जुड़ोगे, गुलाम हो जाओगे। क्योंकि गुलामी का मूल कारण होता है — धारणा। तुमने अपने और संसार के बारे में किसी मान्यता को सच का दर्ज़ा दे दिया है, जो सत्य तो छोड़ दो, तथ्य भी नहीं है। आज़ादी तो अकारण होती है। अपने आप को अपनी सारी मानसिक उठा-पटक से अलग रखो। अपनी निजता को अक्षुण्ण रखो, अस्पर्शित रखो।