आचार्य प्रशांत: कहानी है तीन मछलियों की, पूरी नहीं पढूँगा, संक्षेप में बताए देता हूँ। तो कहानी तीन मछलियों का ज़िक्र करती है जो रहती थीं एक तालाब में। उस तालाब से एक बड़ा दुर्गम रास्ता समंदर की ओर भी जाता था पर उस रास्ते का किसी मछली को पता नहीं था। वो रास्ता था भी बड़ा कठिन।
तो एक बार तीनों मछलियाँ देखती हैं कि मछुआरे आ गये हैं और मछुआरे बिलकुल डटे हुए हैं कि मार के ही जाएँगे, इस तालाब की मछलियों को लेकर ही जाएँगे। ये देखते ही उनमें से एक मछली तुरन्त वो कठिन यात्रा करके निकल जाती है सागर की ओर। और वो यात्रा कठिन ही नहीं, नदी की बाक़ी मछलियों को असम्भव लगती थी। तभी तो वो उस तालाब में थीं। अगर वो यात्रा उन्हें सम्भव ही लगी होती तो वो कब का सागर को निकल गयी होतीं।
पर ये मछली कहती है, 'न, कुछ दिखा है मुझे, कुछ समझ में आया है मुझे।' वो कठिन-से-कठिन यात्रा करने की हिम्मत जुटाती है, उसी को अपना एकमात्र विकल्प मानती है और निकल जाती है।
फिर एक दूसरी मछली होती है जो पहली मछली की मुरीद होती है, पहली मछली से प्रेरित होती है। पहली मछली के जाने के बाद वो ज़रा दिशाहीन हो जाती है और पहली मछली जितना न वो सामर्थ्य उठा पाती है न संकल्प जुटा पाती है तो वो पीछे ही छूट जाती है। लेकिन उसे पहली मछली की कुछ बातें याद रह जाती हैं तो वो क्या करती है? वो मृतवत हो जाती है। मछुआरे उसे देखते हैं और छोड़ देते हैं, कहते हैं कि मरी मछली, ये हमारे किस काम की।
तीसरी मछली होती है, उसको पहली दोनों से कोई लेना-देना नहीं, उसे तो अपने पर पूरा भरोसा है। वो मछुआरों को देखती है, वो कहती है, 'होंगे ये मछुआरे, हम भी कुछ हैं।' वो भागने की और अपने हिसाब से जान बचाने की पूरी कोशिश कर लेती है। उसका क्या हश्र होता है? वो पकड़ी जाती है। हाँ, पकड़े जाने के बाद वो भी तरह-तरह की युक्तियाँ चलाती है। वो भी अभिनय करती है जैसे वो मर गयी हो, इत्यादि-इत्यादि। पर मछुआरे भी इतने बेवकूफ़ नहीं, वो उसे ले ही जाते हैं, खिला देते हैं बिल्ली को।







