सरमन ऑन द माउन्ट: जहाँ सच है, वहाँ समझौता नहीं

Acharya Prashant

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सरमन ऑन द माउन्ट: जहाँ सच है, वहाँ समझौता नहीं
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज क्रिसमस ईव है और जीसस जो कह गए, उनका मतलब हमें कभी बताया नहीं गया। मैं एक कॉन्वेंट स्कूल से हूँ और वहाँ पर बहुत सारी प्रेयर्स कराई जाती थीं। बट कभी भी उनका मतलब नहीं बताया जाता था, न कभी मतलब बताया और न हमें कभी समझ आया।

तो जब आपको सुनना स्टार्ट किया, तो जीसस के ऊपर आपने बोला है और वह वीडियोज़ मैंने देखे, तो कुछ समझ में आया। आज मैं कुछ कोट्स पढ़ रही थी “सरमन ऑन द माउन्ट” बुक से, वो मैं आपके सामने रख सकती हूँ? कुछ पूछ सकती हूँ आपसे?

उसमें से पहला कोट है, मैथ्यू 7.13:

“एंटर बाय द नैरो गेट। फॉर द गेट इज़ वाइड एंड द वे इज़ ईज़ी दैट लीड्स टू डिस्ट्रक्शन, एंड दोज़ हु एंटर बाय इट आर मेनी।”

~ मैथ्यू 7.13

आचार्य प्रशांत: “द नैरो गेट,” ये तो काफ़ी प्रसिद्ध उक्ति है, “सरमन ऑन द माउन्ट” से “नैरो गेट।” “नैरो गेट” माने वो रास्ता या वो द्वार जिससे कम लोग जाते हैं। इसमें कह रहे हैं कि वो रास्ता मत लो जो सब लेते हैं।

सब क्यों लेते हैं? क्योंकि वो रास्ता तुम्हारे जन्म के साथ ही तुम्हारा शरीर ही तुमको सुझा देता है। शरीर सबके पास होता है, तो इसलिए वो रास्ता भी सभी लेना चाहते हैं। सभी जन्म लेते हैं, सभी के पास शरीर होता है। तो सभी शरीर द्वारा सजेस्ट किए हुए रास्ते पर चलना चाहते हैं।

तो शरीर क्या रास्ता सजेस्ट है? शरीर आपका वैसे ही, जैसा जानवरों का होता है। तो शरीर आपसे वही सारे काम भी कराना चाहता है जो जानवर करता है। कौन से काम?

प्रश्नकर्ता: खाना।

आचार्य प्रशांत: खाओ, पियो। जो फिजिकल कंडीशनिंग है, उसको कभी भी चुनौती मत दो। जीवन का कोई अर्थ मत मानो, बस यही है कि खाओ, पियो और मर जाओ। नर हो तो दो-चार नर-मादा के पीछे लड़ाई करें, क्योंकि प्रजनन बहुत बड़ी बात लगे, तो खाना-पीना, संतान पैदा करना, यही करते रहो। यह वाइड गेट है, इस पर सभी चलते हैं। सारे जानवर चलते हैं और ज़्यादातर इंसान भी चलते हैं।

यहाँ पर जीसस कह रहे हैं कि तुम उस रास्ते पर मत चलो। तुम चेतना के रास्ते पर चलो। ये जो वाइड गेट है, ये शरीर का रास्ता है, ये बायोलॉजिकल रूट है, इस पर मत चलो। क्यों नहीं चलो? क्योंकि इसपर अगर चलोगे, तो जो तुम्हारी डीपेस्ट डिज़ायर है, अपनी कॉन्शियसनेस को फुलफिल करने की, वह कभी पूरी नहीं होगी। पेट भरने से चेतना नहीं भर जाती। जानवरों में ऐसा होता है कि उनको पेट चाहिए, कुछ नहीं चाहिए। इंसान को अपना पेट भरना है और पेट के साथ-साथ उसको अपना जीवन का लक्ष्य भी पूरा करना है। हमारे पास एक चेतना है, जो जानवरों के पास नहीं है। हमारे पास एक लक्ष्य है।

एक जगह पर जीसस जी कहते हैं, “मैन शैल नॉट लिव बाय ब्रेड अलोन।” सिर्फ़ खाने-पीने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा, तुम्हें ज़िंदगी में कुछ और ऊँचाइयाँ अभी चाहिए।

इसका मतलब ये नहीं है कि खाने-पीने से काम नहीं चलेगा तो पैसा चाहिए। पैसे को लेकर तो कहते हैं कि भाई, किसी के भी दो मालिक नहीं हो सकते। सत्य को और पैसे को दोनों को तुम एक साथ नहीं पूज सकते। अगर तुम पैसे को पूज रहे हो, तो सत्य नहीं है। और जो सत्य की राह पर चल पड़ेगा, कहेगा कि भाई, मुझे तो सच्चाई से ही आशीक़ी है, उसके लिए फिर पैसा बस एक टूल की तरह, एक रिसोर्स, एक संसाधन की तरह हो जाता है।

तो यह नहीं कह रहे हैं कि अपनी बायोलॉजिकल इंस्टिंक पूरी करो, अपनी जो मेंटल डिज़ायर्स हैं वो पूरी करो। मेंटल डिज़ायर माने पैसा हो गया। किसी हायर पर्पस की बात कर रहे हैं। और क्योंकि उस हायर पर्पस को पाने के लिए बहुत कम लोग चलते हैं, तो कह रहे हैं “नैरो गेट,” एक ऐसा द्वार जिससे बहुत कम लोग प्रवेश करते हैं। कम लोग करते हैं, पर वो कह रहे हैं कि तुम प्रयास करो। क्या पता तुम ही वो हों? न तो पशु की तरह जियो, वो तामसिक जीवन होता है; न मन की कामना चंचलता के पीछे चलो, वो तामसिक जीवन होता है।

तो कह रहे हैं कि सतोगुण और सतोगुण से भी आगे गुणातीत, ट्रांसेंड बोथ योर बॉडी एंड माइंड। दैट इज़ द नैरो गेट। और क्या है?

प्रश्नकर्ता: जी, अगला है, टीचिंग्स ऑन लस्ट एंड प्यूरिटी से दो कोटेशंस हैं। पहला है:

“इफ योर राइट आई कॉजेस यू टू सिन, टीयर इट आउट एंड थ्रो इट अवे।”

~ मैथ्यू 5.29

आचार्य प्रशांत: पहले इस पर ही बता देता हूँ। “इफ योर राइट आई कॉजेस यू टू सिन, टीयर इट आउट एंड थ्रो इट अवे।” मतलब ये है कि तुम्हें अपने शरीर का इस्तेमाल संसाधन की तरह करना है, मुक्ति के लिए। शरीर इसलिए नहीं कि शरीर को ही ढोते रहो। शरीर अगर यूज़फुल हो रहा है लिबरेशन की राह पर, तब तो उसको पालन-पोषण वग़ैरह देना है। बट बॉडी फॉर द बॉडी सेक, ये कोई बात नहीं है।

आँख तुम्हारी अगर एक ऐसी हो गई है जो बाक़ी शरीर के लिए बोझ बनती जा रही है, एक आँख दूसरी आँख के लिए ख़तरा बनती जा रही है। सिन की क्या परिभाषा है? नॉट अटेन्डिंग टू अटेन लिबरेशन दैट अलोन इज़ सिन। लिविंग लाइफ़ ऑफ़ बॉन्डेज एंड डिराइविंग प्लेज़र फ्रॉम इट, दैट इज़ सिन।

तो तुम्हारी ही शारीरिक हस्ती का अगर कोई हिस्सा तुम्हारे रास्ते में बाधा बनता है, तो उस हिस्से को जुदा कर दो। क्योंकि तुम शरीर पालने के लिए नहीं पैदा हुए हो।

शरीर तुम्हारा मास्टर नहीं है, शरीर तुम्हारा रिसोर्स है। इस अर्थ में सर्वेंट है। तो शरीर की अहमियत है, बिल्कुल है। पर तभी तक है जब वो तुम्हारे ऊँचे उद्देश्य में काम आ रहा हो। वो काम आने की जगह बाधा बनने लगे, तो शरीर की कोई अहमियत नहीं है। मतलब नींद चाहिए, बिल्कुल चाहिए। पर नींद क्यों चाहिए? नींद चाहिए ताकि ताज़े हो जाओ और उठ के कोई बढ़िया काम कर पाओ। पर ये कह दो, कि “मुझे दस घंटे सोना है, मुझे बारह घंटे सोना है। मुझे नींद के ही मज़े लेने हैं।” तो ऐसी नींद को गोली मारो फिर।

शरीर की देखभाल भी करनी है। क्यों करनी है? जैसे किसी मशीन की देखभाल की जाती है ताकि वो काम कर सकें। है न? कार होती है, आप कार की देखभाल करते हो ताकि वो चले। और कोई कार ऐसी हो जिसकी सिर्फ़ देखभाल ही होती हो और चलती कहीं न हो। वो खूब सारी सर्विस माँगती है, मेंटेनेंस माँगती है, फ्यूल माँगती है, और जाती कहीं नहीं है।

श्रोता: बोझ बनती है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, धुआँ और छोड़ती है। तो ऐसी कार फिर किसी काम की नहीं होती है। तो शरीर को उसकी सही जगह देना सीखो, और शरीर से आसक्ति का कोई मतलब नहीं है। बॉडी एग्ज़िस्ट्स एज अ रिसोर्स, नॉट फॉर इट्स ओन सेक। बॉडी एक माध्यम है, एक मीडियम है, संसाधन है। बॉडी अंत नहीं है, डेस्टिनेशन नहीं है, एंड नहीं है; ये याद रखो। ये है इस उक्ति का अर्थ।

प्रश्नकर्ता: आगे है, मैथ्यू 5.37:

“लेट व्हाट यू से बी सिंपल, ‘यस’ ऑर ‘नो,” एनीथिंग मोर देन दिस इज़ कम्स फ्रॉम इविल।”

~मैथ्यू 5.37:

आचार्य प्रशांत: मतलब जीवन के जो सबसे महत्त्वपूर्ण मसले होते हैं, उनमें कोई ग्रे एरिया नहीं होता। ठीक है? उसमें बाइनरी चलती है, 0 या 1, यस या नो। आ रही है बात समझ में?

छोटी-मोटी चीज़ों में बाइनरीज़ नहीं चलती, ठीक है? कि भाई, मार्क्स कितने आए? तो ऐसा नहीं है कि या तो 0 आएगा या 100 ही आएगा। 100 की स्केल पर बीच में कहीं पर 71 भी हो सकता है, 91 भी हो सकता है, 21 भी हो सकता है। वो एक अलग चीज़ है। पर सच के सामने सर झुकाना है, या तो उसमें यस होगा और यस नहीं है, तो वो नो है। पार्शियल यस कुछ नहीं होता।

तो ज़िंदगी के सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों में टालमटोल नहीं की जाती, एप्रॉक्सिमेशन नहीं किए जाते, कॉम्प्रोमाइज़ नहीं किए जाते। वहाँ पर बहुत एक एक्सट्रीम, एब्सोल्यूट ओपिनियन लेना पड़ता है, पोजीशन लेनी पड़ती है। वहाँ आप यह नहीं कर सकते, कि “देखेंगे, मे बी, थोड़ा इधर, थोड़ा उधर, लेट मी टेक द मिडिल पाथ।” वहाँ कोई मिडिल पाथ नहीं चलता। छोटी चीज़ों में मिडिल पाथ चल जाता है, छोटी चीज़ों में कॉम्प्रोमाइज़ चल जाती है, बड़ी चीज़ में कॉम्प्रोमाइज़ नहीं चलती।

कोई उदाहरण के लिए आकर के तुम्हारी शर्ट गंदी कर दे। कॉम्प्रोमाइज़ चल जाएगी, “ठीक है, यार, तूने शर्ट गंदी कर दी। कोई बात नहीं, चल, छोटी बात है।” पर कोई आकर तुम्हारा मन गंदा करे, उसमें कोई कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना। वहाँ पर यस या नो। और अगर आप क्लियर नो नहीं बोल पा रहे हो कि “नहीं, मेरा मन गंदा मत करो,” तो आपने यस बोल दिया है। इफ इट्स नॉट अ क्लियर नो, देन इट्स अ यस। सिमिलरली, इफ इट्स नॉट अ क्लियर यस…।

जो भी सही है उसके प्रति एब्सोल्यूट एक सर्टेनिटी और डिवोशन होना चाहिए। उसमें अगर थोड़ा सा भी घपला है कि यस होना चाहिए था, पर 80% यस है, तो वो 80% यस इज़ इक्वल टू नो। द एब्सोल्यूट डिमांड्स, एब्सोल्यूट डिवोशन एंड एब्सोल्यूट सर्टेनिटी। सो, व्हेन इट कम्स टू द कोर इश्यूज़ ऑफ़ लाइफ़, देयर इज़ नो पॉइंट इन वैसिलेशन ऑर इन बीइंग अ बिट इक्विवोकल। यू हैव टू टेक अ वेरी अनैम्बिग्युअस एंड एब्सोल्यूटिस्ट स्टैंड, कि कुछ मुद्दों में हम किसी भी तरह की कोई गुंजाइश नहीं करते, कोई समझौता नहीं करते।

क्योंकि सिर्फ़ उन मुद्दों में नहीं करते, तो बाक़ी मुद्दों में हमको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। छोटी बातों में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, यार, और बड़ी बात में पूरा फ़र्क़ पड़ता है। हमसे 1% भी कंसेशन नहीं मिलेगा।

प्रश्नकर्ता: “व्हाई डू यू सी द स्पैक दैट इज़ इन योर ब्रदर्स आई, बट डू नॉट नोटिस द लॉग दैट इज़ इन योर ओन आई?”

~ मैथ्यू 5.3

आचार्य प्रशांत: लॉग ब्लैंक भी बोलते हैं उसको। स्पैक माने कण, धूल का कण। तो बगल में एक बंदा खड़ा है, योर ब्रदर। उसकी तो आँख में ज़रा सा एक धूल का कण है, तो वो तुम्हें दिखाई दे रहा है, “अरे इसकी आँख गंदी है।” और तुम्हारी आँख में पूरा बल्लम है, लठ, लॉग, पूरा प्लैंक है, वो तुमको नहीं दिखाई दे रहा है।

तो ये सेल्फ-अवेयरनेस के लिए है, इसका संबंध ये मत सोच लेना कि धूल से है या बाँस से है। इसका संबंध सेल्फ-अवेयरनेस से है कि जब अपनी बहुत भीतरी हालत ख़राब होती है न, दुर्दशा होती है, तब आदमी और ज़्यादा प्रेरित रहता है कि दूसरों की बुराइयाँ निकालूँ या दूसरों की ओर देखूँ। भले ही अच्छाइयाँ भी निकालूँ, कुछ भी कर लूँ।

अध्यात्म में पहली चीज़ होती है, स्वयं को देखना। ख़ुद को देखना। और जब ख़ुद को देखते हो तो अपनी आँख साफ़ होती है; अपनी आँख साफ़ होती है तभी तो दूसरों को भी देख पाओगे न। दूसरों को भी अगर साफ़-साफ़ देखना है तो पहले अपनी आँख साफ़ करनी पड़ेगी न। हाँ तो पहली चीज़ ये है कि ख़ुद को देखो।

प्रश्नकर्ता: जैसे हम कहते हैं, कि “जब काम भरा हो आँख में, सच नज़र नहीं आता।”

आचार्य प्रशांत: हाँ, जब काम भरा हो, जब डिज़ायर भरी हो आँख में, तो सच्चाई नज़र नहीं आती है। तो आँख में जैसे ये लठ की बात हो रही है न, घुसा हुआ है, वो वही है डिज़ायर। वो डिज़ायर क्या है? इग्नोरेंस; फंडामेंटल, प्रिमिटिव इग्नोरेंस। लैक ऑफ़ सेल्फ नॉलेज, आत्मज्ञान का अभाव। उसको वो एक ज़मीनी भाषा में, क्योंकि वहाँ के लोग वैसे ही थे; अब वो सेल्फ नॉलेज वर्ड नहीं यूज़ कर रहे हैं क्योंकि जिनसे बात कर रहे हैं, उनका कोई आध्यात्मिक बैकग्राउंड नहीं है। तो उसको ऐसे कह रहे हैं कि तुम्हारी आँख में एक पूरा लॉग घुसा हुआ है। इतनी मोटी लकड़ी घुसी हुई है, वो तुमको नहीं दिखाई दे रही। मतलब यही है कि तुम्हें आत्मज्ञान नहीं है, तुम अपनी हालत को नहीं देख पा रहे हो।

भारत में ये सब बातें जब कही गईं, तो ज़्यादा सोफिस्टिकेशन से कही गई हैं। क्योंकि यहाँ पर ऑडियंस ऐसी थी और एक लंबी परंपरा थी ज्ञान की। तो वो सोफिस्टिकेटेड लैंग्वेज के लिए तैयार थे। जिन लोगों से जीसस बात कर रहे हैं, तो वो उनसे उनकी भाषा में बात करनी पड़ती है।

प्रश्नकर्ता: 7.7

“आस्क एंड इट विल बी गिवन टू यू; सीक, एंड यू विल फाइंड; नॉक, एंड इट विल बी ओपनड टू यू।”

~ मैथ्यू 5.3

आचार्य प्रशांत: माने कि, भैया, सत्य की ओर से कोई बाधा नहीं है कि मैं छुपा हुआ हूँ, मुझे खोजो। लोग कहते हैं न, “मैं सत्य की खोज में हूँ। आई एम सर्चिंग फॉर द ट्रुथ।”

तो यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।

तो जब हम किस्मत पर बात डाल देते हैं न, कि “अरे मैं क्या करूँ? मेरी किस्मत ही ऐसी नहीं है कि मैं एक खुला, स्वतंत्र जीवन जी पाता हूँ।” कह रह हैं, नहीं, नहीं बात तुम्हारी चॉइस की है। अगर तुम बॉन्डेजेस में हो, बंधनों में हो, तो ये तुम्हारी चॉइस है। इसमें किसी ईश्वर का या किस्मत का या स्थितियों का कोई योगदान नहीं है। बात तुम्हारी है। तुम्हें अगर नहीं मिला है, तो इसका मतलब तुमने चाहा नहीं। सर्चिंग फॉर ट्रुथ की बात नहीं है। सत्य कहीं नहीं छुपा हुआ है, सत्य की ओर से कोई झंझट नहीं है। बात ये है कि तुम अपने झूठ नहीं छोड़ना चाहते। सच तो उपलब्ध है ही। पर झूठ छोड़ोगे, तो न वो तुम्हारा होगा।

सूरज है, तुम आँख नहीं खोलना चाहते। ये मत बोलो कि, “अरे इतना अंधेरा है, सूरज नहीं होगा।” सूरज है, आँख तुम्हारी बंद है। वो तुम्हारी चॉइस है कि तुमने आँख बंद कर रखी है; तो ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लो।

अगर तुम्हारा जो भीतरी जगत है, वह अंधकार में है, तो इसकी वजह यह नहीं है कि कोई ताक़त, कोई बड़ी शक्ति तुमसे रूठी हुई है, और न ये है कि कोई बहुत बड़ी साधना है जो तुमने अभी नहीं करी है। न ये है कि कोई बहुत बड़ा गुप्त रहस्य है जो कहीं छुपा हुआ है। बात बहुत छोटी सी है, तुम्हें चाहिए नहीं। मिला नहीं? तुम्हें चाहिए नहीं; चाहिए होता तो मिल गया होता। मिला इसलिए नहीं, क्योंकि चाहा ही नहीं। चाहो तो मिलेगा।

तुम तो पता नहीं क्या-क्या चाह रहे हो। वो सब उल्टी-पुल्टी जब तक चाहते रहोगे, तो ज़िंदगी की जो असली चीज़ें हैं, तुम्हें कैसे मिलेगी?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं एक और सवाल पूछना चाह रहा हूँ। मैं छोटे जब से कॉमेंट्स स्कूल में ही पढ़ा था और डेली ये होता था सुबह हम स्कूल गए तो सुबह लाइन में खड़ा हो के हर दिन प्रेयर्स करवाते थे, और पता नहीं उस स्टेज में या फिर हमारे इतनी समझ नहीं थी कि वो जो पढ़ा रहे थे, कि लाइक एक आइडल टाइप ही हम देखते थे जो भी पढ़ाते थे। और ऐसा नहीं है कि एक दिन में एक बार ही हो गया। दोपहर में भी खाने के बाद, फिर शाम को जाते वक़्त, हर दिन होता था ये।

तो जब अभी आप समझा रहे थे, हर चीज़। सेल्फ-अवेयरनेस की बात हुई, बॉडी की बात हुई, उन सब में भी वही चीज़ मुझे कुछ याद भी आ रही है। उसमें वो सब भी मौजूद थे, अभी मैं समझ पा रहा हूँ वो चीज़। लेकिन…

आचार्य प्रशांत: उन्होंने नहीं बोला?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: धर्म का मतलब ही केंद्रीय रूप से आत्मज्ञान होता है। मैंने कई बार कहा है न धर्म माने आत्मज्ञान और बाक़ी सब प्रपंच है। आत्मज्ञान के अलावा धर्म के नाम पर जो होते देखो, वो सब ऐसे ही हैं, पाखंड है, नौटंकी है या अज्ञान है। तो नहीं पता चलता लोगों को। लोग सोचते हैं कि जो धर्म की बाहरी बातें हैं, बिल्कुल पेरिफेरल, वही महत्त्वपूर्ण हैं। तो उनको ही पकड़ के बैठ जाते हैं। जबकि धर्म सिर इसलिए है ताकि इंसान अपने भीतर जा सके।

इंसान की ग़ुलामी उसके भीतर है। इंसान का दुख उसके भीतर है, और वह ख़ुद अपने दुख का कारण है। क्योंकि वह स्वयं को नहीं जानता।

उसे नहीं पता कि जिसको मैं “मैं” बोलता हूँ, ये कहाँ से आ गया। मेरी डिज़ायर कहाँ से आ गई। मैं हर्ट हो गया, तो मैं इस बात पर हर्ट हो जाऊँ, मुझे सिखाया किसने? मेरी भावनाएँ कहाँ से आ रही हैं, उसको ये सब नहीं पता होता। मेरी कल्पनाएँ कहाँ से आ रही हैं।

धर्म का मतलब होता है कि भीतरी, जो अपनी प्रक्रिया है, इंसान उसको अच्छे से समझे। लेकिन भीतर ही वह बैठे हुए है जिसको समझ लोगे तो वह गायब हो जाएगा। ईगो। तो ईगो को ही ख़ुद को समझना है। और ईगो ये भी देख लेता है कि ख़ुद को समझूँगा तो गायब हो जाऊँगा। तो फिर उसको समझने से इंकार कर देता है और रिलिजन को डिस्टॉर्ट कर देता है।

भले ही धर्म, रिलीजन का केंद्रीय मतलब ही यही हो कि ख़ुद को जानो, पर ये मतलब भी किसको संबोधित किया गया है? अहंकार को ही, ईगो को ही। तो वो सुन लेता है, अच्छा, ख़ुद को जानना है, पर ख़ुद को जाना अगर तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। मैं ही मिटूँगा। तो फिर वो ख़ुद को जानने के लिए धर्म का मतलब पाखंड बना लेगा, परंपरा बना लेगा, रीति-रिवाज बना लेगा, इधर-उधर की पचास बातें बना लेगा, कट्टरवाद बना लेगा, मारपीट बना लेगा, अंधविश्वास बना लेगा। वो ये सब करेगा धर्म के नाम पर।

जो असली काम है धर्म का, सेल्फ-नॉलेज, सेल्फ-ऑब्ज़रवेशन, आत्मज्ञान; वो नहीं करेगा। यही है। हर जगह रहा है, पूरी दुनिया में रहा और हमेशा रहा है। तुम उसको चुनौती दे सकते हो तो तुम्हें देनी चाहिए। सबसे पहले अपनी ज़िंदगी में जो पाखंड है और डर है, उसको चुनौती देनी चाहिए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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