
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।







प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। सर, दुनिया में दो तरह के सिद्धांत चलते हैं — एक ये कि जवान लोग कहते हैं कि खाओ-पियो बिंदास जियो, और दूसरी ये कि बुज़ुर्ग या दार्शनिक लोग कहते हैं कि जीवन क्या है इसको समझो, अपना पुरुषार्थ दिखाओ, अपनेआप को जानो, इस तरह की बातें।

प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य

प्रश्नकर्ता: वीडियो था ‘अपनी कमज़ोरियों से भिड़ जाओ’ तो उसके सम्बन्ध में थोड़ा प्रतिवाद है— अपनी कमज़ोरियों से कभी मत भिड़ो क्योंकि कमज़ोरियाँ भी आपके व्यक्तित्व का पहलू है। अपनी कमज़ोरियों पर विजय पानी हो तो स्वीकार करो कि हाँ, मैं हूँ ऐसा, कमज़ोरियों को स्वीकार करते ही कमज़ोरियाँ आपकी

आचार्य प्रशांत: एक बार मुझसे पूछा था कि उपनिषद कहाँ से आते हैं। ‘न’ से उठता है उपनिषद्। न से। तो वेदान्त ‘न’ है। ‘न’। नकार — नहीं, नहीं। किसके खिलाफ़ नहीं? ‘ये जो मेरी हालत है, ऐसे नहीं जीना है।’ इसको वेदान्त कहते हैं। और अगर मेरी हालत ऐसी

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अमन है। और पिछले दो साल से आपको सुन रहा हूँ। बाय नेचर मैं इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) हूँ। इन्होंने भी इंट्रोवर्ट होने की बात करी थी। काफी लम्बे समय से इंट्रोवर्ट ही रहा हूँ। तो जब आपकी टीचिंग मिली मुझे और क्लैरिटी (स्पष्टता) आयी तो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अंतर्मुखी होना माने क्या और वो क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: ये बहुत गहरा शब्द नहीं है। अध्यात्म की दृष्टि से अंतर्मुखी-बहिर्मुखी सब एक हैं। आमतौर पर आप बहिर्मुखी उसे बोल देते हो जो संसार से ज़्यादा वास्ता रखता है। और जो अपने में ही ज़्यादा सीमित…

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केंचुए की तरह थोड़े ही कि किसी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, आँखों में ताक़त झलकनी चाहिए, कुछ बोलो तो उसमें साहस और संकल्प हो, आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए नहीं। एक ज़िंदगी


आचार्य प्रशांत: एक आदमी था बड़ा भुल्लकड़। कोई एक चीज़ उसके साथ रहती थी, वो थी उसकी विस्मृतिशीलता। भूलता गया, भूलता गया, और एक दिन पाता है कि वो अपनी हँसी भी भूल गया; भूल ही गया कि हँसना कैसे है।


प्रश्नकर्ता: सर बात दाएँ-बाएँ इसलिए हो गई क्योंकि आपने हमें एक दर्जे से ऊपर बात कही, पर कुछ समझ नहीं आया। मेरा स्तर इतना नहीं कि उतना तक सोच पाऊँ। मैं सोचने की कोशिश कर रही थी लेकिन समझ नहीं आ रहा था।

श्रोता: सवाल है कि ‘क्यों हम अपने निर्णय स्वयं नहीं ले पाते और इस कारण दूसरों पर आश्रित रहते हैं?’

वक्ता: तुम्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा ना? उस बिंदु पर प्रतिक्रिया करने के दो तरीके होते हैं। समझना इस बात को। आमतौर पर हमें ये सिखाया जाता है कि अगर कुछ पसंद ना आए तो उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए और इस बात को बड़े विद्वान लोग भी



अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।











साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।

वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।






भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
सबसे बड़ा दोष है — कमज़ोरी, जो कहता है हम संकुचित हैं, सीमित हैं जबकि हमारे ऋषियों ने प्रेम में हमें बताया — 'अमृत की औलाद हो तुम, इतनी आसानी से कैसे लड़खड़ा सकते हो?' 'न दैन्यं न पलायनम्' — ना हम छोटे हैं, ना हम मैदान छोड़कर भागते हैं।
कोई होगा बहुत ऊँचा, उसको बोलो "अपनी ऊँचाई अपनी जेब में रखे। हमारे पास हमारी ज़िंदगी है, हमारा दुख है और हमें बेहतर होना है।" श्रीकृष्ण कहते हैं कि "योग: कर्मसु कौशलम्" माने बेहतर काम चुनूँगा और उस बेहतर काम को रोज़, क्रमशः बेहतर तरीक़े से करूँगा, क्योंकि कोई चमत्कार नहीं होता। अचानक से उड़कर के, छलांग मारकर कोई ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी, लगातार ऊपर चढ़ते हुए ही उत्कृष्टता हासिल करनी पड़ती है।
हम ठीक वैसा ही देखते हैं, जैसा हम होते हैं। जो यह तय करना चाहता है कि दूसरा नकली है या नहीं, उसे पहले अपने आपको असली करना पड़ेगा। दूसरों से सतर्क मत रहो, अपने आप से सतर्क रहो। तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन तुम्हारे भीतर ही बैठा हुआ है। तुम्हें एक क्षण नहीं लगेगा नकली को नकली जान लेने में, अगर तुम असली हो गए। जिसको दूसरे की सच्चाई जाननी है, उसको पहले अपनी सच्चाई जाननी पड़ेगी। अपने भीतर ही समाधान खोजना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं बचपन से एक धार्मिक परिवार में पला-बढ़ा हूँ। बचपन से पूजा-पाठ हमारे घर में चलता था। रामायण-महाभारत हमारे घर में चलता था। तो उन सब का देखा-देखी मैं भी सबसे रामायण-महाभारत साझा करता था। लोग खुश होते थे और मुझे भी एक तरह का प्रोत्साहन…
एक ओर तो शरीर को बनाकर रखना है, और दूसरी ओर शरीर से चिपक भी नहीं जाना है - जैसे शरीर एक उपकरण है, एक संसाधन है; इस्तेमाल करना है उसका। लेकिन जिस चीज़ का इस्तेमाल करना है, उसको इस्तेमाल करने के लिए ही सही, स्वस्थ और मज़बूत तो रखोगे न? मज़बूत रखना है, लेकिन इससे पहचान नहीं बाँध लेनी है। जब मौक़ा आएगा, इसको हँसते-हँसते त्याग भी देंगे। और शरीर की जितनी हम सेवा कर रहे हैं, जितना इसको तेल पिला रहे हैं, जितना इसको व्यायाम दे रहे हैं, इससे दूना इससे काम लेंगे।
देश का जो सबसे बड़ा लफंगा हो, अगर वह देश का सबसे बड़ा टीनएज सेलिब्रिटी भी बन गया हो, तो माँ-बाप को समझ जाना चाहिए कि अब बहुत ज़बरदस्त ख़तरा है।
टीनएज (किशोर) लड़कियों को भगत सिंह का पता हो न हो, खुदीराम बोस का पता हो न हो, विनय…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में मुझे अभी वॉलन्टीयरिंग (स्वयं सेवा) का मौका मिला था तो मैं और मेरे सहयोगी ने तय किया कि हम आपके द्वारा जो पुस्तकें प्रकाशित हैं उनका स्टॉल लगाएँगे। जब वहाँ पहुँचा तो पाया कि इतने सारे लोगों में कौन इन किताबों का पात्र है…
आचार्य प्रशांत: तुमको इसलिए समझ में नहीं…
वक्ता: कितने लोग ऐसे हैं जिनकी यही कहानी है कि अपने निर्णयों के लिए दूसरोँ पर आश्रित रहना पड़ता है? हाथ खड़े करें।
*(**सभी श्रोतागण हाथ खड़े करते हैं)*ये हम…
आचार्य प्रशांत: मुझे बड़ी ख़ुशी होती इस सवाल का कोई सकरात्मक जवाब देकर। सवाल तुमने इस तरीके से पूछा है कि लगता है, “लक्ष्य ‘मेरे’ हैं और दुनिया उनमें बाधा डाल रही है। तो मैं क्या करूँ?” लेकिन बात थोड़ी-सी इससे अलग है। बात असल में यह है कि वो…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।
तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।
कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।
आपका कहना है कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ, उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है, मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरा काम उनके लिए है, जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मुझे एक पल का चैन नहीं, और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ।
यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।
हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।
गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।
श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…
अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल,
नाचे बेसुर ते बेताल | टेक |
दरदमंद नूं कोई न छेड़े,
जिसने आपे दुःख सहेड़े,
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,
बूझे अपणा आप खिआल
जिसने वेस इश्क़ दा कीता,
धुर दरबारों फ़तवा लीता,
जदों हजूरों प्याला पीता,
कुछ ना रहा सवाल जवाब
जिसदे अन्दर वस्स्या…
हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।
आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी।
प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन।

यूँ ही कुछ हो नहीं जाता, सब कुछ चुनाव है। बहुत समय तक तुम एक ही चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी भी तुमसे चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा। कोई बाहरी ताक़त आकर तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। तुम्हारा जो कुछ भी है, वो बस तुमसे है।

यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"

हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।