ज़िन्दगी जीने के दो तरीक़े || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक देव पर (2014)

संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग। ~ जपुजी साहिब (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: फ़्री विल (मुक्त इच्छा) भी एब्सोल्यूट्ली फ़्री (पूर्णत: मुक्त) है। आपकी जो फ़्री विल है, वो भी इस मामले में तो बाउन्डेड (सीमित) है ही कि वो आपकी नहीं है। जो आपकी इच्छा है वो तो सदा ही सीमित है, वो सीमित है अपने सन्दर्भ से और अपने प्रभावों से। जो आपकी इच्छा है, जिसे कहते हो, ‘ये मेरी इच्छा है’ — जो आपकी इच्छा है वो तो वही है जो आपके भीतर डाली गयी है — तो वो सीमित है। और जो वास्तव में मुक्त इच्छा है, अपरिमित इच्छा है, वो आपकी है नहीं। वो आपकी नहीं है, वो पूर्ण की है।
ठीक है?
हम ये तो कह देते हैं कि हमको ये हक़ हासिल है कि हम कब फ़ैसला करें कि स्रोत की तरफ़ जाना है, लेकिन याद रखिएगा स्रोत की तरफ़ जाने का फ़ैसला जब भी होगा, वो आपका नहीं होगा। आप किसी भी बिन्दु पर खड़े होकर के दो फ़ैसले करते हो, हर फ़ैसला वास्तव में दो ही विकल्पों के बीच होता है। एक स्रोत से दूर जाने का, दूसरा उसकी तरफ़ जाने का, चाहे वो छोटे-से-छोटा फ़ैसला हो। चाहे वो यही फ़ैसला क्यों न हो कि जूता कौनसा ख़रीदना है। चाहे वो यही फ़ैसला क्यों न हो कि रिक्शा लेना है या बस लेनी है। पर वो फ़ैसला आप ध्यान से देखेंगे तो फ़ैसला यही है कि स्रोत की तरफ़ जाना है या उससे दूर जाना है। स्रोत से दूर जाने का फ़ैसला आप जब भी ले रहे हैं, वो आपकी अपनी व्यक्तिगत इच्छा है और वो आपकी है नहीं क्योंकि वो आपके ऊपर बड़े प्रभावों से आ रही है, उसका एक सन्दर्भ है, उसके कारण हैं। स्रोत की तरफ़ जाने का फ़ैसला आप जब भी ले रहे हैं, वो आपकी इच्छा है ही नहीं क्योंकि वो स्रोत की इच्छा है।
नहीं समझ रहे हैं?





