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Dreams

सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
Dreams
सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
7min
2.3kreads
63
30

आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।

कहाँ से आते हैं सपने?
Dreams
कहाँ से आते हैं सपने?
9min
498reads
15
2

जो बात मन में नहीं है, वो सपने में भी नहीं आ सकती। और जो कुछ सपने में आ रहा है, वो निश्चित रूप से जाग्रत अवस्था में कहीं-न-कहीं मन में है। वरना सपने में नहीं आता। न बंद ऑंखों वाले सपने सच्चे हैं, न खुली ऑंखों वाले सपने सच्चे हैं। सच्ची है सिर्फ़ तुम्हारी समझने की शक्ति।

सपनों में भगवान मत देखो, जीवन में भगवान उतारो || आचार्य प्रशांत (2016)
Religion
सपनों में भगवान मत देखो, जीवन में भगवान उतारो || आचार्य प्रशांत (2016)
9min
317reads
5
1

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सपनों में या ध्यान में किसी भी भगवान के दर्शन हो जाने को बड़ा महत्व दिया गया है, लोगों को ध्यान में शिव दिखते हैं और ऐसी बहुत कहानियाँ और भी प्रचलित हैं, ये सब क्या है कृपया स्पष्ट करें?

आचार्य प्रशांत: और शिव का भी वही…

चलो पॉज़िटिव हो जाएँ || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
Climate Change
चलो पॉज़िटिव हो जाएँ || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
5min
138reads
1

आचार्य प्रशांत: बी पॉज़िटिव ताकि तुम इस दुनिया से और ज़्यादा लूट सको। बी पॉज़िटिव माने उम्मीदें बुलंद रखो। उम्मीद है किस बात की? तुम्हें सच्चाई की उम्मीद है, तुम्हें मुक्ति की उम्मीद है, तुम्हें सच्चे प्यार की उम्मीद है? या कोई तुम्हें तुम्हारे झूठे सपनों से झंझोड़ कर जगा…

कितनी तनख्वाह है आपकी? (सैलरी बढ़ाने का एक अचूक तरीका) || आचार्य प्रशांत (2023)
Shri Krishna
कितनी तनख्वाह है आपकी? (सैलरी बढ़ाने का एक अचूक तरीका) || आचार्य प्रशांत (2023)
14min
291reads
5

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि कॉर्पोरेट जगत में काम कर रहे हैं तो मुख्य रूप से मार्जिन, क्वार्टरली प्रॉफ़िट आदि को लेकर हम कामना-केन्द्रित होते हैं। ऐसे में हम करुणा पर कैसे ध्यान दें? मैं आपसे स्पष्ट जानना चाहती हूँ।

आचार्य प्रशांत: कुल मिलाकर के आप…

Excerpts from Articles
अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
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सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
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जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
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बाबा नहीं, यार आया है - मंतर नहीं, मिरर लाया है
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
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जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
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शादी या लिव-इन: आज़ादी किसमें है?
सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
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फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
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UPSC छात्र का बेबाक साक्षात्कार (जिनमें दम हो, वो ही देखें) || आचार्य प्रशांत (2023)
Clarity
UPSC छात्र का बेबाक साक्षात्कार (जिनमें दम हो, वो ही देखें) || आचार्य प्रशांत (2023)
21min
412reads
7
1

प्रश्नकर्ता सर, समाज में कुछ लोगों का दावा होता है कि वो समाज कल्याण के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन उसमें भी उनकी कामना छुपी हुई होती है। लेकिन कुछ लोग सचमुच ऐसा समझते हैं कि वो काम इसीलिए करना चाहते हैं क्योंकि वो वाक़ई समाज कल्याण करना चाहते…

आओ तुम्हें अमीर बनाएँ || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Money
आओ तुम्हें अमीर बनाएँ || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
37min
267reads
1

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आज सुबह से थोड़ा मैं परेशान था इसलिए मैं चाहता था मैं आपसे थोड़ा बात करूँ इस विषय में। मेरा एक दोस्त है उसका मुझे सुबह फ़ोन आया था और सुबह जो उसका फ़ोन आया था उसके पीछे थोड़ा बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) है वो बताना चाहूँगा पहले।…

एक ही गलती कितनी बार करनी है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Desire
एक ही गलती कितनी बार करनी है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
9min
465reads
35
10

प्रश्नकर्ता : नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शिखर है। कल आपने अपना एक कॉर्पोरेट (निगम) का थोड़ा सा अनुभव बताया था कि आप जेंटल इलैक्ट्रिक में काम करते थे, तो वहाँ पर आपने पूछा कि अच्छा, आपके ऊपर कितने लोग काम करते थे, तो किसी को कोई मतलब नहीं था।…

मौज करो, गंभीर मत हो जाना || नीम लड्डू
Mind
मौज करो, गंभीर मत हो जाना || नीम लड्डू
1min
337reads
2

यही जीवन जीने की कला है, मौज करो, मस्ती करो! गंभीर मत हो जाना। बिलकुल हल्के रहो, क्योंकि रखा क्या है?

आज तुम जिस बात को गंभीरता से लेते हो, कल वो तुम्हारे लिए दो पैसे की हो जाएगी। याद है, जब चौथी-पाँचवी में रिज़ल्ट आया था तो तुम कैसे…

सुन्दर लड़की के सामने छवि बनाने की कोशिश
Attraction
सुन्दर लड़की के सामने छवि बनाने की कोशिश
5min
693reads
7

प्रश्नकर्ता: एक विचार बरक़रार ही रहता है कि 'क्या लोग सोचते हैं या क्या है छवि?' कभी थोड़ा कम दिखता है पर रहता ही है। फिर ये क्यों है, ऐसा सब के साथ तो नहीं है, जैसे अभी कोई छोटा कुत्ता है, तो उसके लिए तो मैं नहीं सोच रहा…

जवानी जलाने का पूरा और पक्का इंतज़ाम -2
Dreams
जवानी जलाने का पूरा और पक्का इंतज़ाम -2
13min
535reads
2

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) "नाम तो मेरा लक्की है पर मैं बहुत अनलक्की हूँ। मैं पिछले नौ साल से यू.पी.एस.सी. की तैयारी कर रहा हूँ। चार बार फ़ेल हो चुका हूँ, नौ साल से घर से बाहर हूँ और अब घर लौटने में डर लगता है। यू.पी.एस.सी. के अलावा…

दूसरे क्या सोचेंगे, दुनिया क्या कहेगी?
Social Issues
दूसरे क्या सोचेंगे, दुनिया क्या कहेगी?
43min
1.2kreads
14
2

प्रश्नकर्ता: मैं जब अपनी ज़िन्दगी के बीते सालों को देखता हूँ तो दिखता है कि बहुत कुछ किया जा सकता था पर दूसरे क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, ये ख़्याल कर-करके मैंने कुछ किया नहीं। और आपका जीवन देखता हूँ तो पाता हूँ कि आपने सब कुछ लीग (संघ) से हटकर…

जो सामने है, उसपर ध्यान दो
Clarity
जो सामने है, उसपर ध्यान दो
7min
896reads
13
3

प्रश्नकर्ता: मैं अपने जीवन में हारा हुआ महसूस करता हूँ और जीवन की असफलताओं से बहुत अधिक परेशान हो जाता हूँ। इससे कैसे बाहर निकलूँ?

आचार्य प्रशांत: एक-से-एक चोटियाँ हैं चढ़ने के लिए, आई-आई-टी का एग्जाम क्लियर नहीं हुआ बहुत छोटी चोटी है वह। हजारों लोग हर साल करते हैं…

आओ तुम्हें जवानी सिखाएँ || आचार्य प्रशांत (2020)
Clarity
आओ तुम्हें जवानी सिखाएँ || आचार्य प्रशांत (2020)
22min
866reads
15

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, “जवानी अकेली दहाड़ती है शेर की तरह”—आपकी यह पंक्ति जब से सुनी है, तब से ख़ुद को युवा कहने में शर्म आती है। मुझ में उत्साह की कमी है। वो धार नहीं है जो इस उम्र में होनी चाहिए। किसी भी कर्म में डूबने की कोई…

अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें? || युवाओं के संग (2019)
Goal
अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें? || युवाओं के संग (2019)
3min
1.1kreads
10
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें?

आचार्य प्रशांत: जो तुम उपलब्ध करना चाहते हो, अपने-आप को बार-बार याद दिलाओ कि वो तुम क्यों उपलब्ध करना चाहते हो, और वो उपलब्ध करके क्या मिलेगा। उपलब्धि से पहले की प्रेरणा क्या है, इंस्पिरेशन क्या है – ये अपने-आप को…

अतीत के ढ़र्रे तोड़ना कितना मुश्किल? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Laziness
अतीत के ढ़र्रे तोड़ना कितना मुश्किल? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
5min
398reads
9
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प्रश्न: आचार्य जी, बीस साल से जिन ढर्रों पर चलता आ रहा था, आपने आकर बोल दिया कि वो ठीक नहीं हैं। तो अब मैं उन्हें ठीक करने की कोशिश करूँगा। दो-चार दिन चलूँगा, फिर पाँचवें दिन लगेगा सब ऐसे ही चल रहे हैं तो ठीक है रहने दो, मैं…

संकल्प पूरे क्यों नहीं कर पाते? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)
Goal
संकल्प पूरे क्यों नहीं कर पाते? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)
8min
213reads
1

प्रश्न: आचार्य जी, हम जीवन में संकल्प करते हैं और पाते हैं कि जल्द ही फीका पड़ने लगता है। ऐसा क्यों?

आचार्य प्रशांत: सही बात तो ये है कि जो काम शुरू किया, वो शुरू ही इसलिए नहीं किया कि ख़ुद समझ आई थी कोई बात, वो शुरू इसलिए…

आँख खोल के देखो, दुनिया दूसरी हो जाएगी || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
आँख खोल के देखो, दुनिया दूसरी हो जाएगी || आचार्य प्रशांत (2014)
2min
180reads
1

आचार्य प्रशांत: कुंदन ने बात कही है एक कि अगर यह स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?

नहीं, बिलकुल भी नहीं!

क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है, एक बार आपकी…

आदमी की खोपड़ी कभी नहीं भरती || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Attachment
आदमी की खोपड़ी कभी नहीं भरती || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
9min
324reads
4
1

आचार्य प्रशांत: एक कहानी सुना रहा हूँ, ठीक है? इसको तार्किक तरीके से मत सुनना, इसका भाव समझने की कोशिश करना। कहते हैं, कि एक बार एक फ़कीर आया एक राजा के यहाँ पर। बड़ा राजा था, राजा से बोलता है एक छोटा सा कुछ चाहिये, मिलेगा? थोड़ा सा…

कल्पनाएँ ही आलस्य हैं || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2012)
Laziness
कल्पनाएँ ही आलस्य हैं || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2012)
18min
378reads
4
1

आचार्य प्रशांत: क्या है आलस्य?

हम चीज़ों को, उनके लक्षणों के आधार पर भ्रमित कर लेते हैं। हम चीज़ को उसके नाम से भ्रमित कर लेते हैं। अच्छा, दाल क्या है? दाल का नाम है दाल? क्या दाल का नाम है दाल?

मैं कहूँ, “पानी”, तो इससे प्यास बुझ…

न इच्छाएँ तुम्हारी, न उनसे मिलने वाली संतुष्टि तुम्हारी || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2012)
Attachment
न इच्छाएँ तुम्हारी, न उनसे मिलने वाली संतुष्टि तुम्हारी || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2012)
10min
235reads

आचार्य प्रशांत: सब कुछ तो सिर्फ़ जानना है न? खुद जानना। बस सुन नहीं लेना। किसी ने बोल दिया कि इंजीनियरिंग कर लो, तो कर ली। अब किसी ने बोल दिया कि चलो सॉफ्टवेयर वाली जॉब ले लो, तो ले ली। फिर किसी ने बोल दिया कि अब ये है,…

बोध में स्मृति का क्या स्थान है? || आचार्य प्रशांत (2015)
Dreams
बोध में स्मृति का क्या स्थान है? || आचार्य प्रशांत (2015)
4min
303reads
1
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श्रोता: एक बात मन में आती है कि जब अवेयरनैस (जागरुकता) है, तब अवेयरनैस है, आप नहीं हैं। तो जब तक इस शरीर में हैं, तब तक मस्तिष्क भी है, स्मृति भी है। जब अवेयरनैस है, तो स्मृति का क्या होता है? क्या वो कार्य नहीं करती?

वक्ता: नहीं, रहती…

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
Dreams
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
5min
1.3kreads

प्रश्न: सर, ये कहा जाता है कि ‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है’, ये कहाँ तक सही है?

वक्ता: ‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है’, जिस प्रकार से ये कही गई है, वैसे लगता है कि जीवन व्यापार है और उसमें अगर सफलता पानी है, तो…

सपने नहीं, समझ || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Dreams
सपने नहीं, समझ || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
4min
223reads
5

वक्ता: क्या इस बात को समझ रहे हो? इस पल में जो है, उसी से तो अगला निकलता है। अगर ये पल ठीक नहीं है तो क्या अगला ठीक हो सकता है?

श्रोता १: उसका कोई कारण भी तो होना चाहिए?

वक्ता: जिसको तुम आगे जाना कह रहे हो, उसका…

मत पूछो कि करें क्या? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Dreams
मत पूछो कि करें क्या? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
3min
119reads
2

वक्ता: सवाल है, ‘करें क्या’?

देखो बेटा सवाल है क्या इसको ध्यान से समझना। अक्सर मैं देखता हूँ कि छात्र यही बातें करते आते हैं कि हम समझ गए हैं कि ये ठीक है, ये नहीं । ये जान गए कि हम डरे हुए हैं, ये भी जान गए कि…

पंख हैं पर उड़ान नहीं || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Dreams
पंख हैं पर उड़ान नहीं || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
12min
151reads
1

प्रश्नकर्ता: सर, हम मुक्त होते हुए भी मुक्त क्यों नहीं हैं?

आचार्य प्रशांत: कुछ सवाल महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन मैं कहता हूँ कि ये बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। मुझे ये भी नहीं पता है कि ये जो सवाल पूछा गया है क्या उसे ये पता भी है कि उसने पूछा…

परम लक्ष्य सबसे पहले || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
Goal
परम लक्ष्य सबसे पहले || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
13min
187reads
4
1

वक्ता: जहाँ कहीं भी तुम परम लक्ष्य बनाओगे, उससे चाहते तो तुम एक प्रकार की ख़ुशी ही हो। यही तो चाहते हो और क्या चाहते हो? परम लक्ष्य नही होता है। परम ये होता है कि उसी ख़ुशी में रह कर तुम ने अपने बाकी सारे काम करे। छोटे- बड़े,…

करने से पहले सोचने की ज़रूरत || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
Dreams
करने से पहले सोचने की ज़रूरत || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
2min
179reads
12
1

प्रश्नकर्ता: सर, कहा जाता है कि कोई भी काम करने से पहले उसमें सोचना-विचारना ज़रूरी है। लेकिन मेरी ऐसी आदत है कि जो भी मैं सोचता हूँ, उसे कर देता हूँ। ये हमारे लिए अच्छा होगा या बुरा?

आचार्य प्रशांत: दोनों हो सकते हैं, निर्भर करता है कैसे। अगर मुद्दा…

सपने नहीं, जागृति का उत्सव || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Dreams
सपने नहीं, जागृति का उत्सव || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
5min
287reads
3

वक्ता: सपने क्यों? आंख खोलो और जियो! सपने तो इस बात की निशानी हैं कि आंख बंद है।

क्यों, किसलिए? पर मैं समझ रहा हूँ कि तुम कहाँ से आ रहे हो। तुम आ रहे हो वहाँ से जहाँ पर बड़े-बड़े लोगों ने कई बार तुमको ये कहा है कि…

अतीत के बोझ का क्या करूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Suffering
अतीत के बोझ का क्या करूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
5min
232reads
2
1

वक्ता: सवाल अच्छा है। ईमानदार सवाल है, ध्यान से देखेंगे इसे। सतीश कह रहे हैं कि ये सब बातें ठीक हैं पर जीवन का एक सत्य ये है कि हम सब अपनी परिस्तिथियों की पैदाइश हैं। बच्चा छोटा होता है, उसे वो ग्रहण करना ही होता है जो उसके आसपास…

न तुम, न तुम्हारा श्रम || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Talent
न तुम, न तुम्हारा श्रम || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
12min
123reads

प्रश्न: सर सफलता कैसे पाएँ?

वक्ता: तुम मुझे बताओ कि सफलता क्या है?

श्रोता: परिश्रम करने से सफलता मिलती है।

वक्ता: तुम कहना चाहते हो कि परिश्रम करने से सफलता मिलती है। यह पंखा देखो। यह कितना परिश्रम कर रहा है, परिश्रम करते-करते गरम हो गया है।

श्रोता: यह पंखा…

अवसर अभी है || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Dreams
अवसर अभी है || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
2min
226reads
2
1

श्रोता: सर, कहा जाता है कि जो लोग सफल होते हैं वो अपने अवसर ख़ुद बनाते हैं! हम अपने अवसर ख़ुद कैसे बनायें?

वक्ता: बनाना क्यों है? है! अवसर अभी है!

और बनाओगे भी तो किस फैक्ट्री में बनाओगे जरा ये बताना? ये सारी बेकार की बातों पर क्यों ध्यान…

फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
Values
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
48min
996reads
234

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
Money
घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
1min
858reads
16
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एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
Goal
किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
10min
641reads
39
9

बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।

विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
Mind
विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
9min
3.1kreads
143
50

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

सिखाने वालों से सीखो, चिपको नहीं ll आचार्य प्रशांत (2017)
Truth
सिखाने वालों से सीखो, चिपको नहीं ll आचार्य प्रशांत (2017)
5min
4.7kreads
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?

आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

पैसे और भविष्य की चिंता
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पैसे और भविष्य की चिंता
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शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।

अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
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अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
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तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।

अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
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अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
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आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।

हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!
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हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!
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जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।

पैसा कितना ज़रूरी है?
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पैसा कितना ज़रूरी है?
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वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।

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मनुष्य ही है जो बंधन का अनुभव करता है, इसलिए उसे अर्थ चाहिए। ज़िंदगी मिली है भीतरी बंधन तोड़ने के लिए, न कि भीड़ या रेस में दौड़ने के लिए। हमें लगता है रेस में दौड़ने वाले मेहनत कर रहे हैं, पर वो मौज कर रहे हैं। निरर्थक काम करने में तो मेहनत लगती है, लेकिन अकेले चलने और सार्थक काम करने में उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। खोजो वो, जो जीवन को अर्थपूर्ण बना दे। भीड़ में जीवन नहीं लगाना है, क्योंकि भीड़ में निरर्थकता है। उस निरर्थकता से बचना ही सार्थकता है।

अच्छी आदतें
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अच्छी आदतें
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कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

मेरे विचार मेरे हैं या सामाजिक?
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ये जीने का एक नया तरीक़ा है, क्योंकि हम तो हासिलियत की ही भाषा और ज़िंदगी जानते हैं न। हम कहते हैं, कहीं गए हैं, तो वहाँ से कुछ प्राप्ति हो जाए। यहाँ खेल प्राप्ति का है ही नहीं। यहाँ से भी उठ के जाओ तो ये मत कहना, कि ये प्राप्ति हो गई, ये जान लिया, ये समझ लिया। तुम थे, वो ज़रूरी है, तुम्हारा होना क़ीमती है, वही निष्कर्ष है।

क्या गीता व्यावहारिक जगत की भी समझ देती है?
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श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।

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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

जिज्ञासा स्वास्थ्य है और मान लेना रोग
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तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

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शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।

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दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।

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