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सर, आप हिंदी में साइन क्यों करते हैं? || आचार्य प्रशांत (2021)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: आपके साइन (हस्ताक्षर) देखें। आप बिल्कुल सरल तरीके से अपना नाम ही हिंदी में लिख देते हैं। तो आप ऐसे साइन क्यों करते हैं?

आचार्य प्रशांत: आपत्ती क्या है? कुछ उसमें गलत दिख रहा है क्या? दो बातें तुमने कहीं। पहली कि सीधे-सीधे अपना नाम लिख देते हैं और दूसरा यह कि हिंदी में लिखते हैं। तो इन दोनों ही बातों में गलत क्या दिख रहा है?

मेरे ख्याल से बारह या चौदह की उम्र तक मैं भी अंग्रेज़ी में ही हस्ताक्षर करता था। वह भी थोड़ा घुमा करके। ऐसे पी बनाया घुमाकर आर बनाया। फिर सवाल पूछा कि यह ज़रूरत क्या है ऐसे घुमाने की, कोई नियम तो है नहीं। और ज़रूरत क्या है अंग्रेज़ी भाषा में ऐसा करने की? क्योंकि, हिंदी मेरे ज़्यादा निकट रही है। तो मेरा यह सवाल पूछना बिल्कुल जायज़ ही था कि बातचीत हिंदी में करता हूँ, खेलता हिंदी में हूँ, खाता हिंदी में हूँ, सुनता हिंदी हूँ, देखता हिंदी हूँ, हूँ हिंदी। तो जब हस्ताक्षर करने का, साइन (हस्ताक्षर) करने का समय आता है तो यह अंग्रेज़ी कहाँ से आ गई। तो मैंने अपने साइन बदल दिए और चुपचाप हिंदी में अपना नाम लिखने लग गया।

मैं समझता हूँ यह सवाल हम सबको पूछना चाहिए अपने-आपसे कि यह मान भी लें कि भाषा भाषा एक बराबर होती हैं, तो आप अंग्रेजी को क्यों प्रधानता दे रहे हैं हिंदी के ऊपर, कोई वज़ह है आपके पास? मैं हिंदी भाषियों से बात कर रहा हूँ अभी। मैं उनसे नहीं बात कर रहा हूँ जो दूसरी भाषाओं के हैं। मैं सबसे कह रहा हूँ जो जिस भाषा का है उसको क्या वज़ह मिल जाती है कि वह अंग्रेज़ी में दस्तख़त करना शुरू कर देता है। आप उड़िया हों, बंगाली हों, पंजाबी हों, तमिल हों मैं आप सबसे पूछ रहा हूँ। कौन सी मजबूरी आ गई कि आपको अपना नाम या अपना प्रतीक, अपना हस्ताक्षर अंग्रेज़ी में बनाना पड़ गया? मुझसे मत पूछो मैं हिंदी में क्यों करता हूँ, तुम बताओ तुम अंग्रेज़ी में क्यों करते हो? क्योंकि जब पैदा हुए थे तुम तो अंग्रेज़ी में तो लोरियाँ नहीं सुनी होंगी। हिंदी भाषी हो अगर तो घर में अंग्रेज़ी में तो नहीं बात करते होगे। माँ से जाकर दाल चावल ही माँगते होगे, राइस एंड करी एंड लेंटिल्स तो नहीं बोलते होगे। या बोलते हो? अभी पूछ दिया जाए कि जीरे को और सौंफ को अंग्रेज़ी में क्या बोलते हैं तो तकलीफ़ हो जाएगी। खाते हिंदी में ही हो और मुझसे पूछ रहे हो कि आप क्यों अंग्रेज़ी में साइन नहीं करते। क्यों करूँ?

तुम्हें मेरा हिंदी में हस्ताक्षर असामान्य लग रहा है क्योंकि तुम्हारी आदत हो गई है भीड़ को देखने की। और भीड़ की आदत है बेहोशी की। भीड़ की आदत है कोई सवाल ना पूछने की, चुपचाप वह करते रहने की जो सब कर रहे हैं। नहीं तो हिंदी में हस्ताक्षर करना तो सबसे सहज बात होनी चाहिए। तुम्हें कहना ही चाहिए — हाँ, ऐसा तो होगा ही और विकल्प क्या है? उत्तर प्रदेश का हूँ, कि मध्य प्रदेश का हूँ, कि राजस्थान का हूँ, हरियाणा का हूँ, बिहार का हूँ, हिंदी में नहीं करूँगा हस्ताक्षर तो किसमें करूँगा। उसके जगह तुम्हें प्रश्न उठा रहा है।

आईआईएम (भारतीय प्रबंधन संस्थान) के बाद मेरी पहली नौकरी जनरल इलेक्ट्रिक में थी। तो इंटरव्यू (साक्षात्कार) वगैरह हो गया। उसके बाद में उनका वॉशरूम था, शौचालय, वहाँ गया। इंटरव्यू के कई राउन्डस (पारी) थे। उसमें जो आखिरी राउंड लिया था वो वहाँ पर एक वाइस प्रेसिडेंट (उपाध्यक्ष) थे, उन्होंने लिया था। तो मैं वहाँ खड़ा हुआ था, वह भी मेरे बगल में आकर खड़े हो गए। स्थिति समझिए। मैं शौचालय की बात कर रहा हूँ। वहाँ मुझसे बगल में खड़े होकर के कह रहे हैं कि " जस्ट वन थिंग, डू यू वांट टू मेक अ स्टेटमेंट (क्या तुम कुछ सिद्ध करना चाहते हो)" मैंने कहा " एक्सक्यूज मी (मुझे माफ़ कीजिए)"। उन्होंने कहा " आई जस्ट लुक्ड ऐट योर सिगनेचर, यू वांट टू मेक अ पॉइंट, प्रूफ समथिंग? (मैंने अभी तुम्हारा हस्ताक्षर देखा, क्या तुम कुछ साबित करना चाहते हो)।" बात इतनी अटपटी थी कि मैं कुछ बोला नहीं, बस हल्के से हँस दिया। खैर जो भी है उनको बात समझ में आई, नहीं आई। मैंने वहाँ फिर लगभग साल भर नौकरी भी करी। लेकिन लोगों को यह बात बड़ी खुजली जैसी लगती है, एक दबाव बनता है भीतर, जैसे शौचालय में। कि "तुम ज़्यादा बनते हो ना। तुम दुनिया को कुछ दिखाना चाहते हो ना। हीरो बन रहे हो ज़्यादा, हिंदी में साइन करोगे। तुम ही खास हो, तुम ही स्पेशल हो? यहाँ एमएनसी (बहु-राष्ट्रीय संगठन) है, पूरा ऑफिस (कार्यालय) अंग्रेज़ी में लगा हुआ है और तुम आईआईएम (भारतीय प्रबन्धन संस्थान) से निकल कर आए हो अभी-अभी, फिर भी तुम्हारी हिम्मत हो गई कि तुम यहाँ खुलेआम सीधे धड़ल्ले से लिख रहे हो।"

तो हम तो लिखते थे। तब भी लिखते थे आज भी लिखते हैं। मुझे तुम बताओ तुम क्यों नहीं लिखते हो? हिंदी से दूर होने का मतलब समझते हो ना क्या होता है? बहुत सारी चीज़ों से दूर हो जाना। भाषा सिर्फ़ भाषा नहीं होती, वह अपने साथ बहुत सारी चीज़ें जोड़कर चलती है। भाषा को छोड़ोगे तो भाषा से जो चीज़ें जुड़ी हुई हैं ना, वह भी छूट जाती हैं। हो सकता है तुरंत ना छूटे वह, धीरे-धीरे करके फिर छूटती रहती हैं। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।

पिछले साल एक वीडियो में मैंने कहा था कि "भाई नीचे कमेंट (टिप्पणी) वगैरह करते हो तो देवनागरी में कर दिया करो।" मुझे बड़ा अच्छा लगा। बहुत लोगों ने उस बात को सम्मान दिया। वह देवनागरी में लिखने लगे टिप्पणियाँ। आज भी बहुत लोग लिख रहे हैं। सुनने वालों से मेरा आग्रह है: हो सके तो हस्ताक्षर हिंदी में करें। बहुत-बहुत मूल बात है। अपनी माँ और अपनी मिट्टी जैसी बात है। जैसे माँ नहीं बदलती और जैसे मिट्टी नहीं बदलती, वैसे ही मातृभाषा नहीं बदलती।

फिर पूछा है कि आप एकदम सरल तरीके से अपना नाम ही क्यों लिख देते हैं, तो क्या करूँ वहाँ पर? मुझे सवाल नहीं समझ में आता। आप लोग हँस रहे हो। मेरा कोई चुटकुला सुनाने का इरादा नहीं है। मुझे पता है कि तुम क्यों पूछ रहे हो क्योंकि अधिकांश लोग सिग्नेचर करने के नाम पर कनखजूरा बनाते हैं वहाँ पर। दुनिया भर की जो बायोडायवर्सिटी (जैवविविधता) होती है वह अगर तुमको देखनी है तो एक फॉर्म (आवेदन पत्र) उठा लो जिसमें दस-पचास लोगों ने साइन करें हो। अर्थवर्म (केंचुआ), सेंटीपीड (चालीसपद), टेपवर्म (फीता कृमि), छोटे बच्चे जैसे कैट (बिल्ली) और डॉग (कुत्ते) बनाते हैं। सब तरीके के नमूने तुम्हें मिल जाएँगे। यह लोगों के हस्ताक्षर हैं। क्यों?

अपने नाम से इतनी नफ़रत है कि सीधे-सीधे अपना नाम नहीं लिख सकते वहाँ पर? अपने ही नाम को काट पीटकर कई लोग अपने नाम के दो अक्षर लिखते हैं, फिर उसके ऊपर से दो बार कलम चलाते हैं। तुम्हारा ही नाम है भाई! इतना क्या शर्मा रहे हो। साफ-सुथरे सरल तरीके से अपना नाम लिख दो। तुम्हारे नाम का एक वज़न होना चाहिए। तुम्हारे नाम में एक स्पष्टता, एक सरलता होनी चाहिए। छुपा रहे हो क्या अपने नाम को? शर्मिंदा हो क्या अपनी हस्ती से कि काट रहे हो, पीट रहे हो, कुछ कर रहे हो, घुमा रहे हैं।

नाम होगा उनका अभिमन्यु। तो वो लिखेंगे बड़ा सा, फिर बी और फिर ऐसे घुमा देंगे जैसे अ प्लेनेट गोइंग अराउंड द सन इन इलैप्टिकल ऑर्बिट (कोई ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रही हो)। ऐसे पूरी। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है और चाँद पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है। यह जनाब के हस्ताक्षर हैं। इतनी कलाकारी तुमने कैनवस (चित्र फलक) पर कर दी होती तो चित्रकार बन गए होते।

कोई वज़ह है यह कलाकारी करने की, यह जटिलता पैदा करने की? मैं बताऊँ यह जटिलता कहाँ से आ रही है। यह कॉम्प्लेसिटी ऑफ माइंड (मन की जटिलता) है। जब मन सरल नहीं है तो हस्ताक्षर सरल कैसे हो जाएगा। जब मन में ही गाँठे हैं तो वहीं गाँठे फिर तुम्हारे हस्ताक्षर में दिखाई देती हैं। नहीं तो तुम सीधे-सीधे क को क और ख को ख लिखते ना। तुम क का कनखजूरा क्यों बना देते हो वहाँ पर? मन सरल होना चाहिए फिर शब्द अपने-आप सरल हो जाते हैं। हो जाते हैं ना?

जब मन सरल नहीं होता है तो सब कुछ विकृत होता है, टेढ़ा होता है, जटिल होता है, उलझा हुआ होता है, गाँठो में होता है। लोगों के हस्ताक्षर देख लो समझ जाओगे कि ज़िंदगी में कितनी गाँठे पड़ी हुई है, और गाँठो का मतलब है कष्ट। गाँठे, और आयातित गाँठे। ठीक वैसे जैसे अंग्रेज़ी एक आयातित भाषा है। आयातित माने? जो तुम्हारा है नहीं पर तुमने मंगा मारा। जो तुम्हारा है भी नहीं पर तुमने खासकर उसको मंगा लिया। उसका आयात किया, उसको इंपोर्ट (आयात) किया। कष्ट ऐसे ही होते हैं अधिकांशतः हमारे। उनकी कोई ज़रूरत नहीं। हम उनको मंगाते हैं। तरीके-तरीके से आमंत्रित करते हैं। खींच कर लाते हैं, आओ आओ।

कैसे कैसे हस्ताक्षर, अच्छा खासा आदमी होगा। सॉटूथ कर्व जानते हो ना कैसा होता है? कैसा होता है? जैसे आरे के दाँत। आरा जानते हो? जिससे लकड़ी काटते हैं। उनका साइन वैसे ही होता है। वह लग रहा है जाने आरे के दाँत हैं, जाने मगरमच्छ के दाँत हैं। जब साइन ऐसा है तो जिंदगी कैसी होगी?

सीधा, सुंदर, सुकोमल हस्ताक्षर नहीं कर सकते? या कागज पर अपने नाम का फूरियर ट्रांसफॉर्म बनाते हो? कह रहे हो नाम तो अलग था, यह हस्ताक्षर मेरे नाम का फूरियर ट्रांसफार्म है, ज़ुग ज़ुग ज़ुग ज़ुग, इनफ़ाइनाइट नंबर्स ऑफ स्मॉल वेव्ज़।

यह सब बहुत छोटी-छोटी बातें हैं पर मैं इनके बारे में बोल इसलिए रहा हूँ क्योंकि हम इन पर गौर नहीं करते। जैसे हम अपने हस्ताक्षर बेहोशी में चुनते और करते हैं वैसे ही जीवन में सब कुछ बेहोशी में चुन रहे हैं और कर रहे हैं। और इसी चक्कर में जो एक हमको कीमती जीवन मिला हुआ है वह बर्बाद चला जाता है। कुछ पता नहीं चलता। जो लोग यह वीडियो देख रहे हो, मेरा आग्रह है उनसे कि इस विषय में थोड़ा विचार करें।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी, आचार्य जी आपने सिग्नेचर के बारे में बताया उसे काफ़ी रिलेट (संबंधित) कर पाया क्योंकि मैं भी अपने नाम के पहले अक्षर एन को बनाकर गोल करके अपना उपनाम लिखता था मेहता। तो मैंने याद किया कि मैं ऐसा क्यों करता था। चूँकि मैं क्रिकेट खेलता हूँ तो मैंने यह सचिन से सीखा था। सचिन भी एस लिखकर गोल करके तेंदुलकर लिखते हैं।

आचार्य: तो सचिन कहाँ से रोल मॉडल (प्रेरणास्रोत) हो गया। दिक्कत यह है कि जो भी कोई आकर तुम्हारा थोड़ा मनोरंजन कर दे तुम्हारे लिए वही भगवान हो जाता है। " क्रिकेट इज रिलीजन एंड सचिन इज गॉड ( क्रिकेट धर्म है और सचिन भगवान है)।" जो जिस जगह का है उसे उस जगह रखना सीखो। एक आदमी आकर तुम्हारा मनोरंजन कर रहा है बस ठीक है। उतनी ही अहमियत है उसकी, बहुत अच्छा करा। बहुत अच्छा मनोरंजन करा, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।

क्रिकेटर गुरु थोड़ी बन जाएगा। क्रिकेटर जीवन शिक्षक थोड़ी बन जाएगा। हाँ, तुम्हें यह सीखना हो उससे कि कवर ड्राइव कैसे मारते हैं तो उसी के पास जाओ। बेशक उसके पास जाओ, उपनिषदों के पास जाने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन समय की किताब पर अपने जीवन के अक्षर कैसे उकारने हैं, हस्ताक्षर कैसा हो तुम्हारा यह सीखने तुम किसी क्रिकेटर या फिल्म स्टार के पास थोड़ी चले जाओगे। उनसे बाउंसर सीख लो, योर्कर सीख लो, ठीक है यहाँ तक। और इससे ज़्यादा थोड़ी सर पर चढ़ाना है।

जब मन ही तुम्हारे लिए सब कुछ हो जाता है ना, तब जो भी कोई उस मन को मनोरंजन देने लगता है वह भगवान बन जाता है तुम्हारे लिए। मनचला जीवन जीने की यह सज़ा मिलती है। मन आपके लिए सब कुछ है। अब कोई आ गया वह नाचता-गाता अच्छा है, कोई है जो आइटम नंबर बहुत अच्छा करती है, वही फिर आपके लिए सब कुछ हो जाते हैं कि इन्हीं से तो जीवन सीखना है, यही देवी है, यही देवता है, यही गुरु है। इन्हीं से सब कुछ करना है।

आदर्श जीवन में अगर पकड़ने हैं तो ऊँचे पकड़ो, बहुत ऊँचे पकड़ो। जीवन स्कोर ड्राइव नहीं है। कट , पुल , हुक ठीक है। वह ट्वेंटी टू यार्ड्स पर ठीक है। बाहर निकल कर भी हुक मार दोगे जल्दी से? वकील हो अदालत में खड़े हो वहाँ अदालत में क्या करोगे, पुल कर दोगे खट से?

जो जिस चीज़ के लायक है उससे वही चीज़ सीखनी चाहिए। कहा था ना मैंने एक बार — खिलाड़ी से खेल सीखो, व्यापारी से व्यापार सीखो, लेकिन जीवन या तो तुम्हें जीवन ही सिखाएगा या गुरु सिखाएगा। वैज्ञानिक से विज्ञान सीख लो। नर्तक से नृत्य सीख लो। बावर्ची से खाना बनाना सीख लो। यह सब अलग-अलग क्षेत्र है जीवन के छोटे, छोटे, छोटे, छोटे। यह जीवन नहीं है।

अध्यात्म जीवन का मूल है। खेल है, चाहे पाककला है, चाहे राजनीति है, चाहे विज्ञान है, चाहे व्यापार है, यह सब क्या है? जीवन के छोटे-छोटे हिस्से हैं। लेकिन अगर तुम्हें जीवन ही सीखना है तो तुम्हें जीवन के मूल पर जाना पड़ेगा, वह तुम्हें अध्यात्म से ही मिलेगी सीख। हाँ, अध्यात्म तुमने सीख लिया तो बहुत संभावना है कि तुम थोड़े बेहतर खिलाड़ी भी हो पाओ। तुम थोड़े बेहतर बावर्ची भी हो पाओ। तुम थोड़े बेहतर ड्राइवर भी हो पाओ, बेहतर वकील भी हो पाओ। लेकिन इस बात में कुछ निश्चित नहीं है कि तुम अगर बेहतर वकील हो गए तो तुम बेहतर इंसान भी हो जाओगे। या तुम बेहतर क्रिकेटर हो गए तो तुम जीवन भी बेहतर जिओगे, ऐसा बिल्कुल कुछ नहीं है।

हम उल्टी सोच लगा देते हैं। हम सोचते हैं कि क्रिकेटर अच्छा है तो इंसान भी अच्छा होगा। गलत बात, बिल्कुल गलत बात। ऐसा नहीं है। हम सोचते हैं नाचता अच्छा है तो बंदा भी अच्छा होगा। ना! ठीक वैसे ही जैसे हम शक्ल देखकर फिसल जाते हैं। कि शक्ल अच्छी है तो इंसान भी अच्छा होगा। शक्ल अच्छी हो तो इंसान अच्छा होता है कभी? क्या रहा है तुम्हारा अनुभव? कि शक्ल से कुछ तय नहीं किया जा सकता, अच्छा भी हो सकता है बुरा भी हो सकता है। यही रहा है ना। जैसे शक्ल इत्यादि से इंसान का कुछ पता नहीं है — तुम थोड़ी ना कहोगे कि इतनी अच्छी शक्ल है आइए मुझे जीवन का ज्ञान दीजिए, बताइए हस्ताक्षर कैसे करूँ। यह करते हो? क्या पता करते भी हो। तो वैसे यह तुम थोड़ी ही कहोगे कि क्या स्ट्रेट ड्राइव मारा है, आइए बताइए मैं जीवन के निर्णय कैसे किया करूँ? बताइए मैं जीवन में यह राह चुनु कि वह राह चुनु? पर हम तो ऐसे ही करने लग जाते हैं। और यह मैं तब कह रहा हूँ जब मैं भी अभी ऊपर बैठ कर के टेस्ट मैच देख रहा था टीवी पर। टेस्ट मैच हो और कड़ा संघर्ष हो तो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है देखना।

लेकिन मुझे हर चीज़ को उसकी सही जगह देना भी आता है। अच्छी बात है आपने शॉट अच्छा खेला, आपने बिल्कुल धैर्य के साथ वेल लेफ्ट कर दिया। बढ़िया लग रहा है देखने में। और उससे ज़्यादा नहीं। बात खत्म।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=4dpG--cFQic

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