
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कोई कुछ बोलता है, तो न चाहते हुए भी ‘ना’ नहीं बोल पाता हूँ।
आचार्य प्रशांत: ‘ना’ तो तुम बोलते हो, ऐसा तो नहीं है कि ‘ना’ नहीं बोल पाते।
ऐसा नहीं है। ‘ना’ तो हम बोलते हैं, वहाँ हमारा गणित होता है। हमें अच्छे से…



आचार्य प्रशांत: ज़्यादातर लोग, सभी लोग बहुत सारे लोग होते हैं। एक व्यक्ति बहुत सारे चेहरे रखता है। इसी बात का प्रतिनिधि दशानन है, अपने दस सिरों के साथ।
तो हर इंसान के भीतर बहुत-बहुत सारे हिस्से होते हैं। ये बात तुम्हें उसके चेहरे से पता नहीं चलेगी, क्योंकि चेहरा…


सही लक्ष्य की खातिर जियो। दिल में एक सही उद्वेश्य होना चाहिए। उसके बाद किसी पॉजिटिव थिंकिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये चीज़ इतनी ज़बरदस्त मिल गई है, प्यार हो गया है इससे, अब मजबूर हैं इसके सामने। अब चाहें भी पीछे हटना तो हट नहीं सकते। जब ऐसा हो…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने अपने एक संवाद में कहा है कि व्यक्तित्व की बात हम इसीलिए करते हैं क्योंकि हम मूलतत्त्व से अनभिज्ञ रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि – हम दूसरों के मूलतत्त्व को कैसे देखें?

आचार्य प्रशांत: सूफी था एक, उसके घर खाने को ज्यादा रहता नहीं था | बस उतना कि अपना, सुबह खा लिया अपना | शाम की ज्यादा फिकर नही, शाम को मिल गया तो अच्छा, नही मिला तो भी कोई बात नही और जो सूफी साधना है उसमें कम खाने पर…

आचार्य प्रशांत: अच्छा, आप ने एक चीज़ गौर करी है? यूँ ही, कहीं रहो, घर में, बाज़ार में, बोलना आसान होता है। यहाँ आते हैं, शुरुआत में, बोलना थोड़ा सा अटक जाता है और फिर कुछ देर बाद, या आधे घंटे बाद, यहाँ भी बोलना आसान हो जाता है,

आचार्य प्रशांत: सवाल ये है कि, मैंने कहा है कि जो कुछ भी आप तक पहुँच रहा है उसकी असलियत जानिये। उसका सत्य पहचानिए। सतह पर मत रह जाइए। चीज़ वास्तव में क्या है, इस तक जाइए। तो पूछ रही हैं कि ये कैसे हो? डिकोड (समझा) कैसे करें?

श्रोता १: सर, मेरी लाइफ में बहुत सारे चिंता के विषय होते हैं जैसे मेरे परिवार में मेरे पेरेंट्स के बीच कुछ हो गया, झगड़ लिए हैं दोनों तो फिर उन दोनों को समझाना है पर वो समझ नहीं रहे । जैसे एक दोस्त है कि जा रहा है खाए…




आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।



श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।










प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, मुझे ये समझने में बड़ी समस्या होती है कि किस पर भरोसा करूँ और किस पर न करूँ।
आचार्य प्रशांत: किसी पर भी भरोसा करने का निर्णय तुम ही करोगे न? और भरोसा नहीं करने का भी निर्णय तुम ही करोगे। तो अंततः तुमने भरोसा किस पर…
प्रश्नकर्ता नमस्ते सर, आज की बातचीत थोड़ी कॉन्ट्रोवर्शियल (विवादित) होने वाली है
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं होती रहती है कॉन्ट्रोवर्शी।
प्र: मैं आपसे गुरुओं के ऊपर बात करना चाहता हूँ और इस पूरी बात की शुरुआत आज से दस या बारह साल पहले से होती है।
आचार्य: क्या हुआ…
प्रश्नकर्ता: कुछ नया आता है तो उसको देख करके डर उठता है। ऐसा कैसे हो पाये कि नये को देख करके डर की जगह उत्सुकता जगे?
आचार्य प्रशांत: तुम एक घर में हो, तुम एक घर में हो आयुष (प्रश्नकर्ता) और तुम्हें अच्छे से पता है कि ये जो घर…
प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, मुझे ये समझने में बड़ी समस्या होती है कि किस पर भरोसा करूँ और किस पर न करूँ।
आचार्य प्रशांत: किसी पर भी भरोसा करने का निर्णय तुम ही करोगे न? और भरोसा नहीं करने का भी निर्णय तुम ही करोगे। तो अंततः तुमने भरोसा किस पर…
प्रश्न: अभी हम लोग कार में आ रहे थे तो उसमें ओशो के वचन चल रहे थे। उसमें उन्होंने कहा कि जब आप कभी ज़्यादा सोचते हो, तो आप कहीं नहीं पहुँच पाते। आप जब भी किसी चीज़ को बहुत ज़्यादा सोचोगे, तो आप किसी भी दिशा में आगे कहीं…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
राष्ट्रों की लड़ाई असल में अहंकार की लड़ाई है। देश माने वहाँ के लोग, और लोग जैसे हैं वैसे ही उनके नेता। दुनिया में जो गुंडागर्दी दिखती है वो बाहर से नहीं आई, हम ही उसका स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध हों या व्यक्तिगत, यहाँ वफ़ा नहीं ताक़त चलती है। अहंकार की भूख अनंत है इसलिए युद्ध रुकता नहीं। समाधान केवल एक है कि जनसंख्या को स्वयं की शिक्षा मिले। जब तक इंसान अपने अहंकार को नहीं पहचानेगा तब तक विनाश जारी रहेगा।
एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।
लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।
पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?
जीवन सही जियो, तो रिश्ते भी फिर सही बनाओगी। सही लोगों को ही अपनी ज़िंदगी में प्रवेश दोगी। गलत ज़िंदगी जीने के कई दुष्परिणाम होते हैं। उनमें से एक ये होता है कि तुम्हें सब गलत ही लोग मिलेंगे। अभी दिक़्क़त ये होती है कि खेल तो होता है सारा जिस्मानी, लेकिन तुमने अपने आप को ये समझा रखा होता है कि बात भावनाओं की है। तो फिर जब रिश्ता टूटता है जिस्मानी, तो तुमको ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी भावनाओं पर चोट हुई है। अरे, बात भावनाओं की कभी थी ही नहीं। क्यों व्यर्थ में भावनाओं को इसमें बीच में ला रहे हो।
ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।
दुनिया में जहाँ भी दक्षिणपंथ है, राइट-विंग मूवमेंट्स जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। ईरान में भी अब यही चल रहा है। यह एक तरह से माया का चक्र है। यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा। मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है।

मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।

भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।

पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है, तो पवित्र क्या है इसमें फिर? पवित्रता चीज़ क्या होती है; ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ। वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।

जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।

प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।

प्रश्न: ‘भगवान’ क्या हैं?
वक्ता: इसका जवाब देना बहुत आसान हो जाता अगर तुमको वाकई पता ही ना होता, अगर पहले ये शब्द कभी सुन ही न रखा होता। अगर कोई बिल्कुल साफ़ स्लेट के साथ ये सवाल पूछे, ‘भगवान का क्या मतलब है?’ तो इसका जवाब देना…

एक सिद्धांत है। एक सिद्धांत क्या है? कि भाई, गाड़ी में जब पाँच-एक लीटर या दो लीटर ही फ्यूल बचे, तो गाड़ी आवाज़ कर देगी, वो सिद्धांत की बात है। आप गाड़ी को इसके लिए दोष थोड़े ही दे सकते हो। तथ्य ये है कि फ्यूल सचमुच कम है, तथ्य ये है कि आप बैठे हो या कोई भी बैठा हो गाड़ी यही कहेगी, कि “लो फ्यूल, लो फ्यूल।” गाड़ी कोई अपनी बात आपसे थोड़ी कह रही है। बात समझिए। और न गाड़ी की आपसे कोई व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी है, एक सिद्धांत है।

अगर जीवन में अनुशासन नहीं है, तो मतलब साफ़ है कि तुम जिस विषय के पास हो, उसमें इतनी जान ही नहीं है कि वह तुम्हें अनुशासित कर पाए। अधिकांशतः हमारे जीवन में एकाग्रचित्तता नहीं रहती, उसका कारण यह है कि हमने अपने लिए लक्ष्य ही मूल्यहीन चुन लिए होते हैं। स्वयं को अनुशासित करने की चेष्टा मत करो, उपयुक्त विषय ढूँढो। जब तुम सच के पास होते हो, तो अनुशासन अपने आप हो जाता है। तुम उसके निकट रहो, वो तुम में अनुशासन ला देगा।

किसी भी सफल विवाह में सीमाएँ होंगी, और अगर आप उन सीमाओं का सम्मान करना नहीं जानते तो वह टूट जाएगा। कोई व्यक्ति आपके जीवन का केंद्र बन जाए, यह प्यार नहीं है। दो इंसानों के बीच एकमात्र सच्चा संबंध जो हो सकता है, वह है दोस्ती। एक-दूसरे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताइए और फिर एक-दूसरे को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र छोड़ दीजिए।

बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।

रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

भारत आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। भारत देश के पीछे बहुत ऊँचे सिद्धांत हैं। अगर यह देश नहीं रहेगा, तो उन सिद्धांतों को भी ताक़त और अभिव्यक्ति देने वाला कौन रहेगा? इसीलिए इस देश की रक्षा बहुत आवश्यक है। बहुत से मौके ऐसे आते हैं, जब सैनिक शरीर को ही दाँव पर लगा देता है — यह सबसे मुश्किल और ज़्यादा वीरता का काम है। इस देश की जो रक्षा करने वाला है, वह निश्चित रूप से विशेष है और सम्मान का अधिकारी है।

रिश्ते प्राथमिक नहीं होते, इंसान प्राथमिक होता है। जो अपने लिए ही अच्छा नहीं, वो किसी और के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता, भले ही वह कितनी भी कसमें-वादे कर ले। अच्छा रिश्ता सस्ती चीज़ नहीं है, वो उन्हीं को मिलता है, जिन्होंने पहले ख़ुद पर मेहनत की हो। जिसमें अपने अंधेरे और भीतर की पशुता का सामना करने का साहस है, वही ख़ुद और दूसरों के साथ स्वस्थ रिश्ता बना सकता है।

विज्ञान में एक गरिमा है, वहाँ पर हर चीज़ झुठलाई जा सकती है। विज्ञान कहता है — कुछ भी मानो मत, कहो कि ‘पता करेंगे।' हिन्दुस्तान को इस दृष्टिकोण की ख़ास ज़रूरत है — मानना नहीं है, पता करना है। विज्ञान में एक-से-एक कहानियाँ हैं, वो कहानियाँ आपको पता चलें, आप वैज्ञानिकों के मुरीद हो जाएँगे। आकाश-गंगा पार कर जाएगा ये देश, पर पहले यहाँ के बच्चों में विज्ञान के प्रति आदर तो पैदा करिए।

प्रश्नकर्ता: सर,आज शाम को चन्द्रयान सफ़लतापूर्वक चाँद पर लैंड (उतरना) कर गया है। हमें भी बहुत खुशी है और पूरा देश भी बहुत खुश है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहेंगे?
आचार्य प्रशांत: खुशी की बात तो है ही, और बहुत ज़रूरी था कि सुर्खियों में कोई वैज्ञानिक घटना आये,…

शुरुआत इसकी होती है — उस शिक्षा व्यवस्था से, उस परवरिश से, जिसमें हमें संबंध का मतलब ही नहीं बताया जाता। बस यह बता दिया जाता है कि जल्दी से जवान होते ही लड़की की शादी कर देनी है। आप दो लोगों को एक तरह से मजबूर कर रहे हो कि एक साथ रहो, जबकि वे एक-दूसरे को जानते-समझते नहीं। दिलों को मिलने दो। दो लोग यदि अपनी मर्ज़ी से, अपने अनुभव के आधार पर ज़िन्दगी को देख-समझ कर संबंध बनाएँगे, तो कुछ अलग बात होगी।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बेटे या बेटी का माँ-बाप के प्रति क्या ऋण होता है? मेरे पिता भ्रष्ट व्यक्ति हैं, मुझे पसंद नहीं हैं। लेकिन बार-बार यह ऋण चुकाने वाली बात मन पर हावी हो जाती है। कुछ कहें!
आचार्य प्रशांत: संतान का और माँ-बाप का रिश्ता दो तलों पर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। मेरा विवाह हुआ, उसके बाद दो बच्चे हुए हमें। पत्नी मेरी गृहणी हैं। और एक बेटा है पहले, फिर उसके बाद बेटी हुई। परन्तु कुछ मेडिकल कंडीशन (चिकित्सा स्थिति) के कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। अभी एक लड़का ही है साढ़े तीन साल का। तो अब…

प्रेम में साथ रह भी सकते हो, और नहीं भी। मूल मुद्दा रिश्ते के स्वास्थ्य का है। जिस रिश्ते में प्रेम नहीं होता, वहाँ दूरी बनते ही घबराहट होती है। भीतर असुरक्षा चिल्लाती है — “नज़रों के सामने नहीं है, दूर चला गया, लौटेगा या नहीं, न जाने क्या कर रहा होगा, कहीं हमें भूल न जाए।” लेकिन रिश्ता अगर बढ़िया है, तो वह एक विश्वास देता है कि दूरी बनाई जा सकती है और नुक़सान भी नहीं होगा। इसलिए, न साथ रहना ज़रूरी होता है, न दूर जाना — बस प्रेम ज़रूरी होता है। प्रेम है, तो सब सही है।

मोह और वासना में आदमी अंधा हो जाता है। अगर किसी रिश्ते में आपको दुख मिल रहा है, तो इसका मतलब है कि उसे चुनने में गलती आपकी ही थी। दूसरे को दोष देने से पहले ये स्वीकार करना ज़रूरी है कि चूक आपकी ही हुई है। जब आप अपनी गलती मान लेते हैं, तो सामने वाले के प्रति जो गुस्सा और नफरत होती है, वो कुछ कम हो जाती है, और हो सकता है कि उसके प्रति आपके मन में थोड़ी करुणा भी जाग जाए।