
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।




ये खेल ऐसा है जिसमें ये नहीं देखा जाता कि किसने अंक ज़्यादा बनाये, इसमें ये देखा जाता है कि अन्त तक डटा कौन रहा, आख़िरी घड़ी तक खड़ा कौन रहा। इसमें बात ये नहीं है कि कौन कितना तेज़ दौड़ा, कहाँ तक पहुँच गया, इसमें बस बात ये है कि कौन मैदान छोड़कर भाग नहीं गया। जो मैदान छोड़कर नहीं भागा, वो जीत गया। ये नियम है इस खेल का। इसमें हार सिर्फ़ एक तरीक़े से होती है कि तुम मैदान छोड़ दो, *नॉक आउट* (पराजित) अपनेआप को घोषित कर दो कि भैया मेरा हो गया!


आचार्य प्रशांत: कई बार अपनेआप को एक चुनौती भरा लक्ष्य दे देना सहायक हो जाता है। पर जो भी कुछ जीवन में लाओ तो इतना चुनौतीपूर्ण, इतना आवश्यक, इतना अपरिहार्य होना चाहिए कि उसके आगे पुराना सबकुछ फीका लगे, तब तो पुराने से मुक्ति मिलेगी, नहीं तो नहीं मिलेगी। सतही



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जीवन में क्या लक्ष्य बनाने योग्य है? क्या है जो मन, शरीर दोनों को सुकून दे सकता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार। आपकी शिक्षाओं की वजह से मेरी निजी ज़िन्दगी में काफ़ी परिवर्तन आया है और एक चीज़ जो मैंने सीखी है वह है वर्तमान क्षण में जीना, जो आपने बहुत दिन पहले शुरुआती दिमाग वाली बात बतायी थी, वह निजी ज़िन्दगी में बहुत अच्छी तरह से काम




आचार्य प्रशांत: सही लक्ष्य क्या होता है? सही लक्ष्य वो होता है जो आपके भीतर की कमज़ोरियों को तोड़े। आपके भीतर जो कुछ ऐसा है कि ख़त्म होना चाहिए, लक्ष्य बनाओ जो उसे ख़त्म ही कर दे। मेरे ख़याल से कार्ल जंग का है — या आप लोग जाँच लीजिएगा…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, आप बार-बार कहते हैं ऊँचे उठो, जो बड़े-से-बड़ा है उसको करो। जीवन में कोई बहुत बड़ा लक्ष्य होना चाहिए, कभी भी छोटा होना स्वीकार मत कर लो। आप ऐसा बोलते हैं।



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि संकल्प का बल कैसे बढ़ाया जाए?

आचार्य प्रशांत: हर उद्योग में हमको कोई एड़ा चाहिए, हर घर में हमें कोई सरफिरा चाहिए। हर स्कूल में, हर कॉलेज़ में हमें कोई विद्रोही चाहिए।

आचार्य प्रशांत: मेरा उद्देश्य आत्मा है, ठीक है? आत्मा मेरा लक्ष्य, आत्मा मेरा अभिप्राय, आत्मा मेरा प्रेम। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मुझे जो भी कुछ उपलब्ध है वो साधन है बस। तो शरीर क्या है? साधन है। जिस सीमा तक शरीर मेरे प्रेम में सहायक होता है उस

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, संयुक्त परिवार में रहने की वजह से जो भी चुनौतियाँ आयीं, उनका सामना घर के बड़े-बुजुर्गों ने ही किया। जीवन में बस एक बार चुनौती का सामना करने जैसा लगा, जब मैं सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था, वो भी एक अन्धी दौड़ जैसी ही

प्रश्नकर्ता: किसी व्यक्ति के बनावटीपन को कैसे जानें?
आचार्य प्रशांत: क्यों जानना है किसी के बनावटीपन को? क्या करोगे? नीम लड्डू तैयार करवा रहे हो और कुछ नहीं। (सब हँसते हैं)। क्या करना है? अपना काम करो! अपनेआप पता चल जाता है। आप एक सीधी बात बोल रहे हो, उधर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक भजन पढ़ा जिसमें गुरु शिष्य को आदेश देते हैं कि जंगल जाकर ऐसी लकड़ी लेकर आओ जो न सूखी हो और न गीली हो। इसका मर्म समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: यह करीब-करीब ऐसा है जैसे जेन क़ुआन। कि लकड़ी लाना पर ऐसी लकड़ी लाना…



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैंने नवम्बर वाला शिविर

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़



प्रश्न: आचार्य जी, दैनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों में फँस जाता हूँ, बहुत ज़्यादा सोचने लगता हूँ, इससे बाहर कैसे निकलूँ?
आचार्य प्रशांत: गाड़ी चला रहे होते हो और सौ की गति से गाड़ी चली जा रही है। वहाँ तो न जाने कितना कुछ है जो तुम्हारे सामने आता जाता…


दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,


अगर आप अपने लक्ष्यों में बार-बार असफलता पाते हैं तो इसकी वजह संकल्पशक्ति, विल पावर इत्यादि का अभाव नहीं है। इसकी वजह ये है कि आपके लक्ष्य हैं ही ग़लत। सही लक्ष्य तो प्रेम-प्रसंग की तरह होता है, वह पकड़ लेता है, आप उसे फिर छोड़ना भी चाहोगे वो आपको

सफलता ऐसे नहीं देखी जा सकती कि कौन कहाँ पहुँचा। सफलता ऐसे नापिए कि किसने कितनी चुनौतियों का सामना किया आगे बढ़ने के लिए। व्हाट आर द ऑड्स (चुनौतियाँ क्या थीं), बाधाएँ क्या थी? तुम जितना भी आगे बढ़े हो, उतना आगे बढ़ने के लिए तुमने कितना जीता है, कितना

ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिया छब्बीस की उम्र में ही, तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचा उठना; जिससे तुमने रिश्ता बना लिया उसे ना उठने से…

जीवन परिवर्तन के लिए जिसको मैं कहता हूँ ठंडी उर्जा, शाश्वत उत्साह चाहिए। एक भीतर ऐसी हार्दिक प्रेरणा चाहिए जो दसों साल थमे नहीं, कमे नहीं, मिटे नहीं। गर्म जोश में वो बात होती ही नहीं है। गर्म जोश के खिलाफ़ तो सावधान रहा करिए, वो फ़िल्मी होता है।

सही लक्ष्य की खातिर जियो। दिल में एक सही उद्वेश्य होना चाहिए। उसके बाद किसी पॉजिटिव थिंकिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये चीज़ इतनी ज़बरदस्त मिल गई है, प्यार हो गया है इससे, अब मजबूर हैं इसके सामने। अब चाहें भी पीछे हटना तो हट नहीं सकते। जब ऐसा हो…



प्रश्नकर्ता: कभी-कभी ऐसे हालात आ रहे हैं लगता है कि जो भी मैं इस वक्त कर रहा हूँ, जैसे कॉलेज जाना इत्यादि, यह सभी निरर्थक है, और ऐसा एहसास मुझे अक्सर इसलिए आता है क्योंकि मैं देखता हूँ कि जीवन की दौड़ में सभी मुझसे आगे निकल चुके हैं और



प्रश्न: आचार्य जी, आपकी सफलता के पीछे क्या राज़ है?


हमारे लक्ष्य हमारे नहीं होते इसीलिए हमारे कोई लक्ष्य पूरे नहीं होते। किसी भी लक्ष्य की ज़िम्मेदारी तुम तभी उठा पाओगे जब वो तुम्हारे ह्रदय से आया हो। जो तुम्हारे ह्रदय से नहीं आया उसकी ज़िम्मेदारी उठाओगे तो बोझ लगेगी। सही लक्ष्य प्रेम प्रसंग की तरह होता है, वो पकड़ लेता है। आप उसे छोड़ना चाहोगे, पर वो आपको नहीं छोड़ेगा। खुद को देखो, अपनी हालत देखो और दर्पण जैसे लोगों के साथ समय गुज़ारो, फिर सही लक्ष्य निर्धारित कर पाओगे और समर्पित रह पाओगे।
मूलभूत शिक्षा लेनी ज़रूरी होती है। कुछ बातें हैं दुनिया की, जो नहीं पता होंगी तो पूरे इंसान भी नहीं बन पाओगे। विद्या-अविद्या दोनों चाहिए। अविद्या माने सांसारिक भौतिक शिक्षा और विद्या माने आध्यात्मिक शिक्षा। उपनिषद् कहते हैं, जिनके पास विद्या नहीं होती, वो गहरे कुएँ में गिरते हैं। लेकिन जिनके पास सांसारिक ज्ञान नहीं होता वो और ज़्यादा गहरे कुएँ में गिरते हैं। और जिनके पास दोनों हैं, वो मृत्यु को पार करके अमर हो जाते हैं।
प्रश्नकर्ता: मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ और बचपन से ही बहुत कम महत्वाकांक्षी रहा हूँ। खेल-खेल में ही मैंने जेईई का एग्ज़ाम क्रैक किया (परीक्षा उत्तीर्ण की) और आइआइटी खड़गपुर में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग (अभियान्त्रिकी) करने का मौका मिला।
इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में ट्रैकिंग (पर्वतारोहण) करने का मौका…
प्रश्नकर्ता: सर, प्रणाम! आपका पुराना छात्र हूँ। दो-हज़ार-दस से आपको सुन रहा हूँ, देख रहा हूँ। आप नहीं बदले, सब बदल गया। ज़माना बदल गया! आपके भीतर इतना जज़्बा आता कहाँ से है?
आचार्य प्रशांत: मुझे तो नहीं पता चलता कि मुझमें कोई जज़्बा है। तुमने कहा, ‘इतना जज़्बा! विशेष…
प्रश्नकर्ता: 'मैं ये नहीं हूँ' ये बात मुझे मन के तल पर तो समझ में आ गयी है, लेकिन ये मेरे जीवन में कैसे उतरे?
आचार्य प्रशांत: 'मैं नहीं' एक निगेशन (नकार) है। वो निगेशन किसी चीज़़ का ही हो सकता है, कुछ होगा तभी तो उसे निगेट करेंगे। जैसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने सही चीज़ों के लिए कष्ट उठाने की बात करी थी कल। पर जब हम गलत चीज़ से सही चीज़ तक पहुँचते हैं तब एक ताकत सी अनुभव होती है। लेकिन उसी समय एक तनाव भी रहता है। तो इसमें एक सहजता नहीं आती। क्या मेरा अहंकार…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! दो-हज़ार-सोलह में प्रतियोगी परीक्षा देकर बैंक में लगा था। लेकिन लगभग एक साल से मुझे ऐसा लग रहा है कि इसे छोड़कर कुछ ऐसा करूँ जिससे मेरी ज़िन्दगी लोगों के काम आये। और अब मैं इस पड़ाव पर आ गया हूँ कि मैंने निर्णय लिया है कि…
आचार्य प्रशांत: वह तो आप पर निर्भर करता है न। अगर बिलकुल खरी बात पूछेंगे तो जीवन को किसी लक्ष्य कि ज़रूरत ही नहीं है। पर वह इतनी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आपने बताया कि 'मैं' को जानना ही अध्यात्म है और यह 'मैं' मुक्ति चाहता है। तो यह 'मैं' अपना ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य कैसे निर्धारित करे जिससे वह मुक्ति की ओर जाए?
आचार्य प्रशांत: 'मैं' कभी भी कोई सिद्धान्त नहीं होता, 'मैं' कोई कल्पना नहीं है। 'मैं' कोई …
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आचार्य जी मुझे असफलता से बहुत डर लगता है। मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ। मन पढ़ते-पढ़ते परिणाम के बारे में सोचने लगता है और फिर बिल्कुल जम जाता है, डर लगता है आगे बढ़ने में। मैं डांसिंग ब्वाय कैसे बनूँ जिससे पढ़ाई भी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…
लेकिन बहुत सारे ज्ञानियों ने ख़ुद को कभी दास कहा है, कभी पाँव तले की घास…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं हाल ही में स्नातक हुआ हूँ और मेरा आख़िरी साल में प्लेसमेंट भी हो गया है, लेकिन मैं वह प्रस्ताव नहीं ले सका। मैं वह नौकरी नहीं करना चाहता था जिसमें जीवन को लेकर झूठी उम्मीदें हैं, तो मैं उससे नहीं जुड़ सका। आचार्य जी, मैं…
प्रश्नकर्ता सर, समाज में कुछ लोगों का दावा होता है कि वो समाज कल्याण के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन उसमें भी उनकी कामना छुपी हुई होती है। लेकिन कुछ लोग सचमुच ऐसा समझते हैं कि वो काम इसीलिए करना चाहते हैं क्योंकि वो वाक़ई समाज कल्याण करना चाहते…
कोई सभा हो, कोई बैठक हो, कोई मजलिस हो, हमें एक क्रान्तिकारी चाहिए। और एक कह रहा हूँ…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने पुराने ढर्रों को छोड़कर नये तरीक़े से शुरूआत करना चाहती हूँ पर असमंजस में हूँ कि अब जो काम करने का सोच रही हूँ, सही है या नहीं। यह उलझन मुझे हमेशा पकड़े रहती है और वो सही है या ग़लत है, इसी में उलझकर…
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी-अभी मेरी एक प्रवेश परीक्षा हुई थी, मैं उसमें फ़ेल हुआ। बाहर हो गया उससे तो काफ़ी ज़्यादा आहत हुआ था। अब मन नहीं लगता पढ़ाई में बिल्कुल भी और अब आगे कुछ करने का दिल भी नहीं कर रहा। बिना करे कुछ होगा भी नहीं, चाहता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में बड़ा लक्ष्य कैसे चुनें?
आचार्य प्रशांत: जो एब्सॅल्यूटली (पूर्ण) बड़ा है उसको लक्ष्य नहीं बना सकते न, तो कम-से-कम जो अनुपातिक तौर से बड़ा है, जो तुलनात्मक रूप से बड़ा है उसको ही लक्ष्य बना लो। क्योंकि दुनिया में तो जो भी कुछ तुम्हें बड़ा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। मेरा प्रश्न ये है कि हमारा किसी काम में मन न लगना या हम किसी कार्य की शुरुआत करते हैं तो उस कार्य को दो या तीन दिन से अधिक नहीं कर पाते। इस स्थिति में हम क्या कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बेटा, किसी भी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! कुछ ही महीने हुए हैं आपसे यूट्यूब के माध्यम से जुड़े हुए। 'वैराग्य शतकम' का इक्कीस्वाँ श्लोक मुझे सता रहा है, मेरे वजूद पर सवाल उठा रहा है। मैं कॉर्पोरेट में काम कर रहा हूँ तीन साल से, आप समझ ही गए होंगे मैं पापियों के…
जिनके दिल नहीं टूटते उनके लिए जीवन में कोई प्रगति संभव नहीं है। जो अपनी असफलता को भी चुटकुला बनाए घूमते हैं, जिन्हें लाज ही नहीं आती, उनके लिए जीवन में कोई उन्नति, उत्थान संभव नहीं है।
इंसान ऐसा चाहिए जो लक्ष्य ऊँचा बनाए। और लक्ष्य फिर ना मिले तो…
“मैं…
प्रश्नकर्ता: एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि, "तुम इसलिए पैदा हुए हो कि तुमको मुक्ति मिले और प्रकृति भी चाहती है कि तुम मुक्त हो जाओ", लेकिन दूसरी तरफ़ आप कहते हैं कि प्रकृति तुमको बाँधकर रखना चाहती है। तो इन दोनों बातों में तो विरोधाभास है।
आचार्य प्रशांत:…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी आपसे एक मार्गदर्शन चाहते हैं कि हमें अपना लक्ष्य किस तरह से निश्चित करना चाहिए? क्या हमें अपना लक्ष्य अपने स्वभाव के अनुसार बनाना चाहिए कि हमारे लिए क्या अच्छा होगा?
आचार्य प्रशांत: नहीं, लक्ष्य मात्र स्वभाव के अनुसार नहीं बनता। आपका स्वभाव ये…
प्रश्नकर्ता: क्या खोज रहे हैं हम?
आचार्य प्रशांत: यह जितना कुछ हम देखते हैं, यह जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, सुनते हैं, इसका अनुभव हमें यूँ ही नहीं हो रहा। थोड़ा गौर करेंगें तो आपको भी दिखेगा। कुछ भी आपको व्यर्थ ही नहीं दिख रहा, अकारण ही नहीं…
आचार्य: अगर मैं काम करने के बाद खुश हूँ तो काम करने के दौरान मैं कैसा हूँ?
नाखुश!
अगर मैं लगातार खुश ही हूँ तो काम करने के बाद…
प्रश्न: मन सही लक्ष्य से क्यों भटक जाता है? जीवन के लक्ष्य के प्रति हमेशा एकनिष्ठ कैसे रहें?
आचार्य प्रशांत: प्रेम।
कामना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि एक पल को भी भूलो नहीं, कुछ और याद ही न आए। अपनी पीड़ा के प्रति बड़ी संवेदनशीलता होनी चाहिए। तुम्हें पता होना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मेरी परीक्षा है, लेकिन मन शांत नहीं है। मैंने प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पर इस वर्ष ऐसा हो रहा है कि मन बड़ा अशांत है। कुछ ही घण्टे बचे हैं। आपका आशीर्वाद मिल जाएगा तो कल का दिन…