
प्रश्नकर्ता : मैं करुणा के बारे में पूछना चाहता था कि करुणा का रिलेशन (सम्बन्ध) दया के साथ कैसे है। मतलब मुझे कई बार लगता है, करुणा नाम की मेरे अन्दर कोई चीज़ है ही नहीं। और दया कई बार मुझे बड़ी आ जाती है, मुझे समझ में नहीं आता, भई ये कहाँ से होता है, क्या होता है।
आचार्य प्रशांत : दो बातें हैं, जो करुणा और दया में भेद करती हैं। पहली तो ये कि दया में दूसरे के दुख को तुम वास्तविक समझते हो। उसके दुख को तुम वास्तविक समझते हो क्योंकि तुम अपने दुख को वास्तविक समझते हो। तो इसलिए तुम्हें दूसरे के साथ सह अनुभूति होती है, सहानुभूति।जो ख़ुद सुख-दुख का झूला झूल रहा है, जो अपने ही दुख-सुख को बड़ी क़ीमत देता है, बहुत असली समझता है, वही दूसरे के दुख को देखकर बड़ा द्रवित हो जाता है, कहता है, ‘अरे! अरे! बेचारा!’ । और दया में ये भी कहते हो कि दुख उसको मिला हुआ है, कम-से-कम अभी मैं दुख से दूर हूँ। दूसरा बेचारा है, मैं नहीं हूँ। दूसरा तो मेरी मदद का पात्र है क्योंकि मेरी स्थिति उससे बेहतर है तो मैं उस पर दया कर रहा हूँ। तो दया में एक श्रेष्ठता का भाव भी होता है।
करुणा नहीं कहती कि दुख वास्तविक है। करुणा कहती है, ‘अच्छे से पता है कि दुख झूठा है, आँसू झूठे हैं। ये जितने सन्ताप का तुम अनुभव कर रहे हो, ये यूँही हैं, आधारहीन। जैसे कोई सपने में डर गया हो ऐसी तुम्हारी हालत है कि डर का अनुभव तो हो रहा है पर डर का आधार कुछ नहीं है, सपना मात्र।‘ और दूसरी बात, करुणा श्रेष्ठता का दम्भ नहीं रखती। करुण व्यक्ति कहता है कि भले ही आँसू झूठे हों तुम्हारे, मैं फिर भी पोछूँगा क्योंकि इस दशा से मैं भी गुज़र चुका हूँ। और मुझे मालूम है कि तुम्हारी ये दशा झूठी है इसीलिए इस दशा के आगे भी बहुत कुछ है। तुममें अपार सम्भावना है। सपने में रो रहे हो तुम। सपने से उठ गये तो तुम भी करुण बुद्ध जैसे ही हो। इसलिए किसी बुद्ध की करुणा होती है।
करुणा दोनों बातें एक साथ कहती है। पहली बात, आँसू झूठे हैं। दूसरी बात, झूठे तो हैं, मैं फिर भी पोछूँगा। बीमारी नकली है, नकली तो है, मैं फिर भी इलाज करूँगा।करुणा है बीमारी का यथार्थ जानना। इसीलिए करुणा इलाज भी कर पाती है। दया और सहानुभूति में तो बीमारी को ही नहीं समझा गया तो इलाज क्या होगा। दुख यदि बीमारी है तो दया उस बीमारी को समझती ही नहीं। इसीलिए दया से दुख का इलाज नहीं होता, दया से दुख बढ़ और सकता है। करुणा से दुख का इलाज होता है क्योंकि करुणा दुख को समझती है।
करुणा में बोध निहित है। दुख में कोई बोध नहीं, दया में कोई बोध नहीं। बोध के साथ-साथ बढ़ती है करुणा तो अगर कह रहे हो कि करुणा नहीं है तुम्हारे भीतर तो बोध नहीं है। बोध बढ़ेगा, करुणा अपनेआप आएगी।

अलग-अलग नहीं हैं दोनों! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। जिसको हम आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं, वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी, अध्यात्म भी। विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे, और अध्यात्म ताकि तुम्हें मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है? इन दोनों का ही पता होना चाहिए, जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को दो पंख मिल जाएँ, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा।

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…