
कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?





जानना तुम्हारा स्वभाव है, करना तुम्हारी प्रकृति है। जब तुम कहते हो, ‘मैं काम कर रहा हूँ’, तो तुम ये मान के चलते हो कि जो कुछ हो रहा है, उसमें तुम्हारी भी कोई सत्ता है। तुम करने वाले हो ही नहीं। जो होना है, सो तो हो ही रहा है, “अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय”। जानो! तुम मात्र जानने वाले हो।

मोह इतना सघन हो जाता है कि तुम सत्य से इनकार करने लगते हो। बात सीधी है, कचरा है लेकिन उसके साथ बहुत रहे हो, उससे पहचान जोड़ ली है, तो अब कचरे को कचरा नहीं बोलोगे। क्योंकि कचरे को कचरा बोला तो खुद को कचरा बोला; पहचान जोड़ ली है न। यही अहंकार है– पहचान जोड़ लेना और फिर जिस वस्तु से सम्बद्ध हो, उसके सारे गुण अपने ऊपर ले लेना। चोट पड़ रही हो कर्मफल की, और सहारा मिल रहा हो गुरु का ग्रन्थ का, ये दोनों जब एकसाथ हो रहे हों तो फिर नासमझी छूट जाती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अकेलापन महसूस करती हूँ और पुरानी बातें याद आती हैं। इस पर आपने कहा था कि विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है। हम जहाँ रहते हैं, जहाँ काम करते हैं, ये सारी जगह एक होती हैं तो विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है।




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं आपके द्वारा लोगों को लाभ पाता देखता हूँ। इस शिविर में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो लाभान्वित हुए हैं, और अपनी कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं और साथ में संस्था के जो स्वयं सेवक हैं उनके कार्य को भी देखता हूँ, तो मेरा


आचार्य प्रशांत: आप कह रही हैं कि कोर्स के वीडियो देखकर के और जो कुछ वीडियोस में कहा गया है उसको लिखकर के और जो लिखा है उसे बार-बार पढ़कर के और बार-बार वीडियो देखकर के भी संतुष्टि नहीं मिलती। ख़तरनाक बात तब होती जब आप कहती कि यह सब…

प्रश्नकर्ता: हमारी एक कल्चर्ड (संस्कारी) और

आचार्य प्रशांत: कृष्ण से, क्राइस्ट से, राम से, बुद्ध से प्रेम करना बड़ी विरल बात है; नहीं होता है। हम उनका नाम भी बस इसलिए ले लेते हैं क्योंकि भई नैतिकता का तकाज़ा है। स्कूल में बताया गया था, घर में सिखाया गया था कि अच्छे बच्चे ‘जय राम जी’

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हाल ही में मैं एक न्यूज़ (ख़बर) पढ़ रहा था, जिसमें यूके इंग्लैंड के एक कोर्ट ने रुलिंग (निर्णय) दी है कि पुरूषों को — जो गंजे हैं — उनको गंजा कहना एक सेक्सुअल हेरासमेंट (यौन उत्पीड़न) के तौर पर लिया जाएगा।
और उसमे उन्होंने तर्क…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, मेरा सवाल था कि एक समय था गाँव में जब शायद ही कोई नशे से ग्रस्त था लेकिन आज ऐसा चलन हो गया है कि कोई भी युवा शराब-कबाब से अछूता नहीं रहा। कॉलेजों में सभी स्टूडेंट्स के पास ड्रग्स मिलना आम बात हो गयी है तो सर,

आचार्य प्रशांत: तुम पूछ रहे हो कि आज से चार-पाँच साल पहले खाते थे, पीते थे, खेलते थे, चैन की नींद सोते थे, अब नहीं होता, कुछ बदला है। तो तुम्हीं मुझे बताओ कि क्या बदला है।
प्रश्नकर्ता: बहुत कुछ बदला है।



प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु, संत जो बताते हैं कि अलग-अलग तल में अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। कहते हैं कि आप जैसे-जैसे अपनी सुरति ऊपर उठाते हैं, आपके अलग-अलग तलों पर अलग-अलग ध्वनियाँ आपको सुनाई देती हैं। और फिर आपको प्रकाश होता है या मौन होता है। क्या ध्यान में

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अभी आपने कहा कि महिला और पुरुष दोनों समान जानवर होते हैं, पर अकसर यह देखा गया है कि जो अधिकतर लड़ाईयाँ हैं वो पुरुष वर्ग शुरू करते हैं। हम इतिहास में देखें, समाज में भी देखें, तो बहुत सारी लड़ाईयाँ अधिकतर पुरुषों के द्वारा शुरु

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे हमें पता है कि दुख है जीवन में, जिंदगी हमारी दुख में ही बीतती है। तो फिर आचार्य जी, लोग बच्चे पैदाकर के उन्हें ऐसी जिंदगी जीने के लिए क्यों विवश करते हैं?

प्रश्नकर्ता:

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मैं अपनी फ्रेंड्स को आपके वीडियोज भेजती हूँ जिसमें जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा नहीं देना है। तो वो मुझसे

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु, संत जो बताते हैं कि अलग-अलग तल में अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। कहते हैं कि आप जैसे-जैसे अपनी सुरति ऊपर उठाते हैं, आपके अलग-अलग तलों पर अलग-अलग ध्वनियाँ आपको सुनाई देती हैं। और फिर आपको प्रकाश होता है या मौन होता है। क्या ध्यान में…


प्रश्नकर्ता: आपका एक वीडियो देखा, जिसमें आप बड़ी भर्त्सना कर रहे थे रियलिटी शो में बच्चियों की डांस (नाच) की। आपको

प्रश्नकर्ता: मेरा एटिट्यूड रहता है कि अगर कोई बंदा है उसमें कुछ अच्छाईयाँ हैं कुछ बुराइयाँ भी हैं; एवरीथिंग इज देअर (सब कुछ है)। तो उसके अंदर जो अच्छाइयाँ हैं उसके उस अच्छाई को बढ़ावा दिया जाए और तारीफ की जाए, जिससे उसमें सकारात्मक बदलाव हो। और 'किसी को

प्रश्नकर्ता: मैं अपने परिवार की एक स्थिति में असमंजस में पड़ा हुआ हूँ। मेरे भाई एक लड़की से प्रेम करते हैं जो दूसरी जाति की है। इसी कारण मेरे घरवाले इस रिश्ते से काफी अप्रसन्न हैं। भाई बोलता है कि माँ-पापा को समझाओं और मेरी मदद करो और माँ-पापा कहते

प्रश्नकर्ता: सर मैं बंगाल से हूँ। बचपन से ही धीर-गंभीर मिजाज़ का रहा हूँ। अब मैं दिल्ली पढ़ने आया हूँ। यहाँ देख रहा हूँ कि सेंस ऑफ़ ह्यूमर (हास्यवृत्ति) को बहुत महत्व दिया जाता है। सेंस ऑफ ह्यूमर

प्रश्नकर्ता: पिछले दिनों गालियों को लेकर आपका एक वीडियो आया, मैं बात की और ज़्यादा गहराई में जाना चाहता हूँ, मुझे बताइए गालियों के पीछे का मनोविज्ञान क्या है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपने मिशन इंपॉसिबल (असंभव लक्ष्य) की बात की। मैं जब आज तीन दिन से ट्रेन में चला आ रहा था, तो मैं सोच रहा था कि, "मैं ये क्यों कर रहा हूँ? मुझे पता है कि ये लड़ाई तो हारी हुई लड़ाई है, कुछ कर नहीं

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं तो हम उसी में फँस जाते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते और फिर अंततः परिस्थितियों के दास बनकर रह जाते हैं। इस स्थिति से कैसे बाहर निकला जा सकता है?


प्रश्नकर्ता: क्या कुछ लोग प्राकृतिक तौर पर निडर और आध्यात्मिक होते हैं?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत अच्छा लग रहा है यहाँ शिविर में आकर। ऐसा घर पर अनुभव नहीं होता। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके वीडियो में एक बात सुनी थी, वो बात मन में ठहर गई। अब जो भी हरकत करता हूँ, जो भी गलती करता हूँ, तो उस वीडियो में सुनी उस बात को याद कर लेता हूँ, और उसी के संदर्भ में सीखने का प्रयास करता हूँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप आइ.आइ.टी., आइ.आइ.एम. से पढ़े, और फिर आइ.ए.एस. भी थे, फिर आपने ये सब छोड़ दिया। तो आपके भी कुछ संकोच रहे होंगे। या फिर परिस्थितियाँ कैसी थी कि आपने सबकुछ छोड़ दिया, इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली आपको?

प्रश्न: आचार्य जी, हम हमारा सच्चा प्यार, हमारा सच्चा व्यवसाय कैसे पाएँ? पापा ने कह दिया, “बी.टेक. कर लो, अच्छा होता है,” तो हम बी.टेक. करने आ गए। हर कोई अमीर बनना चाहता है, हर कोई अपनी ख़्वाहिशें ही पूरी करना चाहता है। पर ये हमारा सच्चा प्यार नहीं है।…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ एक ध्यानस्थ आदमी ही प्रेम जान सकता है। वही स्रोत है, वहाँ से ही सब कुछ निकलता है। ये जो लाल खड़े मैदान हैं न, मैदान में बड़ी लड़ाईयाँ होती हैं। लड़ाई में वही खड़ा रह सकता है, जो अंदर से शांत हो।

आचार्य प्रशांत: कॉलेज, घर, दोस्त, माता-पिता, शिक्षक, शॉपिंग मॉल; तुम्हारा संसार यही है, इतना ही है। यही है न?


आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?

प्रश्न: कभी-कभी ऐसा होता है कि मन करता है कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर चला जाऊँ, क्या ऐसा करना सही होगा?

आचार्य प्रशांत: देखो, अंधविश्वास आज के ज़माने में बहुत आगे नहीं बढ़ सकता है। विज्ञान इतना फैला हुआ है कि अब अंधविश्वासी होने का कोई वास्तविक डर बचा नहीं है, या है भी तो बहुत कम है। आज अन्धविश्वाश से कहीं ज़्यादा बड़ा जो ख़तरा है वह ख़तरा है अश्रद्धा
35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?
नया उन्हीं के पास आता है, जिनमें हिम्मत होती है — पुराना ख़त्म करने की। क्योंकि तुम्हें असल में कुछ नया नहीं चाहिए, तुम्हें तो सिर्फ़ पुराने से मुक्ति चाहिए। हम अपने आप से और पुराने से ऊब चुके हैं, और इसके ख़त्म होने की चाह रखते हैं। यदि वास्तव में नया चाहिए, तो पुराने को जाने दो और श्रद्धा रखो — नया अपने आप आ जाएगा। अन्यथा सिर्फ़ नए की आकांक्षा करोगे, तो वही आकांक्षा पुराने को बनाए रखेगी।
फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।
उम्र बढ़ जाने से तुम व्यस्क नहीं हो जाते। उसके लिए यहाँ दिमाग में कुछ होना चाहिए। कोई एक होता है जो बड़ा हो पाता है। कोई-कोई होता है जो वास्तव में बड़ा हो पाता है। उसको कहते हैं-खिलना, अपनी पूर्णता को प्राप्त होना। कोई-कोई होता है, बाकी तो सब ऐसे जैसे हमारे ऑफिस में डहेलिया है, ये लगे हुए हैं।
"प्रेम प्रेम सब कहैं, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहब मिलै, प्रेम कहावै सोय।" या जा मारग डायपर मिले प्रेम कहावै सोय? जिस मार्ग पर चलकर साहब से मुलाकात हो जाए, उस मार्ग का नाम है प्रेम (आकाश की ओर इशारा करते हुए) । या प्रेम उस मार्ग का नाम है जो *मैटरनिटी* (प्रसूति) वार्ड की ओर जाता है?
प्रश्नकर्ता: मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ और बचपन से ही बहुत कम महत्वाकांक्षी रहा हूँ। खेल-खेल में ही मैंने जेईई का एग्ज़ाम क्रैक किया (परीक्षा उत्तीर्ण की) और आइआइटी खड़गपुर में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग (अभियान्त्रिकी) करने का मौका मिला।
इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में ट्रैकिंग (पर्वतारोहण) करने का मौका…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कोई कुछ बोलता है, तो न चाहते हुए भी ‘ना’ नहीं बोल पाता हूँ।
आचार्य प्रशांत: ‘ना’ तो तुम बोलते हो, ऐसा तो नहीं है कि ‘ना’ नहीं बोल पाते।
ऐसा नहीं है। ‘ना’ तो हम बोलते हैं, वहाँ हमारा गणित होता है। हमें अच्छे से…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जैसा आप बोलते हैं कि चोट खाकर उठना पड़ता है। पर ये जो चोट है हम भूल जाते हैं कि इस बार खायी है, तो दस दिन बाद भूल गये और नयी चोट पकड़ ली। फिर और दस दिन बाद रो रहे हैं कि वो चोट…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, अभी बारह जनवरी को युवा दिवस है और स्वामी विवेकानन्द जी ने युवा जागरण के लिए बहुत कुछ किया है। और आपकी संस्था भी युवा जागरण के लिए बहुत प्रयास कर रही है।
मैं नॉर्थ ईस्ट त्रिपुरा से बिलॉन्ग (सम्बन्धित) करती हूँ, अभी कुछ सालों से…
प्र: सर, हम लोग…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय को लेकर संघर्ष लगता है, जैसे कि सबके पास चौबीस घंटे होते हैं तो मेरे पास भी चौबीस घंटे ही हैं, लेकिन जब कुछ काम करने जाता हूँ तो उसमें एक बार मन कहता है, ‘कोई बात नहीं, आराम करो।’ और जब समय निकल जाता है…
जैसे हम देखते हैं कि कोई मजदूर आदमी है, वह दिनभर मजदूरी करता…
आचार्य प्रशांत: 'कूल' माने क्या? 'कूल' के आध्यात्मिक अर्थ हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन…
आचार्य प्रशांत: जो बात बिलकुल सीधी है उसी से शुरू करो — तुम गाली किसी को आहत करने के लिए ही…
आचार्य प्रशांत: बेटा ज़रूरतें हमारी बहुत ज़्यादा होती…
आचार्य प्रशांत: नहीं, आमतौर पर हम, जिसे कैरियर कह रहे हैं, वो चुनते ही ऐसे…
आपने…
आचार्य प्रशांत: दूर से देखो तो ऐसा…
बाहर की गहरी अशांति…
कोई और होगा जिससे मैं पूछूँ, “संसार माने क्या?,” वो शायद बोलेगा, ‘*लेबोरेटरी*‘(प्रयोगशाला)। यह उसका संसार है। अगर कोई प्रेम में है और मैं उससे पूछूँ, “संसार क्या है?,” वो कहेगा,…
प्रश्न: गंभीरता क्या है?
आचार्य प्रशांत: गंभीरता का अर्थ है कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। गंभीरता एक भाव है कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। जब भी आपको कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण लगेगा, आप गंभीर हो जाओगे। तो इसमें तो कोई गड़बड़ दिखाई नहीं दे रही। मुझे लगा कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण…
देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते…
आचार्य प्रशांत: देखो दो तरह की बातें हो सकती हैं:
१. एक बात होती है सौलिटयुड, एकांत, एकांत का मतलब यह होता है कि मैं यह देख…