टूटा हुआ रिश्ता-गलती किसकी थी?

Acharya Prashant

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टूटा हुआ रिश्ता-गलती किसकी थी?
एक सिद्धांत है। एक सिद्धांत क्या है? कि भाई, गाड़ी में जब पाँच-एक लीटर या दो लीटर ही फ्यूल बचे, तो गाड़ी आवाज़ कर देगी, वो सिद्धांत की बात है। आप गाड़ी को इसके लिए दोष थोड़े ही दे सकते हो। तथ्य ये है कि फ्यूल सचमुच कम है, तथ्य ये है कि आप बैठे हो या कोई भी बैठा हो गाड़ी यही कहेगी, कि “लो फ्यूल, लो फ्यूल।” गाड़ी कोई अपनी बात आपसे थोड़ी कह रही है। बात समझिए। और न गाड़ी की आपसे कोई व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी है, एक सिद्धांत है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: क्या आचार्य प्रशांत की बात मानकर हमारे घर नहीं टूट जाएँगे? उन्हें तो हर रिश्ते में बुराई ही दिखती है। उनके अनुसार तो बच्चा पैदा करना गलती है। तो मेरा अगर बच्चा है, तो मैंने गलती कर दी है।

आचार्य प्रशांत: “आचार्य प्रशांत की बात मानकर हमारे घर नहीं टूट जाएँगे?” कौन सी बात मानकर? बात मानने के लिए तो मैंने कभी बोला नहीं। बात है क्या? ये तो बता दो। माने मैंने बात समझने के लिए कहा है। मैं कोई निर्देश तो देता नहीं हूँ कि “जाओ, ऐसा करो।” हम कौन हैं? मन क्या है? तन क्या है? जीवन क्या है? संबंध क्या है? हम इसको समझने का प्रयास करते हैं। वही पूरा अध्यात्म है, वही काम भगवद्गीता करती है। तो मैं कोई आपको आदेश आदि तो दे नहीं रहा। सलाह भी अगर दूँगा, तो वो सलाह भी किन्हीं आध्यात्मिक सिद्धांतों से आएगी।

वो सलाह भी मेरी कोई व्यक्तिगत सलाह नहीं है। वो ऐसी सी सलाह है जैसे कि आपकी गाड़ी में जब तेल कम हो जाता है तो जो आधुनिक गाड़ियाँ हैं, वो आपको बोलना शुरू कर देती हैं: “लो फ्यूल, लो फ्यूल, लो फ्यूल।” तो ये कोई गाड़ी का निजी मूड थोड़ी ही हो गया है चिल्लाने का।

एक सिद्धांत है। एक सिद्धांत क्या है? कि भाई, गाड़ी में जब पाँच-एक लीटर या दो लीटर ही फ्यूल बचे, तो गाड़ी आवाज़ कर देगी, वो सिद्धांत की बात है। आप गाड़ी को इसके लिए दोष थोड़े ही दे सकते हो। तथ्य ये है कि फ्यूल सचमुच कम है, तथ्य ये है कि आप बैठे हो या कोई भी बैठा हो गाड़ी यही कहेगी, कि “लो फ्यूल, लो फ्यूल।” गाड़ी कोई अपनी बात आपसे थोड़ी कह रही है। बात समझिए। और न गाड़ी की आपसे कोई व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी है, एक सिद्धांत है।

अध्यात्म किसी बड़े आदमी का व्यक्तिगत मत, निजी ओपिनियन नहीं होता है। कि बड़े-बड़े लोग हुए हैं इतिहास में, उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें बोल दीं और आपको वो बातें माननी हैं। आपके मन में जो पूरी छवि है, वो गड़बड़ है। आप सोच रहे हो, “पीछे धुरंधर बड़े खिलाड़ी हो गए।” ऋषि, मुनि, संत, ज्ञानी और वो बड़े लोग थे, उन्होंने कुछ विलक्षण ज्ञान कहीं से पाया। और अब आपका क्या काम है? उनकी बातों को मानना। ये थोड़ी दर्शन होती है कि उन्होंने बोला है, “आपको मानना है।”

आपकी ज़िंदगी है, और वो आपसे कह रहे हैं, अपनी ज़िंदगी को देखो। देखने पर कुछ मूल सिद्धांत पता चलते हैं। मूल सिद्धांत ये है कि जिस विषय को तुमने बिना समझे जीवन में स्थान दे दिया है, वो तुम्हारे दुख का कारण बनेगा। ये एक सिद्धांत है जैसे गणित में होते हैं, जैसे विज्ञान में होते हैं कि दो और तीन पाँच। सार्वजनिन बात है, सबके लिए है।

तुम (श्रोता को कहते हैं) अपनी दो उंगलियाँ दिखाओ, और तुम (दुसरे श्रोता को कहते हैं) अपनी तीन उंगलियाँ दिखाओ और। और पूरी कर दो, दो के बाद तीन और। तो कितनी हो गई? पाँच। और तुम दो दिखाओ और तीन और दिखाओ। तो कितनी हो गई? तो इसमें तो कुछ भी व्यक्ति सापेक्ष तो था ही नहीं। कुछ भी पर्सनल था क्या? ये बात सब पर लागू होती है और इस हद तक लागू होती है कि इनकी दो उंगलियाँ हों, दो दिखाओ, और उनकी तीन हों तो भी पाँच ही बैठेगा। ये भी नहीं है कि मेरी दो और मेरी तीन मिला के पाँच। मेरी दो और आपकी तीन भी मिला दें तो भी पाँच ही बैठेगा। इस हद तक ये पर्सन-इंडिपेंडेंट बात है। इसीलिए वैदिक ऋषियों ने बहुत बार तो अपना नाम भी नहीं दिया। बोले, नाम की बात ही नहीं है। बात जो है, वो व्यक्ति-निरपेक्ष है। मैं बोलूँ कि कोई और बोले, बात तो बात है, क्योंकि वही बात सच है।

तो मैं आपके सामने जो सदा के सच हैं, वो ला रहा हूँ। उसमें मैं कहाँ से आ गया? कि“मेरी बात मानकर आपके घर टूट जाएँगे।” मेरी बात कहाँ से है वो? और अगर वो मेरी कोई व्यक्तिगत बात है, तो फिर मानने लायक भी नहीं है।

बुद्ध की कहानी याद है न? तो बुद्ध जो पूरी उस वक़्त लोकधार्मिक लहर चल रही थी, उसका विरोध कर रहे थे। वो लहर न चल रही होती, तो राजकुमार सिद्धार्थ को बुद्ध बनना भी नहीं पड़ता। वो विरोध कर रहे थे, तो उनके पास एक पंडित आया, एकदम कुपित, बोलता है कि “क्या बता रहे हो तुम, कि जो ये सब हम करते हैं, ये गलत है और तुम कोई नई बात बता रहे हो। तुम क्यों लोगों के सामने दावा कर रहे हो कि तुम कोई नई बात बता रहे हो? तुम जितनी बातें बता रहे हो, वो सब तो हमारे ग्रंथों में पहले से मौजूद हैं। तुम्हारी बात में कुछ नयापन है नहीं।”

तो बुद्ध मुस्कुराकर जो उत्तर देते हैं, समझो, बोले: “अगर मैं कोई नई बात बता रहा होता, तो मैं बुद्ध थोड़ी ही होता।” क्योंकि नया क्या बताओगे? वही त्रिगुणात्मक प्रकृति है, वही अहंकार है, वही संसार है। रूप, रंग, नाम, आकार बदलते रहते हैं, उसमें तुम नया क्या बता दोगे? तो मैं भी कुछ नया नहीं बता रहा हूँ। जो सनातन सत्य है, वो आपके सामने रख रहा हूँ। मेरी बात कहाँ से हो गई?

तो पहले तो ये समझो, मैं आपके सामने कोई अपनी बात नहीं रख रहा हूँ। और अगर मैं आपसे अपनी कोई व्यक्तिगत बात रखने लग जाऊँ, तो फिर वो चीज़ गड़बड़ी होगी। दूसरी बात; आपके घर टूट जाएँगे? घर नहीं टूट जाएँगे। आप कहते हो, आपने घर के नाम पर एक व्यवस्था चला रखी है और उसके टूटने से आपको डर लगता है। क्यों डर लगता है? ईमानदारी की बात ये है कि वहाँ आपकी सुविधाएँ और स्वार्थ जुड़े हुए हैं।

घर क्या है? “घर टूट जाएँगे” माने क्या? मैं ईंट-पत्थर पर हथौड़ा तो नहीं मार रहा। तो घर तो एक मुहावरा है, एक मेटाफ़र है न? किस चीज़ का प्रतीक है? घर माने क्या? आप जिस अर्थ में कह रहे हैं “घर टूट जाएँगे,” ठीक इसी अर्थ में कबीर साहब ने भी कहा है, कि “जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।” घर से क्या आशय है वहाँ पर? कि बुलडोज़र चला दिया जाएगा आपके घर पर? क्या? घर से क्या मतलब है? कि तुम जो ये झूठे केंद्र से गलत संबंध बनाए बैठे हो, उनका टूटना ज़रूरी है। और ये बात कोई मैं नहीं बोल रहा हूँ, संतो-ज्ञानियों ने हमेशा से बोला है। और उनका भी पहला सरोकार झूठे संबंध से नहीं है। उनका भी पहला सरोकार झूठे केंद्र से है।

झूठे केंद्र से जो संबंध बनाओगे, वो झूठा ही होगा। **“झूठे के घर झूठा आया…।” मैं क्या करूँ? मैंने थोड़ी लिखा है। “झूठी छाती झूठी कोखी, झूठा दूध पिलाया।” मैं तो इतना कटु होता भी नहीं हूँ कि सीधे बोल दूँ कि तुम्हारी कोख भी झूठी, तुम्हारा दूध भी झूठा और तुम्हारा बच्चा भी झूठा। आप इतने पर ही कुपित हुए जा रहे हो, मैंने तो बहुत आपसे मृदुल बातें की हैं, कोमल कोमल। असली कठोर बातें तो पीछे हो चुकी हैं। वो तो अभी मैं आपसे कर भी नहीं रहा हूँ, क्योंकि आप झेल नहीं पाओगे।

“घर टूट जाएगा” माने यही न कि आप जिस केंद्र से जी रहे हो, वो केंद्र टूटेगा। पर जिस केंद्र से आप जी रहे हो, भाई-बहन मेरे, वो केंद्र तो आपके लिए अच्छा नहीं है। उस केंद्र से आप अपने आप को भी परेशान करते हो, आप दूसरे को भी दुख देते हो। लेकिन जब आप कह रहे हो “घर टूट जाएँगे,” तो आपने वहाँ पर एक अज़म्प्शन रखा हुआ है और आप उसकी बात नहीं कर रहे हो, और वो ये है कि जैसा अभी चल रहा है, वो बिल्कुल बढ़िया है। ये आपकी मान्यता है और आप चाहते हो कि मैं भी वो बात मानूँ।

मैं वो बात कैसे मान सकता हूँ जब आप ख़ुद वो बात नहीं मानते? आपका जैसा चल रहा है, वो सचमुच बढ़िया है। पाखंड करना है? बोलो। आप चाहते हो कि मैं मान लूँ कि आपका घर बहुत बढ़िया है, मैं मान लूँगा अगर आप मान लो बहुत बढ़िया है। दिल से पूछो, “बढ़िया है?” तो मैं थोड़ी तोड़ रहा हूँ, तुम ख़ुद परेशान हो।

मैं तुम्हें बस तुम्हारी परेशानी का कारण बता रहा हूँ और कारण पता चल जाता है; शरीर में बीमारी है तो शरीर खंड-खंड नहीं हो जाता; रोग दूर होता है, शरीर स्वस्थ हो जाता है।

तुम्हें लग रहा है, “घर टूट जाएगा।” शरीर की बीमारी है, तुम छुपा रहे हो। मैं वो बीमारी उकाड़ रहा हूँ, तो शरीर टूट जाएगा? या स्वास्थ्य की इलाज़ की संभावना बनेगी? पर हम गुप्त रोगी ठहरे, हमें छुपाना है और मेरा काम है नंगा करना। ये तुम्हारी समस्या है। मैं सिर्फ़ नंगा कर रहा हूँ, मैं तुम्हें बीमारी दे थोड़ी रहा हूँ। और तुम्हें छुपाने की ज़्यादा ज़रूरत है ही इसीलिए क्योंकि बहुत गुप्त रोग पाले बैठे हो।

दुखी कौन है उन गुप्त रोगों से? तुम या मैं? बोलो। दुखी तुम ही हो, मैं जो कर रहा हूँ वो तुम्हारे हित में है। पर अनुग्रह मानना, धन्यवाद देना, तो दूर की बात है; तुम इल्ज़ाम लगा रहे हो कि मैं घर तोड़ रहा हूँ। फिर पूछा करो अपने आप से, शब्दों में बह मत जाया करो। “घर माने क्या?” आचार्य जी क्या jcb लेकर आते हैं कि घर तोड़ देंगे। घर माने क्या? घर माने जिस केंद्र से तुम संबंध बनाते हो। पर अगर तुम अज्ञानी आदमी हो, तो आचार्य जी ने नहीं, पुराने ऋषियों ने बोला हुआ है कि अज्ञानी आदमी हिंसा का ही संबंध बनाएगा।

आपने कहा यहाँ पर, कि उनके अनुसार तो बच्चा भी गलती है। अज्ञानी आदमी अपने बच्चे के साथ भी हिंसा का ही संबंध बनाएगा। बच्चा गलती नहीं है, तुम जिस केंद्र से बच्चे पैदा करते हो, जिस केंद्र से बच्चों से रिश्ता बनाते हो, केंद्र गलत है। उस केंद्र से जो भी करोगे, सब गलत होगा। मैं क्या करूँ? मेरी थोड़ी इसमें कोई गलती है। तो नियम है, मैं तो नियम बता रहा हूँ और उस नियम के तुम अपवाद नहीं हो सकते। आपको ये लगता है कि वो नियम दूसरों के लिए होगा, मेरे लिए नहीं है। हर आदमी को ये लगता है, हाँ, नियम तो ठीक बता रहे हैं, पर मेरे ऊपर क्यों ये नियम लगा रहे हैं? क्योंकि वो नियम सबके ऊपर लागू होता है, ठीक जैसे गुरुत्वाकर्षण; तुम उछलोगे तो नीचे गिरोगे। ये उछलेगी तो नीचे गिरेगी। गेंद उछलेगी तो भी नीचे गिरेगी। ज़िंदा भी गिरेगा, यहाँ तक कि?

श्रोता: मुर्दा।

आचार्य प्रशांत: मैं क्या करूँ? उस नियम का कोई अपवाद होता नहीं है। पर आप चाहते हो कि आप अपने आप को इस झूठी सांत्वना में रखे रहो कि सब ठीक चल रहा है। अब सब ठीक है, अगर चल ही रहा है आप ईमानदारी से कह रहे हो, तो जैसा चल रहा है आपको मुबारक हो। मेरी शुभकामनाएँ, आप अपने चलाते रहिए जैसी ज़िंदगी चल रही है। पर अगर सब कुछ ठीक चल रहा होता तो आप मुझसे इतना चिढ़ते नहीं।

जो कहते हैं, हमारा घर पहले से ही ठीक चल रहा था और आचार्य तो उसको तोड़ रहा है। तुम्हारा घर अगर पहले से ठीक चल रहा होता, तो तुम्हें मुझसे इतना डर क्यों लगता? तुम अच्छे से जानते हो ठीक नहीं चल रहा है, मैं ठीक कर सकता हूँ। पर वो जो ठीक नहीं चल रहा है मामला, उसमें तुम्हारा स्वार्थ छुपा हुआ है, तुम्हारा डर छुपा हुआ है। तुमने एक व्यवस्था बना ली है जिसमें तुम दूसरे का शोषण करोगे और अपना भी करवाओगे। आदत लग गई है इस व्यवस्था की, तुम्हारी आदत छुपी हुई है। उसके मारे तुम इल्ज़ाम मुझ पर लगा रहे हो। घर तोड़ रहा हूँ, माने…।

बहुत बार ये तो, जो महिलाओं के पति या पिता होते हैं, वो कहते हैं कि “घर तोड़ दिया।” माने क्या? जब तक तुम उसके ऊपर चढ़े बैठे हो, सौ तरीके से उसका शोषण कर रहे हो, तब तक घर चल रहा है। इंसान को जानवर बनाए बैठे हो, तब तक घर चल रहा है। अब मैंने उसके कान में जाकर फूँक दिया कि “तू काहे को गाय की तरह ऐसे चल रही है? खड़ी हो जा टाँगों पर तू इंसान है।” तो मैं घर तोड़ रहा हूँ?

ये कौन-से घर हैं, जिनमें जब ज्ञान का प्रकाश आता है तो घर टूट जाता है? बोलो। एक बहुत पुराना कमरा हो, उसमें चमगादड़ भरे हुए हों, पुराना, अँधेरा, सीलन से भरा हुआ, बदबूदार, बंद, रोशनी नहीं आती वहाँ पर, किसी प्रागैतिहासिक गुफ़ा जैसा हो। तुम बड़ी मेहनत से पत्थर तोड़कर वहाँ रोशनी लेकर के आओ, तो ये जितने पुराने अँधेरे के चमगादड़ हैं, ये ज़ोर से चिल्लाएँगे ही; शुक्रिया थोड़ी अदा करेंगे! कि करेंगे? और चमगादड़ों का उदाहरण भी उतना अच्छा नहीं है, क्योंकि चमगादड़ों को तो सचमुच प्रकाश चाहिए नहीं।

आप वो हो जिनका स्वभाव ही प्रकाश है। आपको प्रकाश चाहिए, बस आपकी आदत अँधेरे की लग गई है।

और मैं आपको प्रकाश बड़ी मेहनत से, बहुत पत्थर तोड़ने पड़ते हैं। बड़ी मेहनत लग रही है आप तक रोशनी लाने में, और उसके एवज़ में आप बोल रहे हैं कि “घर तोड़ रहा हूँ!” तो मुहावरों पर मत जाओ, थोड़ी अक़्ल लगाओ। “घर तोड़ रहा हूँ” पूछा करो, नहीं हथौड़ा लिए तो तुमनें देखा नहीं कभी। घर तोड़ रहा हूँ, माने क्या?

क्योंकि इतनी बार आपने ये जुमला सुना है न, कि अभ्यस्त होने के कारण आप आगे पूछना भूल जाते हो, कि ये जो अभी बोला, “घर तोड़ना” इसका मतलब क्या होता है। “घर तोड़ना” माने क्या? न तो वो दीवारें तोड़ रहे हैं, और न जो इंसान हैं उनकी हड्डियाँ तोड़ रहे हैं, तो क्या तोड़ रहे हैं? जैसे ही कोई आकर बोले, तो उसको बोल मत देना। बोलो “रुको, रुको, बैठो, कुर्सी में बैठो, बढ़िया अच्छे से।” बल्कि कुर्सी में बैठाकर उसको बाँध-वाँध दो, कि भागने न पाए! बोलो, अब तमीज़ से सवाल-जवाब होगा। घर तोड़ना माने क्या? दीवार तोड़ रहे हैं? घर के लोगों की हड्डियाँ तोड़ दीं, खोपड़ी तोड़ दिया? क्या तोड़ा है उन्होंने? “नहीं कुछ तोड़ा है!” क्या तोड़ा है बताओ तो!

तो तुम्हें समझ में आएगा कि वो किस चीज़ के टूटने से डर रहे हैं। न दीवार तोड़ रहा हूँ, न हड्डियाँ तोड़ रहा हूँ। अज्ञान तोड़ रहा हूँ, अँधेरा तोड़ रहा हूँ। और जो मनुष्य होते हुए भी चमगादड़ बने बैठे हैं, जैसे ही उन तक किरणें पहुँच रही हैं रोशनी की, बड़ी ज़ोर से वो गालियाँ बक रहे हैं और चिल्ला रहे हैं। क्यों चिल्ला रहे हो? थोड़ा ख़ुद से पूछो अपने भीतर झाँको, तुम भी तो प्रकाश के लिए ही परेशान हो न? मनुष्य का स्वभाव है; जानना, बोध, समझना। वो तुम तक ला रहा हूँ, काहे के लिए परेशान हो?

“मेरी सबसे बड़ी गलती मेरा अपना बच्चा है।” थोड़ा सा इसको व्यक्तिगत मत करो, मत करो व्यक्तिगत। जब निकलते हो बाहर, दूसरों के बच्चे तुमको दिखाई देते हैं, झुंड के झुंड, अँधाधुंध, तो क्या तुम ही नहीं बोलते कि “मूर्खों ने इतनी आबादी बढ़ा दी है?” बोलो, जल्दी बोलो। तो दूसरे के बच्चे तुम्हें दिखाई दे जाते हैं, तो तुरंत बोल देते हो, “मूर्खों ने इतनी आबादी बढ़ा दी है।” पर जब मैं कहता हूँ कि अपने घर में भी थोड़ा देखो, तो तुम कहते हो, “देखो, ये तो मेरे बच्चे को कह रहे हैं कि अनावश्यक है।”

माने, दूसरे ही सब जो बच्चे पैदा करें वो मूर्ख हैं; दूसरे बच्चे पैदा करें, आबादियाँ बढ़ाएँ तो वो मूर्ख हैं। और तुम बढ़ाओ तो तुम बिल्कुल ठीक हो, और मैं गलत हूँ? देखो, दुनिया के बच्चों को, तुम्हें सचमुच लगता है इनके माँ-बाप को इन्हें पालना आता है?देखो, बताओ।

कहीं भी चले जाओ, एकदम गए गुज़रे स्लम से लेकर के चहकती शॉपिंग मॉल तक। बच्चों को देखना और बताना कि सचमुच तुम्हें लगता है कि इनके माँ-बाप जानते हैं कि इनका पोषण कैसे करना है? मुझे तो बड़ा दुख होता है बच्चों को देखकर के। बार-बार कहता हूँ कि पशुओं का शोषण बस एक ही तरीके से इंसान के बच्चों से ज़्यादा होता है कि उनकी गर्दन काट दी जाती है। नहीं तो मानसिक तल पर देखो, हम पशुओं से ज़्यादा अपने बच्चों का शोषण करते हैं।

पशु की गर्दन काट देते हैं, कम से कम हम उसके दिमाग में भयानक कंडीशनिंग तो नहीं भरते न, या भरपत भरते हो। तो आपने बकरे की मुर्गे की गर्दन काट दी, वो जान से गया, चलो, उसका खेल ख़त्म हुआ। आपने ये थोड़ी करा कि उसके दिमाग में उल्टी-पुल्टी बातें भरीं, ये तो नहीं करते कि कसाई बैठता है पहले बकरे के पास और उसको बताता है कि “ऐसा है, वैसा है; अब जाओ बाबा जी के पास जाओ और नाड़ा लेके आओ, और ये सब बताता है क्या बकरे को? एक बार में काट देता है। बच्चे का शोषण तो हम पशुओं से भी ज़्यादा करते हैं, क्या-क्या नहीं उनके दिमाग में भर देते।

क्या हमको अपने लिए पता है क्या ठीक है? हमें अपने लिए नहीं पता क्या ठीक है, हमें अपने बच्चों के लिए कैसे पता? ये बता दो बस। मैं तो सवाल कर रहा हूँ, पूछ रहा हूँ आपसे, आप बता दो कैसे। ये दुनिया का सबसे ज़िम्मेदारी भरा काम है, जो सबसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से होता है।

किसान फ़सल उगाता है। हम कहते हैं, देखो, कितनी मेहनत करी। एक पौधे को भी बड़ा करना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। एक इंसान के बच्चे को चैतन्य मनुष्य बनाना, बताओ कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी और काबिलियत का काम होगा! अब अपने चारों ओर देखो। चलो, ख़ुद को मत देखो, बुरा लगता है खुद को देखने से। अपने चारों ओर ही देख लो, अपने आसपास देखो जिनके बच्चे हैं, तुम्हें लगता है उनमें वो चेतना, वो काबिलियत है? तो ये तो तथ्य है न जो तुम्हारे सामने ला के रख रहा हूँ। तथ्यों से क्यों इतना घबराते हो?

अपने चारों ओर देखो जिनके बच्चे हैं, या कभी अस्पताल चले जाओ, मेटरनिटी वार्ड। वहाँ पर जो लोग घूम रहे हों, पति-पत्नी, उनको देखो; और जो चाचा, ताऊ, फूआ, फूफी, बुआ ये सब लगे रहते हैं, इनको देखो। तुम्हें लगता है सचमुच? मैं बच्चों के लिए कुछ अच्छा कर रहा हूँ या बच्चों का बुरा चाहता हूँ? बोलो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य बनना आसान है? ज़रा गृहस्थ बनकर, शादी और बच्चे करके, फिर अध्यात्म-पथ पर चलकर दिखाएँ, तो माने।

आचार्य प्रशांत: देखो, तुम जो कह रहे हो वो करने के लिए मुझे बेहोशी की एक रात चाहिए बस। और मैं जो कर रहा हूँ, वो करने के लिए तुम्हें रौशनी का पूरा एक जन्म चाहिए, सौ बरस। बताओ, आसान क्या है ज़्यादा? जल्दी बोलो। बोल रहे हैं “आचार्य बनना आसान है। असली कठिनाई है ब्याह करके औलादें करने में? वो करके दिखाओ और उस अध्यात्म-पथ पर चलकर दिखाओ।” जो तुमने करा, बेटा, वो तो पागल भी कर देगा, कोई नशेड़ी कर देगा, माने तुम भी कर दोगे, जानवर भी कर देगा।

मेरे लिए बहुत आसान है, मुझे बस ये सिद्ध ही करना हो। मैं इतना पागल नहीं हूँ कि सिद्ध करने निकल पड़ूँ, पर मुझे सिद्ध ही करना हो तो मुझे क्या करना है? कुछ नहीं करना है। मंगवाओ कहीं से कोई इंजेक्शन, लगा दो। लगवा दो चक्कर, और मनवा दो सुहागरात, फटाक से पूरा परिवार तैयार हो जाएगा। क्या रखा है? और कैसे?

जिसको तुम बोल रहे हो “मेरा पवित्र परिवार;” वो और कैसे खड़ा हुआ है? तुमने कौन-सा विचार करा? तुमने कौन-सी चेतना दिखाई? कितनी गहराई थी तुम्हारे प्रेम में? कौन-सी करुणा से तुमने ये बच्चे जने हैं? पशुवत बेहोशी और कहाँ से आ रहे हैं बच्चे? वो करना मेरे लिए कठिन क्यों है, बताओ? अब यही है कि ये मामला इर्रिवर्सिबल हो जाता है, नहीं तो करके दिखा देता। इतना आसान है ये मामला जो करा है तुमने ये? अब मैंने जो करा है, तुम वो करके दिखा दो।

“आचार्य बनना आसान है” आओ बन जाओ। तुम एक आदमी को भी वो समझा के दिखा दो जो मैं समझा रहा हूँ। “आचार्य बनना आसान है” माने क्या नाम के आगे ‘आचार्य’ लिख दिया तो उससे आचार्य हो जाते हो? ज़िंदगियाँ बदलनी पड़ती हैं।

“ये सब बनकर फिर अध्यात्म के पथ पर चलकर दिखाएँ।” तो अध्यात्म कोई पथ होता है? अध्यात्म के पथ पर तो सब गृहस्थ चलते हैं। वो पथ क्या होता है? कर्मकाण्ड, की सुबह उठकर के टुन-टुन-टुन घंटी बजा दी और बोल दिया, “हम आध्यात्मिक हैं।” उससे तुम क्या? और इससे ज़्यादा तो तुम कर भी क्या सकते हो? बेहोशी के पिंजरे तुमने चारों ओर खड़े कर लिए हैं, अब टुनटुनिया बजाने से ज़्यादा तुम कर भी क्या लोगे? और उसी को तुम बोलते हो, “ये हमारी धार्मिकता है।”

“गृहस्थ बनकर फिर अध्यात्म के पथ पर चलकर दिखाएँ।” ‘पथ’ माने क्या? थम, रुक बैठ, हाथ बाँधो इसके कुर्सी से भागने न पाए। ये अध्यात्म का पथ माने क्या होता है? पकड़ा करो, इतना तो सीखो मुझसे कि “अध्यात्म का पथ माने क्या?” समझाओ। नहीं समझाओ, नहीं जाने देंगे समझाओ। “अध्यात्म का पथ माने क्या?” दिखाओ, कहाँ पथ, कौन-सा, कहाँ?

एक बार पहले ही मैंने बोला था, तो बड़ी बढ़िया एक पिक्चर में था ये, वहाँ पर वो गुंडा बॉस है, वो बैठा हुआ है यूपी वाला। तो इनके जो गुर्गे होते हैं, गुर्गा खड़ा हुआ है। तो ये कुछ बोलता है, तो वो हँसना शुरू कर देता है। वो बोलता है, “हँस क्यों रहा है?”

बोलता, “नहीं, हँस नहीं रहे थे।”

बोला, “मैं झूठ बोल रहा हूँ?”

बोला, “नहीं-नहीं, हँस रहे थे।” बोलता है, “हम मन ही मन हँस रहे थे।”

वो ऐसे कट्टा निकालता है, उसके मुँह में लगा देता है, बिल्कुल मुँह खोल के अंदर। बोलता है, “चल, मन ही मन में हँस के दिखा। नहीं-नहीं! अब तूने बोला है न तू मन ही मन हँस रहा था, चल मन ही मन में हँस के दिखा।”

क्या है ये “मन ही मन हँसना” क्या होता है? हिट ऐंड रन मत करने दिया करो। जो तुमने बोला, बताओ क्या बोला? शब्दों का अपने कुछ तो सम्मान, लिहाज़ करो। कुछ तो उसमें वज़न होना चाहिए न, क्या बोल दिया तुमने ये? “अध्यात्म का पथ?” अध्यात्म का पथ माने क्या?

तुम एक बहुत धुँधली-सी छवि की ओर इशारा कर रहे हो और बच निकलना चाहते हो। “जी, वो तो अध्यात्म के पथ पर चलते हैं” और तुरंत इच्छा भी आ जाती है न, टीका-वीका लगा के, चंदन-वंदन करके, इधर-उधर जाकर नहा रहे हैं, तो अध्यात्म का पथ! ऐसे मत किसी को बच निकलने दिया करो। तुरंत पकड़ लो, साफ़-साफ़ बताओ, साफ़-साफ़, अध्यात्म का पथ माने क्या? आ रही है बात समझ में?

ये प्रोपगैंडा है ज़बरदस्त। आज भी लोग हैं न जो चाहते हैं कि दुनिया की आबादी बढ़े। आज भी लोग हैं न, ऐसों के नाम जानते हो? तो ऐसे लोग हमेशा से रहे हैं। और जिस कारण से आज वो लोग आबादी बढ़वाना चाहते हैं, ठीक उसी कारण से पुराने समय में भी लोग आबादी बढ़वाना चाहते थे। आज वो आबादी बढ़वाना चाहते हैं क्योंकि आबादी बढ़ने से उनका स्वार्थ सिद्ध होगा; ग्राहक बढ़ेंगे। और पुराने समय में तो मशीनें भी नहीं थीं। विशेषकर भारत में, भारत ने तो मशीनों का सारा काम कराने के लिए हर मशीन के समकक्ष एक जाती खड़ी कर दी थी। तो वॉशिंग मशीन नहीं है, तो एक जात ही खड़ी हो गई: धोबी। ठीक है न?

बाउंड्री वग़ैरह नहीं है, तो एक जात खड़ी हो गई: लोहार।

कोई लेदर इंडस्ट्री नहीं है, तो एक जात खड़ी हो गई: चर्मकार।

कि जितने भी काम हैं, उन सब कामों को करने के लिए एक जाति खड़ी कर दो। मशीन की क्या ज़रूरत है? मशीन बनाने में दिमाग लगेगा, इससे अच्छा कुछ लोगों को ही मशीन बना दो।

लॉन मोअर की क्या ज़रूरत है, एक जाति खड़ी कर दो: माली।

कौन मेहनत करे आविष्कार करने में? इससे अच्छा एक जाति खड़ी कर दो, हर काम के लिए एक जाति खड़ी कर दो। तो जब सारे काम तुम्हें लोगों से कराने हैं, तो तुम क्या चाहोगे? ज़्यादा से ज़्यादा लोग हों। अगर लोहार ने बच्चे कम पैदा किए, तो फिर तुम्हारे लिए लोहे का काम कौन करेगा? तो लोहार के बच्चे चाहिए तुम्हें, सुनार के भी बच्चे चाहिए, माली के भी बच्चे चाहिए, सबके बच्चे चाहिए तुम्हें। केवट के भी बच्चे चाहिए, नाई के भी बच्चे चाहिए, क्योंकि मशीनें तो तुमने बनाई नहीं। सारा काम तो तुम जातियों से करवा रहे हो। तो उन सबके बच्चे चाहिए, नहीं तो काम रुक जाएगा। तो इसलिए फिर कह दिया, “गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ है।” कि माने सबके मन में ये बात बैठ जाए कि माने शादी करो और बेहिसाब औलादें पैदा करो, यही सबसे अच्छा काम है।

प्रोपगैंडा है बेटा, समझो। ठीक वैसे जैसे आज लोग बोल रहे हैं “औलादें पैदा करो,” वैसे ही पहले ये बोला गया कि “गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ है।” कारण एक ही है, स्वार्थ। तुम्हारे मन में ये बात किसने बैठा दी? और दूसरी बात, मैं कहाँ कह रहा हूँ कि बच्चे नहीं पैदा करो? एक औलाद तुम कर लेते हो तो कोई समस्या हो गई? बोलो। और आबादी नहीं ख़त्म हो जानी है। मालूम है आज जो भारत में फर्टिलिटी रेट है, वो रिप्लेसमेंट रेट से नीचे आ गया है, 1.9 है। तो भी भारत की आबादी अगले 30-40 साल बढ़ती रहेगी, तो भी बढ़ेगी। क्यों? क्योंकि बच्चे पैदा तो हो ही रहे हैं न। आबादी तब घटनी शुरू होती है जब जितने मर रहे हों, वो ज़्यादा हों पैदा होने वालों से।

वो समय आने में तो अभी बहुत दशक लगेंगे। तो अभी तो तुम अगर एक बच्चा भी पैदा कर रहे हो, तो भी आबादी बढ़ती रहेगी। मैं कहाँ कह रहा हूँ कि तुम बच्चा नहीं पैदा करो, मैं कह रहा हूँ, थोड़ा सोचा करो। मैं कौन, एक बालक जीवन में ला रहा हूँ, दुनिया में ला रहा हूँ, उससे मेरा रिश्ता क्या है? ये सब समझा करो। और समझने में कोई समस्या है? समझना पाप की बात है?

देखो, ये हमारी सारी बातें न बातें ही रह जानी हैं। तुम्हारे लक्षण, बेटा, हमें कुछ ठीक नहीं लग रहे हैं। इन बातों का कुछ सम्मान हो सके, सम्मान भी हटा दो, ये बातें विकृत करके लोगों को न परोसी जाएँ, उसके लिए भी बहुत ज़रूरी है कि तुम्हारे पास पर्याप्त संख्या-बल हो।

आज चार्वाकों का उपहास उड़ाती है आम जनता। क्यों उपहास है उनका? क्योंकि उनकी कही बात ही नहीं मिलती। जो उनके मूल ग्रंथ थे, वो सब जला दिए गए। उनके जो विरोधी थे, चार्वाक लोकधर्म के विरोधी थे; ये जो नकली संन्यास, नकली त्याग होता है कहते थे, “भाड़ में जाओ।” तो चार्वाक इन सब चीज़ों के विरोधी थे, तो लोगों ने उनकी किताबें सब जला दीं। और जिन्होंने उनकी किताबें जला दीं, उन्होंने ही फिर सूचना दी कि “चार्वाक ऐसे थे।” अब बताओ, उन्होंने कैसी सूचना दी होगी? उन्होंने सब भ्रष्ट सूचना दी, ऐसी सूचना दी कि आज चार्वाक मज़ाक की बात बनके रह गए हैं।

हमें चार्वाकों की बात का उल्लेख भी उनके विरोधियों के ग्रंथों में मिलता है। विरोधी कहते हैं, “देखो, चार्वाक ये बोलता है और कितनी गलत बात बोलता है।” विरोधियों ने भी तो स्ट्रॉ-मैनिंग करी होगी न चार्वाकों की बात की। वही काम मेरे साथ होने वाला है, आप लोगों की कृपा से।

अगर चार्वाक भी पर्याप्त संख्या में होते, तो उनकी बात बची रह जाती। मुट्ठीभर थे, तो वो व्यक्ति भी सब मिटा दिए गए। और उनकी बात भी मिटाई नहीं गई, मिटाने से ज़्यादा बुरा होता है उस बात को मिलावट कर देना, भ्रष्ट कर देना, और भ्रष्ट करके आने वाले समय में स्थापित कर देना कि “देखो, ये कैसी मूर्खता की बात करते थे।” वही मेरे साथ होगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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