प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?

Acharya Prashant

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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम मनीषा है और मैं आपके सत्रों से पाँच महीनों से जुड़ी हूँ, गीता समागम से। मेरा 10 साल का बेटा है, उसका नाम यथार्थ है। वो आज एक कहानी पढ़ रहा था कल्कि अवतार के बारे में और उसमें यह लिखा था कि पृथ्वी का अंत जब होगा, इस कलयुग का अंत जब होगा, तब कल्कि अवतार आएँगे और यह पूरी पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी और सब कुछ नष्ट हो जाएगा। तो इससे रिलेटेड उसका कुछ डाउट है। आप पूछिए।

नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम यथार्थ है और मेरा डाउट था कि जैसे कि हमें पता है कि पूरी दुनिया जो है, वो नष्ट होने वाली है और पूरा जो साइकिल है कि वापस ह्यूमन बीइंग्स आएँगे और अपना सारा सिविलाइजेशन करेंगे, वो वापस होने वाला है, तो अभी ये करेंगे जब ये ख़त्म ही होने वाला है सारा, तो इससे क्या फायदा होगा? कि जैसे हम चिकन नहीं खाते और दूध पीना बंद किया है और एग्स नहीं खाना है। पोल्ट्री फार्म्स को ऐसे बंद करना है। कम पोल्यूशन करना है।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें कैसे पता कि ये सब कुछ होने वाला है? तुम्हें कि सब नष्ट होगा ही होगा, पृथ्वी जलमग्न होगी। ये सब कैसे पता कि ये होगा ही होगा?

प्रश्नकर्ता: वो बुक में लिखा है।

आचार्य प्रशांत: तो बुक में किसी प्रमाण के प्रूफ के साथ लिखा है? फिर तुमने क्यों माना? मैं फिर कोई और बुक दिखा दूँ, उसमें लिखा हो कि पृथ्वी बहुत खुशहाल है और सारे जानवर, जीव-जंतु सब मिलकर के गाना गा रहे हैं, नाच रहे हैं? इट्स कम पार्टी। तो फिर तुमको लगेगा कि, सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा है। हम ऐसे मानते हैं क्या? ऐसे मानते हैं?

अरे, मम्मी बैठी थी क्या पीछे? कहाँ चली गई? मम्मी कहाँ गई?

प्रश्नकर्ता: यहाँ पर ही है।

आचार्य प्रशांत: कैसे पता वहाँ पर है?

प्रश्नकर्ता: क्योंकि मेरी आँख देख पा रही है उनको।

आचार्य प्रशांत: तो जब मैंने बोला, मम्मी चली गई कहीं, तो तुमने क्या करा?

प्रश्नकर्ता: मैंने आपको बताया कि मम्मी।

आचार्य प्रशांत: जैसे ही मैंने बोला है कि मम्मी कहीं चली गई है, तो तुमने पहली चीज़ क्या करी? मुझे तो बाद में बताया। मुझे बताने से पहले भी तुमने क्या करा?

प्रश्नकर्ता: मैंने ऐसा सोचा कि ऐसे वीडियो जो है, उसमें कुछ ऐसे एरर आ गया।

आचार्य प्रशांत: लेकिन ये तुम्हें पक्का था कि वीडियो में तो एरर हो सकता है, लेकिन मम्मी वहीं पर है। है न?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: क्यों पक्का था? कैसे पता मम्मी वहीं पर है?

प्रश्नकर्ता: मैं उनको टच कर पा रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: इसको प्रूफ कहते हैं। यह क्या था? प्रूफ। जब भी आपसे कोई बात कही जाए मटेरियल वर्ल्ड के बारे में, तो उसका मटेरियल ही प्रूफ माँगना चाहिए। है न?

मैं अभी कहूँ कि मम्मी आपसे प्यार नहीं करतीं। तो यह बात आप मम्मी को टच करके पता नहीं लगा सकते कि प्यार करती हैं या प्यार नहीं करती हैं। यह तो नहीं लगा सकते न पता। क्योंकि जो मैंने अब बात बोली, वह मटेरियल नहीं है। है न? लेकिन अगर मैंने कहा, मम्मी चली गई हैं, तो यह बात मटेरियल है। मटेरियल तो समझते हो न, क्या होता है? मटेरियल माने थिंग्स। थिंग्स दैट यू कैन सेंस, टच, पिक, सी, हियर, स्मेल। यह मटेरियल कहलाता है।

तो जब भी आपके सामने कोई मटेरियल क्लेम आए, तो उसका मटेरियल प्रूफ भी माँगना चाहिए। मेरा मटेरियल क्लेम क्या था? मम्मी चली गई। तो आपने तुरंत उसका मटेरियल प्रूफ माँगा और आपने टच किया, तो आपको प्रूफ मिला कि नहीं गई है। है न?

वैसे ही अगर आपसे बोला जा रहा है कि यह जो मटेरियल अर्थ है, इसके साथ कुछ होगा, तो आपको एक अच्छे स्टूडेंट की तरह क्या माँगना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: प्रूफ।

आचार्य प्रशांत: प्रूफ माँगा आपने? कहाँ है प्रूफ? बताओ। प्रूफ क्या है?

प्रश्नकर्ता: मैंने अपनी मम्मा से पूछा।

आचार्य प्रशांत: मम्मी के पास क्या प्रूफ है?

प्रश्नकर्ता: कोई प्रूफ नहीं है।

आचार्य प्रशांत: जब कोई प्रूफ नहीं है, तो आपने माना क्यों?

किसी भी मटेरियल क्लेम का मटेरियल प्रूफ होगा। हम तो ही मानेंगे।

प्रश्नकर्ता: जितने भी बड़े लोग हैं, वो बोलते हैं कि सतयुग है, फिर कलयुग है। सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग, फिर कलयुग। यह ख़त्म होगा। इसका साइकिल फिर से आएगा। ये बहुत बार, बहुत जगह पढ़ा है और काफी सारी बुक्स में भी पढ़ा है। काफी सारे लेक्चर्स में भी देखा है कि ऐसा होगा। अकॉर्डिंग टू इंडियन माइथोलॉजी है ये। तो वो दिमाग़ में कहीं न कहीं भरा हुआ है कि ऐसा तो है ही।

आचार्य प्रशांत: लिखा होगा बहुत जगह। ज़्यादा नहीं, आज से सिर्फ़ कुछ सौ साल पहले, पाँच सौ- सात सौ साल पहले आधी से ज़्यादा दुनिया मानती थी, 90% दुनिया मानती थी कि पृथ्वी चपटी है। तो आप तो दो-चार लोगों की बात कह रहे हैं। पूरा संसार ही मानता था कि पृथ्वी ऐसे एक चपटी परात की तरह है और कहीं पृथ्वी का छोर भी है। कुछ लोगों ने बड़ी लंबी-लंबी यात्राएँ करीं जहाजों पर, क्योंकि उनको द एज ऑफ द अर्थ चाहिए था। जैसे, पृथ्वी के छोर तक जाना है। वहाँ से ऐसे झाँकेंगे, तो सूरज छुपा हुआ दिखाई देगा।

हजार लोग कोई बात कह रहे हों, हम उनका असम्मान नहीं कर रहे। नो डिसरिस्पेक्टमेंट, वी आर हमबली आस्किंग फॉर अ प्रूफ। वो भी इसलिए, क्योंकि आपने जो बात करी है, वो पदार्थ के तल की है और पदार्थ के नियम होते हैं और चूँकि वहाँ नियम होते हैं, इसलिए नियमों से कोई बात सिद्ध भी करी जा सकती है, काटी भी जा सकती है। पूरे मटेरियल यूनिवर्स में कुछ ऐसा नहीं है, जिसको विश्वास की पनाह लेनी पड़े। वहाँ जो कुछ भी है, उसको तो प्रयोगों से, तर्कों से, उपकरणों से, सिद्धांतों से जाँचा-परखा जा सकता है।

कभी भी कोई भी बात किसी भौतिक वस्तु के बारे में करी जाए, कोई भी भौतिक वस्तु हो और भौतिक वस्तु वो, जिसके बारे में सोचा जा सकता है। भौतिक वस्तु बस वही नहीं होती कि जिसको आप पकड़ लें या कुछ कर लें। आप जिसका नाम ले सकते हो, वह वस्तु भौतिक हो गई। आपने किसी को नाम भी दे दिया, तो वह भौतिक हो गया।

तो इस पूरे भौतिक जगत में जो कुछ भी है, उसको विश्वास की ज़रूरत नहीं है। उसको जाना जा सकता है। हमें जानना है और बिना जाने नहीं मानना है।

जितना ज़रूरी है कि जो अज्ञेय है, अननोएबल, उसको अननोएबल ही छोड़ दिया जाए। उसके बारे में तमाम तरह के किस्से-कहानी न बनाए जाएँ। उतना ही ज़रूरी है कि जो नोएबल है, ज्ञेय। उसको जानने का प्रयास करा जाए। जो ज्ञेय है, उसको अज्ञात से ज्ञात के क्षेत्र में लाया जाए। विज्ञान इसीलिए होता है।

जो फील्ड ऑफ नोएबल्स होता है न, उसमें कुछ अननोंन्स होते हैं, कुछ नोंन्स होते हैं। विज्ञान का काम होता है अननोंन्स को नोंन्स में लाना। और बेटा, तुम्हारे लिए प्रमाण वाली बात बहुत ज़रूरी है। तुम छोटे हो, तुम्हारे भीतर हमेशा एक ऐसे प्रश्नचिह्न होना चाहिए। एक टीशर्ट बनाओ अपने लिए और वहाँ एक क्वेश्चन मार्क बनाओ, बड़ा सा। कुछ भी कोई बोले, तो क्या माँगोगे? प्रूफ।

प्रूफ मिल गया, सर झुका दो। प्रूफ नहीं मिला, तो सामने कितनी भी बड़ी अथॉरिटी खड़ी हो, बड़ी-बड़ी किताबों में लिखा हो, बड़े-बड़े लोग बोल रहे हों, मत मानना। हम मटेरियल वर्ल्ड में सारा काम प्रूफ से चलता है। अथॉरिटी से नहीं चलता कि हम बड़े आदमी हैं। हमने बोल दिया, तो मानना पड़ेगा। ऐसा थोड़ी होता है।

यह है चाय और इसका तापमान 800 डिग्री है और मैं हूँ आचार्य शमशेरा। तुम्हें मेरी बात माननी पड़ेगी। तुम मेरी बात मानोगे या इसमें थर्मामीटर डालूँ, तो उसकी बात मानोगे? बोलो, बोलो।

प्रश्नकर्ता: थर्मामीटर की।

आचार्य प्रशांत: हाँ। होंगे आचार्य, उसका चाय के तापमान से क्या लेना-देना? चाय का तापमान आचार्य नहीं बताएगा, थर्मामीटर बताएगा। समझ रहे हो?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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