एक कश्मीरी परिवार से बातचीत (भाग २) || आचार्य प्रशांत (2022)

प्रश्नकर्ता: (माताजी से प्रश्न पूछते हुए) आपकी तरफ़ से कुछ सुनना चाहूँगा। कुछ चीज़ें जो बस़ हमने कल फ़िल्मों में देखी। और मुझे लगता है की फ़िल्म में जो दिखाया गया वो बहुत कुछ था। उसने बहुत कुछ चीज़ें फैक्ट्स (तथ्य) थे, पर आपके साथ कुछ ऐसा हुआ या जो आपने देखा मैं आपसे जानना चाहूँगा।
माताजी: बाप और बेटे को बाँध के रखते और औरत और लड़कियों के कपड़े-सपड़े फाड़कर रखते थे उनके सामने, किसको यह सहन होता। इसीलिए…
प्र: जब आप ही सुनते थे। नारे लगते थे। आपने कहा की घर से। मस्ज़िदों से ऐसी आवाज़ आती थी। कि कश्मीरी पंडित या तो कन्वर्ट हो जाए या तो भाग जाए और जो पंडिताइन हैं उनको यहीं छोड़ दें तो आपको कैसा लगता था, एक औरत होने के नाते?
माताजी: यह सुनकर ही हम पागल हो गए थे कि हमें आज़ादी चाहिए, हमें औरतें चाहिए। लेकिन आदमी लोग नहीं चाहिए, वो भाग जाओ यहाँ से। और एक ही जैसे हर मस्ज़िद से आवाज आती थी। इंसान तो उसी वक़्त जिनके दिल कमज़ोर होते थे यह सुनकर बेहोश हो जाते थे।
प्र: आप और बाक़ी औरतें जिनसे आपकी बात हुई होगी, जब यह स़ब सुनते थे। तो मन में क्या आता था, अब क्या करेंगे क्या सोचते थे। अगर ऐसा बोला जा रहा है, बार-बार बताया जा रहा है।
माताजी: जब हम ऐसा सुनते थे कि यह लोग ऐसा चाहते हैं, कि औरतें और लड़कियाँ यहीं रहे और मर्द सारे भाग जाएँ। हम सोचते थे कि हम कहीं भाग जाएँ, कहीं छुपकर बैठ जाए, कुँवारी लड़कियों को लेकर कहीं भाग जाएँ, कहीं छुप जाएँ। हम जो भी थे हमारी पापा की जो बहनें थी, मेरी बहनें, मसेरी बहनें, अपनी बहन – सबको लेकर हम भाग गए। बेश़क दो दिन हमने कुछ नहीं खाया। लेकिन हम सात बच तो गए। इज्ज़त बच गई, हमने यही सोचा कि हमारी इज़्ज़त बच जाए।


