प्रश्नकर्ता: कुछ नया आता है तो उसको देख करके डर उठता है। ऐसा कैसे हो पाये कि नये को देख करके डर की जगह उत्सुकता जगे?
आचार्य प्रशांत: तुम एक घर में हो, तुम एक घर में हो आयुष (प्रश्नकर्ता) और तुम्हें अच्छे से पता है कि ये जो घर है, ये तुम्हारे किसी शुभेक्षु का है, वेल-विशर का। लेट्स से इट्स योर फादर्स हाउस (मान लो ये तुम्हारे पिताजी का घर है)। ये पिता का ही घर है। घर बहुत बड़ा है, बहुत-बहुत बड़ा है।
घर. . . बहुत बड़ा है। तुमने नहीं देखा, उसमें सैकड़ों कमरे हैं। पर तुम अपने पिता को जानते हो और जानते हो कि वो बहुत अच्छे आदमी हैं। तुम उस घर में पहुँचते हो, तुमने कमरे नहीं देखे हैं, उन कमरों में जो कुछ भी है तुम्हारे लिए नया है। तुम उन कमरों में कैसे जाते हो? क्या डर-डर के जाओगे?
तुम उन कमरों को नहीं जानते पर तुम ये जानते हो कि ये घर मेरा है और इस घर को जो चला रहा है वो बहुत अच्छा आदमी है। तुम्हें उन कमरों में घुसते हुए क्या डर लगेगा?
अब दूसरी स्थिति ले लो — तुम एक ऐसे घर में हो जहाँ पर तुमको ज़बरदस्ती बंधक बनाया गया है, जो बुरे लोगों का है और तुम वहाँ पर सिर्फ़ सज़ा काटने के लिए डाल दिये गये हो। वहाँ पर तुम सिर्फ़ सज़ा काटने के लिए डाल दिये गये हो। ऐसे घर में क्या तुम मुक्त हो करके चारों तरफ़ घूम पाओगे? और जब भी कोई नई आवाज़ आएगी, तुम्हें क्या लगेगा?
श्रोतागण: भूत।




