
यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

Acharya Prashant: Man is both Prakriti and something else. Prakriti is y=sin(x). You are confined within duality- ups and downs, ups and downs, leading to nothing. The up will not remain up, forever; the down will not remain down, forever. Crests and troughs, crests and troughs; that is





प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जैसा आपने बताया कि जो भी कुछ मन के दायरे में आता है वो सब छिलके हैं, यानि असत्य है। पर असत्यों को हटाने के लिए भी जो डिस्क्रिशन



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत बार ऐसा होता है कि हम कुछ लोगों को बड़ा समझने लगते हैं, और उन्हें तवज़्ज़ो देने लगते हैं। समझ नहीं आता कि ऐसा करना भी चाहिए या कोई सम्यकता रखनी ज़रूरी है?


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सत्य या चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? जहाँ अभी तक समझ में आया है तो ऐसा प्रतीत होता है कि

प्रश्रकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आज हमने कुछ बोधक कथाएँ पढ़ी, जिनमें से एक का शीर्षक था ‘ब्रह्मज्ञान का स्वरुप’, जिसमें श्री योगवासिष्ठ देव जी पुत्रों के शोक मैं विह्वल होकर रो रहे थे, तब लक्ष्मण जी के शंका करने पर श्री राम जी कहते हैं, ‘भाई, जिसे ज्ञान है उसे…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। वैसे ज़्यादा समय हुआ नहीं, कुछ गत महीने ही हुए होंगे जब से आपकी वीडियोस देख रहा हूँ यूट्यूब पे तो पहला ही मौका मिला है आपसे संगति करने का। तो असल में दो मिले-जुले से सवाल थे। एक तो उद्देश्य,

प्रश्नकर्ता: जब मैं हूँ ही नहीं तो मुझे होना क्यों पड़ता है? जब प्रकृति एक है तो इसके रुप-रंग में भेद क्यों है? ये कौन और कैसे तय करता है कि कौन इंसान बनेगा, कौन जानवर बनेगा, जीव-जंतु बनेगा, कीट पतंगा बनेगा, वनस्पति बनेगा इत्यादि? किस चेतना का अवतरण किस

आचार्य प्रशांत: आप गुड़गाँव जाइए, आप बम्बई जाइए, वहाँ एक बड़ी इमारत है पचास मंज़िली, सत्तर मज़िली। आप उसके नीचे खड़े हो। आपको दिख नहीं रहा कि वो इमारत आप पर चढ़ी आ रही है? भीतर ये सतर्कता रहे — जैसे ही दिखे कोई चढ़ा आ रहा है तुरन्त क्या


प्रश्नकर्ता१: प्रणाम आचार्य जी। अर्जुन हम सब हैं पर कृष्ण नहीं है सबके पास। साथ ही साथ यह भी आभास हुआ कि यदि जीवन की तड़प कृष्ण के ही माध्यम से मिटेगी तो फिर कृष्ण के पास जाने का चुनाव क्यों करना पड़ता है कुछ लोगों को? यह मेंडेटरी क्यों…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संसार से हमारे सम्बन्ध के बारे में बताइए।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हम आदमी की सत्ता से बड़े किसी सिद्धांत में विश्वास क्यों करें? कोई परम् सत्ता, परमात्मा, भगवत्ता इत्यादि है, इसमें यकीन ही क्यों करें?


यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।

आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को


प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय बदल रहा है, और जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूँ उस क्षेत्र में धीरे-धीरे मंदी आ रही है। मैं इस मंदी से आंतरिक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ हूँ। कारणवश अब आर्थिक रूप से भी मैं बिल्कुल खाली हो गया हूँ, और इस प्रक्रिया में…

प्रश्न: आचार्य जी, जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी भ्रमित रहता हूँ कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आत्मा सत्य है, शुद्ध चैतन्य है, यह हम सब जानते हैं। क्या यह जगत जिसे हम मिथ्या जानते हैं, यह भी सत्य है?

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?

आचार्य प्रशांत: कुंदन ने बात कही है एक कि अगर यह स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?


प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में “अन्दर” और “बाहर” से क्या आशय होता है?


उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।।


श्रोता१: जो भी माइंड (मन) में थॉट्स (विचार) घूमते रहते हैं, वो तो हमेशा होते ही हैं।

वक्ता : आदमी का मन ऐसा है कि वो हमेशा कार्य-कारण में जीना चाहता है| अपने से बाहर की किसी सत्ता को किसी हाल में स्वीकार करना नहीं है| वो यह कहता है कि संसार में जो हो रहा है उसके कारण हैं ही, मुझे जो मिला या नहीं मिला,

प्रश्न: सर, एक चीज़ मन में बैठ गयी थी। ओशो ने कहा है, बाज़ार में ही रहना है, पहाड़ों में नहीं। तो अपनेआप को सिद्ध करने की चाह थी कि अब तो बाज़ार में ही रह कर शांत रहेंगे। तो वहाँ पर अभी भी संघर्ष है, अपने को साबित…

श्रोता:सर, कई बार एसा होता है कि ये जो बात है कि माइंड जो कुछ भी दिखा रहा है वो सब झूठ है, इसको माइंड नकार देता है। पर फिर बैठ के सोचते हैं तो इस दुनिया का कोई आधार भी समझ नहीं आता।

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप

श्रोता: सर, जो भी होता है, कोई कारण या फिर किसी तरह का कोई तरीका है क्या? एक घटना का एक हिस्सा है जो पूर्वनिर्धारित है?
वक्ता: ये सब न एक हार्मोनी है जो स्वतः ही चल रही है। स्टैंडिंग वेव्स पढ़ीं थी ना क्लास 12 में?


न विक्षेपो न चैकाग्रयं नातिबोधो नमूढता।
आचार्य प्रशांत: देखते हैं दुनिया को; उसमें पहली डुएलिटी (द्वैत) तो पैदा होने के साथ ही आ जाती है। पहली डुएलिटी है कि — ये मैं हूँ और ये रहा संसार, और ये दोनों अलग-अलग हैं। पैदा होने के कुछ ही समय बाद शरीर का बोध आ जाता है, और…
दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्। ब्रह्माणमग्रत: कृत्वा पप्रच्छ: को भवानिति।।
“मुझे देखकर सनकादि ब्रह्माजी को आगे करके मेरे पास आये और उन्होंने मेरे चरणों की वन्दना करके मुझसे पूछा कि आप कौन हैं?”
~ हंस गीता, श्लोक २०
इत्यहयं मुनिभि: पुष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा। यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे।
प्रिय उद्धव! सनकादि परमार्थतत्त्व…
आचार्य प्रशांत: हम जैसे जीते हैं, हमारे लिए दो हैं, एक संसार और एक हम। संसार और एक हम, कुछ हम संसार की बात करते हैं, कुछ हम अपनी बात करते हैं। जब हम अपनी बात करते हैं तो भी हम अपने आप को देखते उन्हीं उपकरणों से और उसी…
तत्व क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते। अहं कर्ता च भोक्ता च जीवनमुक्त: स उच्यते।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच तत्वों से बना ये शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाश से परे अहंकार ही क्षेत्रज्ञ है। ये ‘मैं’ ही समस्त कर्मों का कर्ता और कर्म फलों का भोक्ता है, इस…
प्रश्नकर्ता: जैसा आपने बताया कि कोई अन्तिम अवस्था नहीं होती है। हमें निरन्तर जीवनपर्यन्त अपनेआप को शुद्ध करते रहना होगा। तो हम जिन जीवनमुक्त महात्माओं के बारे में हमने जो पढ़ा है ‘निसर्गदत्त महाराज’,’रमण महर्षि’, ‘परमहंस योगानन्द’। वो जिस निरन्तर अवस्था में रहते हैं, वो जो बिलकुल फ्री फ्लो एटीटयूड…
निर्पंथी को भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान। निर्द्वंद्व को मुक्ति है, निर्लोभी निर्वाण।। ~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: चार हिस्से हैं इसके, चारों को अलग-अलग बोलिए। एक आदमी पहले एक ही बोले, फिर अगला दूसरा।
"निर्पंथी को भक्ति है" — क्या अर्थ हुआ?
प्रश्नकर्ता१: सर, यहाँ निर्पंथी से अर्थ होता…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि जैसे न आत्मा जन्म लेती है न मरती है, तो जो आम धारणा यह है कि उसकी आत्मा भटक रही है या आत्मा अतृप्त है। तो जैसा कि आप बताते हैं कि आत्मा तो जन्मती ही नहीं है, न…
आचार्य प्रशांत: यूँ तो होगा ही, वो होना ही पक्का है। देखो, दुनिया…
आचार्य: हर शब्द का अपना एक माहौल होता है, एक पृष्ठभूमि होती है, वो कहाँ से आ रहा है। तो जब मन में बहुत कुछ भरा रहे, संसार बहुत अर्थपूर्ण लगे तब शून्यता शब्द की प्रासंगिकता है।
जब लगे कि आगे-पीछे जो कुछ है, ऊपर-नीचे जो कुछ है, स्मृतियों में…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मैं जे कृष्णमूर्ति जी की कमेंट्रीज ऑन लिविंग (जीने पर टीकाएँ) पढ़ रहा था तो उसमें वो कह रहे थे कि ‘दे आर नॉट पॉजेजर्स ऑफ वेल्थ, बट आर पॉजेस्ड बाई वेल्थ (वे धन के स्वामी नहीं हैं, बल्कि धन उनका स्वामी है)।‘ तो आपने भी…
आचार्य प्रशांत: दो झूठ हैं जिनको एक साथ बोलना पड़ता है, और उन्हें हमेशा जोड़े में चलना ही पड़ेगा उनमें से सिर्फ़ एक झूठ पकड़ना मुश्किल हो जाएगा। जो पहला झूठ है वो अपनेआप को अहंकार मानने की मजबूरी है और जो दूसरा झूठ है वो बोलना पड़ता है आत्मा…
आचार्य प्रशांत: किसी और की ख़ातिर आप नहीं यकीन करेंगे, अपनी ख़ातिर करना पड़ेगा। क्योंकि अगर आप ही…
आचार्य प्रशांत: स्वागत है! और मेरी मेज़ पर ये दोनों रीडिंग्स (पठन सामग्री) रखी हुई हैं जो आपको दी गयी थीं पढ़ने के लिए। तो कितने लोग हैं जो इसमें से कम-से-कम आधी सामग्री पढ़ पाये? आधी भी जिन्होंने पढ़ ली हो वो बता दें। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)…
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।
“उस अवस्था में सम्पूर्ण…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने बताया है कि सब सांसारिक विषय मूल में एक ही हैं, बस रूप अलग-अलग हैं। जैसे ख़राब दूध से बनी सभी मिठाइयाँ ख़राब ही होंगी। चाहे रसगुल्ला खाओ, बर्फी खाओ, रसमलाई खाओ सब गंधाएँगी और पेट ख़राब करेंगी। आचार्य जी, कृपया बताएँ कि इस संसार में…
आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मुझे ये जानना है कि – जन्म और मृत्यु की ये जो प्रक्रिया है, ये क्यों हो रही है? कोई आदमी जन्म ले रहा है, तो क्यों ले रहा है? और मर रहा है, तो क्यों मर रहा है? जो भी लोग बुद्धत्त्व को उपलब्ध हो…
देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते…
नहीं, बिलकुल भी नहीं!
क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है, एक बार आपकी…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः।।
वो जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागृत रहता है।
वह जिसमें सब जगे होते हैं, वह दृष्टा मुनि के लिए रात्री है।
आचार्य प्रशांत: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय से…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम हर बार कहते रहते हैं कि सब माया है, ये माया है, वो माया है। जैसे मैं यहाँ पर हूँ, तो मैं अभी कैसे अंतर करूँगा कि ये एक साफ़ मन का निर्णय होना चाहिए, और ये एक प्राप्त और अधिकृत मन का निर्णय होना…
प्रश्न: यहाँ तक तो ठीक है कि मैं जानूँ कि दुनिया कैसी है? मेरे भाई कैसे हैं? मेरा दोस्त कैसा है? मेरी संगति कैसी है? समाज कैसा है? यहाँ तक तो मेरा मन अनुमति देता है पर जब बात आती है अपने को भीतर से जानने की तब बहुत डर…
श्रोत१: लेकिन उनके बारे में सोचने लगता हूँ तो फ्रस्ट्रेशन अपने आप बढ़ती रहती है।
वक्ता: नहीं बढ़ेगा क्योंकि जिसको तुम फ्रस्ट्रेशन कह रहे हो ना, वो भी सिर्फ़ एक …
वक्ता:नहीं, ‘झूठा’ जो है…
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो…
आचार्य प्रशांत: समय को सच मानने का अर्थ है, उस सबको सच कह देना, जो समय में आया और समय में चला जाएगा। मतलब फिर यह जितने पदार्थ हैं, इन सबको सच कह देना। इसमें दिक़्क़त बस एक छोटी सी है कि यह कैसा असहाय सच है, जिसकी मौत हो…
अवधूता गगन घटा गहरानी रे।।
पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,
उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।
निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी,
दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।
चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,
काटया खेत मींड़ा…
~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १०, अध्याय १८
(अर्थ: अपने स्वरुप में स्थित होकर शांत हुए तत्वज्ञानी के लिए न विक्षेप है और न एकाग्रता, न ज्ञान है और न अज्ञान, न सुख है और न दुःख)…