श्रोता: एक बात मन में आती है कि जब अवेयरनैस (जागरुकता) है, तब अवेयरनैस है, आप नहीं हैं। तो जब तक इस शरीर में हैं, तब तक मस्तिष्क भी है, स्मृति भी है। जब अवेयरनैस है, तो स्मृति का क्या होता है? क्या वो कार्य नहीं करती?
वक्ता: नहीं, रहती है।
श्रोता: सर, स्मृति होगी, तो मैं तो रहूँगी ही।
वक्ता: नहीं, यह ज़रूरी नहीं है।
श्रोता: यह बात बिलकुल समझ नहीं आ रही।
वक्ता: देखिये जब मन के पूरे विस्तार का कोई केंद्र होता है, तो उस केंद्र का नाम होता है- अहंकार, अहंता। जिसको हम आम तौर पर दूसरा केंद्र कहते हैं- ‘द रियल सेंटर’, वो वास्तव में केंद्र हीन केंद्र है। हम कहते हैं कि अहंकार नकली केंद्र है और एक कोई असली केंद्र होता है। वास्तव में एक ही केंद्र होता है- ‘नकली’। जो असली है, वो केंद्र नहीं है। वहाँ पर मन होता है, उसका कोई केंद्र नहीं होता।
जैसे अनंत विस्तार का कोई केंद्र नहीं हो सकता न। कुछ सीमित है, तो उसका केंद्र बना सकते हो। अनंतता का, इन्फिनिटी




