
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें?
आचार्य प्रशांत: जो तुम उपलब्ध करना चाहते हो, अपने-आप को बार-बार याद दिलाओ कि वो तुम क्यों उपलब्ध करना चाहते हो, और वो उपलब्ध करके क्या मिलेगा। उपलब्धि से पहले की प्रेरणा क्या है, इंस्पिरेशन क्या है – ये अपने-आप को बार-बार याद दिलाओ, क्योंकि ये हम भूल जाते हैं। और उपलब्धि के बाद क्या मिलेगा, उसका परिणाम क्या है, रिसल्ट क्या है, ये भी अपने-आप को बार-बार याद दिलाओ, क्योंकि वो भी हम भूल जाते हैं।
इन दोनों को क्यों भूल जाते हैं? क्योंकि उपलब्धि की प्रेरणा पीछे है, पहले है, अदृश्य है। दिखाई नहीं देती। उपलब्धि का श्रम सामने है, उसमें पसीना छूटता है। वो सामने है, दिखाई देता है, वो बुरा लगता है। और उपलब्धि से जो मिलेगा, वो भी मिला नहीं है, सामने नहीं है, वो भी दिखाई नहीं देता। दिखाई सिर्फ़ क्या दे रहा है? कि जो करना चाह रहे हो, उसमें बड़ी मेहनत लग रही है। और मन होता है आलसी। मन कहता है, “अरे यार! बड़ी मेहनत का काम है, सो जाओ।”
तो जो दिख रहा है, उसके अलावा भी जो है, उसे याद रखो। यूँ ही तुमने किसी चीज़ को उपलब्ध करने की कोशिश शुरु नहीं की है।
हम पागल तो नहीं हैं कि हम यूँ ही किसी चीज़ पर मेहनत डाल रहे हैं। हम जो उपलब्ध करना चाहते हैं, जो पाना चाहते हैं, उसको पाने के पीछे हमारे पास वाजिब कारण हैं। तभी तो हम मेहनत कर रहे हैं न? वो कारण हम अकसर भूल जाते हैं, क्योंकि वो कारण दिखाई नहीं देता।
दिखाई भले ही ना देता हो, तुम देखते रहो। जितने तरीकों से याद रख सकते हो, उसको याद रखो। और अगर पा गए, जीत गए, तो उसका अंजाम क्या मिलेगा, उस अंजाम को याद रखो। उस अंजाम में ज़रूर कोई कीमत होगी, तभी तो तुम मेहनत कर रहे थे न? तो उस अंजाम को बार-बार याद करो। वो अंजाम तुम्हें ताक़त देगा मेहनत करते रहने की।
जो तुम्हें चाहिए, उसको याद करो। वही तुम्हें ताक़त देगा, मेहनत करते रहने की।
नहीं तो, मेहनत से तो कोई भी भागता है, आदमी हो चाहे जानवर हो।

बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।


मूलभूत शिक्षा लेनी ज़रूरी होती है। कुछ बातें हैं दुनिया की, जो नहीं पता होंगी तो पूरे इंसान भी नहीं बन पाओगे। विद्या-अविद्या दोनों चाहिए। अविद्या माने सांसारिक भौतिक शिक्षा और विद्या माने आध्यात्मिक शिक्षा। उपनिषद् कहते हैं, जिनके पास विद्या नहीं होती, वो गहरे कुएँ में गिरते हैं। लेकिन जिनके पास सांसारिक ज्ञान नहीं होता वो और ज़्यादा गहरे कुएँ में गिरते हैं। और जिनके पास दोनों हैं, वो मृत्यु को पार करके अमर हो जाते हैं।
हमारे लक्ष्य हमारे नहीं होते इसीलिए हमारे कोई लक्ष्य पूरे नहीं होते। किसी भी लक्ष्य की ज़िम्मेदारी तुम तभी उठा पाओगे जब वो तुम्हारे ह्रदय से आया हो। जो तुम्हारे ह्रदय से नहीं आया उसकी ज़िम्मेदारी उठाओगे तो बोझ लगेगी। सही लक्ष्य प्रेम प्रसंग की तरह होता है, वो पकड़ लेता है। आप उसे छोड़ना चाहोगे, पर वो आपको नहीं छोड़ेगा। खुद को देखो, अपनी हालत देखो और दर्पण जैसे लोगों के साथ समय गुज़ारो, फिर सही लक्ष्य निर्धारित कर पाओगे और समर्पित रह पाओगे।