कितनी तनख्वाह है आपकी? (सैलरी बढ़ाने का एक अचूक तरीका) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि कॉर्पोरेट जगत में काम कर रहे हैं तो मुख्य रूप से मार्जिन, क्वार्टरली प्रॉफ़िट आदि को लेकर हम कामना-केन्द्रित होते हैं। ऐसे में हम करुणा पर कैसे ध्यान दें? मैं आपसे स्पष्ट जानना चाहती हूँ।
आचार्य प्रशांत: कुल मिलाकर के आप जो कुछ कर रहे हैं, उसमें आपके लिए उतना ही होना चाहिए कि आप बस करते रह पाएँ। बस यही है सूत्र। ठीक है, निकाल लीजिए जो भी आपको क्वार्टरली प्रॉफ़िट निकालना है। ‘जो भी मैं कर रही हूँ, उसमें मेरे लिए बस उतना ही रहे जितना आवश्यक है ताकि मैं करती रह पाऊँ।’
जीवन यज्ञ है। यज्ञ में सबकुछ तो खिला दिया मैंने देवताओं को, पर उतना तो मैं भी खाऊँगी न कि यज्ञ करती रह पाऊँ। नहीं तो पता चला सामने यज्ञ वेदी है, एकदम भूखे बैठे हैं। ज़रा भी कुछ नहीं खाया, उसी में अपना सिर ही डाल दिया। झूमकर गिर गये।
तो जिसको आप प्रॉफ़िट कहते है, प्रॉफ़िट तो चाहिए, ठीक है, पर इतना ही कि काम मेरा चलता रहे। बाक़ी जो बड़ा प्रॉफ़िट है, वो करुणा कर्तव्य में है। अपने लिए छोटे प्रॉफ़िट से भी काम हो जाता है। बड़ा प्रॉफ़िट तो काम से मिल जाता है। एक प्रॉफ़िट होता है जो काम के बाद मिलता है। है न? काम पूरा हो गया, फिर हिसाब-किताब करते हो कि सरप्लस कितना आया। उसको बोलते हो प्रॉफ़िट। और एक प्रॉफ़िट होता है जो काम में मिलता है। ठीक है?
दोनों प्रॉफ़िट






