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आदमी की खोपड़ी कभी नहीं भरती || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत : एक कहानी सुना रहा हूँ, ठीक है? इसको तार्किक तरीके से मत सुनना, इसका भाव समझने की कोशिश करना। कहते हैं, कि एक बार एक फ़कीर आया एक राजा के यहाँ पर। बड़ा राजा था, राजा से बोलता है एक छोटा सा कुछ चाहिये, मिलेगा? थोड़ा सा बस दान मांगने आया हूँ, दे पाओगे? राजा हँसने लगा, बोला इस दरवाज़े से आजतक कोई खाली हाथ वापस नहीं लौटा। बोल तुझे क्या चाहिये? तो फ़क़ीर बोला, “ये छोटा सा मेरा कटोरा है, इसको भर दो किसी भी चीज़ से – मिट्टी से भर दो, पानी से भर दो, कुछ भी इसमें डाल दो, इसे भर दो, मैं संतुष्ट हो जाऊँगा। मैं चला जाऊँगा, इतना सा चाहता हूँ।”

राजा को थोड़ी हँसी आयी, थोड़ा गुस्सा आया। राजा ने कहा, “तू बात किस से कर रहा है? तू ये ज़रा सा कटोरा भरवाना चाहता है मुझसे, और मुझसे कह रहा है, बस इसको भर दो। वो भी कह रहा है, मिट्टी से भर दो। मेरे दरवाज़े पर आया है, और मिट्टी से भर के जाएगा?” वज़ीर को बुलाया, बोला, “हीरे जवाहरात से भर दो इसको। भर के जाए।” वज़ीर आया, जितने हीरे जवाहरात थे, उसमें डालने लगा। वो भरे ही न। राजा ने कहा, “पूरा ले के आओ, भरो इसे। भरना ज़रूरी है। अब तो बात नाक की है। भरो।” सुबह से दोपहर हो गयी, तिजोरी खाली होने को आ गयी, डालते जा रहे हैं, डालते जा रहे हैं। वो भरे ही ना। हीरे जवाहरात ख़त्म, सोना चांदी डाले जा रहे हैं, भरे ही न। फिर जितना और था, सिक्के, रुपये, लगे डालने।

जब सूरज ढल गया, तब राजा बिलकुल उस फ़क़ीर के पाँव में पड़ गया। और होता भी यही है, राजाओं को अंततः फ़क़ीरों के पाँव में पड़ना ही पड़ता है। बोलता है, “बताओ क्या, चल क्या रहा है? बात क्या है ये?” तो फ़क़ीर बोला, “बात कुछ नहीं है। ये जो तुम देख रहे हो ना, ये जो भर नहीं रहा, इधर से आ रहा था तो श्मशान में एक आदमी की खोपड़ी पड़ी हुई थी, तो ये खोपड़ी उठा लाया हूँ। ये आदमी की खोपड़ी कभी भरती नहीं।”

भर सकती ही नहीं है। बिलकुल नहीं भर सकती।

क्योंकि एक अनंत प्रगमन है। जैसे एक जी.पी(ज्यामितीय प्रगमन), अनंत संख्याओं का। या कोई भी प्रगमन अनंत मामलों का। ऐसा ज्यामितीय प्रगमन जिसका अनुपात एक से अधिक हो। तो वो न केवल अनंत है, बल्कि उसकी हर इकाई, पिछली इकाई से बड़ी भी है। इसका अर्थ समझ रहे हो? अर्थ ये है, कि तुम्हें एक चीज़ चाहिए होती है, और वो तुम्हें मिल जाती है, तो उससे और बड़ी चीज़ चाहिए। और ये जो प्रगमन है, ये जो श्रृंखला है, वो अनंत तक जाती है। ये कभी रुक नहीं सकती।

आदमी की खोपड़ी , बेटा , है ही ऐसी। ये मत पूछो कि मैं जो चाहता हूँ मुझे मिलता क्यों नहीं। ये चाहत का स्वभाव है कि वो कभी मिल नहीं सकती। क्योंकि अगर वो मिल गयी , तो वो चाहत रहेगी ही नहीं , मर जाएगी

मन इच्छाओं के अलावे कुछ नहीं है। मन अहंकार के अलावे कुछ नहीं है। मन सिर्फ एक चीज़ चाहता है, खुद को बनाए रखना । इसीलिए वो तुम्हें निरंतर, नित्य, इच्छाओं में रखेगा। इच्छाओं में रहने की वजह से आप भविष्य में होते हो। क्योंकि सारी इच्छाएँ भविष्य के बारे में होती हैं। भविष्य में रहने की वजह से मन वो पा लेता है जो उसे पाना होता है। वो क्या पाना चाहता है ? तुम्हें इस क्षण से दूर रखना।

देखो, दो ही बातें हैं। या तो कंडीशनिंग , या समझ। इतना समझ में आ गया है? या तो कंडीशनिंग , या समझ। समझ, अभी में काम करती है, कंडीशनिंग भूत से आती है। ये समझ में आ गया है? बहुत मोटी-मोटी बातें है, समझ में आ गयी हैं ना? आ गयी हैं?

कंडीशनिंग में भी अपनी एक जान होती है। वो भी इसी तरह व्यवहार करती है, जैसे कि वो जीवित हो। और वो जानती है कि इंटेलिजेंस उसकी दुश्मन है। जैसे रौशनी अँधेरे की दुश्मन होती है। तो वो पूरी कोशिश करती है, कि इंटेलिजेंस जागृत ना होने पाए। समझ, चूंकि सिर्फ इस क्षण में होती है, इसलिए कंडीशनिंग आपको, इस मोमेंट से दूर कर के रखती है। कंडीशनिंग आपको भविष्य में डालेगी और भूत में डालेगी। समझ आपको वर्तमान में डालेगी। इच्छा का अर्थ ही है वो कंडीशनिंग , जो आपको भविष्य में ले जाती है। हर इच्छा, भविष्य के बारे में होती है ना? हर डिजायर, फ्यूचर के ही बारे में तो होती है। कि मुझे ये मिल जाए, मैं ये पा लूँ, मैं ऐसा हो जाऊँ, मैं ऐसा बन जाऊँ। कब? भविष्य में। ठीक है ना?

ये आपकी कंडीशनिंग है, जो आपकी समझ को काम करने नहीं करने देना चाहती। इसलिए आपको भविष्य में ले जा के डाल रही है। और ये लगातार ऐसा करती रहेगी, ये कभी ऐसा करना बंद नहीं करेगी। एक होशियार आदमी वो है, जो भविष्य में नहीं जीता, वर्तमान में जीता है। एक होशियार आदमी वो है, जो इच्छा में नहीं जीता, जो वर्तमान में जीता है, जिसको चाहतों से कोई लेना देना नहीं। जो चाहता नहीं है, होता है। होने और चाहने का अंतर समझ रहे हो? अगर है, तो क्या, चाहोगे? अगर है, तो क्या, चाहोगे? चाहने का अर्थ ही है, न होना। समझ का अर्थ है, “होना”। और कंडीशनिंग का अर्थ है, “चाहना”। ये दोनों बातें कितनी अलग हैं, ये समझ में आ रही हैं? हाँ? आ रही हैं?

श्रोतागण : जी सर।

वक्ता : बोलो, अगला? हाँ? बोले मैं जा रहा हूँ, शक़्लें तुम्हारी ऐसी हो रही हैं, कि कितना तक गए। क्या बात है? हाँ , बोलो? उफ़। पाँच सौ किलोमीटर दौड़-दौड़ के आ रही हूँ अभी मैं। (छात्र हँसते हैं)

श्रोता :

मेरा सवाल इंटरव्यू से सम्बंधित है।

आपने कहा कि “ बी योरसेल्फ ”। लेकिन क्या यह सच में काम करता है?

वक्ता : बहुत बढ़ियाँ। नाम क्या है तुम्हारा?

वक्ता : तो बेटा, “*बी योरसेल्फ़*” तो तुमसे हर कोई बोलता है। पर “*बी योरसेल्फ़*” तो तब हो ना, जब तुम जानो कि “बी यौरसेल्फ़” माने क्या? मैं बोलता हूँ, “आई ऍम बीइंग माइसेल्फ।” पर मैं जान भी रहा हूँ कि “स्वयं” क्या है? “बी योरसेल्फ़” तो हम ऐसे बोल देते हैं, कि जैसे “*बी योरसेल्फ*” होना कितनी सस्ती बात है। एक शराबी है, पी रहा है, और वो क्या मांगेगा? उसको किसकी मांग होगी?

और शराब दो।

उसको पूछो कि क्यों मांग रहा है? बोलेगा, “आई ऍम जस्ट बीइंग माइसेल्फ।” मेरी मर्ज़ी। अब क्योंकि आपने नहीं रखी तो आपको स्पष्ट दिख रहा है, कि इसमें “बी योरसेल्फ़” जैसी कोई बात नहीं है। ये होश में नहीं है। हम भी, ज़्यादातर समय जब ये बोलते हैं, कि बी योरसेल्फ़, हम उस शराबी जैसी ही हरकत कर रहे होते हैं। कि मेरे ऊपर जो प्रभाव है, मैं उसी को और आगे बढ़ाना चाहता हूँ। और उसको मैं “बी योरसेल्फ़” का नाम दे रहा हूँ। समझे? क्या समझे? अब जैसे तुम मुझे देख रहे हो, वैसे मैं भी तुम्हें देख रहा हूँ।

(छात्र हँसते हैं)

क्यों, न बात करनी है, न सुनना है, न समझना है, बस ऐसे ही देखना तो है। क्या समझे?

तुम चले जा रहे हो, ये चाट के ठेले वाले होते हैं, अकसर सड़क किनारे। वो क्या कर रहा है, कि वो उसका जो बड़ा सा तवा होता है, वो देख रहा है कि लोग आ रहे हैं, तो वो उस पर थोड़ा सा घी छिड़कता है। और फिर टन टन टन टन, आवाज़ करता है। और तुम निकले बगल से, और तुम्हारे कान में आवाज़ पड़ी, टन टन टन टन। और तुम्हारी नाक में गंध आयी, और तुम्हारी आँखों में दिखाई पड़ा। तुम्हारी तीन इन्द्रियों पर उसने आक्रमण करा – कान, नाक, आँख। और तुमने कहा, “मेरी मर्ज़ी है कि मैं चाट खाऊँगा।” ये तुम्हारी मर्ज़ी थी, कि उसकी?

श्रोतागण : उसकी।

वक्ता : पर तुम लड़ जाओगे, कहोगे, “मेरी इच्छा हो रही है चाट खाने की।” तुम्हारी इच्छा है?

पर तुम तो मरने-मारने पर उतारू हो जाओगे। कहोगे, “मुझे मेरी मर्ज़ी का कुछ करने ही नहीं दिया जाता। मुझे ग़ुलाम बना रखा है। मुझे चाट खाने दो।”

वो तुम्हारी मर्ज़ी थी?

“*बी योरसेल्फ*” मतलब क्या? हम सभी एक प्रभावित जीवन जीते हैं । तुम घर जाते हो, टी वी खोलते हो, उसमें नवीनतम मोबाइल का विज्ञापन आता है, और वो विज्ञापन तुमको पाँच सौ बार दिखाया जाता है। और तुम कहते हो कि मुझे भी यही खरीदना है। और फिर तुम लड़ जाते हो, “मेरी मर्ज़ी है मुझे खरीदना है।” तुम्हारी मर्ज़ी थी? वो इच्छा तुम्हारे भीतर घुसाई गयी है। जबरन, बलात, घुसाई गयी है, तुम्हारे भीतर। और तुम कहोगे, “नहीं ये मेरी…।” ये जो मोबाइल है, ये तुम्हारी ग़ुलामी का सबूत है। ये जो मोबाइल तुम खरीदोगे, वो निशानी है, सबूत है, तुम्हारी ग़ुलामी का, निशानी है कि कैसे तुम प्रभावित हुए, कैसे तुम चले गए उसे खरीद लाए।

“*बी योरसेल्फ़*” कहने का हक़ सिर्फ उसको है, जो इन सब प्रभावों से परे हट के, इन प्रभावों को देखना जानता हो। जिसके मन में जब इच्छाएँ उठें, तो वो उन इच्छाओं में बह न जाए। वो उन इच्छाओं को देख पाए। वो तुरंत समझ पाए, कि इच्छा उठी। और वो समझ पाए कि इच्छा क्यों उठी? और वो उस इच्छा का गुलाम बन के न बैठ जाए।

उसके मन में सपने उठें, तो वो ये देख पाए कि ये सपना कहाँ से आ रहा है, समझ गया। समझ गया, कहाँ से आ रहा है। वो समझे, समझे। और फिर वो कहेगा, “*बी योरसलफ*”; और किसी को हक़ नहीं है “*बी योरसेल्फ़*” कहने का। ठीक हैं? आ रही है बात समझ में?

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