
फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।




प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! पहले मैं सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय नहीं था। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय आने के बाद, मैं थोड़ा ज़्यादा सक्रिय हो गया हूँ। तो मैं देखता हूँ, सोशल मीडिया पर आजकल बहुत सारे बाबा लोग हैं, जो अपना आधिकारिक ऐप बना लिये हैं। और ऐड के माध्यम…

जीवन परिवर्तन के लिए जिसको मैं कहता हूँ ठंडी उर्जा, शाश्वत उत्साह चाहिए। एक भीतर ऐसी हार्दिक प्रेरणा चाहिए जो दसों साल थमे नहीं, कमे नहीं, मिटे नहीं। गर्म जोश में वो बात होती ही नहीं है। गर्म जोश के खिलाफ़ तो सावधान रहा करिए, वो फ़िल्मी होता है।

प्रश्न: अगर हम चालाकी नहीं दिखाएँगे, तो क्या हमें कुछ नहीं मिलेगा?

प्रश्न: आचार्य जी, हम क्यों अपने माता-पिता के निर्णयों के आगे हथियार डाल देते हैं?

श्रोता: आचार्य जी, हम अपने शरीर और मन को किस तरह से नियंत्रित कर सकते हैं? ग़लत चीज़ों की तरफ एकदम से खिंचे चले जाते हैं, और सही चीज़ से भागते हैं।


आचार्य प्रशांत: आपकी जो रुचियाँ हैं, वो आपके संस्कार से ही तो आती हैं ना? आपकी रुचियाँ कहाँ से आते हैं? रुचियों का स्रोत क्या है? भारत में गोरी चमड़ी पर बड़ा ज़ोर है ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपकी सभी बातें पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता, मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम फँस इसीलिए जाते हो क्योंकि तुम्हें तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब ऊँचे काम खराब होते हैं, कि, "ऊँचा काम हो रहा था और मैं किसी निचले केंद्र में ही…

आचार्य प्रशांत: कुछ भी संयोगवश नहीं है। पाँच उँगलियाँ भी हैं तुम्हारी, तो पाँच ही होनी थी, छह नहीं हो सकती। पूरी जो शरीर की विकास प्रक्रिया रही है, जिसमें अस्तित्व के एक एक अणु का योगदान है, उसने ये तय किया है कि पाँच उँगलियाँ हों, और इतना कद

प्रश्नकर्ता: मैं जीवन में जो भी कर रहा हूँ उस के विरुद्ध जब तर्क आते हैं तो और उन तर्कों को काटने के लिए मेरे पास तर्क नहीं होते, तो ख़ुद पर संदेह होता है। जीवन में संदेह कैसे कम करें?


प्रश्न: सर, हरफनमौला और मस्तमौला में अंतर क्या है?

प्रश्न: सर, हर व्यक्ति में कोई मूल गुण होता है। उसे कैसे पहचानें?
वक्ता: शशांक ने कहा कि हर व्यक्ति में कोई मूल गुण होता है, उसे कैसे पहचानें? मूल जो होता है तुम्हारा, ‘केन्द्र’, ‘स्त्रोत’ इसका कोई गुण नहीं होता, वो निर्गुण है। उसका कोई गुण नहीं होता। वो…

वक्ता: सवाल है कि अपनी काबिलियत पता है, ये भी पता है कि क्या कर के दिखा सकती हूँ, उसके बाद भी अगर सफलता नहीं मिलती तो क्या करूँ? तुम्हें काबिलियत पता है या फिर तुमने बस मान लिया है कि काबिलियत है? जिसको तुमने मान लिया है कि काबिलियत…

प्रश्न: सर सफलता कैसे पाएँ?
वक्ता: तुम मुझे बताओ कि सफलता क्या है?
श्रोता: परिश्रम करने से सफलता मिलती है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।









आदमी बेहतर तब बनता है जब उसे अपनी कमियों का एहसास होता है, और यह एहसास दुख, असफलता, और निराशा से आता है। आज मेहनत और ज्ञान से ज़्यादा कीमत पैसे और स्टाइल की है, जिससे वर्तमान पीढ़ी को अपनी असफलता और अज्ञानता का दुख भी नहीं होता। जब तक उनका ऊँचाइयों से परिचय नहीं होगा, वे नीचे ही रहेंगे। इसलिए आज सही संगति की और गुण-ज्ञान अर्जित करने की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि असली सुंदरता और मौज उसी में है।
प्रश्नकर्ता: कला क्या है? सिर्फ़ म्यूज़िक (संगीत), पोएट्री (कविता) या पेंटिंग (चित्रकारी) ही कला है? और, यू नो, इतनी प्रैक्टिकल (व्यावहारिक), प्रैग्मैटिक (व्यवहारमूलक) दुनिया के लिए, प्रैक्टिकली (व्यवहार में) कला का क्या कुछ यूज़ (उपयोग) है? डज़ इट लीड टू समथिंग (क्या कला से कुछ मिलता है)?
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य प्रशांत: सवाल है, ‘ये टैलेंट, प्रतिभा नाम की चीज़ क्या होती है? और कैसे पता करूँ कि मुझेमें क्या प्रतिभा है?’
निशांत, जिसको तुम प्रतिभा बोलते हो, यह तो आदमी की बनाई हुई धारणा है न, तुम अगर भारत में हो और तुमको एक लकड़ी से एक गेंद को…
आचार्य प्रशांत: हर उत्कृष्टता एक इशारा है, एक संकेत है। आसमान की ओर संकेत है और प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह है। जब सबको एक जैसा होना चाहिए था तो कोई ख़ास हो कैसे गया? जो ख़ास हो गया, उसको तुम मानो कि वही अगर भगवान नहीं तो भगवत्ता का प्रतिनिधि…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शुभम है। मैं एक-डेढ़ साल से सुन रहा हूँ आपको। मैं कॉर्पोरेट नौकरी में हूँ, इंजीनियरिंग जॉब भी है तो मेरा सवाल ये था कि किसी भी काम में जाते हैं शुरुआत में तो वो नया होता है, उसके बाद वो दिनचर्या बन जाता…
“मैं…
प्रश्नकर्ता: जो नहीं दिखाते, उन्हें कुछ नहीं मिलता है।
आचार्य प्रशांत: जो चालाकी नहीं दिखाते, वैसे लोग तो शायद तुम्हारे संपर्क में आए ही नहीं।…
आचार्य प्रशांत: तुम बताओ, तुमने डाले हैं।
प्रश्नकर्ता: बहुत कम लोग होते हैं जो अपने निर्णय ख़ुद लेते हैं, तक़रीबन १०-५ प्रतिशत।
आचार्य प्रशांत: देखो तुम हथियार नहीं डालते हो, तुम व्यापार करते हो।
तुम…
जैसे, हमने कोई दिनचर्या बनाई पढ़ाई के लिए, उसका पालन ही नहीं कर पाते कभी। ध्यान कहीं…
प्रश्न: आचार्य जी, एक लड़की होने के कारण हमारे ऊपर बहुत सारी बंदिशें लगाई जाती हैं, जब भी अगर कुछ गलत होता है तो उसका इल्ज़ाम हम पर ही लगता है, क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: क्या नाम है?
श्रोता:- शिवांगी।
आचार्य प्रशांत: शिवांगी बैठो। शिवांगी ने…
भारत में गोरी चमड़ी पर बड़ा ज़ोर है । ग़ुलामी बिलकुल छायी हुई है…
आचार्य प्रशांत: जितने भी आपको तर्क दिए जाते हैं…
वक्ता: विवेक क्या है? विवेक, विवेक का शाब्दिक अर्थ तो भेद करना ही है; अंतर करना। लेकिन किस-किस में अंतर करना? एक अंतर ये होता है कि एक ही आयाम, एक ही डायमेंशन की दो अलग-अलग इकाईयों में तुम अंतर करो, कि X एक्सिस है और उसमें तुम अंतर कर…
श्रोता: यह पंखा…
एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…
राम को किसी फ़िल्म, अभिनेता या ऐतिहासिक चरित्र की छवि तक सीमित करना उनके वास्तविक अर्थ को भूलना है। राम कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अहंकार के विगलन और सत्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। बाहर पर्दे पर राम को खोजने के बजाय अपने भीतर उस तड़प को पहचानना ज़रूरी है, जो अहंकार से मुक्त होना चाहती है। जब राम विषय नहीं, हृदय बनते हैं, तभी रामत्व का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।
शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।
शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।
जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।
वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दीवाली है, मेरे मन में ये प्रश्न आ रहा है कि क्या हम त्योहारों को उनके सही अर्थों में मनाते भी हैं या नहीं?
आचार्य प्रशांत: अगर धर्म वास्तव में ये है - ईमानदार, बोधपूर्ण, एकांत तो ये दिन (त्योहार) हमें और धार्मिक बनाते हैं या…

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।

“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।

दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।

आस्तिकता का अर्थ — वेदान्त के प्रति सम्मान। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था जिसको वेदान्त समझ में आता हो। असली वेदान्ती वही हैं। वेद का मर्म कर्मकांड नहीं, वेदान्त है और वेदान्त को सबसे आगे बुद्ध ही बढ़ा रहे थे। वेदान्त अकेला है जो अमर है। अगर आप वेद को कर्मकांड बना दोगे, तो आज की पीढ़ी वेद को भुलाती जाएगी — यह सबसे बड़ा ख़तरा है।

प्रश्नकर्ता: बहुत से लोग हैं जो फाउंटेनहेड पढ़कर जीवन में कोई बदलाव नहीं ला पाते हैं। और दूसरी तरफ़ बहुत ऐसे भी लोग हैं जो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्युतीकृत हो जाते हैं। आचार्य जी मैं दूसरे लोगों की श्रेणी में आने के लिए क्या कर सकता हूँ?…

गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।

अपने साथ जो चले — जानने वालों ने उसको बस एक नाम दिया है। बोले तुम्हारे साथ जो चले वो वो भी नहीं हो सकता जो तुम्हारे बगल में खड़ा हो। जो तुम्हारे साथ हमेशा चले वो सेल्फ होता है — तुम ही सिर्फ़ अपने साथ चल सकते हो। तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।

ये रुपए पैसे का खेल ये आदमी द्वारा आदमी का शोषण। ये एक आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो अमीर हूँ और दूसरे आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो गरीब हूँ। तुम्हें ये सारा खेल समझ में आएगा कि ये कैसे चल रहा है। खेल के शिकार मत बनो, खेल के खिलाड़ी मत बनो। थोड़ा सा बाहर निकलो और इस खेल के दृष्टा बनो। ये खेल ऐसा है कि जो इसे खेलने लग जाते हैं उन्हें ये खेल कभी समझ में नहीं आता। ये खेल उन्हें खा जाता है, इस खेल को वही समझ सकता है जो इस खेल से थोड़ा बाहर आ गया है।

दो ही चीज़ें होती हैं जो जीवन को समृद्ध करती हैं — तन के लिए व्यायाम, मन के लिए अध्यात्म। युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, विराट हृदय और दुनिया की समझ। दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने की हैं; क्रांति का मतलब एक नया सृजन होता है। वो जवानी जो पढ़ती नहीं, लिखती नहीं, जो अपने आप को बोध से भरती नहीं — वो जवानी व्यर्थ ही जा रही है।

बुद्ध ने जितना काम किया, उतना बहुत कम लोग ही कर पाए। उनके आंतरिक ज्ञान को तो एक तरफ़ रखो — जो उन्होंने भौतिक तल पर भी कर दिखाया, वह उस समय का बड़े-से-बड़ा आश्चर्य था। इतना बड़ा संघ उन्होंने खड़ा कर दिया था और उसकी व्यवस्था चलाते थे। बुद्ध एक तरह से उसके सीईओ थे। उसके बहुत विस्तृत और सूक्ष्म नियम-क़ायदे थे, जो बुद्ध ने स्वयं तय किए थे — जैसे आज की किसी भी संस्था में होते हैं। बड़े-से-बड़े वेदांतियों में महात्मा बुद्ध का नाम लिया जाना चाहिए।

कॉन्फ़िडेंस का मतलब ये नहीं होता कि आप भयमुक्त हो गए। कॉन्फ़िडेंस का मतलब होता है कि भीतर भय तो बिराजा ही हुआ है उसके ऊपर आप निर्भय दिखने की कोशिश कर रहे हो। अगर भीतर वो डर मौजूद नहीं होता तो आपको कॉन्फ़िडेंस की ज़रूरत पड़ती ही नहीं। डर छोड़ना आसान है, बस डर के साथ जो सुख सुविधाएँ मिलती हैं उनका लालच थोड़ा छोड़ दीजिए।