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आओ तुम्हें जवानी सिखाएँ || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
22 min
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, “जवानी अकेली दहाड़ती है शेर की तरह”—आपकी यह पंक्ति जब से सुनी है, तब से ख़ुद को युवा कहने में शर्म आती है। मुझ में उत्साह की कमी है। वो धार नहीं है जो इस उम्र में होनी चाहिए। किसी भी कर्म में डूबने की कोई प्रेरणा नहीं है। डॉक्टर से मिलता हूँ तो वो कहते हैं—“दवाई लो”; पर मुझे दवाई नहीं लेना। मैं आपके पास आया हूँ, कृपया मुझे सच्चा यौवन सिखाएँ।

आचार्य प्रशांत: यौवन का क्या अर्थ है? उसी अर्थ से शुरू कर लो जो हम सामान्यतया लेते हैं। जब हम कहते हैं 'जवानी', या 'जवान व्यक्ति', तो आंखों के सामने क्या छवि आती है? शारीरिक रूप से जवान कोई व्यक्ति न? बीस या पच्चीस की उम्र का, अट्ठारह या तीस की उम्र का, उसको हम कह देते हैं कि, "जवान है।" है न? जवानी की ख़ासियत क्या होती है? अभी हम जवानी के उसी अर्थ को ले रहे हैं जो सामान्यतया प्रचलित है। उस अर्थ में भी जवानी की ख़ासियत क्या होती है? या विशेष लक्षण क्या होते हैं?

प्रश्नकर्ता: ऊर्जा से भरा हुआ।

आचार्य प्रशांत: ऊर्जा। और? सपने। कहीं पहुंचने की लालसा और प्रीतम के प्रति आकर्षण, जिसको प्रचलित शब्दावली में 'प्रेम' कह दिया जाता है। क्या कह देते हैं—प्रेम। तो प्रेम, ऊर्जा, उमंग, सपने, ये सब लक्षण होते हैं जवानी के—साधारण तौर पर भी। इन्हीं शब्दों को जीवन में और गहराई से ले लो तो जवानी का जो मानसिक या आध्यात्मिक अर्थ है, वो भी स्पष्ट हो जाएगा।

जो शारीरिक रूप से जवान है, उसमें ऊर्जा है भिड़ जाने की, चल लेने की, चुनौतियों को स्वीकार कर लेने की। है न? जो आध्यात्मिक रूप से युवा है, उसमें ऊर्जा है अपने जीवन के बंधनों को काट देने की। जो शारीरिक रूप से युवा है, उसमें आकर्षण होता है दूसरे किसी आकर्षक, सुंदर शरीर के प्रति। जो मानसिक या आध्यात्मिक रूप से युवा है, उसमें आकर्षण होता है सौंदर्य मात्र के प्रति; वो जो वास्तव में सुंदर है। वो जिसमें शिवत्व है इसलिए सुंदर है—“सत्यम् शिवम् सुन्दरम्”।

इसी तरीक़े से—जो शारीरिक रूप से जवान है, आयु से जवान है, उसके पास हम कहते हैं कि सपने हैं। सपनों का क्या अर्थ होता है? कि अभी आस पास जो दिख रहा है, उससे दूर की, उससे आगे की कोई चीज़। है न? ये जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं, इनसे बेहतर कुछ जब आपकी आँखों में हो तब आपकी आँखों में कहा जाता है कि सपने हैं। है न? इसी तरीक़े से—जो आध्यात्मिक रूप से या मानसिक रूप से जवान आदमी होता है, उसकी आँखों में भी सपने होते हैं, पर उसका सपना और आगे का होता है। उसका सपना फिर जो आस-पास दिख रहा है, उससे बस आगे का ही नहीं होता, उससे ऊँचा भी होता है, उससे ऊपर के किसी तल का होता है। तो इसको कहते हैं —असली जवानी।

जब आप में सौंदर्य मात्र के प्रति अनुराग जग जाए, जब आप किसी ऐसी सच्चाई के प्रति आकर्षित होने लग जाओ, खिंचने लग जाओ, जो आपको अपने आस-पास कहीं दिखाई न देती हो, जब अपने प्रेम और अपने सपने से निष्ठा करने के लिए आपके पास अदम्य ऊर्जा-उत्साह भी हो, तब आप कहलाते हो कि आप वास्तव में जवान हो गए। ये यौवन का असली अर्थ है।

इस यौवन में और आयुबद्ध शारीरिक जवानी में अंतर क्या है?

अंतर ये है कि जिस यौवन की बात हम कर रहे हैं, वो शरीर पर आश्रित नहीं है, इसीलिए आप आध्यात्मिक रूप से युवा हो सकते हो—किसी भी शारीरिक उम्र में। आप तेरह-चौदाह साल के हो तो भी आप आध्यात्मिक रूप से जवान हो सकते हो, और आप तेरासी-चौरासी साल के हो, तो भी आप आध्यात्मिक रूप से जवान हो सकते हो। शारीरिक उम्र पर जो जवानी आश्रित है, वो तो शरीर के साथ ढल जानी है। और जो जवानी मन की समझदारी से, मन की गहरी प्रेरणा से संबंधित है, वो तो मंज़िल पर पहुँच कर ही दम लेती है। वो कायम रहती है, वो ढलती नहीं जब तक कि उसे उसकी मंज़िल न मिल जाए।

तो एक तरीक़े से अध्यात्म सतत यौवन की कला हुई। अध्यात्म क्या है—लगातार जवान रहने की कला। तब तक जवान रहेंगे जब तक मिलन ही न हो जाए—प्रेम की भाषा में। और तब तक जवान रहेंगे, जब तक मिट ही न जाएँ, महामृत्यु ही न आ जाए, मृत्यु ही न मिल जाए। ये ज्ञान की या सांख्य की भाषा हुई।

अब कह रहे हो कि जो आम तौर पर जवानी के चिन्ह होते हैं वो अपनेआप में दिखाई नहीं देते, तो अब मुझे साफ़-साफ़ बताओ, जवानी चाहिए कौन-सी—शरीर वाली, या अंदर वाली?

प्रश्नकर्ता: चाहिए तो अंदर वाली।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो यदि अंदर वाली चाहिए तो उसके लिए तो अंदर का ‘हाल’ पता होना चाहिए न? दूर का, ऊपर का, किसी और तल का सपना तो तब उठेगा न जब भीतर जो है उससे ज़रा-सी वितृष्णा हो। भीतर जो है, जब वो ज़रा पसंद आना कम हो जाए, तब न व्यक्ति कहेगा कि, “कुछ और चाहिए”। भीतर का हाल पता हो तो भीतर वाली जवानी अपने आप पैदा होने लगती है। इसी तरीक़े से अगर साफ़ दिखाई दे कि जीवन बड़ी कसमसाहट में, बड़े बंधन में बीत रहा है, तो अपना जो मुक्त स्वभाव है वो ख़ुद ही फिर तैयार होने लगता है, दहाड़ने लगता है। आंतरिक मांसपेशियाँ मचलने लगती हैं उन बंधनों को तोड़ने के लिए। ऊर्जा स्वतः उठने लगती है।

शरीर से जवान होने के लिए कुछ करना नहीं होता। समय के बहाव में बहना होता है बस। जानवर भी जवान हो जाते हैं। आंतरिक रूप से जवान होने के लिए बड़ी ईमानदारी चाहिए। नहीं तो ये बहुत संभव है कि आप शारीरिक तौर पर बच्चे से जवान हो जाएँ, फिर बूढ़े हो जाएँ, फिर मर भी जाएँ, लेकिन वास्तविक जवानी कभी घटने ही न पाए। शरीर अपनी यात्रा पूरी कर गया, चक्र पूरा घूम आया, और भीतर से क्या रह गए? अविकसित या अर्धविकसित; छौने से ही रह गए। यही ज़्यादातर लोगों का हाल भी तो है न। शरीर कैसा भी हो जाए, हो सकता है अस्सी-नब्बे साल के हो गए हों—भीतर से कैसे रह जाते हैं? वो छौने ही हैं भीतर से। आंतरिक विकास हुआ ही नहीं और तुर्रा ये है कि कहते हैं “देखो हम तो अब बुज़ुर्ग हो गए हैं, हमारी उम्र पिछत्तर की है। चलो हमें सलाम करो, पाँव छुओ।”

जिनकी आँखें हों, उन्हें दिखाई देता है कि वो दिखते पिछत्तर के हैं, अंदर से अभी साढ़े-सात के भी नहीं हैं—दुधमुँहे हैं। अब कैसे इनकी बात मान लें, कैसे इनको सम्मान दे दें? चलो, रस्म-अदाएगी किए देते हैं। शरीर बूढ़ा रहा है तो शरीर का ही चरण-स्पर्श कर लेते हैं। ये हो जाता है फिर। भीतर-ही-भीतर तो पता रहता है कि इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो आदरणीय हो, पूजनीय हो।

किसी व्यक्ति में तब ही कुछ आदरणीय, पूजनीय, सम्माननीय होता है जब वो व्यक्ति उसको समर्पित हो गया हो, जो एकमात्र सम्मान और आदर के योग्य है। नहीं तो इंसान कोई कैसे सम्मान का पत्र हो सकता है? इंसान तो हाड़-मास-मिट्टी है। उसमें क्या ऐसा सम्माननीय है? इंसान इज़्ज़त के क़ाबिल तभी बनता है जब इंसान ने अपने से आगे किसी को, किसी ऊँचाई को इज़्ज़त देनी शुरू कर दी हो। वही आदमी, जो अपने से आगे की किसी ऊँचाई को इज़्ज़त देना शुरू कर देता है—आध्यात्मिक अर्थों में 'जवान' कहलाता है।

लेकिन मैं फिर कह रहा हूँ—अपने से आगे को इज़्ज़त देना तभी हो पाएगा जब पता हो कि भीतर बड़ी बेइज़्ज़ती का मामला चल रहा है। पहले अपनी नज़रों में थोड़ा गिरना पड़ता है, तब जाकर हस्ती उठती है। जो नाहक ही अपनी नज़रों में बड़े सूरमा, उस्ताद बने बैठे हैं, वो क्यों आध्यात्मिक तल पर कभी उन्नति-प्रगति, आरोह करेंगे? वो तो अपनी नज़र में पहले ही क्या हैं? बड़े फ़न्ने ख़ाँ हैं। वो कहेंगे—“हमें उठने की ज़रूरत क्या? हम तो ‘उठे’ ही हुए हैं।”

तो पहले अपनी अकड़ को थोड़ा टूटने देना होता है। पहले देखना होता है कि भीतर बड़ा अंधेरा है। जैसे कोई पुरानी सीलन भरी बदबूदार गुफ़ा —बड़ी दुर्गंध उठती है। जब तुम अपने प्रति थोड़ी उपेक्षा, निराशा, वितृष्णा से भर जाते हो, तभी तो अपने आप को छोड़ पाओगे न? नहीं तो पकड़े ही रहोगे ख़ुद को। और जब मैं ‘ख़ुद’ कह रहा हूँ, और मैं कह रहा हूँ ‘स्वयं को’ पकड़े रहोगे, तो उस ‘स्वयं’ से मेरा आशय क्या है?—आत्मा? आत्मा नहीं। वही सब — धूल-कीचड़।

तुमको उठना हो—तो सिर को झुकाओ। किसी के सामने मत झुकाओ सिर  को। कोई ज़रूरी नहीं है कि किसी व्यक्ति के सामने या किसी मूर्ति के सामने या कहीं किसी जगह पर जाकर सिर को झुका दिया। लाज में झुका लो भाई सिर को। सच्चाई की अगर यात्रा शुरू कर रहे हो, तो शुरू में ‘लाज’ बड़ी उपयोगी चीज़ है, लज्जा आनी चाहिए। लज्जा ही नहीं आ रही तो फिर तो सब ठीक ही ठीक है न?

बेशर्म लोगों के लिए नहीं है अध्यात्म। बहुत होते हैं मोटी खाल के बेशर्म टट्टू। उन्हें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। उन्हें दिख रहा होगा कि ज़िंदगी बिल्कुल दुर्गंध, मवाद से भरी हुई है, तो भी वो बिल्कुल चौड़ में, ठसक में घूमते हैं —"हाँ, हम हैं चौधरी।" उनको बताओ कि "तू ग़लत कह रहा है”, वो बोलेंगे—"तो?" उनको बताओ कि “तू घटिया आदमी", वो बोलेंगे—"तो?" ऐसों के लिए नहीं है अध्यात्म। अध्यात्म उनके लिए है जो बिल्कुल संकुचित हो जाते हों। जो स्वयं को देखते हों और लजा जाते हों और फिर उनके भीतर की जवानी कहती हो कि “ऐसे ‘जी’ नहीं सकते—लजाए, लजाए। हमें बेहतर होना होगा, हमें ऊपर उठना होगा, हमें बाहर निकलना होगा। ये कोई तरीक़ा नहीं जीने का।”

कुछ लक्षण समझ लो—अप्रगती के, कुगती या दुर्गति के। कोई तुम्हें तुम्हारी ग़लती दिखाए और तुम्हें बुरा अगर लगता है, तो तुम जवान कभी होने से रहे। कोई अगर तुम्हें ग़लती दिखाए और तुम कहो कि “अरे, ग़लती दिखा रहा। हम बड़े आदमी हैं। हमें टोका-टोकी कर रहा है,” तो इसका मतलब ये है कि तुम शिशु ही रह जाने वाले हो। जिसे जवान होना होता है वो अपनी ग़लतियों का सामना करता है। ग़लती माने? छुटपन, विकार, दोष।

इसी तरीक़े से, जो अपने तथ्यों को झुठलाने की आदत रखता हो, वो जवान होने से रहा कि—ज़िंदगी में चल कुछ रहा है, वो दूसरों को भी कुछ और बता रहा है, और स्वयं को भी कुछ और जता रहा है।

ऐसे बहुत लोग होते हैं न? वो कभी मानेंगे ही नहीं कि हक़ीक़त में चल क्या रहा है ज़िंदगी में। ऐसे लोग भी जीवनपर्यंत शैशवावस्था में ही रहेंगे।

ज़रा दम दिखाओ, ज़रा चोट खाओ। जैसे ही तुम सहर्ष चोट खाने को तैयार हो जाते हो, तुम पाते हो कि ये काम बच्चे का तो है नहीं। क्या हो गए तुम?—जवान। और चोट पड़ी नहीं कि बिलबिला उठे, और हाय-हाय करके भागे, तो छुन्नू लाल ही हो—अंगूठा चूसो। बच्चों को तो सुरक्षा दी जाती है, दी जाती है न? कोई बच्चे को मार भी दे तो फिर उसे ताना मारा जाता है, कि “क्या बच्चे पर हाथ उठता है? आ हमारा सामना कर!” बच्चे को क्या दी जाती है—सुरक्षा। तुम अगर ऐसे हो कि ज़िंदगी में जहाँ जाओ, सुरक्षा ही माँगते रहो, तो अच्छे से समझ लो क्या हो अभी? बच्चे। जवान आदमी सुरक्षा माँगता नहीं है, वो सुरक्षा देता है। वो कहता है—“हमारा जो होगा-सो-होगा, लेकिन अभी धर्म ये है कि तुम हमारी पनाह में आ जाओ। हम पर जो आएगी, झेल लेंगे।”

पूछो अपनेआप से, ईमानदारी से, सुरक्षा कितनी प्यारी है तुमको। और सुरक्षा कई तरह की होती है। सुरक्षा यही नहीं कि शरीर पर चोट लग गई, इज़्ज़त पर चोट लग गई? ये भी तो वही है, "बदनामी हो जाएगी," "लोग क्या कहेंगे।" इसी तरीक़े से इन्द्रियों पर चलना किसका काम होता है? कि खिलौना दिखा और मचल गए। ये कौन करता है? बच्चे करते हैं। तुम्हें भी अगर खिलौना दिखता है और मचल जाते हो, तो काहे अपनेआप को जवान बोलते हो?

बच्चा इन्द्रियों पर जीता है। थोड़ा बड़ा होता है, किशोरावस्था आती है तो ‘मन’ पर जीता है; वो ‘मनचला’ हो जाता है। और आध्यात्मिक अर्थों में जवान वो है जो न इन्द्रियों पर न मन पर बल्कि आत्मा में जीता है —आत्मस्थ रहता है। वो धर्म का पालन करता है। वो कहता है, "इन्द्रियाँ किधर को खींच रही हैं, हमें नहीं जाना। मन किधर को फिसला रहा है, रपटा रहा है, हमें नहीं जाना। हम अपना धर्म जानते हैं, हम उसपर चलेंगे।" पूछो अपनेआप से—खिलौनों के नचाए नाचते हो, मन के चलाए भागते हो, या अपना धर्म और अपना कर्तव्य जानते हो, उसकी पूर्ति करते हो? अगर इन्द्रियों और मन की ही कठपुतली हो अभी, तो फिर यही भाग्य रहेगा तुम्हारा कि किसी की गोदी में नज़र आओगे हमेशा।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं हमेशा से जीवन के प्रति उदासीन रहता हूँ, पर जैसा कि आपने कहा—“खिलौना दिखता है तो मचल जाते हैं”, तो वही होता है मेरे साथ। जब कुछ बड़ा दिखता नहीं है तो ऐसे छोटे-मोटे सुखों की तरफ़़ खिंचा जाता हूँ। इससे खुद के प्रति निराशा होती है लेकिन सुखों के साथ समझौता करना, और उसके लिए बल प्रयोग करूँ तो लगता है कि एक तरह का दमन है।

आचार्य प्रशांत: तुम कह रहे हो कि कुछ बड़ा दिखता नहीं है इसलिए तुम खिलौनों की ओर आकर्षित हो जाते हो। यही कहा न? फिर पूछ रहे हो कि अब खिलौनों की ओर न जाऊँ तो क्या इसके लिए बल प्रयोग करूँ, दमन करूँ। इतनी लंबी कहानी कहने की ज़रूरत क्या है? कहानी शुरू यहाँ से हो रही है कि तुमने कहा कि बड़ा कुछ दिखता नहीं है, इसीलिए छोटे-छोटे खिलौनों की ओर भगते हो। बड़ा क्या होता है? 'बड़ा' माने क्या? बहुत बड़ी गेंद? बहुत बड़ा पहाड़? बहुत बड़ी थाली? 'बड़ा' क्या होता है? अध्यात्म में 'बड़े' का अर्थ क्या होता है? अध्यात्म में बड़े का अर्थ होता है— वो जो छोटा नहीं है।

कल मैं क्या कह रहा था, अध्यात्म की भाषा हमेशा कैसी होती है? नकारात्मक। तो जब कहा जाए कि 'विराट', 'अनंत', तो उसका कोई सकारात्मक या विधायक अर्थ मत लगा लीजिएगा। जब भी कहा जाए कि अध्यात्म का मतलब है विराट की ओर गति, तो मतलब ये नहीं है कि अध्यात्म का मतलब है—हिमालय में चढ़ गए, वही तो विराट दिखाई देता है। नकार की भाषा में उसका मतलब हुआ—अपने भीतर जो कुछ छोटा है उसको पहचानना, और पहचानकर उसको त्यागना।

कह रहे हो— “बड़ा कुछ दिखाई नहीं देता," अरे, छोटा दिखाई देता है कि नहीं? कहाँ है सारी क्षुद्रता, छुटपन? कहाँ है? कहाँ है वो? दिखती है? ईमानदारी से साफ़-साफ़ दिखती है?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: हाँ, उसी को देखना आवश्यक है। बड़ा नहीं कुछ देखना होता। अगर वो साफ़-साफ़ दिखती है बेटा, तो उसको देखने के बाद भी तुम झुनझुने की ओर कैसे मचल जाते हो? कह रहे हो—“बड़ा कुछ दिखाई नहीं देता तो हम खिलौनों की ओर भागते हैं।" फिर अब बात पलट कर कह रहे हो कि, “नहीं, अपने भीतर का छुटपन तो दिखाई देता है।" अपने भीतर का जब छुटपन दिखाई देता है तो मैंने थोड़ी देर पहले कहा—बड़ी लाज आनी चाहिए। जो लाज में गड़ा हुआ होगा वो झुनझुना माँगेगा? वो खिलौनों की तरफ़़ जाने की धृष्टता करेगा? वो तो कहेगा—“खिलौने गए भाड़ में, मैं कलुष में गड़ा हुआ हूँ, मुझपर बड़ा कलंक है। मैं कीचड़ में धँसा हुआ हूँ।” कीचड़ में जो धँसा हुआ हो वो खिलौना माँगेगा क्या? और अगर खिलौना तुम माँग रहे हो तो इसका मतलब तुम्हें अभी ज़रा भी होश ही नहीं है कि कीचड़ में धँसे हुए हो। शुरुआत तो हमेशा अपनी दुर्गति को देखने से ही होगी न? अगर अपनी दुर्गति को तुम मान्यता ही नहीं दे रहे हो, नकारे ही जा रहे हो, मान ही नहीं रहे हो कि हालत बहुत ख़राब है, तुम्हें अपने ऊपर बड़ा गर्व-गौरव ही है, अपने क़िस्से तुम बड़े दर्प के साथ सुनाते हो—“मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, मुझमें ये ख़ूबी है, मुझमें ये ख़ासियत है,” तो तुम क्यों अपनी ज़िंदगी बदलोगे? या बदलोगे?

आप सभी लोग यहाँ बैठे हैं। मैं समझता हूँ कुछ बदलाव के इच्छुक हैं। बदलाव क्यों आए अगर आप अपनी ज़िंदगी को देखें और पाएँ कि यदि आपको कोई अजनबी मिलता हो तो उसके सामने अपनी कहानी आप बड़े गौरव से बघारते हैं—और हम आम तौर पर ऐसा करते हैं, या नहीं करते हैं? तो इसका मतलब क्या है? कि ख़ुद को लेकर हमारे भीतर बढ़िया संतोष है। हम ख़फ़ा नहीं हैं ख़ुद से। जो ख़ुद से ख़फ़ा नहीं हो सकता, उसके लिए अध्यात्म कैसा?

बाइबल में जीज़स ने एक बड़ी विचित्र बात कही है। अभी जो हम चर्चा कर रहे हैं, उसके संदर्भ में आपको समझ आ जाएगी। वो कहते हैं—“जो अपनी ज़िंदगी से नफ़रत नहीं करता, वो मेरे पास न आए।” क्या कहते हैं? “जो अपनी ज़िंदगी से नफ़रत ही न करता हो, वो मेरे पास आए ही नहीं।” और हमें तो अपनी ज़िंदगी पर बड़ा गौरव है। बड़े गुरूर से हम भरे रहते हैं कि—“अजी साहब, हम हैं।” कोई मिल जाता है तो उसको अपने पुराने एलबम दिखाते हैं। तुम्हें अगर वाकई अपनी ज़िंदगी से नफ़रत होगी, तो तुम पुराने एलबम बचाकर रखोगे, या उनपर राख डाल दोगे? बोलो जल्दी।

पर हम तो... बड़ी दिक़्क़त हो जाती है न। पुराने एलबम पर राख कैसे डालोगे क्योंकि जो पुराना किस्सा था वो आज भी चल रहा है। एलबम पर राख डाल दी, तो अभी जैसी ज़िंदगी चल रही है उसमें से भी बहुत कुछ बदलना पड़ेगा, त्यागना पड़ेगा। उतना साहस, उतनी जवानी हम में होती ही नहीं। तो फिर पुराना भी जो कुछ होता है हम उनपर झूठा गौरव किए जाते हैं। सब में ये वृत्ति होती है न, ख़ुद को जायज़ ठहराने की? होती है कि नहीं? सबको बुरा लगता है न जब उनकी बात काटी जाए, या झूठी साबित हो जाए, या उनको टोक दिया जाए। अब तुम समझ रहे हो ये वृत्ति किस तरफ़ इशारा कर रही है? वो इसी तरफ़ इशारा कर रही है—हम बदलाव चाहते ही नहीं। अगर हम काट दिए गए, अगर हमें टोक दिया गया, अगर हमें ग़लत साबित कर दिया गया, तो फिर तो हमें मजबूर होकर बदलना पड़ेगा न। “भई, अगर तुम ग़लत हो तो बदलो।” बदलना हमें है नहीं, क्योंकि बदलने के लिए क्या चाहिए?—एक जवान छाती। वो हमारे पास है नहीं। उतना साहस और उतनी निर्लिप्तता हम दिखा नहीं पाते। तो फिर हम एक सस्ता तरीक़ा पकड़ते हैं कि हम जैसे हैं, जो कुछ भी हैं, उसी को सही और जायज़ ठहराते चलें, ताकि बदलाव की नौबत ही न आए।

प्रश्नकर्ता: आपने अभी कहा कि जिसमें सच्चाई और यौवन है, उसको हमेशा सही के और धर्म के रास्ते पर चलना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: चलना 'चाहिए' नहीं, ये कोई ट्रैफिक पुलिस के दिशा-निर्देश थोड़े ही हैं कि आपको साठ की गति के नीचे ही चलना चाहिए। ये 'चाहिए' वाली भाषा अध्यात्म में नहीं होती। वो भाषा संस्कार-शास्त्र में होती है। वो भाषा नैतिकता के ग्रंथों में होती है। चलना ‘चाहिए’ नहीं, वो ‘चलेगा’। मैं तुमसे कहूँ, "तुम्हें अपनी माँ से प्रेम करना चाहिए," तो सुनने में कैसी लगेगी ये बात? ये कोई ज़बरदस्ती की चीज़ है क्या कि करनी ‘चाहिए’, ये कोई सिखाने वाली चीज़ है क्या कि करनी ‘चाहिए’—ये तो होगा, अगर इंसान हो तो ये तो होगा। याकि आचार्य जी यहाँ बैठकर शिक्षा दे रहे हैं—“सुनो सब, अपने प्रियवर से प्रेम करना चाहिए।” और फिर विधि भी बता रहे हैं प्रेम करने की।

'चाहिए' नहीं होता है, अगर जवान हो तो वो ‘होगा’।

प्रश्नकर्ता: अगर हम सच्चे जवान हैं, सच्चे यौवन हैं, तो हम धर्म के रास्ते पर जाएँगे ही?

आचार्य प्रशांत: जाना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: हम करेंगे। फिर भी कभी-कभी अधर्म का जो रास्ता है, वो आकर्षित करता है।

आचार्य प्रशांत: बच्चे को खिलौना आकर्षित करता है।

प्रश्नकर्ता: क्या उस अधर्म के रास्ते की उपेक्षा करके भी हम धर्म पर चल रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: तुम पूछना चाहते हो—उपेक्षा करके क्या हमें धर्म पर चलना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: मतलब उपेक्षा करते-करते क्या एक समय ऐसा आएगा कि अधर्म आकर्षित करना छोड़ देगा?

आचार्य प्रशांत: सिखाया नहीं जा सकता। वो छोड़ ही दे, अगर तुम फ़ैसला कर लो थोड़े ख़तरे उठाने के। बात तुम्हारी नीयत, तुम्हारे फ़ैसले की है। बच्चा बने रहने में बड़ी सुख है, सुविधा है, और एक और शब्द है "स" से, जिसकी थोड़ी देर पहले चर्चा करी थी—'सुरक्षा' है। अभ्यस्त हो गए हो अगर तुम सुविधा और सुरक्षा में ही जीने के, तो तुम जवानी के ख़तरे उठाओगे क्यों? जवानी माने ज़िम्मेदारी होता है। हमने कहा था न—बच्चे को तो सब सुरक्षा देते हैं, और जो जवान आदमी होता है वो किसी की सुरक्षा लेता नहीं है। वो अपना दायित्व निभाता है। वो सुरक्षा देता है। तो जवानी ज़िम्मेदारी का काम होती है, और ज़िम्मेदारी उठाने में तो बहुत लोगों को बड़ा आलस आता है, बड़ा ख़तरा लगता है। तो फिर तय करते हैं कि चलो बच्चे ही बने रहते हैं।

प्रश्नकर्ता: तो उपेक्षा हम करते रहें?

आचार्य प्रशांत: हमें अपेक्षा करती रहनी “चाहिए”। (व्यंगात्मक तौर से प्रश्नकर्ता के प्रश्न को दोहराते हुए) तुम वो मन छोड़ ही नहीं पा रहे हो जो निर्देशों पर चलता है। प्रेम किसी के निर्देश पर किया जाता है क्या? तो वैसे ही ‘अध्यात्म’ प्रेम ही है। वो प्रेम से और ऊँचा प्रेम है—महा-प्रेम है। किसी के निर्देश पर थोड़े ही हो सकता है। ये थोड़े ही हो सकता है कि सामने बैठे हुए हैं गुरू जी और गुरू जी ने कहा—“चलो, मुक्त हो जाओ। तुम्हें मुक्त होना ‘चाहिए’।” तुमने कहा—“ठीक है। महाराज जी की आज्ञा है, मुक्त होना ‘चाहिए’, तो हम मुक्त हो जाएँगे।”

ये आज्ञा-पालन की चीज़ें थोड़े ही होती हैं भई, ये तो दिल की बात है, आशिक़ी है। ये किसी की आज्ञा पूरी करने के लिए, हुकुम बजाने के लिए थोड़े ही होते हैं ये काम।** ये तो वो है — जो लगाए न लगे, बुझाए न बुझे। ये थोड़े ही तुम कहोगे कि आग का दरिया है, क्या पार करना ‘चाहिए’? वो तो पार तब होता है जब कोई लाख रोक रहा हो तो भी तुम कूद पड़ो। तुम अनुमति ही लेते रहोगे, सलाह लेते रहोगे और निर्देश माँगते रहोगे, तो फिर तो तर चुके।**

इससे मुझे क्या समझना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: तो जो त्याग करेंगे हम चीज़ों का, जिसे हम छोटा मानते हैं, उस त्याग करने में निश्चय होना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: घिन आनी चाहिए। निश्चय क्या होना चाहिए? हाथ में कीचड़ लग गया, मल लग गया, तो धोने के लिए निश्चय चाहिए होता है? क्या चाहिए होता है? घिन। अध्यात्म उनके लिए है जो ख़ुद को आईने में देखें और उन्हें घिन आए। और घिन नहीं आ रही है, बड़ी खूबसूरती जान पड़ रही है—“आ हा हा हा हा, हम ही तो हैं, आ हा हा...” तो फिर करोगे क्या अध्यात्म का? तुम तो खुशबूदार तेल लगाओ, चौराहे पर जाओ, और अपनी नुमाइश दिखाओ, तुम्हें तो बड़ा नाज़ है ख़ुद पर।

अब एक अजीब बात हो गई है, क्योंकि आम तौर पर अध्यात्म की भाषा में ये सब शब्द होते ही नहीं हैं कि ‘घिनाओ’, ‘लजाओ’।

"ये आचार्य जी कौन सा अध्यात्म बताते हैं?"

"किस ग्रंथ में लिखा है कि घिनाना चाहिए, लजाना चाहिए?"

वो हम नहीं जानते, पर जो बात है, वो असली बता दी।

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