एक ही गलती कितनी बार करनी है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता : नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शिखर है। कल आपने अपना एक कॉर्पोरेट (निगम) का थोड़ा सा अनुभव बताया था कि आप जेंटल इलैक्ट्रिक में काम करते थे, तो वहाँ पर आपने पूछा कि अच्छा, आपके ऊपर कितने लोग काम करते थे, तो किसी को कोई मतलब नहीं था। तो मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ अनुभव था कि मैं एक कंसल्टिंग (परामर्श )में काम करता था और वहाँ पर एक जैसे आपने प्यादे का उदाहरण दिया कि रख दिया गया, वैसे ही वहाँ परभावना आ रही थी कामगार की। तो मैंने वो छोड़कर दूसरा काम उठाया है और मतलब थोड़ा उससे उच्च स्तर का ही है। मगर उससे भी और बेहतर काम मैं कर सकता हूँ, मुझे ऐसा लगता है। तो मेरा यह सवाल है कि अनुभव की कितनी भूमिका होनी चाहिए, वेदान्त को जानने में?
आपने जैसे बोला कि संसार को जानना है। तो अनुभव ही एक तरीक़ा है जानने का? किसी चीज़ को अगर मुझे जानना है तो क्या मैं उसको अनुभव करूँ या फिर दूर से भी किसी चीज़ को समझा जा सकता है? क्योंकि अनुभव करने चला तो बहुत कुछ है करने को तो।
और दूसरा सवाल यह है कि मैं देखता हूँ कि जैसे आपने आज सुबह भी बोला कि हम लोग इस्तेमाल कर रहे हैं आपको, एक हिसाब से। तो मैंने देखा कि मेरा जीने का माध्यम ही उपभोग है। मतलब मैं अगर अभी देख भी रहा हूँ तो उपभोग कर रहा हूँ, सुन भी रहा हूँ तो भी उपभोग कर रहा हूँ। कुछ भी कर रहा हूँ, कपड़ा भी पहन रहा हूँ तो उपभोग कर रहा हूँ। तो इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ नीयत का अन्तर है कि मैं प्रेमभाव से या, क्योंकि उपभोग तो होना है, ये तो है; मतलब, मुझे लग रहा है। तो इसमें सिर्फ़ नीयत का ही अन्तर है या फिर कुछ और भी एक तरीक़ा है जीने का?
आचार्य प्रशांत : क्या, पहली बात क्या बोली थी?
प्र : पहली बात तो ये थी कि अनुभव के बारे में।



