
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते, आज योग दिवस है तो देश-दुनिया के जितने भी समाचार है हर जगह पर योग को लेकर ही चर्चा हो रही है। तो मैं काफ़ी चीज़ें पढ़ रहा था तो वहाँ पर एक चीज़ मुझे बार-बार पढ़ने को मिल रही थी जहाँ पर लोग कह रहे…



प्रश्नकर्ता: ब्रह्मचर्य और विवाह में क्या सम्बन्ध है? जो भी जितने भी ब्रह्मचारी लोग हुए हैं, उनके जीवन को पढ़ते हुए बड़ा आनन्द आता है। मतलब जो ब्रह्मचर्य के नियम पर चले हैं। जैसे– स्वामी दयानन्द हो गए, महात्मा बुद्ध हो गए, भगवान महावीर हो गए या स्वामी विवेकानन्द हो…
प्रश्नकर्ता: वृत्ति क्या है?
अचार्य प्रशांत: वृत्ति क्या है? कुछ का भी आ जाना वृत्ति है। खाली आसमान है और खाली होना ही आसमान का स्वभाव है। खाली आसमान में आकारों का एहसास होने लगना ही वृत्ति है। जहाँ कुछ हो ही न, वहाँ ये धारणा कि कुछ है और…
युवाओं में बढ़ते नशे की समस्या का मूल कारण केवल ड्रग्स नहीं, बल्कि दिशाहीन और अशांत जीवन है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व, उद्देश्य और भीतर की बेचैनी का सामना नहीं कर पाता, तो वह किसी-न-किसी नशे में शरण खोजता है—चाहे वह शराब हो, सोशल मीडिया, मनोरंजन, भोजन या प्रसिद्धि। स्थायी समाधान बाहरी रोकथाम नहीं, बल्कि आत्म-शिक्षा, जीवन की सही दिशा और स्वयं को समझने वाली शिक्षा है, जिससे ऊर्जा सार्थक कार्यों में लगे और नशे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों का तनाव केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि इतिहास, सामाजिक भय, आर्थिक असुरक्षा और प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है। परिवार, कोचिंग संस्कृति और सफलता की संकीर्ण परिभाषाएँ छात्रों पर भारी दबाव डालती हैं। समाधान केवल काउंसलिंग नहीं, बल्कि ऐसी समग्र शिक्षा है जो रचनात्मकता, खेल, कला, दर्शन, आत्मबोध और स्वतंत्र चुनाव को महत्व दे, ताकि विद्यार्थी केवल करियर नहीं, बल्कि संतुलित और सार्थक जीवन भी जी सकें।

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।

भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।

मन एक रस्सी की तरह है, जिसे दस दिशाओं से — भविष्य, अतीत, रिश्ते, सोशल मीडिया जैसी ताक़तें खींचती हैं। हर कोई हमें ग़ुलाम बनाना चाहता है, और हम बनते जाते हैं; यही तनाव है। इससे मुक्त होना कठिन नहीं, बस यह भ्रम छोड़ो कि कोई सहारा चाहिए, क्योंकि जो भी आएगा, वह अपने अनुसार ही खींचेगा। इसलिए साहस जुटाओ और अपने क़दमों पर चलो — दो-चार बार गिरो, चोट खाओ, पर रस्सी की तरह मत बनो: बेजान, मुर्दा, ग़ुलाम।

अध्यात्म के बिना, चाहे हम बाहर कितना भी कुछ पा लें — पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान — फिर भी डर और तनाव से नहीं बच पाते। व्यक्ति के पास ऐसा कुछ होना चाहिए जिसे संसार का कुछ भी छू न सके — जिसका उल्लेख श्रीकृष्ण अर्जुन से करते हैं: ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’; न शस्त्र उसे काट सकते, न अग्नि जला सकती है। पहले झूठ काटना पड़ेगा। जैसे-जैसे वो कटता जाता है, वैसे-वैसे तुम उसको पाते जाते हो जो बिल्कुल तुम्हारा अपना है। उसके बाद कोई बाहरी दबाव तुमको परेशान नहीं कर पाएगा।

गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।

गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।

गुरु लोग और बड़े-बड़े पदाधिकारी भारत में और दुनिया भर से योग दिवस को अपना समर्थन दर्शाते हैं। लोग शारीरिक मुद्राओं में अपनी तस्वीरें डालते हैं — एक योगा मैट होता है, उसपर योगा करते हुए कहते हैं, "Celebrating Yoga Day!" लेकिन योग का संबंध व्यायाम और कसरत से नहीं, बल्कि मन से है। योग मन की बात है — क्योंकि मन परेशान है। और योग वास्तव में क्या है — यह जानना है, तो भगवद्गीता की ओर जाना ही पड़ेगा।

काम तनाव तभी देता है जब आप काम सही कारणों से न कर रहे हों। जब आप सही कारणों से काम नहीं करते तो आप दो ही चीज़ों का इंतज़ार करते हो — एक रविवार का और दूसरा सैलरी डे का। काम का अंतिम उद्देश्य पैसा नहीं हो सकता। आपको काम में अर्थ ढूँढना पड़ेगा। कुछ ढूँढिए जिसमें सौंदर्य हो, सार्थकता हो, बड़ी कोई चुनौती की बात हो। तब फिर उस काम में आप घंटे नहीं गिनते, उस काम में आप परिणाम की ओर भी नहीं देखते।

आलस करने में आलस क्यों नहीं आता तुम्हें? कोई मिला है जिसको सोने में आलस आता हो? आलस कुछ नहीं होता, बस नीयत ख़राब होती है। जेब में एक रुपया भी नहीं है, पर बैठे-बैठे सपने ले रहे हैं कि मेरे पास लाखों हैं, करोड़ों हैं। जहाँ उत्तेजना और मज़े की बात होती है, वहाँ हम खूब मेहनत करते हैं। और जो काम ज़रूरी और करने योग्य है, हमें वहीं बस आलस आता है। आलस का एक ही इलाज है — आज़ादी से प्रेम।

आजकल की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, बोलती हैं कि धर्म का मतलब ही है नारी शोषण। नहीं, ऐसा नहीं है। धर्म के केंद्र पर जो ऋषि बैठे हैं, उन्होंने अपनी ओर से कभी भेदभाव नहीं किया। यह भेदभाव उस समाज ने किया है, जो कृषि और बाहुबल आधारित था। आज सौभाग्य की बात यह है कि महिलाओं के लिए ऊर्जा बाजुओं से नहीं आती, मस्तिष्क से आती है। तो परम आवश्यक है कि उनके हाथ मजबूत रहें और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहें।

डिप्रेशन का पहला कारण है – कृत्रिम उपभोक्तावाद। वैज्ञानिक क्रांति के बाद उपभोग की वस्तुओं में बड़ी तेज़ी से वृद्धि हुई है। कुछ शातिर लोग हमें उन चीज़ों को चाहने पर मजबूर कर रहे हैं, जिन चीज़ों की कोई अहमियत नहीं है। चूँकि हम हर चीज़ पा नहीं सकते, इसीलिए फिर डिप्रेशन से घिर जाते हैं। डिप्रेशन का दूसरा कारण है – बोध का पतन। अगर हमारी ज़िंदगी में धैर्य, प्रेम, समझ, कर्मठता, ईमानदारी जैसे मूल्य नहीं हैं, तो हम चैन से नहीं रह सकते।

तामसिकता का अर्थ आलस्य होना आवश्यक नहीं, हालांकि सतह पर यह आलस्य जैसा लग सकता है। असली तमस स्वयं को यह भरोसा दिलाने में निहित है कि "मैं ठीक हूँ," "मैं स्वस्थ हूँ," "मुझे सब पता है," जबकि वास्तव में न तो मैं ठीक हूँ, न स्वस्थ, न ही स्वयं का जानकार। ऐसे व्यक्ति या तो स्वयं जागें, या फिर ज़िंदगी शायद उन्हें झंझोड़कर जगा पाए — जिसकी संभावना बहुत कम होती है। सबसे अच्छा विकल्प है स्वयं जाग जाना, क्योंकि जब जीवन सिखाता है, तो फिर वह किसी भी तरह की रियायत नहीं देता।

टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।

साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||3. 9||
अन्वय: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र (यज्ञ के लिए किए कर्म के अलावा अन्य कर्म में) लोकोऽयं (लगा हुआ) कर्मबन्धनः (कर्मों के बन्धन में फँसता है) कौन्तेय (हे अर्जुन) मुक्तसङ्गः (आसक्ति छोड़कर) तत्-अर्थ (यज्ञ के लिए) कर्म (कर्म) समाचर (करो)
काव्यात्मक अर्थ: बाँधते…

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना…

यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।

मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक…

आचार्य प्रशांत: हम देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं अर्जुन कि
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस:। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।
कथं न ज्ञेयम स्माभि: पापादस्माननिवर्तितुम। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यदिर्जनार्दन।।…

आचार्य प्रशांत: तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से। और संजय बताते हैं कि शंखनाद ने विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी। मन उनके कम्पित हो गये, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर। अर्जुन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई बार ऐसा होता है कि विरोधी पक्ष के लोग विनीत भाव से मदद वग़ैरह माँगने आ जाते हैं, जैसे दुर्योधन ने शल्य का सहयोग माँगा, दुर्योधन ने बलराम से गदा सीखने का निवेदन किया और दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से उनकी नारायणी सेना माँगी। ऐसी स्थितियों…

मेडिटेशन "करा" नहीं, "जीया" जाता है। "करने" वाला मेडिटेशन तो झुनझुना है, कि गए और तीस मिनट मेडिटेशन करके आ गए। जो तुम्हारी ज़िंदगी चल रही है, उसी में देखो कि तुम्हारे संदर्भ तथा संबंध में ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य क्या हो सकता है। अपने बंधन पहचानो और देखो कि उनके कारण कितना दुख है। उसे मिटाना ही लक्ष्य बनेगा तुम्हारा। और फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरे जीवन को झोंक दो, यही ध्यान है।

जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।

काम को टालना बुरा नहीं है, पर यह समझना ज़रूरी है कि टालने वाला कौन है और क्यों टाल रहा है। यदि टालने वाला छोटा बने रहने, डरे रहने या अहंकार बचाने के लिए टाल रहा है, तो यह गलत है। लेकिन यदि भीतर सच्चाई, प्रेम और बोध है, और इसीलिए तुम जानते हो कि कौन सा काम सही नहीं है, और उसे टालते हो, तो टालना गलत नहीं है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में रहना और वैसे ही अपनी ज़िंदगी बिताना अगर सही तरीका है, तो हम लोग अपने तरीके से, जितना भी हमलोगों को पता है उस हिसाब से या आपको जैसे सुनते हैं, तो कोशिश करते हैं। पर लगता है कि कुछ हो नहीं रहा या हमसे…

प्रश्नकर्ता: मैं एक सर्जन (शल्य चिकित्सक) हूँ। क्या ध्यान में होने से सर्जरी सफल हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में होने पर ही सर्जरी सफल हो सकती है। नहीं तो ध्यान का फ़ायदा क्या? ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के पास भटकने के लिए कोई ठिकाना,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं काफ़ी समय से मेडिटेशन (ध्यान) कर रही हूँ। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ समय के लिए टाइमलेसनेस (कालहीनता) का अनुभव होता है। मैं ऐसा क्या करूँ कि ये अनुभव पूरे दिन रहे?
आचार्य प्रशांत: अगर आपको पता न होता कि मेडिटेशन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुपचाप…

यस्वतंरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।१७।।
किन्तु जो लोग सत्य में ही अनुरक्त, तृप्त और संतुष्ट हैं उनके लिए तो कर्तव्य कर्म नहीं बचते।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १७
आचार्य प्रशांत: सुंदर बात कही है! पिछला श्लोक समाप्त हुआ था ये कहने पर कि…

स्वामी विवेकानंद को हम सब जानते हैं। लेकिन क्या आपने 'श्री आलासिंगा पेरूमल' के बारे में सुना है?
शायद नहीं। पर आलासिंगा ना होते तो स्वामी विवेकानंद कभी शिकागो का वो ऐतिहासिक भाषण नहीं दे पाते, जिसकी बदौलत उन्होंने विश्वभर में वेदान्त व हिंदू धर्म का नाम रोशन किया।
बात…

आचार्य प्रशांत: केतन हैं, गीता के पाँचवे अध्याय से अट्ठारवाँ श्लोक उद्दृत किया है। श्लोक कहता है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ||
“वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।”
भगवद्गीता,अध्याय…