प्रश्नकर्ता: वृत्ति क्या है?
अचार्य प्रशांत: वृत्ति क्या है? कुछ का भी आ जाना वृत्ति है। खाली आसमान है और खाली होना ही आसमान का स्वभाव है। खाली आसमान में आकारों का एहसास होने लगना ही वृत्ति है। जहाँ कुछ हो ही न, वहाँ ये धारणा कि कुछ है और जो है वही सत्य है, यही वृत्ति है।
वृत्त का अर्थ होता है 'गोल आकार'। थोड़ा व्यापक अर्थ में लें, तो वृत्त का अर्थ हुआ 'आकार'। निराकार में आकार का भ्रम होने लगना ही वृत्ति है। सब खुला हुआ था, अचानक उसमें आकार आ गया। और याद रखिए जब सब खुला होता है तब न समय होता है, न दूरी होती है।
जैसे ही कुछ भी होता है, 'कुछ भी' में सब आ जाता है — जिनको आप तथ्य कहते हैं, जिनको आप कल्पनाएँ कहते हैं, जिसे आप अच्छा कहते हैं, जिसे आप बुरा कहते हैं, जिसे आप जीवित कहते हैं, जिसे आप मृत कहते हैं, जिसे आप दिन और रात कहते हैं, जिसे आप सपना और जाग्रति कहते हैं, वो सबकुछ जिसे आप संसार कहते हैं। संसार का आ जाना, संसार का उदित हो जाना और ऐसा एहसास होना मानो ये सब है, कि काला है, कि सफ़ेद है, धूप है, छाँव है; ये है और इनमें सत्यता है, इसी का एहसास होना वृत्ति कहलाता है।
वृत्ति असीम को सीमित कर देती है, जैसे कि अनन्त आकाश में आपने सीमाएँ खींच दी हो। आकार तो तभी बनेंगे न जब सीमाएँ आएँगी। वृत्तियाँ आकारों को जन्म देती हैं, आकार संसार को जन्म देते हैं। ये है वृत्ति।
मूल वृत्ति है 'अहम्-वृत्ति'। 'मैं हूँ' — ये मूल वृत्ति है। इससे बाक़ी सारी वृत्तियाँ जन्म लेती हैं। भ्रम भी हो रहा है तो किसे हो रहा है? मुझे हो रहा है। कल्पना भी कर रहा हूँ, तो मैं कर रहा हूँ, दुख-सुख, आनन्द-क्षोभ सब मुझे है। 'मैं हूँ', ये पहली वृत्ति है। 'मैं हूँ', ये पहला आकार है जो मन में खिंचता है। अहम्-वृत्ति बाक़ी सारी वृत्तियों की माँ है। ये तो हुई वृत्ति की परिभाषा।







