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वृत्ति माने क्या? || आचार्य प्रशांत (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
31 min
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प्रश्नकर्ता: वृत्ति क्या है?

अचार्य प्रशांत: वृत्ति क्या है? कुछ का भी आ जाना वृत्ति है। खाली आसमान है और खाली होना ही आसमान का स्वभाव है। खाली आसमान में आकारों का एहसास होने लगना ही वृत्ति है। जहाँ कुछ हो ही न, वहाँ ये धारणा कि कुछ है और जो है वही सत्य है, यही वृत्ति है।

वृत्त का अर्थ होता है 'गोल आकार'। थोड़ा व्यापक अर्थ में लें, तो वृत्त का अर्थ हुआ 'आकार'। निराकार में आकार का भ्रम होने लगना ही वृत्ति है। सब खुला हुआ था, अचानक उसमें आकार आ गया। और याद रखिए जब सब खुला होता है तब न समय होता है, न दूरी होती है।

जैसे ही कुछ भी होता है, 'कुछ भी' में सब आ जाता है — जिनको आप तथ्य कहते हैं, जिनको आप कल्पनाएँ कहते हैं, जिसे आप अच्छा कहते हैं, जिसे आप बुरा कहते हैं, जिसे आप जीवित कहते हैं, जिसे आप मृत कहते हैं, जिसे आप दिन और रात कहते हैं, जिसे आप सपना और जाग्रति कहते हैं, वो सबकुछ जिसे आप संसार कहते हैं। संसार का आ जाना, संसार का उदित हो जाना और ऐसा एहसास होना मानो ये सब है, कि काला है, कि सफ़ेद है, धूप है, छाँव है; ये है और इनमें सत्यता है, इसी का एहसास होना वृत्ति कहलाता है।

वृत्ति असीम को सीमित कर देती है, जैसे कि अनन्त आकाश में आपने सीमाएँ खींच दी हो। आकार तो तभी बनेंगे न जब सीमाएँ आएँगी। वृत्तियाँ आकारों को जन्म देती हैं, आकार संसार को जन्म देते हैं। ये है वृत्ति।

मूल वृत्ति है 'अहम्-वृत्ति'। 'मैं हूँ' — ये मूल वृत्ति है। इससे बाक़ी सारी वृत्तियाँ जन्म लेती हैं। भ्रम भी हो रहा है तो किसे हो रहा है? मुझे हो रहा है। कल्पना भी कर रहा हूँ, तो मैं कर रहा हूँ, दुख-सुख, आनन्द-क्षोभ सब मुझे है। 'मैं हूँ', ये पहली वृत्ति है। 'मैं हूँ', ये पहला आकार है जो मन में खिंचता है। अहम्-वृत्ति बाक़ी सारी वृत्तियों की माँ है। ये तो हुई वृत्ति की परिभाषा।

निवृत्त होना होता है, निवृत्त होने का अर्थ है बोझ से हल्का हो जाना। कुछ भी है तो वो बोझ ही है। याद रखिए बोझ के अलावा और कुछ है नहीं। हल्कापन होता नहीं, जो होता है वो बोझ होता है। पत्थर का भी बोझ होता है और फूलों का भी बोझ होता है।

दुनिया में जो कुछ भी है, जिसको आप अस्तित्वमान कहते हैं, वो मात्र बोझ की तरह ही है। अच्छा और बुरा बोझ नहीं होता, काला और सफ़ेद बोझ नहीं होता, बोझ तो बोझ होता है। पाप का बोझ हो चाहे पुण्य का बोझ हो, बोझ तो बोझ है। मन में जो कुछ भी चल रहा है, वो मात्र बोझ की तरह चलता है। बोझ का हट जाना ही निवृत्त हो जाना है।

आपके मन में नैतिकता के ऊँचे-से-ऊँचे ख़याल चल रहे होंगे, 'मैं बड़ा परोपकार करूँगा, मैं जगत की सहायता करूँगा', ये बोझ है। आपके मन में चोरी और हिंसा के ख़याल चल रहे हैं, बोझ है। और दोनों बोझ एक समान हैं, किसी को ऊँचा किसी को नीचा न समझें। मन में कुछ भी होना, मन का कोई भी शक्ल ले लेना, कोई भी आकार ले लेना, कोई भी रूप ले लेना ही वृत्ति है। और वृत्तियों से मुक्त हो जाना ही समाधि है, और कुछ नहीं है समाधि।

पतंजलि जब हमें समाधि के बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो उचित ही है कि शुरुआत वृत्ति से करते हैं, क्योंकि समाधि तो अपनेआप में कुछ है ही नहीं।

समाधि तो स्वभाव है, समाधि तो खुला आकाश है, वो तो उपलब्ध ही है। समाधि की ओर नहीं जाना है, वृत्ति को समझ लेना है। वृत्ति क़ायम तभी तक रहती है जब तक उसमें, उसकी सत्यता में हमारा गहरा यक़ीन है। जिस क्षण वृत्ति को वृत्ति जान लिया, वृत्ति के पास कोई अवलम्बन बचता नहीं।

बात समझ में आ रही है?

मन की प्रत्येक हलचल में वृत्ति है। मूल में बैठी है अहम्-वृत्ति, उससे उभरती हैं बाक़ी वृत्तियाँ और वृत्तियों से उठते हैं विचार और विचारों से उठते हैं कर्म।

और यही सब मिल-जुलकर वो हो जाता है जिसे हम भूलवश अपना जीवन कह देते हैं। वो जीवन नहीं है। वो तो एक मिथ्या खेल है जिसके मूल में वृत्तियाँ बैठी हुई हैं। और उन सब वृत्तियों के भी मूल में अहम् बैठा हुआ है – 'मैं हूँ।' अहम्-वृत्ति, बाक़ी वृत्तियाँ, विचार, कर्म।

क्या था अगला प्रश्न? (श्रोतागण से पूछते हुए)

श्रोता: वृत्तियों के प्रकार?

आचार्य: 'वृत्तियों के प्रकार?' बहुत-बहुत ज़रूरी है समझ लेना। पतंजलि कह रहे हैं, 'प्रमाण, विपर्यय, शब्दभ्रम, निद्रा, स्मृति।' ठीक? पहली और सबसे ख़तरनाक वृत्ति है 'प्रमाण'। प्रमाण का अर्थ है — जो मुझे दिख रहा है वो वास्तविक है क्योंकि उसके पीछे कारण है। कारण प्रमाण है।

कारण कुछ भी हो सकता है। कई प्रकार के कारण होते हैं। मेरी अपनी अनुभूति है, ये कारण है, इसको मैं प्रमाण मान रहा हूँ। मुझे किसी विश्वसनीय व्यक्ति ने बता दिया, किसी ग्रन्थ में लिखा हुआ है, ये कारण है। मैंने बड़े तार्किक आधारों पर अनुमान लगाया है, ये कारण है। कारण कुछ भी हो सकते हैं। लेकिन कारण में यक़ीन करना ही बड़ा अन्धविश्वास है। कारण में तुमने यक़ीन किया नहीं कि तुम संसार में यक़ीन करने लग जाओगे। कारण में तुमने यक़ीन किया नहीं कि तुम मानने लगोगे कि समय सत्य है, क्योंकि कार्य-कारण की, कॉज़-इफैक्ट की तो पूरी श्रृंखला ही वहाँ पर है।

मनुष्य की विडम्बना ये है कि ये तो छोड़ ही दो कि हम कारण की व्यर्थता को जाने, हम कारणों की खोज करते हैं। और अगर कारण मिल जाता है तो हम बड़े आश्वस्त हो जाते हैं कि अच्छा, अच्छा, अच्छा! समझ गये, ये कारण था।

पतंजलि कह रहे हैं, 'प्रमाणों पर मत जाओ क्योंकि सारे प्रमाण तुम्हारी किसी-न-किसी कल्पना पर आधारित हैं।' देखो कि क्या है प्रमेय और कौन है प्रणेता। तुम ही तो बैठे हो न? तुम कहते हो, 'कोई बात सत्य है क्योंकि उसका प्रमाण उपलब्ध है।' ये किसने कहा कि प्रमाण आधार है? ये तो तुम ही ने अपनी ओर से एक धारणा बैठा ली है। और ये बड़ी गहरी धारणा है। पतंजलि इसे सबसे ऊपर रख रहे हैं।

याद रखना, सत्य का कोई प्रमाण नहीं होता। याद रखना, प्रेम का भी कोई प्रमाण नहीं होता, न आनन्द का, न मुक्ति का। जो प्रमाण में यक़ीन करने लग गये वो कभी सत्य तक नहीं पहुँच सकते। सत्य तक पहुँचने के लिए तो श्रद्धा की छलाँग लगानी पड़ती है। प्रमाण तो एक प्रकार की गारन्टी (आश्वस्ति) होता है। अगर तुम्हारा मन ऐसा है जो बात-बात पर प्रमाण की, प्रूफ की माँग करता है तो समझ लेना कि तर्क से जो कुछ हासिल किया जा सकता है वो तो तुम्हारे मन को मिल जाएगा, पर जो कुछ भी असली है वो उसे कभी उपलब्ध न हो पाएगा। क्योंकि जो असली है कहाँ से लाओगे उसका प्रमाण?

पतंजलि के ये वचन आज के समय में और भी ज़्यादा औचित्यपूर्ण हो गये हैं क्योंकि अब हम क्रमशः ज़्यादा, और ज़्यादा एक रेशनल, रीज़नेबल (तर्कसंगत) दुनिया में जीने लगे हैं। पतंजलि कह रहे हैं, 'न रीज़न (कारण), न रेशनेल (तर्क)। यही तो तुम्हारी वृत्तियाँ हैं, यही तो तुम्हारे दुख के कारण हैं।'

जो प्रमाण में यक़ीन करेगा, वो संसार में बड़ा गहरा यक़ीन करेगा और वो कहेगा, 'संसार आख़िरी बात है, इसके आगे कुछ होता नहीं।' क्योंकि सारे प्रमाण तो संसार के भीतर हैं, मन के भीतर हैं। जो प्रमाणों में यक़ीन करेगा वो मन को ही राजा बना देगा और उसका मन कभी आत्मा की खोज पर निकलेगा नहीं, कभी नहीं। वो स्वयं को कभी नहीं पा सकेगा।

आत्मा का कोई प्रमाण नहीं होता। प्रमाण हमेशा द्वैत में होते हैं। प्रमाण ज्ञान की माँग करता है। प्रमाण में कोई वस्तु चाहिए, कोई विचार चाहिए जिसे आप प्रमाण की तरह इस्तेमाल कर रहे हो। कोई ज्ञाता, कोई दृष्टा चाहिए जो देख रहा है उस प्रमाण को। द्वैत बैठा हुआ है। प्रमाण कभी तुम्हें अद्वैत में न ले जा पाएगा।

तो जब कहते हैं पतंजलि कि प्रमाण पहली वृत्ति है तो वो यही कह रहे हैं कि द्वैत पहली वृत्ति है। द्वैत पहली वृत्ति है। बच्चा आँख खोलता है और उसे संसार दिखायी पड़ता है, शुरू हो गया द्वैत। मैं हूँ और संसार है, दो हैं। और प्रमाण क्या है कि संसार है? 'मैं' हूँ न, मेरी आँखें बता रही हैं। भूल शुरू हो गयी, अब द्वैत सत्य बन गया तुम्हारे लिए।

दूसरी वृत्ति है 'विपर्यय'। आमतौर पर देखने पर ऐसा लगेगा कि मन के भ्रम बड़ी वृत्तियाँ हैं। पर नहीं, पतंजलि उसे 'प्रमाण' के बाद रखते हैं, क्यों? क्योंकि विपर्यय को तो तुमने नाम ही दिया है 'विपर्यय'। विपर्यय माने भ्रम।

जिसको तुमने भ्रम जान लिया, अब वो तुम्हारा बहुत नुक़सान नहीं कर पाएगा। लेकिन जिस भ्रम को तुमने सत्य का नाम दे दिया वो बड़ा नुक़सान करता है। इसको ऐसे समझ लो, जाग्रत अवस्था में मन की जो हालत है वो पहली वृत्ति है, उसका नाम हुआ 'प्रमाण'। स्वप्नावस्था में जो मन की अनुभूति है वो दूसरी वृत्ति है, उसका नाम हुआ 'विपर्यय'। और स्वप्नावस्था से मेरा अर्थ यही नहीं है कि सोते में जो स्वप्न आते हैं, मैं जाग्रति के सपनों को भी उसमें ले रहा हूँ।

'कल्पना भ्रम है', ये कहना तो आसान है। पर 'तथ्य भी तो भ्रम है', ये कहना बड़ा मुश्किल हो जाता है। पतंजलि कह रहे हैं, 'पहली बात तो ये जानो कि जिन्हें तुम तथ्य कहते हो, वो सब झूठे हैं।' खम्भा तुम्हें पेड़ लगे, ये तो भ्रम है ही। पर खम्भा तुम्हें खम्भा लगे, ये भी भ्रम है। जब खम्भा पेड़ लगे तो ये बात विपर्यय कहलाएगी। और जब खम्भा, खम्भा लगे तो ये बात प्रमाण कहलाती है, क्योंकि इसके तुम्हारे पास प्रमाण होते हैं कि खम्भा, खम्भा है।

खम्भा, खम्भा कैसे है? क्योंकि इसी तरीक़े के अन्य आकार मैंने देखे हैं और उन सबका नाम भी खम्भा था, क्योंकि ये लोहे का बना हुआ है और इसमें कुछ तार लगे हुए हैं और इसका एक विशिष्ट आकार है और रंग है और उपयोगिता है। और ऐसी वस्तु जिसका ये रूप, रंग, आकार और उपयोगिता हो उसे खम्भा ही कहा जाता है। ये सब तुमने प्रमाण खोजे हैं और तुम भूल ही जाते हो कि इन सारे प्रमाणों के पीछे और प्रमाण हैं, और प्रमाण हैं और आख़िर में जाकर के कोई प्रमाण नहीं है। आख़िर में तुम पाओगे कि तुम्हें ये कहना पड़ रहा है, 'मेरी मर्ज़ी थी इसीलिए मैंने इसे खम्भा बोला, और कोई प्रमाण है नहीं।' आख़िर में जाकर के बस अहम् है, अहम्-वृत्ति, 'मैंने कहा न खम्भा है।'

खम्भा, खम्भा क्यों है? क्योंकि तुमने उसे खम्भा बनाया। तुम उसे खम्भा बनाने वाले न हो, तुम न कहो कि ये खम्भा है, तो क्या खम्भा अभी भी खम्भा रहेगा? अब नहीं रहेगा। खम्भा को खम्भा कहने की जो वृत्ति है, उसके पीछे अहम् बैठा हुआ है, 'मैं'। इसीलिए हम कह रहे थे कि अहम्-वृत्ति मूल वृत्ति है।

बात आ रही है, समझ में?

तो एक तो भूल ये हुई कि खम्भे को खम्भा समझा। और ये बात बड़ी अजीब लगती है, ‘खम्भे को खम्भा समझना भूल है?’ बहुत बड़ी भूल है। जो भी आपको दिख रहा है अपने चारों ओर वो, वो है ही नहीं जिसे आप रूप-रंग या नाम दे रहे हैं। संसार को आँखें जैसा देखती हैं, वो सिर्फ़ आँखों का धोखा है। शब्दों को कान जैसा सुनते हैं, वो सिर्फ़ कानों का छद्म है। जो इनमें अटक कर रह गया कि इन्द्रियगत अनुभूतियाँ सच ही हैं, वो कभी भी स्वयं तक, आत्मा तक और सत्य तक नहीं पहुँचेगा।

तीसरी वृत्ति है 'शब्दभ्रम'। शब्दभ्रम का अर्थ हुआ कुछ ऐसा कह देना जो न तथ्य है, न कल्पना है, मात्र शब्द की ध्वनि है। कल्पना भी कम-से-कम लगती है कि है। और याद रखिए, जब आप कल्पना में गहरे डूबे होते हैं, उस समय कल्पना और तथ्य में कोई विशेष भेद नहीं रह जाता। जब खम्भा पेड़नुमा लग रहा है, तब खम्भे में और पेड़ में कोई अन्तर है नहीं। तो कल्पना भी कम-से-कम कुछ समय के लिए, कुछ परिस्थितियों में तथ्य जैसी लगती तो है।

शब्दभ्रम तो बड़ी ही विचित्र बात है, वहाँ आप कुछ ऐसा कह रहे हैं जिसका आपको कुछ अता-पता नहीं है, वो बस एक शब्द है। जैसे कि आप कहें कि आकाश में खिला हुआ फूल। और जैसे आप हज़ार शब्दों का उपयोग करते हैं, कल कोई कह रहा था 'मोक्ष'। जैसे कि हममें से ज़्यादातर लोग प्रेम शब्द का उपयोग करते हैं, शब्दभ्रम है, प्रेम जाना कभी? ये तो प्रमाण और विपर्यय के समान ही बात हो गयी। क्या है? कुछ नहीं, कोरा शब्द, शब्द का ढोल बज रहा है। और अपने संसार को ध्यान से देखो तो बहुत कुछ है जो सिर्फ़ शब्दों पर चल रहा है। उसकी तहकीकात करने निकलोगे तो उसमें कुछ मिलेगा ही नहीं। ये बड़ी वृत्ति है — शब्दों में जीना, भाषा में जीना।

प्रमाण में मन भरा होता है कारण से, विपर्यय में मन भरा होता है कल्पना से, शब्दभ्रम में मन भरा होता है मात्र शब्द और उसकी ध्वनि से। निद्रा में मन भरा होता है एक व्यापक शून्य से, पर भरा तब भी होता है। तो निद्रा अगली वृत्ति है।

निद्रा अगली वृत्ति है। जब पतंजलि निद्रा कह रहे हैं तो उनका आशय सुषुप्ति से है। भूलना नहीं है कि हमने कहा था कि मन में कुछ भी होना क्या है? वृत्ति है। कोई ये न सोचे कि सुषुप्ति में मन में कुछ नहीं होता।

हम ये तो अच्छे से जानते हैं कि जाग्रति में मन में जो होता है उसे हम तथ्य कहते हैं। आप जगे हुए हैं, आपको एक दीवार दिख रही है, आप कहते हो ये 'तथ्य है।' हम ये भी जानते हैं कि स्वप्न में मन में जो होता है उसे हम कल्पना या सपना कह देते हैं। पर हम ये सोचते हैं कि सिर्फ़ जाग्रति और स्वप्नावस्था में मन भरा होता है, सिर्फ़ जाग्रति और स्वप्न में मन में कुछ चल रहा होता है। नहीं, सुषुप्ति में भी मन में भरा है।

सुषुप्ति में भी मन भरा हुआ है एक खाली, प्रकाशहीन अन्धकार से। उस समय भी मन के पास करने के लिए कुछ है। बहुत सूक्ष्म है मन के पास जो है करने के लिए, पर है। एक खालीपन है मन के पास अभी भी। इसीलिए सुषुप्ति समाधि नहीं है। वरना सुषुप्ति में तो मन रुक ही जाता है।

न वो तथ्यों में है, न वो कल्पना में है, तो आपको बेशक ये दावा करना चाहिए कि सुषुप्ति ही तो समाधि है। नहीं, सुषुप्ति समाधि नहीं है। मन पास अति सूक्ष्म रूप से करने के लिए अभी भी कुछ है, मन में अभी भी एक सूक्ष्म वृत्ति काम कर रही है। तो इसीलिए निद्रा को पतंजलि ने अगली वृत्ति गिनाया है। मन के पास कुछ है।

वृत्ति का आख़िरी प्रकार पतंजलि कहते हैं 'स्मृति' है। स्मृति क्या वृत्ति है? ध्यान दीजिएगा कि अभी तक आपने जितनी वृत्तियों की चर्चा करी, उनमें मन कम-से-कम प्रत्यक्ष रुप से समय में नहीं भाग रहा है। तथ्य सामने है, कल्पना आप अभी कर रहे हैं और आपका दावा यही होता है कि नयी है। शब्दभ्रम में तो है ही मात्र ध्वनि। और सुषुप्ति में समय रुका हुआ सा ही प्रतीत होता है।

स्मृति एक विशेष प्रकार की वृत्ति है जिसमें मन समय में भाग रहा है, मन पीछे की ओर भाग रहा है। स्मृति का अर्थ है — मैं अनुभव से गुज़रा, पर गुज़र नहीं पाया, अटका रह गया। स्मृति का अर्थ है समय खिंचा चला जा रहा है, समय का लोप नहीं हो पा रहा। अनुभवों से गुज़रता हूँ तो उनका कुछ अंश अपने साथ इकट्ठा कर लेता हूँ।

स्मृति का अर्थ ये नहीं है कि आप बैठकर कुछ याद कर रहे हैं। स्मृति का अर्थ है मन इकट्ठा करता चल रहा है।

वृत्ति क्या है? मन में कुछ भी होना वृत्ति है। मैंने कोशिश की है उसे सरलतम रूप से परिभाषित करने की। समझिए बात को! मन में कुछ भी होना वृत्ति है। स्मृति का अर्थ है मन कुछ-कुछ-कुछ-कुछ-कुछ-कुछ इकट्ठा करता चल रहा है। कहाँ से? समय से। अनुभवों से गुज़रता है, पर पूरा नहीं गुज़र पाता, अनुभवों का कुछ अंश साथ लिये रह जाता है। जितना अंश को वो साथ लिये रह जाता है, वो मन का और बोझ, बोझ, बोझ बनता ही जाता है। कतरा-कतरा करके मन ने एक बड़ा समुन्दर जोड़ लिया है और वो मन में चलता रहता है, लहराता रहता है, स्मृतियों का समुद्र।

पाँच ही प्रकार नहीं हैं। आप पतंजलि से पूछेंगे कि गुरुदेव वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं, वो कहेंगे इसका उत्तर देना एक और वृत्ति हो जाएगी। आपकी मर्ज़ी है, आप सातवाँ प्रकार निकाल लो और आप चाहो तो इन पाँच प्रकारों को कुल एक कर दो। आकार-प्रकार क्या हैं? गिनतियाँ हैं, संख्याएँ हैं। उनमें कोई बड़ी बात नहीं। चाहे तो कोई तीन भी कह सकता है, ये तो मन के खेल हैं। संख्या में कोई सत्य तो होता नहीं न।

संख्या क्या है? मन का फैलाव संख्या है। अब मन के फैलाव से आप सत्य तक तो नहीं पहुँच जाएँगे। तो ये रटना आवश्यक नहीं है कि वृत्तियाँ कितने प्रकार की हैं। भाषा की समस्या हो तो इन शब्दों को भी आप ध्यान में रखें, कोई बहुत ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी ये है कि मन अपने भ्रमों को सत्य का नाम देना छोड़े।

ज़रूरी ये है कि आप साफ़-साफ़ समझो कि मन में जो चल रहा है सो ही वृत्ति। मन का स्वभाव ही नहीं है कि वो कुछ तरंगित रहे। मन का स्वभाव ही नहीं है कि उसमें कुछ चलता रहे। कुछ भी चल रहा है, और मैं इस पर अभी दस दफ़े और ज़ोर दूँगा – 'कुछ भी।'

आपको बड़ी मौज की अनुभूति हो रही है, वो भी वृत्ति ही है, क्योंकि कुछ चल रहा है न। चला नहीं कि वृत्ति है। मन में किसी भी प्रकार की तरंग का उठना, कैसे भी उसका चलायमान होना, मन में वृत्ति का उठना है।

आसमान में काला बादल छाये या सफ़ेद बादल छाये, छा तो गया ही। आसमान जिसमें कोई रंग था ही नहीं, जो सिर्फ़ एक अनन्त व्याप्ति थी, उसमें एक आकार तो नज़र आने ही लग गया। बारिश वाला बादल हो सकता है, सूखा बादल हो सकता है, क्या फ़र्क पड़ता है, बादल तो बादल है। आपकी बड़ी इच्छा थी कि बादल छाये, बादल छाये; आपकी इच्छा थी कहीं आज बारिश न हो जाए, बादल छाये। अच्छा बादल हो सकता है, बुरा बादल हो सकता है, बादल तो बादल है।

कुछ भी चल रहा है मन में, आप बड़ा उत्सव मना रहे हो, 'मैं बड़ा खुश हूँ', वृत्ति है। आपके प्यारे मित्र की शव यात्रा निकल रही है और आप फूट-फूटकर रो रहे हो, वृत्ति है। आपको अचानक अनुभव हुआ है कि आपको परमात्मा की प्राप्ति हो गयी, वृत्ति है। आपको अचानक अनुभव हुआ है कि आप से बड़ा पापी कोई नहीं, वृत्ति है।

ध्यान रखिएगा, मन में कुछ भी होना वृत्ति है। मन हिला नहीं कि वृत्ति, क्योंकि मन को हिलना है ही नहीं। मन आत्मा है, आत्मा अचल है, निष्कम्प। हिलना उसका स्वभाव नहीं, आकार लेना उसका स्वभाव नहीं। उसने आकार लिया नहीं कि वृत्ति है।

मेरी बातें आपको बहुत भली लग रही हैं, वृत्ति है। मेरी बातें आपको समझ में नहीं आ रही हैं, वृत्ति है। आप कह रहे हो, 'आहा! अहोभाव', वृत्ति है। और आप कह रहे हो, 'आह! आह!', वृत्ति है। अन्तर मत करने लग जाना, अन्तर करते ही तुम वृत्ति को और प्रगाढ़ कर देते हो। वृत्ति को वृत्ति जानो, हलचल को हलचल जानो।

'देखिए, हम तो कारणों पर चलते हैं', वृत्ति है। 'देखिए, मुझे कारणों से कोई लेना-देना नहीं क्योंकि पतंजलि बता गये हैं कि कारणों पर चलना वृत्ति है', ये भी वृत्ति है। 'देखिए, वृत्तियों के पाँच ही प्रकार होते हैं', ये आपकी वृत्ति है। 'देखिए, वृत्तियों के प्रकार गिनाये नहीं जा सकते, कितने भी हो सकते हैं, थोड़ी देर पहले आपने ही कहा था', महोदय! वो भी वृत्ति ही थी। गिनती करना भी वृत्ति है, गिनती न करना भी वृत्ति है, विचार मात्र वृत्ति है।

समझ रहे हैं?

निवृत्त होने का मतलब है निपट लिये, हम हलचल से ही निपट लिये। 'न लेना, न देना, मगन रहना' ये है निवृत्त होना, अगर ये गीत सहजता से निकला है। पर अगर ये गीत वैसे निकला है जैसे हम गाते हैं तो ये वृत्ति है और इसका नाम है शब्दभ्रम। क्योंकि मग्नता क्या है, ये तो हमने जाना नहीं, बस गा दिया।

अंग्रेज़ी में वृत्ति के लिए कोई अच्छा शब्द नहीं है, पर वो इसे टेंडेंसी कहेंगे। हम उसका भी उपयोग कर सकते हैं। जब भी अपनेआप को किसी भी ओर झुका पाओ, टेंडिंग टेंडेंसी का यही मतलब होता है, झुकाव किसी तरफ़ को — जब भी अपनेआप को किसी भी तरफ़ झुका पाओ तो समझ लेना यही वृत्ति है। जब भी कभी किसी पैटर्न को, किसी आकार को, किसी व्यवस्था को अपने व्यवहार में बार-बार आता हुआ पाओ तो समझ लेना यही वृत्ति है मेरी। क्रोध वृत्ति हो सकती है, क्षमा और दया भी वृत्ति हो सकते हैं। जिधर को ही तुम्हारा मन भागे, जो ही तुम्हारे मन को भरे रहे, सो ही तुम्हारी वृत्ति है।

प्र: सर, पैटर्न को फॉलो करना और किसी पैटर्न को न करना क्या है?

आचार्य: दोनों वृत्तियाँ हैं। अगला क्या है? (श्रोता से पूछते हुए)

श्रोता: अभ्यास और वैराग्य में अन्तर क्या है?

आचार्य: इसे बाद में लेंगे, आगे बढ़ो।

श्रोता: कर्म और वैराग्य में अन्तर।

आचार्य: अब लेना ही पड़ेगा, दोनों ही को लेते हैं फिर।

अभ्यास और वैराग्य में अन्तर। पतंजलि कहते हैं, वृत्तियों से मुक्ति के लिए अभ्यास और वैराग्य। अभ्यास और वैराग्य, समझेंगे दोनों को। दोनों युक्तियाँ हैं, पहले तो ये जानिए। दोनों युक्तियाँ हैं, दोनों विधियाँ हैं। दोनों ही मन के तल पर विधियाँ हैं, अभ्यास और वैराग्य। पर दोनों में थोड़ा अन्तर है, क्या अन्तर है, समझेंगे।

अभ्यास में आप मन के एक टुकड़े का प्रयोग मन के दूसरे टुकड़े के ऊपर करते हो। टुकड़े तो सदा मौजूद ही हैं। भूलना नहीं, जहाँ वृत्ति है वहाँ टुकड़े हैं। कैसे? जब तक आकाश पूर्ण है, शून्यवत है तब तक उसमें कहीं कोई रेखा खिंची नहीं, तब तक उसका कोई हिस्सा हुआ नहीं, वो एक अखंड इकाई है। पर एक बादल के आते ही आकाश के क्या हो जाते हैं? बादल आया नहीं कि उसने आकाश को क्या कर दिया? उसके टुकड़े कर दिये।

नहीं समझ में आ रही बात?

हर बादल आकाश के टुकड़े कर देता है। वृत्ति का काम ही यही है कि वो तुम्हारे टुकड़े कर देती है। उसी को कहते हैं मन का खंडित हो जाना, मन का हिस्सा-हिस्सा हो जाना, फ्रेगमेंटेड माइंड (बिखरा हुआ मन)।

तो वृत्तिपूर्ण जो चित्त है उसके टुकड़े तो हैं ही। अभ्यास का अर्थ हुआ कि एक टुकड़ा दूसरे टुकड़े पर नज़र रख रहा है, उसकी हरकतों पर, उसकी गतिविधि पर, उसके विचारों पर। हर टुकड़ा समय में जीता है। अभ्यास का अर्थ हुआ कि उस पर नज़र रखकर के उससे समय में बार-बार एक प्रकार का आचरण करवाया जा रहा है।

मन का कौनसा टुकड़ा है जो दूसरे टुकड़े पर नज़र रख सकता है? मन का वो टुकड़ा जो साफ़ है, मन का वो टुकड़ा जो केन्द्र के ज़्यादा क़रीब है, वो मन के बाक़ी उन टुकड़ों पर नज़र रख सकता है जो अब वृत्तियों द्वारा आच्छादित हो गये हैं। भूलना नहीं कि बादल कितना भी छा ले, उससे आकाश का कुछ बिगड़ा नहीं है, आकाश अपनी जगह क़ायम है। बादल के नीचे भी आकाश है और ऊपर भी आकाश है और दायें-बायें भी। आकाश कहीं चला नहीं गया। आकाश का बल, आकाश की व्यापकता अभी भी उतनी ही है।

अभ्यास का अर्थ है कि आकाश के बल का प्रयोग किया जा रहा है बादल के विरुद्ध। कि मन का एक टुकड़ा आत्मा के बल का प्रयोग कर रहा है मन के दूसरे टुकड़े के विरुद्ध। वृत्ति एक चाल चलना चाहती है, मन का एक टुकड़ा उसे उस चाल पर नहीं चलने देगा, ये अभ्यास है। आशय ये है कि अभ्यास जहाँ भी आएगा, वहाँ तुम पाओगे कि मन में प्रतिरोध है, क्योंकि एक टुकड़ा दूसरे के विरुद्ध जा रहा है। वो अवस्था कभी आ ही नहीं सकती कि तुम अभ्यास कर रहे हो और मन मना नहीं कर रहा।

तुम जब भी अभ्यास में उतरोगे, मन विरोध करेगा, मन का एक हिस्सा। पर भूलना नहीं, अपनी ही दशा को ध्यान से देखना, मन का एक टुकड़ा विरोध कर रहा होता है, लेकिन फिर भी तुम अभ्यास कर रहे होते हो, क्योंकि आत्मा का बल उस एक टुकड़े के बल से ज़्यादा है; ये अभ्यास है।

अभ्यास कब होगा? जब तुम जानते हो कि वृत्ति गहरी है लेकिन मेरी श्रद्धा भी बहुत गहरी है। मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ सारी ऊर्जा, जहाँ सारी ताक़त है। मैं उसके पास जाऊँगा, उसकी मदद लेकर के इस गहरी वृत्ति के विरुद्ध खड़ा हो जाऊँगा; ये अभ्यास है। और इतनी बार खड़ा रहूँगा, इतनी बार खड़ा रहूँगा — जहाँ अभ्यास की बात आती है वहाँ दोहराना, रिपीटिशन बहुत आवश्यक हो जाता है — इतनी बार खड़ा रहूँगा कि अन्ततः इस बादल को छँटना पड़ेगा, अन्ततः इस वृत्ति को हारना पड़ेगा।

आत्मा के पास अनन्त बल है, वृत्ति का बल अनन्त नहीं है। तुम उसके विरोध में बहुत बार, बहुत बार, बहुत बार खड़े होओगे, वृत्ति हार जाएगी, टूट जाएगी, बादल छँट जाएगा। गहरी-से-गहरी आदत बदली जा सकती है। पर उसके लिए कोरा अभ्यास नहीं चाहिए, उसके लिए वो अभ्यास चाहिए जिसकी ताक़त आत्मा से निकल रही है, जिसकी ताक़त एक गहरे सच से निकल रही है।

वैराग्य क्या है? वैराग्य ये है कि बादल, बादल तब तक प्रतीत हुआ जब तक मैंने बादल को बादल का नाम और संज्ञा दी। जिस क्षण मेरे मन ने ये भाव ही त्याग दिया कि बादल है, अब बादल होते हुए भी नहीं है; ये वैराग्य है।

पहला तरीक़ा था कि मैं बादल के विरुद्ध तब तक खड़ा रहूँगा जब तक बादल छँट न जाए। दूसरा तरीक़ा है — 'बादल है' ये कहा किसने? मैंने। बादल को बादल बनाया किसने? मैंने। तो मैं बादल के विरुद्ध लड़ूँँ क्यों? बादल कृति किसकी है? मेरी। तो मैं ही चुपचाप कहे देता हूँ कि बादल तू नहीं है। और मैंने ये कहा नहीं कि बादल छँट गया। मैंने ये कहा नहीं कि बादल छँट गया।

अभ्यास उनके लिए है जिनका चित्त कर्म-प्रधान है, वैराग्य उनके लिए है जिनका चित्त ज्ञान-प्रधान है। और याद रखिए, चित्त में दोनों ही गुण होते ही हैं। कर्म-प्रधान यानी राजसिक गुण, ज्ञान-प्रधान यानी सात्विक गुण। चित्त में दोनों ही मौजूद हैं इसीलिए अभ्यास और वैराग्य को साथ-साथ चलना होता है। अभ्यास और वैराग्य को इसीलिए साथ-साथ चलना होता है।

वैराग्य क्या कहता है? 'बादल, तू मेरे कहने के कारण था, मैंने तुझे बादल बनाया था, मैंने तुझे पकड़ रखा था कि तू बादल है। और जा मैंने छोड़ा, मैंने छोड़ा।' इस छोड़ देने का नाम वैराग्य है। मैं अब मानता ही नहीं कि तू बादल है, तू गया। आकाश तो नहीं जन्म देता आकारों को, अविद्या जन्म देती है न आकारों को? आकाश को क्या लेना-देना! मैंने अविद्या को छोड़ा। पर भूलिएगा नहीं, बिना अभ्यास के वैराग्य काम न आएगा, और बिना वैराग्य के अभ्यास मात्र थकान देगा।

अभ्यास एक प्रकार का गृहयुद्ध है, एक अन्दरूनी लड़ाई, जिसमें आपका एक हिस्सा आपके विरुद्ध खड़ा है। वैराग्य नहीं है तो अभ्यास बड़ा मुश्किल हो जाएगा, बड़ी हिंसात्मक हो जाएगी अन्दर की लड़ाई। ज्ञान भी चाहिए, अभ्यास भी चाहिए, क्योंकि गुण दोनों मौजूद हैं, सतोगुण भी और रजोगुण भी।

फिर क्या है? (श्रोता से पूछते हुए।)

श्रोता: वैराग्य में भी अध्यात्म ज़रूरी है?

आचार्य: हाँ, अगर इतना आसान होता तुम्हारे लिए बस ये कह देना, 'बादल तुझे छोड़ा', तो बादल तुम बनने ही क्यों देते? बादल अविद्या से बना न? इसका अर्थ है कि तुम्हारे भीतर वो वृत्ति गहरी बैठी हुई है जिससे बादल उठ रहे हैं। तुम कह सकते हो, 'अंगारे! तुझे मैंने छोड़ा।' पर अगर तुम इतने ही होशियार हो कि अंगारे को अंगारा जानकर छोड़ दो, तो तुमने अंगारा उठाया ही क्यों होता?

वैरागी चित्त को बहुत-बहुत सधा हुआ होना होता है, उसका बोध बड़ा गहरा होना चाहिए। बोध उतना गहरा था नहीं, तभी तो तुम भ्रम में पड़े। तो इसलिए उसके साथ अभ्यास ज़रूरी है। ठीक है?

अगला क्या? (श्रोता से पूछते हुए)

श्रोता: वैराग्य और परवैराग्य में क्या अन्तर है?

आचार्य: 'वैराग्य और परवैराग्य में क्या अन्तर है?' साधारण वैराग्य क्या हुआ? साधारण वैराग्य ये हुआ कि जो मुझे दिखायी दे रहा है, मैं उसको सत्य नहीं मानता। संसार को सत्य मानने की वृत्ति का त्याग है साधारण वैराग्य। ये वैराग्य बहुत आगे तक तो तुम्हें नहीं ले जा पाएगा। कारण क्या है? तुमने संसार को तो सत्य मानना छोड़ा, पर स्वयं को अभी भी सत्य मानते हो, 'मैं हूँ। संसार नहीं है, मैं हूँ।'

तो इसीलिए, परवैराग्य क्या है? जब न तो तुम संसार को सत्य मान रहे हो, न अपनेआप को सत्य मान रहे हो। मात्र संसार को छोड़ा तो वैराग्य, जब संसार के साथ-साथ स्वयं को भी छोड़ दिया तो परवैराग्य। जब दृश्य को छोड़ा तो वैराग्य, जब दृश्य के साथ-साथ दृष्टा को भी छोड़ दिया तो परवैराग्य।

इसीलिए साधारण वैराग्य तुम्हें मात्र साक्षित्व तक ले जाएगा। लेकिन परवैराग्य साक्षित्व से आगे की घटना है, वो तुरीयातीत है। साधारण वैराग्य तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय की त्रिपुटी से मुक्त करता है, तीन को छोड़कर तुम चौथे में अवस्थित हो जाते हो। परवैराग्य में तुम कहते हो चौथा भी कोई हमारा आसन नहीं हो सकता, हमारा आसन तो बस वहीं लगेगा, परम आकाश में।

लेकिन ये अन्तर फ़िलहाल हमारे किसी काम का नहीं है। ये अन्तर पूछना वैसा ही है जैसे कि कोई आदमी जिससे अभी सौ मीटर न दौड़ा जाता हो, वो पूछे कि हाफ मैराथन दौड़ूँ कि फुल मैराथन। तुम पहले सौ मीटर दौड़ लो।

वैराग्य और परवैराग्य शब्दभ्रम हैं, जिनका पता नहीं, पर जिनके लिए शब्द मौजूद हैं। जिनका कुछ पता नहीं, पर जिनके लिए शब्द मौजूद हैं।

और अगला? (श्रोता से पूछते हुए)

श्रोता: संप्रज्ञात समाधि क्या है?

आचार्य: 'संप्रज्ञात समाधि क्या है?' संप्रज्ञात समाधि में पतंजलि क्या कह रहे हैं? 'तुम यात्रा में हो।' तर्क अभी चल रहा है, पर कुतर्क नहीं है। अब ये वो तर्क है जो तुम्हें स्रोत तक ले जाएगा, ये वितर्क है। अस्मिता अभी बाक़ी है, 'मैं हूँ' का भाव अभी है।

मैं हूँ, पर मैं कौन हूँ? मैं वो हूँ जो तेरा प्रेमी है, तेरे विरह में है, तुझसे मिलने चला आ रहा है, तेरी ही तरफ़ की यात्रा में है। मैं हूँ, पर मिटने की राह पर हूँ। मैं सोचता भी हूँ, खूब विचार करता हूँ, पर मेरे सारे विचार सद्-विचार हैं। मेरे तर्क वितर्क हैं, कुतर्क नहीं हैं।

श्रोता: आनन्द?

आचार्य: आनन्द है। एक बात समझना साफ़-साफ़! आनन्द आत्मा नहीं है, न आनन्द आत्मा का लक्षण है। आनन्द मन की ही एक अवस्था होती है जब वो आत्मा के सम्पर्क में आने लगता है। जब वो सुख-दुख दोनों से मुक्त हो जाता है, तब मन की जो अनुभूति होती है उसे आनन्द कहते हैं।

आनन्द के होने का अर्थ है मन अभी बाक़ी है, मन अभी यात्रा में ही है। बहुत क़रीब पहुँच गया है केन्द्र के, पर केन्द्र से एक नहीं हुआ है, अन्यथा आनन्द का अनुभव कौन करता! कोई तो है न अभी भी जो आनन्दित अनुभव कर रहा है? आनन्द का होना दर्शाता है कि अभी योग नहीं हुआ, एक नहीं हुए। गले मिल गये हो, बहुत निकट आ गये हो, पर एक नहीं हुए हो।

पतंजलि कह रहे हैं, 'जहाँ वितर्क है, जहाँ विचार है, जहाँ आनन्द है, जहाँ अभी अस्मिता है — अस्मिता माने 'मैं हूँ', 'अस्मि', 'मैं हूँ' — जहाँ अभी ये है, वो समाधि संप्रज्ञात समाधि है। ज्ञान अभी है। ज्ञान अभी है। इसी को मोटे तौर पर सविकल्प समाधि भी कहा जाता है। इसी को कहीं-कहीं पर अपरा-समाधि भी कहा गया है।

समझ में आ रही है बात?

और क्या है? (श्रोता से पूछते हुए)

श्रोता: असंप्रज्ञात समाधि।

आचार्य: असंप्रज्ञात समाधि फिर क्या हुई? न आनन्द, न आनन्द का बोध। न मुक्ति, न मुक्ति की आकांक्षा। प्रेम भी नहीं बचा अब वहाँ पर, क्योंकि प्रेम के लिए भी एक महीन द्वैत चाहिए, प्रेम के लिए भी अस्मिता चाहिए। न प्रेम है, न मुक्ति है, न सत्य है, न बोध है। ये निर्विकल्प समाधि है।

निर्विकल्प समाधि क्या है? निर्विकल्प समाधि तुम्हें नहीं मिल सकती, निर्विकल्प समाधि अस्तित्व का स्वभाव है। निर्विकल्प समाधि तब है, जब तुम हो ही नहीं सकते। उसकी चर्चा व्यर्थ है, वो चर्चा में क़ैद नहीं होगी, मन उसकी तरफ़ उड़ान नहीं भर सकता। हमारे लिए तो उचित है कि हम संप्रज्ञात समाधि की ही बात करें, क्योंकि हम जी रहे हैं, हम अपनेआप को जीव जानते हैं, और जीवन यात्रा है।

हम तो यात्री हैं, तो हम तो यात्रा की ही बात करें। यात्रा में विचार काम आएगा, यात्रा में वितर्क काम आएगा। यात्रा आनन्द भाव में की जाए तो बहुत अच्छा रहेगा। यात्रा में यात्री तो होगा, तो अस्मिता भी होगी। तो हम तो संप्रज्ञात समाधि की ही बात करें क्योंकि हम यहाँ अपनेआप को जीव ही मानकर बैठे हैं न। जीव यात्री होता है।

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