योग के नाम पर मज़ाक || आचार्य प्रशांत, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते, आज योग दिवस है तो देश-दुनिया के जितने भी समाचार है हर जगह पर योग को लेकर ही चर्चा हो रही है। तो मैं काफ़ी चीज़ें पढ़ रहा था तो वहाँ पर एक चीज़ मुझे बार-बार पढ़ने को मिल रही थी जहाँ पर लोग कह रहे थे कि योग जो है वो भारत का सबसे बड़ा योगदान है पूरे विश्व के लिए। इंडियाज़ बिगेस्ट कॉन्ट्रिब्यूशन टू द वर्ल्ड इज़ योग (विश्व को भारत का सबसे बड़ा योगदान योग है।)
अब ये पढ़ते ही मेरे मन में सबसे पहला सवाल ये आ रहा था कि ठीक है योग दिवस है, लोग थोड़ा भावनाओं में बहकर बड़ी-बड़ी बात कर रहे हैं। पर मैं आपसे पूछना चाहता हूँ क्या सच में ऐसा है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है। योग विश्व को भारत का न सबसे बड़ा योगदान है, न सबसे बड़ा निर्यात है। लेकिन साथ-ही-साथ ये बात पूरी तरह से ग़लत भी नहीं है, अगर हम योग का सही अर्थ समझ लें। जब मैं कह रहा हूँ कि जो भारत का सबसे बड़ा योगदान है विश्व को वो योग नहीं है, तो मैं उस योग की बात कर रहा हूँ जिसे आजकल योग माना जाता है। और जिसके लिए योग दिवस कल मनाया जाएगा।
कल योग दिवस किस योग के उत्सव में, उपलक्ष्य में मनाया जाएगा? आप पाऍंगे कि लोग शारीरिक मुद्राओं में अपनी तस्वीरें डाल रहे हैं। गुरु लोग और बड़े-बड़े पदाधिकारी, राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री लोग भारत में भी दुनिया भर से योग दिवस को अपना समर्थन दर्शा रहे हैं।
किस तरह से? कि बैठ गये हैं पालथी मारकर, कोई आसन, कोई मुद्रा; तो ये जो शारीरिक क्रियाएँ हैं इनको योग माना गया है। और जो आप योग दिवस मनाते हो वो वास्तव में इन शारीरिक क्रियाओं का उत्सव है।
आप इन शारीरिक क्रियाओं को महिमा मंडित करने के लिए, गौरवान्वित करने के लिए योग दिवस मनाते हो। ठीक है न, बिलकुल ज़मीनी बात। वो बात इसी से प्रमाणित हो जाती है कि योग दिवस पर आप यही तो करते हो कि एक व्यक्ति बैठ जाएगा और उसके पीछे दस, बीस या पचास और बैठ जाऍंगे। और वो सब-के-सब क्या कर रहे हैं?





