✨ A special gift on the auspicious occasion of Sant Ravidas Jayanti ✨
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बारह प्रकार के धोखे || आचार्य प्रशांत, गुरु मिलारेपा पर (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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द सॉन्ग ऑफ द टवेल्व डिसेप्शंस। वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव; सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।

"संसार के सभी क्रियाकलाप तो मायारूपी हैं, अतः मैं सत्य की शरण में जाता हूँ।"

आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहीं से होती है—जो तुमने कहा न मैं जानवर हूँ—ये जानने से। शुरुआत वहीं से होती है कि ये जानवर-जानवर जैसा क्या लग रहा है? कि जैसे एक उकबहाट हो कि ये क्या जानवर-जानवर जैसा लग रहा है?

है तो नहीं, लग क्या रहा है? वही "वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।" और जहाँ ये प्रतीति हुई कि 'ये क्या पशुता-सी महसूस हो रही है, बैचेनी है इसमें,' बस हो गया, वहीं काम हो गया।

परमानेंट (स्थायी) नहीं हो गया। दिक़्क़त क्या है न कि तुम तलाश कर रही हो परमानेंट की। परमानेंट नहीं हो गया, उस क्षण के लिए हो गया। जिस क्षण में ये अहसास हो गया कि वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव , उस समय पर ये सीकिंग (खोज) भी नहीं है, यही ट्रुथ डिवाइन है। इसके अलावा और कोई डिवाइन ट्रुथ है क्या कि वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव? अब इसमें सीकिंग भी कहाँ बची? वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव , जिसने ये जान लिया, अब उसे कुछ और सीक करना है क्या?

देयर इज नो गॉड , कोई ख़ुदा नहीं है, इसके आगे वाली लाइन (पंक्ति) बोलने की ज़रूरत है क्या? और क्यों रुक जाता था सरमद? इतना ही तो जान लिया न उसने कि वर्ल्डली गोड्स आर ऑल डिसेप्टिव। अब उसके आगे और कुछ जानने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत छोड़ो, अगर और जानने की कोशिश की तो मामला गड़बड़ हो जाएगा। इसीलिए सरमद रुक जाता था कि आगे की नहीं, बस इतना बहुत है कि वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव एंड वर्ल्डली गोड्स आर आल डिसेप्टिव। एंड वर्ल्डली लिबरेशन इज डिसेप्टिव। वर्ल्डली बॉन्डेज इज डिसेप्टिव। (संसार के क्रियाकलाप, संसार के भगवान, संसार की मुक्ति, संसार के बंधन सब मायारूप हैं।)

बस इतना जान लो, रुक गए, अब कुछ नहीं सीक करना है। कोई सीकिंग नहीं बची। दिस इज द ट्रुथ डिवाइन। दिस इज द ट्रुथ डिवाइन। इतना जान लो, रुक जाओ वहीं पर। और जो इतना जानकर रुका नहीं, उसने अभी जाना ही नहीं है। मन इसके आगे और जानेगा भी क्या, कि ये सब जो दिख रहा है वो गड़बड़ है।

"एक्ससाइटमेंट्स एंड डिसट्रेक्शन्स आर इल्युजन्श, सो आई मैडिटेट ऑन द नॉन-डूअल ट्रुथ

"आकर्षण और विकर्षण तो भ्रम मात्र हैं, इसलिए मैं अद्वैत सत्य की शरण में जाता हूँ।"

लोग बहुत बार सवाल पूछते हैं कंसन्ट्रेट (एकाग्र) कैसे करें? अब कंसन्ट्रेशन का मतलब ये है कि कुछ डिस्ट्रेक्ट (व्याकुल) कर रहा है, उससे बचना है। किसी एक ऑब्जेक्ट को डिस्ट्रेक्शन बोला है, उससे बचना चाहते हो। और किसी दूसरे ऑब्जेक्ट पर कंसन्ट्रेट करना चाहते हो। क्या कह रहे हैं मिलारेपा कि जिसको तुम डिस्ट्रेक्शन कह रहे हो वो क्या है?

श्रोता: इल्यूजन।

आचार्य: जब वो इल्यूजन है तो कंसन्ट्रेशन भी क्या होगा?

श्रोता: इल्यूजन।

आचार्य: समझ में आ रही है बात? सहजता में कंसन्ट्रेशन नहीं होता। एक बात बिलकुल ध्यान से समझ लीजिएगा। कंसन्ट्रेशन विधि है, वो पतंजलि के योग का हिस्सा हो सकता है। धारणा कंसन्ट्रेशन ही है। पतंजलि के योग—क्योंकि वो विधि है, वो प्रोसेस (प्रक्रिया) है, वो प्रोसेस देते हैं, वो पूरा बताते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। यम-नियम सब बताते हैं। वहाँ पर हो सकता है।

वरना जिसने ये जान लिया कि डिसट्रेक्शन इल्यूजन है, वो फिर कंसन्ट्रेट नहीं करेगा। वो बस सहजता से बहेगा। कि अगर कुछ ऐसा होगा जो पढ़ने योग्य है, तो मैं पढूँगा ही, इसमें कंसन्ट्रेट क्या करना? अगर कुछ ऐसा कहा जा रहा होगा जो सुनने योग्य है तो मैं सुनूँगा ही, इसमें कंसन्ट्रेट क्या करना? आपमें से कितने लोग अभी कंसन्ट्रेट कर रहे हैं? नहीं कर रहे हैं न कंसन्ट्रेट या कर रहे हैं? और करना पड़ रहा है कंसन्ट्रेट तो फिर कुछ सुन नहीं पा रहे होंगे। तो कंसन्ट्रेशन इल्यूजन है। कंसन्ट्रेशन नहीं, एक सहज बहाव। सहजता से बस होना, प्रेजेंस (उपस्थिति)। कंसन्ट्रेशन नहीं; क्या? प्रेजेंस , होना।

"एक्ससाइटमेंट्स एंड डिसट्रेक्शन्स आर इल्युजन्श, सो आई मैडिटेट ऑन द नॉन-डूअल ट्रुथ।"

द नेचर ऑफ नॉन डूअल ट्रुथ इटसेल्फ इज मेडिटेटिव। आई डोंट मैडिटेट; द नॉन डूअल ट्रुथ इज मेडिटेशन इटसेल्फ। देयर इज नो आई देयर। एंड इनफैक्ट टील द टाइम देयर इज एन आई, देयर कैन बी नो मेडिटेशन, नो लॉन्ग डूअल ट्रुथ।

"कम्पेनियन्स एंड सर्वेंट्स आर डिसेप्टिव, सो आई रिमेन इन सॉलिट्यूट"

"मित्र और सेवक सभी कपटी हैं, इसलिए मैं कैवल्य में रहता हूँ।"

"कम्पेनियन्स एंड सर्वेंट्स आर डिसेप्टिव, सो आई रिमेन इन सॉलिट्यूट।" नॉट ए चॉइस। इट इज सो। इट इज सो। (चुनाव नहीं है। ऐसा ही है। ऐसा ही है।)

जीवन जीने का एक, समझ लीजिए बैरोमीटर है ये, कभी चेक करना हो कि कैसा चल रहा है। जो अंतरतम का स्वभाव है—बिलकुल अपना—जब बाहर भी जीवन वैसा ही बीत रहा हो तो जान जाइए कि सब हारमोनियस (सामंजस्यपूर्ण) है। एक रिदम (लय) है जीवन में, मेलोडी (राग), संगीत है बिलकुल। अंदर का स्वभाव है अलोननेस (अकेलापन) और जब बाहर भी वैसा ही हो— अलोननेस भीतर की है और जब बाहर भी आ जाए—तो जानिए कि भीतर-बाहर एक हुआ।

अब जड़ और पत्ते संपृक्त (संयुक्त) हैं पूरे तरीक़े से। जो मेरा स्वभाव है, मैं वैसा ही जी रहा हूँ, अंदर बाहर एक-सा। कोई अब उसमें गैप (अंतर) नहीं है। उसी गैप का नाम मन है। उसी गैप का नाम मन है।

रमण बड़ी प्यारी व्याख्या देते हैं मन की। कहते हैं, मन आत्मा और शरीर के बीच का सेतु है। शरीर जो हरकतें कर रहा है और आप जैसे हैं—मन उसके बीच में खड़ा है।

आप जैसे हैं और आपका जैसा चरित्र है, जैसा आचरण है, जब वो एक हो जाता है तो समझिए कि जीवन संगीतमय हुआ। स्वभाव है प्रेम। जब वही प्रेम आपके कर्म भी बन जाते हैं, आपके कृत्यों में भी आए तो जानिए अंदर-बाहर एक हुआ। स्वभाव है निडरता, वही निडरता जब आपके कृत्यों में भी दिखाई दे तो जानिए अंदर-बाहर एक हुआ।

श्रोता: जो कहता है, उसमें जो शब्द इस्तेमाल किया मेरा स्वभाव। अब उसमें एक हमारा इमेज हो सकता है कि ये मैं हूँ और जैसे निडरता को ग़लत, निडरता को एक तरीक़े से ये भी लिया जा सकता है, दैट आई ऑर्ग्यु। प्रेम को इस तरीक़े से भी लिया जा सकता है, दैट आई पज़ेस।

आचार्य: ये लेकिन अगर ऐसे लोगे तो हमने कहा, अंदर-बाहर एक होने के लिए एक चीज़ आवश्यक है कि बीच में जो मन है वो?

श्रोता: नहीं रहे।

आचार्य: वो नहीं रहे। पर अगर तुम अभी अर्थ निकाल रहे हो निडरता के तो इसका मतलब मन अभी है। इसीलिए अंदर-बाहर उनका एक—सिर्फ़ उन्हीं का एक—हो सकता है जिनका मन इतना मैडिटेटिव हो गया है कि अब वो ख़त्म हो रहा है। वो निडरता के असली अर्थ जान जाएँगे। समझ रहे हो न? चीज़ को देखो। मन है, मन में एक शब्द गया 'निडरता', मन ने उसका कुछ का कुछ निकाला क्योंकि मन जानता तो है नहीं। हमने कहा, दो तरह से जाना जाता है। एक किसी प्रोसेस से, जब कोई प्रोसेस होता है तो वो ज्ञान कहाँ से आता है?

श्रोता: बाहर से।

आचार्य: बाहर से आता है। और दूसरा जस्ट नोविंग (बस जानना)। और वो जो जस्ट नोविंग है उसकी कोई विधि नहीं होती। देट्स मैडिटेटिव नोविंग। वो असली ज्ञान है। जब मन मैडिटेटिव नोविंग में होता है तो वो निडरता का कौन-सा रूप जानेगा, नक़ली या असली?

श्रोता: असली।

आचार्य: असली जानेगा न। जब असली अर्थ जानेगा तो कृत्यों में कौन-सी निडरता दिखाई देगी? असली या नक़ली?

श्रोता: बहुत दूर की बात नहीं हो गई।

आचार्य: बिलकुल नहीं हो गई।

श्रोता: नहीं, शुरुआत ही मतलब मेरे को हाइपोथेटिकल लगा। शुरुआत ही बड़ी डिफिकल्ट है कि जस्ट नोविंग वाली जो चीज़ है डज दैट एक्चुअली हैप्पन विथ द लाइफ दैट आई लिव द होल डे?

आचार्य: जिसको तुम कह रहे हो डज इट हैप्पन द होल डे? ये जो पूरा होल डे बीत रहा है, जो पूरा समय ही बीत रहा है, समय, समय, समय, समय, समय। इसका तुम जो ये इंटेग्रेटेड व्यू (एकीकृत दृश्य) ले रहे हो, यही मन है। यही मन है।

जस्ट नोविंग , समय में नहीं होती है। जस्ट नोविंग होती है, अभी, ठीक अभी। जस्ट नोविंग ठीक अभी होती है। जस्ट नोविंग वैसे ही होती है, तुम कह रहे हो न, डज इट हैपन द होल डे? जस्ट नोविंग ठीक अभी हो रही है तुम्हारे साथ क्योंकि तुम जान रहे हो कि तुम हो। इनसे मैंने सवाल क्या पूछा था? कि क्या आपको ये विश्वास करना पड़ता है कि आप हैं यहाँ पर? डोंन्ट यू जस्ट नो देट यू आर? तो फिर इतनी बैचेनी क्या है कि जस्ट नोविंग , कितनी मुश्किल है, कितनी मुश्किल है?

ये सारा ज्ञान, जितना भी तुम जीवन में जानते हो, क्या सब बाहर से आया है? क्या बाहर से ही आ रहा है? क्या ये समझने की ताक़त बाहर से आ रही है? जानना मेरा स्वभाव है। सबकुछ मेरे अनुरूप ही चलता है। कंडीशंनिंग कितनी भी बड़ी हो, कितनी भी ताक़तवर हो, मुझसे बड़ी नहीं है। कंडीशंनिंग भी ऑपरेट करती है तो मेरी सहमति से। तुम नहीं चाहोगे तो नहीं ऑपरेट करेगी।

"मनी एंड पजेशंस आर आल्सो डिसेप्टिव, सो इफ आई हेव देम, आई गिव देम अवे"

"धन और सम्पत्ति सब मायावी हैं, इसलिए मैं इनका दान कर देता हूँ।"

कुछ न पकड़ के रखना, परिमार्जन न करना, ये सेल्फ (आत्म) का स्वभाव है। क्यों? क्योंकि पकड़ने के लिए कुछ है ही नहीं। अपनेआप को ही पकड़ के मिलेगा क्या? अंदर-बाहर जो एक-सा हो जाता है, वो बाहर भी पकड़ना छोड़ देता है। वो बाहर भी पकड़ना छोड़ देता है। हम जब अष्टांगयोग देख रहे थे, उसमें यम-नियम में जितने शब्द आए थे, हमने कहा था इनके दो तलों पर अर्थ हैं। एक तल था शारीरिक और दूसरा जो तल था वो था आत्यंतिक। एक तल था कृत्य का और दूसरा तल था भीतर होने का। वहाँ पर भी ये आता है, नॉन पजेसिवनेस, नॉन स्टीलिंग। आंतरिक स्वभाव है, कुछ न लेने का—अस्तेय, कुछ न चुराने का। वही जब बाहर आ जाता है तो अंदर-बाहर एक-सा है। और योग यही करता है—भीतर-बाहर एक-सा कर देता है। तो इसमें फिर अंतर नहीं रह जाता। देखो मैडिटेशन में जो तुमको पता चलेगा न, वो कोई नई जानकारी नहीं होगी। तुमको यही पता चलेगा कि मन—वही मन जो मैडिटेशन में जाता है—कि ये मन अभी तक जिन चीज़ों से भरा हुआ था उनका नाम है डर। और जब मैं मैडिटेशन में हूँ तो जिन चीज़ों से भरा हुआ हूँ उनसे मुक्त हूँ तो उसका नाम निडर है।

इस बात को ध्यान से समझना। जो जस्ट नोविंग है वो पॉजिटिव नोविंग नहीं हो सकती। जो जस्ट नोविंग है वो पूरे तरीक़े से नेगेटिव नोविंग है। वो सिर्फ़ नकार है उसका जिससे मन भरा हुआ है। इसीलिए बुद्ध ने उसको नाम शून्य का दिया है। शून्य मतलब पाँच, चार, तीन, दो, जिन सबसे भरा हुआ था मन, उससे घटते-घटते खाली हो गया है सबसे। तो इसीलिए शून्य।

मैडिटेशन का अर्थ है, ये नहीं कि कुछ और पता चल जाएगा, ध्यान रखिए, मैडिटेटिव नोविंग का अर्थ ये नहीं है कि कुछ और पता चल जाएगा, मैं ज्ञान से भर जाऊँगा, वो काम किताबें करती हैं। वो काम किताबों से आया हुआ ज्ञान करता है कि आपको और भर देता है। मैडिटेटिव नोविंग का अर्थ होता है कि जो मुझे पता है पहले ही, मैं उससे खाली हो जाऊँगा। दिस इज जस्ट नोविंग। इसीलिए निडरता, निर्भयता, ये कोई नये शब्द नहीं हैं, सिर्फ़ भय का?

श्रोता: ट्रांसफॉर्मेशन हैं।

आचार्य: समझ रहे हैं न?

श्रोता: मैडिटेटिव नोविंग इज एक्चुअली द अननोविंग ऑफ व्हॉट आई नो।

आचार्य: यस (हाँ)। नोविंग द लिमिट्स ऑफ द माइंड (मस्तिष्क की सीमाएँ जानना)। नोविंग देट ऑल दैट आई नो इज एक्चुअली वेरी लिमिटेड। (यह जानना कि जो कुछ मैं जानता हूँ वो वास्तव में बहुत सीमित है।)

"थिंग्स इन द आउटर वर्ल्ड आर ऑल इल्यूजन, द इनर माइंड इज देट व्हिच आई ऑब्जर्व"

"बाहर का संसार मन का प्रक्षेपण मात्र है, इसलिए मैं मन को ग़ौर से देखता हूँ।"

ठीक है? इनर माइंड को ऑब्जर्व करने का क्या अर्थ है? मैं बाहर नहीं देखता, मैं उस मन को देखता हूँ जो सब बाहर को देखता है। एक तो संसार है जो बाहर है और एक मन है जिसको मैं भीतर मानता हूँ—भीतर माने शरीर के भीतर। ठीक है? एक संसार है जो बाहर फैला है। अहंकार की ही भाषा है ये। मैं कहता हूँ—एक शरीर है मेरा, इससे बाहर जो कुछ है उसे क्या नाम दिया है? संसार। और एक मन है जिसको मैं कहता हूँ शरीर के भीतर है; उसको मैंने क्या नाम दिया है? मन, अपना। कहा जा रहा है कि जो बाहर-बाहर फैला है उसको देखना तो बहुत आसान है। जिसको मैंने भीतरी बोला है उसको मैं देखता हूँ। उसको देख लिया तो पूरे संसार को समझूँगा।

श्रोता: मन और संसार एक ही तो हैं?

आचार्य: बिलकुल एक हैं। क्योंकि उसको समझा तो संसार को समझ जाऊँगा, यही तो कह रहे हैं, कि बाहर जो है उसको छोड़ दिया, जो भीतरी है उसको देखना शुरु किया। बाहरी जो सबकुछ है, बेटा, उसको कैसे देखोगे, बताओ? चाँद, सितारे, सूरज, इतनी बड़ी दुनिया, पूरा ब्रह्माण्ड—क्या आसान है उसको देखना या उसको देखना जहाँ से सबकुछ उद्भूत हो रहा है?

"वांडरिंग थॉट्स आर ऑल डिसेप्टिव, सो आई ओनली ट्रीड द पाथ ऑफ विजडम"

"सभी भटकते विचार झूठ हैं, इसलिए मैं सिर्फ़ बोध के मार्ग पर चलता हूँ।"

एंड द पाथ ऑफ विजडम इज एक्चुअली द नॉन पाथ। (और बोध का मार्ग वास्तव में कोई मार्ग नहीं है।) क्योंकि जो भी पाथ होगा वो तो डिसेप्टिव ही होगा। जो भी पाथ होगा वो तो डिसेप्टिव ही होगा। व्हॉट इज द पाथ ऑफ विजडम? देयर इज नो पाथ। वो वही है—रेत पर पड़े हुए निशान। आप चल लिये तो दूसरों को ऐसा लग सकता है कि कोई रास्ता था जिस पर आप चले। पर वो रास्ता है नहीं जिस पर आप चले हैं।

श्रोता: ये जो वांडरिंग थॉट्स हैं, तो देट ऑलवेज विल बी देयर?

आचार्य: दे मे बी ऑलवेज देयर। ऑलवेज छोड़िए, दे मे बी देयर। ऑलवेज बहुत दूर की बात है। दे मे बी देयर। बट टू नो देट दे आर डिसेप्टिव, दिस इज ऑल। लेट् द थॉट बी देयर। यू रिटेन योर नेचर, डू लिव इन योर नेचर।

देखिए, जिस पर अभी आप पा रहे हैं कि कुछ कर नहीं पा रहे, मत करो वो। जो सहमति से हो रहा है अपनी, वो तो करो। शुरुआत तो वहीं से करोगे न, जहाँ बस है; जितना बस है उतना करा है क्या? द ऑनेस्ट क्वेश्चन इज, हेव आई डन ऑल देट आई कैन?

ये तो बहुत बाद का है कि व्हेदर दिस इज सफिसीयंट ऑर इनसफिसीयंट। फर्स्ट ऑफ ऑल द क्वेश्चन इज—एम आई डूइंग द एवरीथिंग व्हॉट ऑल आई कैन? देट इज द ऑनेस्ट क्वेश्चन एंड द ओनली रियल क्वेश्चन। एवरीथिंग एलसेस इज…

"डिसेप्टिव आर द टीचिंग्स ऑफ एक्सपीडियंट ट्रुथ, द फाइनल ट्रुथ इज देट ऑन व्हिच आई मैडिटेट"

सत्य की सभी विधियाँ आंशिक एवं भ्रामक हैं, इसलिए मैं पूर्ण सत्य में लीन रहता हूँ।

एक बार इसी कमरे में चर्चा हुई थी। हमारे पुराने सज्जन थे, तो उन्होंने कहा था सत्य कई तरह के होते हैं। कि 'सर, सच एक ही थोड़ी होता है, सच तो बहुत सारे होते हैं।' तो मिलारेपा का उत्तर है ये। एक्सपीडियंट ट्रुथ, आसान सत्य, कंविनियंट ट्रुथ। एक्सपीडियंसी समझते हैं न? देट व्हिच इज कंविनियंट , सुविधाजनक। मुझे उससे कोई लेना ही देना नहीं है जो सुविधाजनक सत्य है। मुझे सुविधाजनक सत्यों से कोई लेना-देना नहीं है। कि 'सर, ये भी तो एक सत्य है,' वो सज्जन यही कह रहे थे—परिवार है उनका, थोड़े ज़्यादा उम्रदराज थे—कि 'सर, ये भी तो एक सच है न कि वो हैं, मुझे उनकी देख-भाल करनी है, ये करना है, वो करना है। ये भी तो सच है।' तब भी कहा था सच कई नहीं होतें, सच एक ही होता है। ये जितनी एक्सपीडियंट चीज़ें हैं इनको सच नहीं कहा जाता।

पर मन तो हमारा भरा हुआ है, अभी हिंदी फ़िल्म कोई लगे उसमें आ जाए डॉयलोग—"और क्या ये सच नहीं है कि मैंने तुमसे प्यार किया है और क्या ये सच नहीं है कि मैंने तुम्हें ज़िंदगी दी है और मैंने तुम्हें बड़ा किया है?" तो आप कहोगे, हाँ सच तो है ही है, ये पूरा सच है। "और क्या ये सच नहीं है कि पिछले छः साल से मैं तुम्हारी बीवी हूँ?" नहीं है ये सच, बेटा। ये सब एक्सपीडियंट ट्रुथ हैं, इनमें सच कुछ नहीं है। हाँ, अदालत सच मान लेगी। तो अदालत तो अदालत है, तुम्हारी ही तो अदालत है, तुम्हीं ने तो बनायी है, जज तुम्हीं ने तो बैठाया है वहाँ, नहीं तो उसकी क्या औकात है। उस जज के पीछे से तुम अपनी सहमति खींच लो तो उसकी कोई औकात है क्या? किसी कोर्ट (अदालत) की कुछ औकात है अगर तुम उस जज के पीछे से अपनी सहमति खींच लो। उसको जज किसने बनाया? किसी और लोक से, कहीं किसी देवता का आशीर्वाद लेकर आया वो जज बनने? उसको जज किसने बनाया? किसने बनाया है? तुमने बनाया है। पर अपना तर्क देखना, तुम कहोगे, "देखो, अदालत कहती है तो सच होगा ही होगा।" और अदालत को किसने कहा कि ये सच है?

श्रोता: अब ये तो कांस्टीट्यूशन (संविधान) का काम है।

आचार्य: तुम्हीं ने तो उसको पूरा नियम-कायदा बनाकर दिया है जिसके आधार पर जज करता है; तो इसको जज किसने बनाया? तुमने। और ख़ुद तुम पलट के क्या ज़वाब देते हो? कि नहीं ये बात सच है, अदालत भी मानती है। ये कैसा तर्क है भाई! अदालत किसको सच मानेगी ये तय कर रहे हो तुम और तुम कह रहे हो अदालत मानती है इसलिए सच है।

"बुक्स रिटन इन ब्लैक इंक आर ऑल मिसलिडिंग, आई ओनली मैडिटेट ऑन द पिथ-इंस्ट्रक्शन ऑफ द व्हिस्पेअर्ड लिनिएज"

"काली स्याही से लिखी धर्म की सभी पुस्तकें भ्रमजनक हैं, इसीलिए मैं विशुद्ध धर्म के सार को सदैव ध्यान में रखता हूँ।"

पिथ-इंस्ट्रक्शन मतलब सूत्र वाक्य, पीथि , जो एक सूत्र रूप में कह दिया जाए। जिसमें बहुत कुछ बोलने की आवश्यकता न रहे। व्हिस्पेअर्ड लिनिएज — चिल्लाकर नहीं बोला, हल्का-सा फुसफुसा दिया बस। जिसको आम अर्थो में कहते हैं दीक्षा देना। कई बार गुरु शिष्य को दीक्षा भी ऐसे ही देते हैं, कान में आकर मंत्र बोल दिया। व्हिस्पेअर्ड लिनिएज — परम्परा चली आ रही है। धीरे से बोल दिया, वो जान गया, इशारा काफ़ी है। ए लिटिल बिट ऑफ नजिंग। ए लिटिल बिट ऑफ नजिंग। उतना बहुत है।

श्रोता: पहली लाइन (पंक्ति) है, बुक्स रिटन इन ब्लैक इंक आर ऑल मिसलिडिंग। ठीक है। वो एक्चुअल में शायद हमारी इंटरप्रटेशन (व्याख्या) पर ज़्यादा डिपेंड (निर्भर) करता है।

आचार्य: आपके इंटरप्रटेशन के अलावा वो बुक क्या है? उस बुक का अपना तो कोई सत्य है ही नहीं न। क्या बुक का अपना कोई सत्य है? बुक उस सत्य को जी रही है? तो बुक इंटरप्रटेशन के अलावा और क्या है? कृष्ण सत्य हो सकते हैं, गीता सत्य है क्या? नहीं, अंतर नहीं समझ में आ रहा? कृष्ण सत्य हैं, ही इज एम्बोडीडमेंट ऑफ ट्रुथ। गीता थोड़ी सत्य है? गीता तो काग़ज़ है। कृष्ण की तो बीइंग (अस्तित्व) सत्य है, गीता की बीइंग थोड़ी है कुछ। गीता की तो कोई बीइंग ही नहीं है। गीता तो किताब है।

श्रोता: ये लिखा है ऑल मिसलिडिंग।

आचार्य: मिसलिडिंग तो है ही। क्योंकि आप ही उसे पढ़ोगे, उसका अपना कोई सत्य नहीं है। कृष्ण का अपना एक सत्य है, गीता का अपना कोई सत्य नहीं है। गीता तो आपके इंटरप्रटेशन पर ही निर्भर है पूरे तरीक़े से। किताब कुछ ख़ास दे नहीं पाएगी।

श्रोता: सर, इसका मतलब गीता को तो कुछ जाना ही नहीं किसी ने पूरा, क्या है वो, सबके अपने-अपने इंटरप्रटेशन हैं?

आचार्य: कृष्ण के अलावा किसी ने नहीं।

श्रोता: फिर तो यूजलेस (अनुपयोगी) हो गया उसका होना।

आचार्य: उसका होना गवाही के तौर पर ही यूजफुल है और कुछ नहीं; और कुछ भी नहीं। मैंने कुछ जाना है और उसको मैं एक तरीक़े से व्यक्त करता हूँ। अभिव्यक्ति तो हमेशा मन से होती है। मैंने कुछ जाना है, मैं उसको अभिव्यक्त करता हूँ। कैसे अभिव्यक्त करता हूँ? मन से। कुछ उदाहरण देता हूँ, किन्हीं तरीक़ों से बोलता हूँ; ठीक है? गीता किन्हीं दूसरे तरीक़ों से बोलती है, बस यही मज़ा है गीता का, और कुछ नहीं।

गीता सिर्फ़ उसके काम की है—काम का अर्थ इतना ही है कि उसे आनंद देगी, मज़े देगी—जो पहले ही कृष्ण है। जो पहले ही कृष्ण है, गीता सिर्फ़ उसको मज़े देगी, कि वाह! लो एक और उदाहरण मिल गया, कुछ नया नहीं बताया है आज, न सरहपा ने, न मिलारेपा ने। कुछ नया नहीं बताया है। सिर्फ़ एक नई भाषा है तो एक आनंद आ रहा है। जो हमने जाना वो इन्होंने भी जाना, वाह! और क्या मज़ेदार उदाहरण दिया है; लो! कि स्टैंड्स ऑफ द ट्रुथ एंड टॉक्स अबाउट सेल्फ। अब उसमें कोई नई जानकारी नहीं है। पता है। जो तुम्हारी अनुभूति है वो मेरी भी है। मैं भी ऐसे ही जानता हूँ, बिलकुल ऐसे ही जानता हूँ।

पर जैसे तुमने कहा ऐसे ही मैंने कभी कहा नहीं है, ये जो कहना है ये मज़ेदार है। लोग कहते हैं कि "ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और," तो ये जो अंदाज़-ए-बयाँ है, बस यही मज़ेदार है। सत्य तो मेरा है, बयान तुम्हारा है, अंदाज़ तुम्हारा है। सत्य तो मेरा ही है, तुम सत्य नहीं दे सकते मुझे। तो मैं तुम्हें किसलिए पढ़ रहा हूँ? सिर्फ़ इस अंदाज़-ए-बयाँ के लिए।

श्रोता: अंदाज़-ए-बयाँ ज़्यादा बेहतर तरीक़े से स्वेलो (ग्रहण) किया जा सकता है इसीलिए अच्छा है।

आचार्य: स्वेलो , न कुछ; बस आनंद, मज़ा। बीइंग विथ देट, नॉट इवन यूटिलिटी। जस्ट द शीयर जॉय ऑफ बीइंग विथ इट। जस्ट द शीयर जॉय। जैसे कि आईने में अपनी ही ख़ूबसूरती देखकर मज़ा आ जाए। अपना ही प्रतिबिम्ब दिख रहा हो कि मेरे रब्बा! मैं ही तो हूँ, वाह! मज़ा आ गया, इतना सुंदर हूँ।

इसमें देखिएगा, जिस दिन आपको अपनी छवि दिखाई देगी न, उस दिन असली मज़ा आता है। उससे पहले तक तो विरोध भी रहेगा, रेजिस्टेंस भी रहेगा और सबकुछ होगा। मज़ा तभी आएगा जब ये बात तो मैंने भी जानी, दोज आर द मूवमेंट्स ऑफ रियल पल्सेशन; रियल एक्साईटमेंट। बिलकुल ध्यान रखिएगा, अगर आप पहले ही नहीं जानते होते तो कोई आपको जनवा सकता नहीं था। कोई आपकी मदद कर पाता है, कोई आपको जनवा देता है उसकी वज़ह बस इतनी है कि आप पहले ही जानते थे, उसका होना बस रेजोनेंस (स्पंदन) पैदा कर देता है। आप जानते पहले ही थे। उसका होना, जो जाना हुआ है, उसको शब्दों में प्रकट कर देता है। और कोई महत्त्व नहीं है किसी दूसरे का, न किसी किताब का, न किसी गुरु का। गुरु बस आपको पैदा नहीं कर देता है, जगा भर देता है। स्वभाव जो है आपका, जान भर जाते हो। उसी जानने को सहजता कहते हैं। ये जान लो न, सहज तो है।

"बर्थ एंड डेथ आर बोथ इल्यूजन, आई ऑब्जर्व बट द ट्रुथ ऑफ नो-एराइजिंग।"

जीवन और मृत्यु दोनों झूठ हैं, अतः मैं अटल सत्य का ध्यान करता हूँ।

जो आया है वो जाएगा भी। सत्य वो है जो नहीं आ रहा, जो प्रकट ही नहीं हो रहा, वही सत्य है। और उसी के साथ मैं रहता हूँ। जो कुछ भी उग रहा हो, जो कुछ भी आ रहा हो, वो समय के भीतर होगा, वो बाहर से प्रभावित भी होगा, वो अराइज कर रहा है। मेरे मन में ये बात आ रही है। एक कर्म हो रहा है, एक संबंध बन रहा है। ये सब जाएँगे, ये ख़त्म होंगे। बर्थ एंड डेथ का अर्थ इतना ही है कि मैं जान गया हूँ कि ये सब मानसिक है— बर्थ एंड डेथ।

अमरता का अर्थ ये बिलकुल भी नहीं है, बिलकुल-बिलकुल भी नहीं है—देखिए, उपनिषद् बहुत बार-बार, बार-बार—सच तो ये है कि उपनिषदों की अगर कोई केंद्रीय विषयवस्तु है तो वो है कि मौत का डर कैसे हटाएँ। लगातार बात होती है इसी पर कि — तुम निडर कैसे हो सको? तुम निडर कैसे हो सको? और इस मामले में वो बिलकुल अनूठे हैं। कोई और किताब मैंने तो नहीं पढ़ी जो डर को लेकर के इतनी उत्सुक हो—कि डर कैसे हटे? उपनिषद् लगातार इसी की बात करते हैं—कि निडर कैसे होना है? और जो सबसे बड़ा डर है, जो मूल डर है मौत का, वो कैसे हटाना है? एक उपनिषद् तो मौत को ही समर्पित है—कठोपनिषद; जिसमें यमराज से पूरा नचिकेता की बातचीत है। बाक़ी उपनिषदों में भी लगातार यही—द ग्रेट फियर, द ग्रेट फियर, उससे कैसे आगे बढ़े? मौत, मौत, मौत की चर्चा। और जिसको मौत समझनी है, उसको समझना पड़ेगा कि — बर्थ क्या है? आना क्या है? जाना क्या?

अमरता का मतलब ये नहीं है कि आप समय में स्थायी हो गए हैं, अब आप कभी मरोगे नहीं। अमरता का अर्थ इतना ही है कि समय मन में है और मैं समय से बाहर खड़ा हूँ। मृत्यु समय में होती है। मैं समय से बाहर खड़ा हूँ। मैं जानता हूँ। वरना देखिए मौत में कोई विशेष कुछ तो है नहीं, जैसे आप सोने जाते हो हमेशा, वैसे ही मौत है। वैसे ही मौत है। जब आप सोने जाते हो तो कोई गारंटी (आश्वस्ति) होती है कि आप दुबारा उठोगे? कुछ नहीं होती न। कुछ नही होती, सो जाते हो। वही मौत है और क्या है? उसके अलावा तो कुछ नहीं है, सोना ही तो एक है। सोने में भी कोई गारंटी नहीं है, मौत में भी कोई गारंटी नहीं है। मन की वही स्थिति है।

मौत में ख़ुद कुछ नहीं है, दिक़्क़त भय की मन के साथ है जो गारंटी माँगता है—मेरा क्या होगा, अब इसके बाद, अब इसके बाद, अब इसके बाद? इसीलिए जब आप सोने जाते हो तो घबराहट नहीं होती क्योंकि मन को झूठी ही सही गारंटी है कि उसके बाद उठूँगा। मौत की जो घटना है उसमें तो कोई दर्द है ही नहीं, वो तो सोने जैसा है। मौत की घटना में दर्द नहीं है—ध्यान दीजिएगा—दर्द है मन में कि शायद मैं इसके बाद उठूँगा नहीं। कोई वास्तविक दर्द है नहीं मौत में। अब आपको पटक-पटक के झींगा-लाला तरीक़े से मारा जाए तो अलग बात है कि वैसी मौत हो रही है। वरना मौत में कोई दर्द नहीं है।

श्रोता: फीयर ऑफ अननोन है?

आचार्य: सिक्योरिटी नहीं है बस वहाँ पर।

"द कॉमन माइंड इज इन एवरी वे मिसलिडिंग, एंड सो आई प्रैक्टिस हाउ टू एनिमेट अवेयरनेस।"

आम मनुष्य का मन हर रूप से भ्रान्तियों से भरा है, इसलिए मैं आम चेतना पर न चलकर, केवल जागरूकता के केंद्र पर विराजता हूँ।

मैं अवेयरनेस का ही मूर्तरूप बन जाऊँ— अवेयरनेस इन एक्शन। इसी को कहते हैं एनिमेट अवेयरनेस; अवेयरनेस इन एक्शन। अवेयरनेस जो अब सिर्फ़ एक एब्सट्रक्शन (अमूर्त) नहीं है। अवेयरनेस जो सिर्फ़ अब एक विचार नहीं है। उसने एक मूर्त रूप ले लिया है, प्रकट रूप ले लिया है, मेरे एक-एक कृत्य में दिखाई दे रही है— अवेयरनेस इन एक्शन।

"द कॉमन माइंड इज इन एवरी वे मिसलिडिंग।" ये कॉमन माइंड और नो माइंड का अंतर समझ लेना। हैं दोनों माइंड ही। यहाँ पर किसी सोल की बात नहीं हो रही है। दोनों मन हैं, उसी मन का जो शुद्धतम सिरा है जिसको तुम आत्मा बोल लोगे, सेल्फ बोल लोगे, उसी को नो माइंड कहते हैं। ठीक है? द माइंड होल्डिंग — ये मज़ाक़ है इनका, आप लोगों को कहना चाहिए था कि इतनी देर से तो हम हाउ टू, हाउ टू की बात कर रहे थे कि नहीं होना चाहिए। इससे पहले इन्होंने कहा, "सो आई प्रैक्टिस हाउ टू एनिमेट अवेयरनेस" और आगे बोलते हैं,

"द माइंड होल्डिंग प्रैक्टिस इज मिसलिडिंग एंड डिसेप्टिव, एंड सो आई रेस्ट इन द रीयल्म ऑफ रियलिटी।"

"मन को नियंत्रित करने की कोशिश भ्रामक और प्रवंचनशील है, अतः मैं मात्र सत्य में वास करता हूँ।"

ये बहुत मज़ेदार बात है कि जिन लोगों ने सहज मार्ग की बात करी उन्हीं लोगों ने इतनी विधियाँ निकाली, उन्होंने इतनी टेक्निक्स (तरकीब) निकाल ली, उसी सहजता में। जब कोई गड़बड़ करता है, भसड़ करता है, कहते हैं न गोरखधंधा कर रखा है। गोरखधंधा माने बहुत सारा, एकदम इतनी सारी कंफ्यूजन , वो गोरखनाथ से ही नाम आया है। वो सिद्ध हैं, उन्हीं से नाम आया है। उन्होंने इतने मेथड बताए, इतने मेथड बता दिए कि लोग कंफ्यूज हो गए। और फिर सारे मेथड क्या बोलते हैं? इट्स जस्ट सो सिंपल (ये एकदम सहज है)। (प्रतिभागी हँसते हुए)। इनकी कोई ज़रूरत नहीं है। सीधा ही है। और ये दोनों चीज़ें विरोधी नहीं हैं, एक ही हैं। जो सहज हो जाएगा वो पाएगा कि विधियाँ अपनेआप निकल-निकलकर आ रही हैं। 'हाउ टू' निकलता है सहजता से। 'हाउ टू' मत माँगो, सहजता माँगो, उससे 'हाउ टू' निकल आएगा। रास्ता बन रहा है चलने से। चलना पहले है, रास्ता बाद में है। मन क्या कहता है?

श्रोतागण: पहले रास्ता दो, उसके बाद चलेंगे।

आचार्य: हमने पहले भी चर्चा करी है मैडिटेशन टेक्निक्स कम फ्रॉम मैडिटेशन; मैडिटेशन डज नोट कम फ्रॉम टेक्निक्स। (विधियाँ ध्यान से आती हैं; ध्यान विधियों से नहीं आता), ये वही बात है। तुम्हें विधियाँ मिल जाएँगी। अभी तक लगातार बोला, विधि बेकार, विधि बेकार, 'हाउ टू' बेकार। 'हाउ टू' तुम्हें मिल जाएगा, पर वो 'हाउ टू' तुमको किसी विधि से नहीं मिलेगा। मैं दूसरे शब्दों में कहूँ तो देयर इज नो हाउ टू टू हाउ टू; देयर इज ओनली ए सहज 'हाउ टू'। सहज रहो उससे 'हाउ टू' निकल आएगा। और सबका 'हाउ टू' अलग होगा।

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