द सॉन्ग ऑफ द टवेल्व डिसेप्शंस। वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव; सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।
"संसार के सभी क्रियाकलाप तो मायारूपी हैं, अतः मैं सत्य की शरण में जाता हूँ।"
आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहीं से होती है—जो तुमने कहा न मैं जानवर हूँ—ये जानने से। शुरुआत वहीं से होती है कि ये जानवर-जानवर जैसा क्या लग रहा है? कि जैसे एक उकबहाट हो कि ये क्या जानवर-जानवर जैसा लग रहा है?
है तो नहीं, लग क्या रहा है? वही "वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।" और जहाँ ये प्रतीति हुई कि 'ये क्या पशुता-सी महसूस हो रही है, बैचेनी है इसमें,' बस हो गया, वहीं काम हो गया।
परमानेंट (स्थायी) नहीं हो गया। दिक़्क़त क्या है न कि तुम तलाश कर रही हो परमानेंट की। परमानेंट नहीं हो गया, उस क्षण के लिए हो गया। जिस क्षण में ये अहसास हो गया कि वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव, उस समय पर ये सीकिंग (खोज) भी नहीं है, यही ट्रुथ डिवाइन है। इसके अलावा और कोई डिवाइन ट्रुथ है क्या कि वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव? अब इसमें सीकिंग भी कहाँ बची? वर्ल्डली अफेयर्स आर आल डिसेप्टिव, जिसने ये जान लिया, अब उसे कुछ और सीक करना है क्या?







