भीतर अटूट ध्यान, बाहर परम खेल || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2018)

कबीर चतुराई अति घनी, हरी जपै हिरदय माही। सूरी ऊपर खेलना, गिरे तो ठाहर नाहीं।।
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: तो आचार्य जी सिर्फ़ पहली पंक्ति कुछ समझ आयी, लेकिन दूसरी पंक्ति समझ नहीं आयी।
आचार्य प्रशांत: वही तो मज़ेदार है। उसको काहे नहीं समझा?
कबीर चतुराई अति घनी, हरी जपै हिरदय माही। सूरी ऊपर खेलना, गिरे तो ठाहर नाहीं।।
~ संत कबीर
चतुराइयाँ तो हम खूब करते हैं। और अक्सर यह माना जाता है कि आध्यात्मिक आदमी ज़रा निरुपाय-सा हो जाता है, अति सरल हो जाता है। ऐसा समझ लिया जाता है ज्यों सद्बुद्धि व्यक्ति निरबुद्धि हो जाता हो। जैसे उसको अब किसी प्रकार की चाल, चतुराई से कोई मतलब ही न हो। बिलकुल भी नहीं।
समझा रहे हैं कबीर कि दुनिया तो सिर्फ़ चतुर है। तुम चतुरों में चतुर हो जाओ। दुनिया की चतुराई इसमें है कि वो छोटी-छोटी चीज़ो को मन में रखती है और उन्हें जपती रहती है। तो तुम बाज़ी मार ले जाओ न दुनिया से। दुनिया जप रही है?






