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Time Management

कम समय में पूरा काम कैसे करें?
Time Management
कम समय में पूरा काम कैसे करें?
25min
1.8kreads
217
25

समय तब कम पड़ता है, जब वह बेकार चीज़ों में जा रहा हो। मैनेजमेंट का एक सिद्धांत है — व्हाट इज़ इम्पॉर्टेंट, मस्ट बी मेज़र्ड। अगर आप वक़्त को क़ीमती मानते हो, तो उसे मेज़र करना सीखो। जब तक आप समय को साफ़-साफ़ नहीं नापोगे, तब तक यह नहीं जान पाओगे कि समय बर्बाद कहाँ हो रहा है। समय जहाँ-जहाँ बच सकता है, बचाओ। यदि उसे बर्बाद होने से बचा लिया, तो 24 घंटे में अच्छे कामों को करने के लिए समय की कोई कमी नहीं होगी।

खाली समय का कैसे उपयोग करें?
Time Management
खाली समय का कैसे उपयोग करें?
19min
7.2kreads
147
43

समय मिले तो उसे तत्काल किसी सार्थक काम में लगा दो। समय का एक पल भी अपने लिए बचा लिया, तो मरोगे। व्यक्तिगत समय के अलावा और कोई नर्क नहीं है। हमें बड़ा अच्छा लगता है बोलना, ‘थोड़ा Personal Time मिलना चाहिए न।’ तुम्हारी ज़िंदगी के सब झंझट Personal Time में ही पैदा हुए थे। ये सज़ा मिली है समय चुराने की, कि आज सौ झंझटों से घिरे हुए हो।

जीवन में अगर कई चीज़ें आकर्षित करती हों || आचार्य प्रशांत (2020)
Confusion
जीवन में अगर कई चीज़ें आकर्षित करती हों || आचार्य प्रशांत (2020)
27min
501reads
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आचार्य प्रशांत: पूछते हैं कि युवा हूँ और अपने जीवन में कई अलग-अलग पहलुओं को पाता हूँ। फिर इनके जीवन में वो अलग अलग पहलू क्या है, उसकी छोटी सी सूची दी है। तो एक पहलू है पढ़ाई और कैरियर का। अगला है गर्लफ्रेंड और प्रेम प्रसंगों का। फिर अगला…

(गीता-30) जिनका मन बहुत भागता हो, वे ध्यान से सुनें || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2023)
Bhagavad Gita
(गीता-30) जिनका मन बहुत भागता हो, वे ध्यान से सुनें || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2023)
43min
652reads
14
3

एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।

इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।

~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३

आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…

Beasts with Ballistic Missiles || Acharya Prashant (2022)
Values
Beasts with Ballistic Missiles || Acharya Prashant (2022)
9min
345reads
8
2

Questioner (Q): One of the things I found really relevant post-Covid is a lot of violent crimes that have happened. I am speaking about the United States, where we had a classroom of school students that were shot. A gunman came in and killed many people, including kids.

There are…

Excerpts from Articles
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
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बाबा नहीं, यार आया है - मंतर नहीं, मिरर लाया है
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
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जो खुद आज़ाद नहीं, वह लोकतंत्र को मजबूत कैसे करेगा?
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
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सपने, सरकारी नौकरी और पेंशन: जवानी किसके लिए है?
सपनों और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए युवा अक्सर अपनी वास्तविक क्षमता, रुचि और वर्तमान चुनौतियों को देखना भूल जाते हैं। आईआईटी, यूपीएससी, सरकारी नौकरी और पेंशन को जीवन का लक्ष्य मान लेने के बजाय ज़रूरी है आत्मज्ञान—ख़ुद को ईमानदारी से परखना। जवानी भविष्य की सुरक्षा की चिंता में नहीं, आज की वास्तविक चुनौतियों से जूझने और सार्थक कर्म में लगनी चाहिए।
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प्रूफ नहीं है, तो मानें क्यों?
अंधविश्वास या किसी दावे को केवल किताबों, परंपराओं या बड़ी-बड़ी हस्तियों के कहने से नहीं मानना चाहिए। भौतिक जगत से जुड़े हर दावे के लिए प्रमाण माँगना आवश्यक है। जो बात जाँची-परखी जा सकती है, उसे तर्क, प्रयोग और उपकरणों से जाना जाए; बिना जाने नहीं माना जाए। सच्ची जिज्ञासा वही है जो हर दावे के सामने प्रश्नचिह्न रखे और प्रमाण मिलने पर ही स्वीकार करे।
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रक्षाबंधन: वो रक्षा माँग रही है - ज़रा सुनिए
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।
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अंधविश्वास असल में झूठ को स्वीकृति पाने की चाह है
एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।
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शादी या लिव-इन: आज़ादी किसमें है?
सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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जवान हो, नाराज़ हो? देश बदलना चाहते हो? तो सुनो ये बात
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
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आप दुखी नहीं… आपको दुख में मज़ा आता है!
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
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काश! मुझे थोड़ा समय और मिल जाता ('Time Management', 'Work-Life Balance') || आचार्य प्रशांत (2023)
Time Management
काश! मुझे थोड़ा समय और मिल जाता ('Time Management', 'Work-Life Balance') || आचार्य प्रशांत (2023)
20min
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1

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न टाइम मैनेजमेंट (समय प्रबंधन) को लेकर है और उसका जो एक छोटा भाई आता है वह है वर्क लाइफ़ बैलेंस (कार्य संतुलन)। तो कॉर्पोरेट और एकेडमिक दुनिया में यह बहुत चलता है कि टाइम मैनेज करो। इसका कोर्स भी होता है कि एक्सेल शीट…

उमरिया धोखे में बीत गयो रे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2017)
Time
उमरिया धोखे में बीत गयो रे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2017)
8min
902reads
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पाँच बरस का भोला-भाला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश विदेश गयो।। उमर सब धोखे में खो दियो रे। चालिस बरस अन्त अब लागे, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो। लड़का…

शरीर का सही इस्तेमाल || नीम लड्डू
Soul
शरीर का सही इस्तेमाल || नीम लड्डू
1min
327reads
6
1

समय तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि समय से आगे जा सको। शरीर तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि शरीर से आगे जा सको। शरीर इसलिए नहीं दिया गया है कि शरीर ही को बचाए पड़े हो, “और दो-सौ साल जिएँगे!” जाते-जाते अपना थोड़ा सा अंश छोड़ गए कि, “इसकी …

यूँ ही मत बिताओ ज़िन्दगी || नीम लड्डू
Values
यूँ ही मत बिताओ ज़िन्दगी || नीम लड्डू
1min
209reads
1

जितनी ज़िन्दगी जी चुके हैं ये देखा है कैसे पालक झपकते बीत गयी है? अभी स्कूल में थे, कॉलेज में थे, और अभी बच्चे थे आप, यूँ ही मैदान में, गलियों में दौड़-भाग रहे थे। अभी-अभी! ये जो समय बीता है ये कैसे बीता है? ये चुटकी बजाते बीता है।…

बेरोज़गार क्यों बैठे हो?  || नीम लड्डू
Women Empowerment
बेरोज़गार क्यों बैठे हो? || नीम लड्डू
2min
433reads
3

जब तुम अपने-आप को बेरोज़गार कहना शुरू कर देते हो, आंतरिक पतन होने लगता है। और वैसे ही पतन होने लगता है उन गृहणियों का जिनके ऊपर अब गृहस्थी की कोई खास ज़िम्मेदारी नहीं है, फिर भी वह घर पर ही बैठी हुई हैं।

मैं समझ सकता हूँ आप काम…

बस एक बात से डरो || नीम लड्डू
Fear
बस एक बात से डरो || नीम लड्डू
1min
378reads
13
3

ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…

ज़्यादा सोने की आदत है? || नीम लड्डू
Laziness
ज़्यादा सोने की आदत है? || नीम लड्डू
1min
813reads
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कुछ साल मिले हैं जगने के लिए, उसके बाद तो खूब सोना है। तो यह तुम कैसे आदत अभी पाले हुए हो कि, “ज़रा और सो लें एक घण्टा, दो घण्टा”?

भीतर एक चेतना होनी चाहिए, लगातार एक गूंज होनी चाहिए कि, “लंबे पाँव पसार कर के अनंत समय के…

खाली समय में क्या कर रहे हो? || नीम लड्डू
Self Enquiry
खाली समय में क्या कर रहे हो? || नीम लड्डू
1min
471reads
4

खाली समय मिला है तो क्या करना है? “चल न! मोहल्ला घूम कर आते हैं, बाज़ार देखकर आते हैं”, या कहीं नहीं जाना तो, “चल न, टीवी देखते हैं।“ ख़ुद को नहीं देखना है!

अपनी हालत क्या है, उससे बिलकुल बचकर रहना है। अपनी हालत का कुछ पता नहीं, टीवी…

कितना कीमती है तुम्हारा समय? || नीम लड्डू
Values
कितना कीमती है तुम्हारा समय? || नीम लड्डू
2min
459reads
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तुम वही हो न जो रात में टिकटॉक पर बैठते हो और दो घण्टे लगा देते हो सोने से पहले? ये तुम्हारे समय की कीमत है! तुम्हारे समय की कीमत होती, तो तुम सोशल मीडिया पर इतना समय कैसे लगा रहे होते? तुम्हारे समय की कीमत होती तो तुम अपने…

उदासी में क्यों जिए जा रहे हो? || नीम लड्डू
Fear
उदासी में क्यों जिए जा रहे हो? || नीम लड्डू
1min
316reads
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एक ज़िंदगी है, दबे-दबे जीने में क्या मज़ा है भाई? तुम किस चीज़ को सुरक्षित कर रहे हो? जीवन माने समय ही तो होता है न? डरे-डरे समय बिता रहे हो, तो तुमने सुरक्षित किस चीज़ को रख लिया है? समय डर में बिता दिया तो तुमने बचा क्या लिया?…

समय, साधना और सुरति || आचार्य प्रशांत, गुरु नानकदेव पर (2014)
Time Management
समय, साधना और सुरति || आचार्य प्रशांत, गुरु नानकदेव पर (2014)
20min
534reads
8

वक्ता: खिंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति|

मौत को हमेशा याद रखो| मौत की स्मृति को ऐसे पहनो, जैसे तुम अपना पैबंद लगा लिबास पहनते हो| अपने कुंवारेपन को, लिये-लिये जियो| वही रास्ता है तुम्हारा| रास्ते पर चलने का सहारा, जो डंडा लेकर के चलते हो, रास्ते पर चलने…

अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
अहं अगनि हिरदै जरै॥ आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
9min
364reads
11

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥

~ कबीर साहब

वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
Values
फ़ालतू खर्च छोड़िए, अपनी ज़िंदगी पर खर्च करना सीखिए
48min
997reads
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आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
Money
घटिया फ़िल्में देखने वालों || नीम लड्डू
1min
858reads
16
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एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

क्या सारे गुरु-ग्रंथ व्यर्थ हैं?
Saint Kabir
क्या सारे गुरु-ग्रंथ व्यर्थ हैं?
8min
592reads
152
1

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।

किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
Goal
किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
10min
641reads
39
9

बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।

विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
Mind
विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
9min
3.1kreads
143
50

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
Dreams
सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
7min
2.3kreads
63
30

आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।

सिखाने वालों से सीखो, चिपको नहीं ll आचार्य प्रशांत (2017)
Truth
सिखाने वालों से सीखो, चिपको नहीं ll आचार्य प्रशांत (2017)
5min
4.7kreads
290
44

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?

आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

पैसे और भविष्य की चिंता
Money
पैसे और भविष्य की चिंता
10min
6.7kreads
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शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।

अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
Success
अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
12min
2.2kreads
127
18

तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।

अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
Money
अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
16min
4.4kreads
96
34

आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।

हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!
Success
हर बार असफल क्यों हो जाते है? असली कारण जानें!
7min
1.5kreads
31
8

जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।

पैसा कितना ज़रूरी है?
Money
पैसा कितना ज़रूरी है?
7min
3.1kreads
136
27

वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।

माया जो राम से मिला दे
Saint Kabir
माया जो राम से मिला दे
15min
4.6kreads
182
73

मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।

अच्छी आदतें
Mind
अच्छी आदतें
7min
4.1kreads
263
52

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

क्या गीता व्यावहारिक जगत की भी समझ देती है?
Success
क्या गीता व्यावहारिक जगत की भी समझ देती है?
23min
2.7kreads
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श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।

सचमुच इतने मजबूर हो कि सुधर नहीं सकते?
Self Enquiry
सचमुच इतने मजबूर हो कि सुधर नहीं सकते?
22min
2.1kreads
174
16

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

जिज्ञासा स्वास्थ्य है और मान लेना रोग
Mind
जिज्ञासा स्वास्थ्य है और मान लेना रोग
17min
803reads
27
6

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

भविष्य का डर रहता है, पैसा बचाना कितना ज़रूरी है?
Money
भविष्य का डर रहता है, पैसा बचाना कितना ज़रूरी है?
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शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।

बड़ा मकान और महँगी शादी
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बड़ा मकान और महँगी शादी
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दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।

कबीर साहब: संत भी, सूरमा भी
Saint Kabir
कबीर साहब: संत भी, सूरमा भी
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सिद्धांत के तल पर ज्ञान देना बहुत आसान है, पर कबीर साहब जब तक उस ज्ञान को ज़िन्दगी बनता नहीं देख लेते, छोड़ते नहीं हैं। पाखंड पर जितनी चोट संत कबीर ने की है, उतनी शायद ही किसी ने की हो। वे संत-शिरोमणि इसीलिए कहे जाते हैं, क्योंकि मजाल है कि उनकी ज़ुबान सच बोलने में काँप गई हो। जानवर की ख़ातिर अपनी जान को दाँव पर लगाने का काम कबीर साहब के अलावा किसी ने नहीं किया है। ये वो जगह है जहाँ पर संत और सूरमा में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।

पैसा नहीं कमाया तो दोस्त छूटने लगे?
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पैसा नहीं कमाया तो दोस्त छूटने लगे?
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अपने साथ जो चले — जानने वालों ने उसको बस एक नाम दिया है। बोले तुम्हारे साथ जो चले वो वो भी नहीं हो सकता जो तुम्हारे बगल में खड़ा हो। जो तुम्हारे साथ हमेशा चले वो सेल्फ होता है — तुम ही सिर्फ़ अपने साथ चल सकते हो। तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।

अमीरों को देखता हूँ तो ख़ुद से नफ़रत होती है
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अमीरों को देखता हूँ तो ख़ुद से नफ़रत होती है
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ये रुपए पैसे का खेल ये आदमी द्वारा आदमी का शोषण। ये एक आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो अमीर हूँ और दूसरे आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो गरीब हूँ। तुम्हें ये सारा खेल समझ में आएगा कि ये कैसे चल रहा है। खेल के शिकार मत बनो, खेल के खिलाड़ी मत बनो। थोड़ा सा बाहर निकलो और इस खेल के दृष्टा बनो। ये खेल ऐसा है कि जो इसे खेलने लग जाते हैं उन्हें ये खेल कभी समझ में नहीं आता। ये खेल उन्हें खा जाता है, इस खेल को वही समझ सकता है जो इस खेल से थोड़ा बाहर आ गया है।

जीवन को समृद्ध कैसे बनाएँ?
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जीवन को समृद्ध कैसे बनाएँ?
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दो ही चीज़ें होती हैं जो जीवन को समृद्ध करती हैं — तन के लिए व्यायाम, मन के लिए अध्यात्म। युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, विराट हृदय और दुनिया की समझ। दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने की हैं; क्रांति का मतलब एक नया सृजन होता है। वो जवानी जो पढ़ती नहीं, लिखती नहीं, जो अपने आप को बोध से भरती नहीं — वो जवानी व्यर्थ ही जा रही है।

क्रिकेट हो या जीवन, जीतने के लिए ही मत खेलो
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क्रिकेट हो या जीवन, जीतने के लिए ही मत खेलो
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जीतने के लिए मत खेलो। तुम खेलो वो सर्वश्रेष्ठ करने के लिए, जो तुम कर सकते हो। और जो सर्वश्रेष्ठ तुम कर सकते हो, वो जीतने से ज़्यादा ऊपर की बात है। परिणाम की चिंता न करते हुए, प्रतिपक्षी की चिंता न करते हुए, जीवन के हर मैदान में, तुम अपना सर्वश्रेष्ठ करो। खिलाड़ी का धर्म है कि वो लगातार उत्कृष्टता की ही पूजा करे। चाहे क्रिकेट का मैदान हो, चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।

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साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

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कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।

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सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि आपने अपने लक्ष्य की ओर कदम किन चुनौतियों का सामना करते हुए बढ़ाया है। आपके सामने कठिनाइयाँ क्या थीं, और किन मुश्किलों के खिलाफ़ आपने अपनी यात्रा की है, यही तय करेगा कि आप सफल हैं या असफल। अपने आप से यही पूछो—‘जो कुछ मैंने पाया है, कितनी चुनौतियों को हराकर पाया है?’ अगर बिना किसी चुनौती के पा लिया है, तो वह व्यर्थ है, क्योंकि परिस्थितिवश मिली चीज़ें सफलता नहीं, महज़ संयोग हैं।

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हमारे लक्ष्य हमारे नहीं होते इसीलिए हमारे कोई लक्ष्य पूरे नहीं होते। किसी भी लक्ष्य की ज़िम्मेदारी तुम तभी उठा पाओगे जब वो तुम्हारे ह्रदय से आया हो। जो तुम्हारे ह्रदय से नहीं आया उसकी ज़िम्मेदारी उठाओगे तो बोझ लगेगी। सही लक्ष्य प्रेम प्रसंग की तरह होता है, वो पकड़ लेता है। आप उसे छोड़ना चाहोगे, पर वो आपको नहीं छोड़ेगा। खुद को देखो, अपनी हालत देखो और दर्पण जैसे लोगों के साथ समय गुज़ारो, फिर सही लक्ष्य निर्धारित कर पाओगे और समर्पित रह पाओगे।

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यमराज तो यमराज ठहरे। हमारे स्वार्थों और हमारी भावनाओं से क्या लेना देना? तो वह पहली बात यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्रेय और प्रेय आपस में अलग-अलग हैं। या तो यह पकड़ लो या यह पकड़ लो। यह दो नावों पर तुम एक साथ सवारी नहीं कर पाओगे। अपनी चालाकियां अपनी जेब में रखो। दुनिया भी ना छूटे और दिलदार भी मिल जाए, ऐसा नहीं होगा। जो दिलदार दुनिया छोड़े बिना मिल जाए वो दुनिया की ही धूल होता है। वहां फिर दिल जैसा कुछ होता भी नहीं। यह किसी की फिजूल जिद नहीं है कि दो में से एक ही मिल सकता है। यह अस्तित्व का एक साधारण नियम है।

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साहब नज़र रखना, मौला नज़र रखना तेरा करम सबको मिले, सबकी फ़िक्र रखना न आदमी की आदमी झेले गुलामियाँ, न आदमी से आदमी मांगे सलामियाँ जो फ़र्क पैदा हो रहे, वो फ़र्क गर्क हों सबको बराबर बाँट, ये धरती ये आसमान कोई भी न हो दर्द में, सबकी ख़बर रखना…

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देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।

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जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

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जो जगेगा, वही रोएगा क्योंकि संसार बड़ी पीड़ा में है। और जो जगता है, संसार की पीड़ा अपने ऊपर ले लेता है। संतों का रोना संत की करुणा की अभिव्यक्ति है। वो तुम्हारे लिए रोते हैं, वो अपने लिए नहीं रोते। दस लोग सो रहे हैं और घर में आग लग गई है। उन दस में से एक जगा हुआ है, तनाव किसे रहेगा? एक जगे हुए आदमी को ना! जो जग जाता है, वह शिव की तरह संसार के विष को ग्रहण करता है।

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