जो चाहते हैं, वह हो नहीं रहा। जो नहीं चाहते, उसके हो जाने का डर है। जो प्यारा है, उसे जाने से कैसे रोकें? ऐसे हम रोज़ मरते हैं, शरीर की मौत से पहले सौ बार। वजह एक है: हमने अपने मकान की नींव नदी में बहते पत्थर पर रखी है। ‘मैं’ अकेला जी नहीं सकता, उसे हर बार कोई विषय चाहिए, और हर विषय बह रहा है। कबीर साहब कहते हैं, “एक कबीरा ना मरे, जाके राम आधार।” दीवाली राम का पर्व है। क्या हम देख रहे हैं कि इसे किस आधार पर मना रहे हैं?
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[दीवाली पर, कबीर साहब की साखियों के माध्यम से श्रीराम पर एक सत्र से, 2021]
आचार्य प्रशांत: राम के मर्म पर चर्चा। राम जो प्रकृति का कोई विशेष तत्व नहीं है। जो हमारे मन या दृष्टि का या हमारे श्रवण का कोई विषय नहीं है। राम जो सगुण तो नहीं ही हैं पर जिन्हें यदि निर्गुण भी बोल दिया तो हमने अपने बचने का इंतज़ाम कर लिया। सगुण कहने वाले भी हम ही, निर्गुण कहने वाले भी हम ही। अगर निर्गुण भी कह रहे हैं तो हम तो बचे ही रह गए ना। हम अगर बचे रह गए तो राम पूर्ण नहीं हुए। क्योंकि पूर्ण के समक्ष कोई दूसरी सत्ता बची नहीं रह सकती। पूर्ण एक है, अनंत और असंग है।
तो संत कबीर के राम सगुण तो नहीं ही हैं, निर्गुण भी नहीं हैं। वो बस न्यारे हैं। “राम निरंजन न्यारा रे।” न्यारा माने तुम जो कुछ कह सकते हो, सबसे अलग। सगुण कहो तो सगुण से अलग और निर्गुण कहो तो निर्गुण से भी अलग। ना सगुण है ना निर्गुण है, इसका अर्थ यह न लगा लें कि वो सगुण और निर्गुण के मध्य में कहीं हैं या कभी सगुण हैं या कभी निर्गुण हैं। या भक्त की आस्था के अनुसार सगुण हैं या निर्गुण हैं। नहीं, प्रश्न आपकी आस्था का नहीं, आपके अस्तित्व का है। आपके अस्तित्व का नाम ही अहंता है। आप यदि बचे हुए हैं अपनी आस्था अनुसार कभी उनको सगुण कहने के लिए, कभी निर्गुण कहने के लिए तो अभी आप राम से, राम के तत्व और मर्म से बहुत दूर हैं।


![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)



