
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम मधुर है। मैं बीएससी फिज़िक्स ओनर का फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट हूँ। आचार्य जी, जैसे मैंने कॉलेज ज्वाइन किया तो मैंने अपने आप को कई विषयों से घिरा हुआ पाया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कैसे इनको टैकल करूँ और किस तरीक़े से इनको वरियता दूँ। तो आचार्य जी मेरा सवाल है कि किस मूल बात को केंद्र में रखकर मैं विषयों को वरियता दूँ, ताकि अपनी कॉलेज की ज़िन्दगी का मैं सबसे उच्चतम इस्तेमाल कर सकूँ।
आचार्य प्रशांत: कैसे विषय? कौन सी चीज़ें हैं जो कॉलेज में आ गई हैं और उसमें तुम वरियता नहीं दे पा रहे हो, माने प्रायोरिटाइज़ नहीं कर पा रहे हो। उदाहरण दो।
प्रश्नकर्ता: जैसे सर सोसाइटीज़ में पार्टिसिपेट करना या किसी कंपटीशन में पार्टिसिपेट करना, तो उसमें सर मैं कन्फ्यूज़ हो जाता हूँ कि किस में करूँ या किसको छोड़ूँ किसको ज़्यादा वरियता दूँ।
आचार्य प्रशांत: उसमें कन्फ्यूज़न क्या है? जहाँ कहीं भी अपनी रुचि है और थोड़ी स्किल है, कुशलता है तो वहाँ जाना चाहिए। और इनके इवेंट्स इतने ज़्यादा तो होते नहीं है कि एक-एक दिन में दो-दो हो रहे हैं, और एक ही समय पर हो रहे हैं, ओवरलैपिंग हैं कि चुनना पड़े कि ये करूँ, कि ये करूँ। तो समस्या कहाँ पर आती है?
अब बहुत सारी सोसाइटीज़ होती हैं। कोई भी ऐसा नहीं होता स्टूडेंट जो सारी ही सोसाइटीज़ में उत्सुक हो या कि उसकी वो क्षमता या पात्रता भी रखता हो। हमारे यहाँ पर तो मतलब ड्रामैटिक्स, फोटोग्राफ़ी, राइटिंग, डांसिंग कितने ही सारे फिल्म सोसाइटी, लेक्चर सीरीज़ ना जाने कितने तरह के क्लब्स होते थे। आईआईटी की बात कर रहा हूँ, वहाँ बीआरसीए होता था (बोर्ड फॉर रिक्रीएशनल एंड कल्चरल एक्टिविटीज़)। लेकिन ऐसा तो कोई भी नहीं था जो 13 में से 13, या 13 में से सात आठ क्लब्स में भी सक्रिय हो।
ये तो हमें ख़ुद ही पता होता है ना कि कहाँ पर मेरी क्षमता है, मैं वहीं पर तो जाऊँगा। मैं चाहता हूँ कि तुम साफ़-साफ़ उंगली रखो कि कहाँ फँस जाते हो।
प्रश्नकर्ता: सर मैं सोसाइटीज़ के बीच में ही और लेक्चर्स के बीच में जैसे डिसाइड नहीं कर पाता।
आचार्य प्रशांत: पर जो सोसाइटीज़ का काम होता है वो आमतौर पर लेक्चर के समय में तो होता ही नहीं है। लेक्चर्स दिन में होते हैं और ये जो क्लब्स और सोसाइटीज़ हैं, ये दोपहर बाद या कि शाम को या कि जो हॉस्टल के स्टूडेंट्स हैं, उनके लिए रात को सक्रिय होती हैं। ऐसा तो शायद कॉलेज भी अलाउ नहीं करता होगा कि लेक्चर के समय पर ही सोसाइटी का इवेंट भी चल रहा है। ऐसा तो नहीं होता होगा। होता है?
प्रश्नकर्ता: नहीं ज़्यादातर टाइम तो सर…
आचार्य प्रशांत: जब नहीं होता है तो फिर प्रायोरिटाइज़ करने की बात कहाँ आई? दोनों कर लो। ऐसे ही करते थे, सुबह 8:00 से ले शाम 5:00 तक जो इंस्टट्यूट बिल्डिंग थी वहाँ रहते थे। और उसके बाद लौट कर आते थे जल्दी से कुछ खाया पिया और फिर 6:00 बजे से जो इवेंट्स होते थे अलग-अलग क्लब्स के, उनको भी कर लेते थे। उसके बाद कभी मन किया तो रात में मूवी देखने भी चले जाते थे, उसके बाद वापस आकर के अगले दिन के लिए जो भी असाइनमेंट्स वग़ैरह थे वो थोड़ा बहुत करा, थोड़ी बहुत नींद ले ली। अभी तक मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ, कहाँ फँस रहे हो? देखो समय बहुत होता है, 24 घंटे बहुत होते हैं।
तुम मुद्दा अच्छा लेके आए हो प्रायोरिटाइज़ेशन का। पर असली जो चीज़ प्रायोरिटाइज़ होनी चाहिए, और जो एक चीज़ है जो प्रायोरिटाइज़ बिल्कुल नहीं होनी चाहिए शायद आप उसकी बात कर नहीं रहे हो। 24 घंटे कम नहीं पड़ते हैं। समय तब कम पड़ता है, जब समय बहुत सारी बिल्कुल बेकार की चीज़ों में जा रहा हो। अब मैं ये करूँ कि मैं अपना बहुत सारा समय तो बिल्कुल फ़िज़ूल कामों में लगाता रहूँ, तो उस कारण मेरे पास समय बचा ही कितना? बहुत थोड़ा सा। और मैं कहूँ कि अब ये थोड़ा सा समय मुझे बताइए कि मैं प्रायोरिटाइज़ कैसे करूँ? तो ये तो सवाल ही थोड़ा गड़बड़ हो गया ना।
पहली प्रायोरिटी तो ये होनी चाहिए थी, कि जो समय व्यर्थ जा रहा है, फ़िज़ूल जा रहा है, उसको बर्बाद नहीं होने देना है। और अगर वो पहली प्रायोरिटी आप पूरी कर लें, तो फिर आप पाओगे कि इस 24 घंटे में बहुत सारे अच्छे सकारात्मक कामों के लिए, सार्थक चीज़ों के लिए आपके पास वक़्त की कोई कमी नहीं है।
बहुत होते हैं 24 घंटे और अगर हम बिल्कुल निष्पक्ष होकर के देखें तो पता ये चलता है कि, हम सब साधारण लोग आम आदमी, हम अपने 24 घंटों में — जो हमें फिर सोने और दिन भर के साधारण कामों के अलावा मान लो आपको 14 घंटे मिलते हैं। इन 14 घंटों में से हम 4 घंटे से ज़्यादा का सही इस्तेमाल नहीं करते हैं, बाकी समय व्यर्थ ही जाता है। और वो आपको तब तक पता नहीं चलेगा जब तक आप उसको साफ़-साफ़ नापोगे नहीं।
मैनेजमेंट का एक सिद्धांत होता है कि, व्हाट इज़ इम्पॉर्टेंट मस्ट बी मेजर्ड एंड इफ समथिंग इज नॉट बीइंग मेजर्ड देन इट इज नॉट इम्पॉर्टेंट ऐट ऑल। आप अगर अपने वक़्त को कीमती मानते हो ना तो उसको साफ़-साफ़ मेज़र करना सीखो — आँकड़ों में, न्यूमेरिकली। मेरा समय सचमुच जाता कहाँ है? और नतीजा आपको चौंका देगा। आप पाओगे कि जो 14 घंटे दिन में हमें मिलते हैं कि भाई अब इसमें काम करो, खाने पीने, सोने, नहाने धोने के अलावा 14 घंटे तो मिल जाते होंगे ना? तो ये जो 14 घंटे मिलते हैं। इस 14 घंटे में आप पाओगे कि 4 घंटे, 5 घंटे इतने ही निकल रहे हैं जिनका कोई सार्थक सदुपयोग हो रहा है। बाकी सारा समय कहीं गॉसिप में जा रहा है, कहीं बैठे-बैठे फालतू सोचने में जा रहा है, कहीं स्क्रॉलिंग में जा रहा है।
तो सवाल ही फिर दूसरा पूछना चाहिए ना, सवाल हमें ये नहीं पूछना चाहिए कि, मेरे पास तो चार ही घंटे हैं — मैं इस 4 घंटे में लेक्चर्स भी कैसे अटेंड करूँ? स्पोर्ट्स भी कैसे करूँ? सोसाइटीज़ का काम भी कैसे करूँ? और अपनी रीडिंग भी कैसे करूँ? और ये कैसे करूँ? और सोशलाइज़ कैसे करूँ? हम सवाल ये पूछ रहे हैं। क्या सवाल ये नहीं होना चाहिए कि मेरे पास सिर्फ़ चार ही घंटे क्यों हैं? क्या सवाल ये नहीं होना चाहिए कि, मेरा समय वाकई बर्बाद कहाँ हो रहा है? और वो आपको मैं कह रहा हूँ तब तक नहीं पता चलेगा जब तक आप उसको लिखोगे नहीं, नापोगे नहीं, मेज़र नहीं करोगे। नहीं तो सबको ये लगता रहता है कि मैंने तो काम का सही उपयोग किया।
इसी तरीक़े से एक और सिद्धांत होता है वर्क एक्सपेंड्स इटसेल्फ अकॉर्डिंग टू द टाइम अवेलेबल कोई काम है आपने तीन घंटे में करा, आपको लगेगा देखा तीन घंटे तो मेरे लग गए ना इस काम में, माने ये इन तीन घंटों का सही इस्तेमाल हो गया। हक़ीक़त ये है कि वो काम शायद 20 मिनट में भी निपट सकता था, और अगर आपके पास 20 मिनट ही होते तो आप पाते कि 20 मिनट में निपट भी गया है। ऐसा किस-किस ने अनुभव करा है? मैंने तो खूब करा है।
तो हम अपने आप को धोखे में भी खूब रख लेते हैं। हम बोलते हैं 3 घंटे काम करा, और वो काम है सचमुच कितना बड़ा? वो 20 मिनट लायक ही काम है। तो इसलिए मैं कह रहा हूँ कि जब हम थोड़ा निर्मम हो कर रूथलेसली अपने समय के व्यय को एक्सपेंडिचर को नापते हैं, तब हमें पता चलता है कि जिसको मैं कह रहा हूँ कि 14 घंटे का दिन था मेरा, वो 14 घंटे का नहीं था साहब वो 4 घंटे का ही था। और ये भी हो सकता है कि मैं बहुत उदार होकर 4 घंटे बोल रहा हूँ, कई लोगों का दिन आधे घंटे का होता है। 13.5 घंटे उन्होंने बर्बाद करे होते हैं।
और एक बात और समझिएगा जितना ज़्यादा आप समय बर्बाद करते हो ना, वो बर्बादी बस एक दिन की आदत नहीं रहती वो आदत आगे तक जाती है। आज अगर आपने दिन ऐसा जिया जिसमें 14 में से 10 घंटे खराब किए, और फिर कल वैसा ही जिया जिसमें 8, 10, 12 घंटे खराब करे 14 में से। हफ्ते भर आपने ऐसा कर लिया हफ्ते के बाद आप सुधारना चाहेंगे आसान नहीं होगा। क्योंकि क्या बन गई है अब? — आदत बन गई है। और जब आदत बन जाती है ना तो हम भीतर से बड़े चतुर चालाक होते हैं, हम कभी ये नहीं कहते कि मैं तो समय बर्बाद करने वाला प्राणी हूँ। हम कहते हैं इन कामों में तो समय लगता ही इतना है।
हम जिस ढर्रे पर चल रहे होते हैं, जो हमारा टाइम को खर्च करने का, टाइम को स्पेंड करने का पैटर्न बन गया होता है — हम उस के पक्ष में कुछ तर्क निकाल लेते हैं। कहते हैं, नहीं इसमें तो इतना समय लगता ही है ना, नहीं अभी मन नहीं कर रहा, नहीं मैं क्या करूँ? एक बंदा कितने काम कर सकता है, मेरे साथ वाले भी तो इतना कम काम ही करते हैं ना तो मैं क्यों करूँ? कई तरह के आप भीतर से आर्गुमेंट्स तर्क निकाल लोगे अगर आपकी आदत बन गई है समय खराब करने की।
और बहुत सारी चीज़ें होती हैं दुनिया में चौंकाने वाली। एक बड़ी चौंकाने वाली चीज़ ये होती है कि आप एक दिन से कितनी कीमत, कितना मूल्य, कितना रस, कितनी वैल्यू निकाल सकते हो। कुछ लोग होते हैं जो एक दिन से एक हफ्ता, एक महीना निकाल लेते हैं। तो अगर ऐसे देखो तो उनकी ज़िन्दगी फिर 70, 80,100 साल की नहीं होती, वो एक ज़िन्दगी में हज़ार साल जी जाते हैं। नहीं तो कोई ज़िन्दगी पूरी तरह सोते-सोते भी काट सकता है, उसके भी तो 100 साल बीत ही जाएँगे ना। ऐसा हो सकता है कि नहीं कि, कोई 100 साल जिया लेकिन 100 में से 90 साल सिर्फ़ सो रहा था, हो सकता है कि नहीं हो सकता है? ज़िन्दगी ऐसे नहीं गिनी जाती, ज़िन्दगी गिनी जाती है कि —
मेरा कितना समय सार्थक काम में गया। बस उतने ही समय आप जिए बाकी समय तो बेहोशी का था, वो मरने जैसी ही दशा थी।
और फिर कुछ समय बाद जब आप देखोगे कि, अरे! समय तो थोड़ा ही था — एक महीना, दो महीना, तीन महीना ही था, इसमें मैंने क्या-क्या कर लिया? तो आपको ख़ुद अचरज होगा कि ये कैसे हो सकता है? ये कैसे हो सकता है? ये तो होता नहीं है, मैंने किसी को करते नहीं देखा, इतने कम समय में मैंने इतने काम कैसे कर लिए?
आप एक बहुत अच्छे इंस्टिट्यूशन के सब छात्र हो। मैं भी एक अच्छे संस्थान से पढ़ पाया, तो बहुत कुछ वहाँ ऐसा था जो बहुत प्रेरणास्पद था। मैं देखता था जो टॉप रैंकर्स होते हैं ना आईटी जेई में तो वो कंप्यूटर साइंस लेते हैं यूज़ुअली, तब भी ऐसा होता था अभी भी वैसा ही हो रहा है। तो पूरा इंस्टट्यूट ही उनकी ओर ऐसे देखता है कि, क्योंकि सबने यही चाहा होता है कि हमारी भी टॉप 100 में रैंक आए, बात ही तो है नहीं। तो सब उनको देखते हैं ये कौन है?
जो चीज़ मुझे चाहिए थी इसको मिल गई है, टॉप 100 में रैंक ले आया। और मैंने ये देखा था कि बहुत सारे, ऐसे जिनकी आईआईटी जेईई में रैंक भी अच्छी थी। अंदर आने के बाद उनकी सीजीपीए भी अच्छी थी। यही नहीं बस कि एंट्रेंस के लिए पढ़ के अंदर आ गए, अब अंदर कुछ नहीं करते। रैंक भी अच्छी थी, अंदर आ के सीजीपीए भी अच्छी थी — माने पढ़ने में समय तो लगाते होंगे।
वो, वो थे जो तमाम तरह के कोकरिकुलर्स में सबसे आगे थे। और ऐसे भी थे जो बस किसी तरीक़े से धक्का खा कर के तीसरे चौथे अटेम्प्ट में आईआईटी में घुसे थे, और घुसने के बाद उनकी सीजीएपी भी बुरी थी। और वो किसी क्लब में किसी तरह की कोई एक्टिविटी नहीं करते थे। जहाँ तक अपने आप को निर्मित करने की बात है, व्यक्तित्व के तौर पर, इंसान के तौर पर, वो जैसे भीतर घुसे थे, ठीक वैसे ही बाहर भी निकल गए।
अब मुझे बताइए ऐसा कैसे हो गया? कि एक इंसान है, छात्र है — उसके पास पढ़ने के लिए भी बहुत समय निकल आता है, वो खेलों में भी आगे है, वो ड्रामेटिक्स में भी आगे है। और कई बार वो मौज़ मस्ती में भी सबसे आगे है, ये नहीं कि बस वो किताबी कीड़ा बना हुआ है। कहीं बन रहा है, चलो इस बार अब हफ्ते भर का कुछ गैप आ रहा है — चलते हैं, ट्रैकिंग कर के आएँगे, वो उसमें भी सबसे आगे है।
और सबसे ज़्यादा अब छुपा कर क्या बोलूँ? जलन तब होती थी जब पता चलता था कि, इनके पास अपनी गर्लफ्रेंड को देने के लिए भी टाइम है। वो पढ़ भी रहा है, वो खेल भी रहा है, वो लिख भी रहा है, वो कई बार एडिशनल प्रोजेक्ट्स भी कर रहा है। ये बड़ी बात होती थी ग्रेजुएशन के दिनों में क्योंकि हमारे बैच में सिर्फ़ 13 ही लड़कियाँ थी, भारत का हाल है। 350 का बैच था उसमें सिर्फ़ 13 लड़कियाँ थी।
इसमें लड़कियों की क्षमता की बात नहीं है, हमारे समाज की बात है, हमारे देश की बात है — 350 में 13 तो गर्लफ्रेंड बनाना बड़े दूर की कौड़ी होती थी। कुछ हैं उनके गर्लफ्रेंड्स भी हैं, वहाँ भी समय दे पा रहा है और फिर वापस आता है और अगले दिन लेक्चर में जाता है। लेक्चर में भी वो सब पूरी तैयारी करके गया है। समय लाता कहाँ से है तू? कहीं से नहीं लाता। सबके दिन में 24 ही घंटे होते हैं, वो बस अपना समय बर्बाद नहीं करता है।
वो रातों में चार-चार घंटे बैठकर अड्डा नहीं मारता है। चार बैठ गए हैं, कुछ नहीं कर रहे हैं, कुछ भी नहीं कर रहे। क्या कर रहे हैं? इधर-उधर की फ़िज़ूल बातें हैं। कुछ नहीं बैठे हुए हैं ऐसे ही, उनमें से बीच में एक सो भी गया है। फिर बैठे हैं 4 घंटे बैठे हो, 3- 4 बजे तक जगे हो तो, भूख भी लग आई है। तो फिर अपनी बाइक, स्कूटर ले कर के बाहर निकले हौज़ खास में पराठे खोज रहे हैं, उसमें और घंटा डेढ़ घंटा लगा दिया। फिर वापस लौट करके आए तो अब देखा — अरे ये तो सुबह रोशनी होने लग गई, 5:30 बज गया।
बोले यार 1 घंटे में तो अब मेस में ब्रेकफास्ट ही मिलने लगेगा तो जग ही लेते हैं, तो जग लिए। और रात भर के जगे और उसके बाद खा भी लिया खूब, तो अब आई मस्त नींद। बोले अब ऐसा करते हैं आज की जो क्लासेस हैं सारी बंक। ये यहाँ पर तो किसी के साथ नहीं होता। कितने बैठे हैं जिनसे मिलती जुलती जिनके साथ घटनाएँ होती हैं, कोई भी नहीं है। काफी है।
वक़्त ऐसी ही चीज़ है। वो कब फिसल जाता है पता नहीं चलता।
और स्ट्रॉ मैनिंग जानते हैं किसको बोलते हैं? स्ट्रॉ मैनिंग — असली समस्या से बचने के लिए एक फ़िज़ूल की नकली समस्या खड़ी करना और उस नकली समस्या से उलझ जाना। स्ट्रॉ मैन जानते हो कि नहीं क्या होता है? स्ट्रॉ मैन क्या होता है? — नकली आदमी, किस चीज़ का आदमी? — स्ट्रॉ का। तो असली जो आपका दुश्मन है वो यहाँ (दीवार की तरफ़ इंगित करते हुए) है, पर आपको डर लगता है उससे उलझने में, उसको चुनौती देने में। तो आप क्या करते हो? आप एक नकली दुश्मन बिना ताकत का, बिना दम का, घास-फूस का स्ट्रॉ मैन वहाँ खड़ा करते हो और फिर आप उससे उलझ जाते हो। कहते हो ये स्ट्रॉ मैन है, इसको परास्त करूँगा।
भाई प्रायोरिटाइज़ेशन शायद आपकी केंद्रीय समस्या है ही नहीं, क्योंकि प्रायोरिटाइज़ेशन की बात तब आती है जब आइदर ऑर पैराडाइम हो। आइदर ऑर की बात है ही नहीं, बात एंड की है। एक्स ऑर वाई नहीं है, ज़िन्दगी एक्स एंड वाई है। ये भी करूँगा और वो भी करूँगा, क्यों चूकूँ? एक ही ज़िन्दगी है।
पर आप एक नकली समस्या खड़ी करके कह रहे हो कि साहब समय की बहुत कमी है। प्लीज गाइड मी हाउ डू आई चूज़ एक्स ओवर वाई? ये स्ट्रॉ मैन प्रॉब्लम है, ये नकली समस्या है। असली समस्या उधर खड़ी है और वो क्या है? बोलिए — हम समय बर्बाद करते हैं इसलिए हमारे पास समय बचता नहीं है। समय बर्बाद कर रहे हैं हम इसलिए समय बचता नहीं है, समझ में आ रही है बात ये?
सन् 2000 में, नवंबर के महीने में मैंने सिविल सर्विस का मेंस एग्ज़ाम लिखा है और दिसंबर में कैट का लिखा है — एग्ज़ाम। 99 में पास आउट हुआ था, अगले साल ये एग्ज़ाम और ये दोनों ही क्लियर हो गए। और मानना मेरा भी यही था कि, कोई इंसान अगर कई अटेम्प्ट्स लगा के इन दोनों में से किसी एक को भी क्लियर कर ले तो बड़ी बात होती है। एक साथ दोनों कैसे क्लियर हो गए? इतना समय कहाँ से आ गया पढ़ने का? कहीं से नहीं आ गया, उतना ही समय था।
बस ऐसा कुछ था नहीं ज़िन्दगी में कि जिस पर मुझे लगे कि समय व्यर्थ करना है। और अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे ही लगता है ये तो बड़ी अजीब बात है। एक ही साल में, एक ही महीने के अंतराल में आप सिविल सर्विस और कैट दोनों को कैसे हो सकता है? हो सकता है भाई, हो सकता है। एकदम हो सकता है।
कभी भी अपने आपको सामने पाँच चीज़ें दिखे तो, ये मत बोला करो कि — क्या चुनूँ, क्या ना चुनूँ? पर हाँ अगर अपना दिन चार घंटे का ही रखोगे, तो कुछ चीज़ों से हाथ धोना पड़ेगा। जब भी कुछ दिखाई दे कि कीमती है पर उसके लिए समय नहीं है, तो ये मत करो कि किसी दूसरी कीमती चीज़ से समय काटो। बस ये नापो कि समय बर्बाद कहाँ जाता है और उसको काट दो। ज़िन्दगी सचमुच गहरी होनी चाहिए, रिच होनी चाहिए। क्यों हम अपने आपको किसी भी बढ़िया बात से वंचित रखें बस ये बोल के कि, मेरे पास टाइम नहीं है। मेरे पास है टाइम, मेरे पास एनर्जी भी है।
एनर्जी की तो कमी होनी नहीं चाहिए आपकी उम्र में, एक जगह से भाग के आए हो, घुसो ना अब दूसरी चीज़ में — हाँ ये कर के आए हैं, अब ये करेंगे। हाँ, पूरे दिन इंस्टट्यूट से थक के आए हैं, कोई बात नहीं, अब जा रहे हैं टेनिस खेलने। ये थोड़ी कि अरे मैं थक गया, मैं 3 घंटे सोऊँगा। कुछ नहीं, बल्कि वापस लौट रहे हो इंस्टट्यूट से हॉस्टल तक आओ ही मत ना। रैकेट वग़ैरह बाँध के जाओ कि, जैसे ही क्लास ओवर होगी सीधे उधर निकल जाऊँगा। समय जहाँ-जहाँ भी बच सकता है बचाओ।
ये भी फ़िज़ूल की बात है कि, वहाँ से पहले लौट के आ रहे हो, फिर मुँह धो रहे हो, फिर कुछ खा रहे हो, फिर बतिया रहे हो, फिर कपड़े बदल रहे हो। क्यों? अरे शूज़ तो रूम में रखे हैं ना। शूज़ बाँध कर ले जाओ भाई, एक छोटा सा बैग क्यों नहीं रख सकते हो? उसमें शूज़ भी है, चेंज ऑफ क्लोथ्स भी है, वहीं से करके निकल जाऊँगा सीधे। मेक द मोस्ट ऑफ द लिमिटेड टाइम दैट देयर इज़ और मौत कब आ जाए, पता तो चलता नहीं। और मौत सिर्फ़ इसी तरह नहीं आती है कि आदमी गिर गया लाश हो गया।
मौत ऐसे भी आती है कि अब आप में 'एनर्जी' नहीं रही, आपको कोई बीमारी हो गई या आपके ऊपर इधर-उधर की फ़िज़ूल ज़िम्मेदारियाँ आ गई, आपने अपनी गलती से उठा ली वो भी एक तरह की मौत ही है। क्योंकि वो अब जीने नहीं देती, जो चीज़ जीने ना दे उसको ही मौत बोलते हैं ना।
अभी बहुत समय है, व्यर्थ के पछड़ों में भी अभी फँसे नहीं हो। कैंपस में एक तरह की सिक्योरिटी है, सुरक्षा है, अधिक से अधिक इस्तेमाल करो इस समय का। जो रीडिंग आप अभी कर लोगे ना, वो ज़िन्दगी भर चलेगी। जैसी हमारी ज़िन्दगी होती है हिंदुस्तान में और जैसा हमारा पारिवारिक माहौल हो जाता है, और जैसे ही हम नौकरियाँ ले लेते हैं। बाहर आकर के, जिसको आप कहते हो रियल लाइफ असली ज़िन्दगी। उसमें आने के बाद ना जाने कितने तरीक़े के चक्र शुरू हो जाएँगे और फिर भूल जाओ कि कभी किताबें उठाने वाले हो, रीडिंग होगी ही नहीं। अभी अधिक से अधिक रीडिंग कर लो। अभी कैंपस में हो, दिल्ली में हो, बहुत तरह की स्पोर्टिंग फैसिलिटीज अवेलेबल होंगी। यहाँ से बाहर निकल गए कौन जाने कि स्विमिंग पूल कितनी आसानी से एक्सेसबल होगा।
भारत में तो गली क्रिकेट चलता है। सड़क पर आ जाओ ईंटें रख दो, वो किरमिच की बॉल ले लो और एक बैट ले लो खेलना शुरू कर दो। कौन जाने स्क्वाश कोर्ट अवेलेबल होगा कि नहीं होगा। और अवेलेबल होगा भी तो फिर कहते हो कि अरे बूढ़ी-बूढ़ी लाल लगाम। कई लोग तो 28 के हो के ही अपने आप को बूढ़ा मानने लगते हैं, वो कहते हैं अब हमारी थोड़ी उम्र है कि बिल्कुल स्क्रैच से, बिल्कुल शुरुआत से कोई नया स्पोर्ट सीखना शुरू करें। अभी कर लो सब कुछ, कम से कम शुरुआत अभी कर लो। अभी तुम्हारे पास लाइब्रेरी भी होगी। ये कल्चरल सोसाइटीज़ उनकी बात कर रहे थे, लाइब्रेरीज़ होंगी, स्पोर्टिंग फैसिलिटीज़ हैं, सोसाइटीज़ हैं। इन सबका अधिक से अधिक इस्तेमाल कर लो, इंसान दूसरे हो जाओगे।
और ये गपबाजी, अपने ही जैसों का झुंड बना लेना और उसी में चलना, ये गलती कभी मत करना — कभी-कभी-कभी मत करना। बिल्कुल मत करना कि, हम जैसे हैं अपने ही जैसों का चार-पाँच लोगों का एक झुंड बना लिया है और ये चार पाँच अपने में ही अपना पड़े रहते हैं, ये मत करना कभी भी। मेरी टीम में एक सदस्य हैं वो एक आईआईटी से हैं। तो दो साल पहले उनकी आईआईटी ने इनवाइट किया कि आइए हमारे यहाँ बोलिए। तो मैं गया तो वो उन्हीं का अलमा मीटर है तो मैं उनको ले के ही गया, वो जाएँगे ही तो वो भी गए।
सब हो गया, बहुत अच्छा हो गया दिन में सेशन हुआ, रात में स्टूडेंट से अलग से बातचीत हुई। इनफॉर्मल लंबा 5-6 घंटे तक बात होती रही, 12:00 बज गए। 12:00 बज गए, ये सज्जन कहीं दिखाई नहीं दे रहे जो टीम में है, और उसी आईआईटी के पास आउट हैं कई साल पहले के। तो इनको फोन ऑन किया गया फोन भी नहीं उठा रहे, ढूँढा गया तो ये जिम में मिले। जिमिंग करके आए, मैंने पूछा क्या हो गया? बोले कैंपस का जिम देखना चाहता था। मैंने पूछा देखना चाहता था माने? बोले यहाँ 4 साल रहा मैंने जिम देखा ही नहीं। जब मैं आपके पास आया और आपने इन चीज़ों पर पर बहुत जोर डाला कि — खेलो, जिमिंग करो, रीडिंग करो इसके बिना नहीं, तो तब जाकर के मैंने जिमिंग शुरू करी।
अब यहाँ पर वापस आया हूँ तो मैं देखने आया हूँ कि मेरे ही इंस्टट्यूट का जिम था कैसा? और बहुत अच्छा था। बस एक पछतावा रह जाएगा कि साल थे, ओपोरर्चुनिटी थी और मौका हाथ से जाने दिया। और हम मौका हाथ से जाने देते हैं। जिन सज्जन की मैं बात कर रहा हूँ उन्होंने क्या करा था? उन्हीं की जबानी, उन्होंने अपनी ही तरह के लोगों का एक ग्रुप बना रखा था और वो लोग आपस में रहते थे। और ये किस तरह के थे? बोले हम ऐसे थे जो ऐसे ही अपना रहते थे। पढ़ाई लिखाई में भी बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे लेकिन फेल नहीं होते थे, पास भी हो जाते थे, एवरेज किस्म के नंबर आते थे, तो हम कूल जैसा रहते थे। अपना इधर-उधर घूमते रहते थे, हम चारों पाँचों लोग ही दुबले पतले थे। कोई भी किसी स्पोर्ट्स में भी नहीं था, जिमिंग भी कोई नहीं करता था, कुछ नहीं था।
तुम आपस में अपना रहते थे। आपस में रहोगे तो तुमसे बेहतर कौन है और तुमसे बेहतर ज़िन्दगी कैसे जी जा सकती है? तुम्हें पता भी कैसे चलेगा? ये बताओ। और जो भीतरी हमारी माया है, अहंकार उसकी ये चाल देख रहे हो? वो दोस्ती ही ऐसों से करना चाहता है जो अपनी ही तरह के हों, क्योंकि किसी और के साथ हो गए तो तकलीफ़ हो जाएगी, बदलना पड़ेगा। किसी और के साथ हो गए तो जिसके साथ हो जाओगे, वो एक चुनौती की तरह हो जाएगा। क्योंकि वो तो कहेगा मैं अब ये करने जा रहा हूँ, मैं अब वो करने जा रहा हूँ। और आप ना कुछ करते हो, ना आपको कुछ आता है ना आप कुछ करना सीखना चाहते हो। तो ये तो बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
तो हम अपना एक भीतरी कंफर्ट ज़ोन ही नहीं बनाते हैं। हम एक बाहरी कंफर्ट ज़ोन भी बना लेते हैं, अपने ही जैसों का एक गैंग बना के। और ये कॉलेज में खूब होता है, ये मत होने देना। जो तुम्हारे ही जैसा है, वो तुम्हारी मदद नहीं कर सकता। जो तुम्हारे ही जैसा है वो तुम्हारे लिए प्रेरणा, इंस्पिरेशन नहीं बन सकता।
एक आखिरी बात और जब कोई बात बहुत ज़रूरी लग रही हो ना, और उसमें बहुत समय जा रहा हो, होता है ना? और हमारी उम्र में ना जाने कितनी बातें हमको बहुत ज़रूरी लगने लग जाती हैं, बहुत आवश्यक। अरे! ये तो बहुत इंपॉर्टेंट बात है। तो बस एक चीज़ पूछना है अपने आप से — आज से 2 साल बाद इस बात का कितना महत्व रह जाएगा? आज से 2 साल बाद ये चीज़ अभी इतनी ज़रूरी लग रही है कि, ज़ेहन पर छा गई है बिल्कुल, मन से उतर ही नहीं रही। मैं 4 घंटे से इसी बारे में बात करे जा रहा हूँ और 40 घंटे से सोचे जा रहा हूँ। अपने आप से पूछो 2 साल बाद वो चीज़ कितनी ज़रूरी रहेगी तुम्हारे लिए?और पिछले दो सालों में ऐसी कितनी चीज़ें हो चुकी हैं, जो हो रही थी तो बहुत-बहुत गहरी, गंभीर लगती थी और आज उनकी कोई हैसियत नहीं, उनका कोई महत्व नहीं।
जो आदमी ये पूछना शुरू कर देता है वो दिन के अपने कई घंटे बचा लेता है, क्योंकि हमारा बहुत सारा समय ऐसी चीज़ों में जाता है, जो बिल्कुल एफ़ीमरल है क्षणभंगुर, माने अभी लग रहा है बहुत ज़रूरी है, अभी आ के वो मेरा सारा समय खा लेगा। और दो दिन बाद? कुछ नहीं और हाँ, दो दिन बाद लेकिन कोई — दो दिन बाद क्या होगा? कोई दूसरा वैसा ही मुद्दा खड़ा हो जाएगा। और ऐसे ही दो-दो-दो दिन कर के जवानी भी बीत जाती है, ज़िन्दगी भी बीत जाती है, मौत आ जाती है।