(गीता-30) जिनका मन बहुत भागता हो, वे ध्यान से सुनें || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2023)

एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं पर आपको इसका अनुवाद मिलेगा कि आत्मा के द्वारा मन को स्थिर या स्तम्भित करो, अर्जुन। अब आत्मा के द्वारा, माने जैसे आत्मा का उपकरण की तरह उपयोग किया जा रहा हो, कि जैसे ‘हाथों के द्वारा इस मग को उठाओ’, तो हाथ फिर क्या हो गये?
श्रोता: उपकरण।
आचार्य: है न! तो कह रहे हैं, ‘आत्मा के द्वारा मन को स्थिर करो।’ आत्मा का इस्तेमाल करने वाला कौन है? मैं कहूँ, ‘हाथों के द्वारा मैं इसको (मग को) उठा रहा हूँ’, तो मैं हूँ, ये मेरे हाथ हैं और उसके द्वारा इसको उठा रहा हूँ। बोले, ‘आत्मा के द्वारा मन को स्थिर करो, अर्जुन।’ ये बिलकुल गलत इसका अनुवाद है। ऐसा इससे कोई आशय नहीं है।
आत्मा और मन की बात नहीं हो रही है। डोलता अहम् है। अहम् चूँकि डोलता रहता है तो इसलिए मन में तो कूद-फाँद मची ही रहेगी। मन क्या है? अहम् के आसपास का पूरा क्षेत्र। अहम् क्या है? मन का केन्द्र। जब केन्द्र ही कूद-फाँद कर रहा हो, तो क्षेत्र का क्या होगा?





