
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…

प्रश्नकर्ता: क्या आत्मा को ही इस्लाम में रूह और क्रिश्चियनिटी (ईसाइयत) में स्पिरिट कहते हैं?


चेतना ना बचे उसके बाद देह का हश्र भी देखा है? दो दिन पुराना मुर्दा भी देखा है, कैसा हो जाता है? यह है इस देह की औक़ात। बड़ी सुंदरता निखारते फिरते हो! यह जितने प्रेमी घूम रहे हैं, देह के, यह पास आने से घबराएँगे।


ये ब्रेकअप होता क्या है? तुम्हें अगर प्रेम है तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? कर कैसे लोगे? ये बात तो हृदय की होती है, आत्मा की होती है। तुम तय थोड़े ही करोगे कि कल से इससे बात नहीं करनी है क्योंकि हमारा



प्रश्नकर्ता: कोई जन्म से ही सात्विक विचारों वाला होता है, कोई जन्म से ही राक्षसी विचारों वाला होता है और कोई जन्म से अंधा और कोई जन्म से अपाहिज भी होता है। यह इतना भेद क्यों होता है? आत्मा तो एक है फिर यह इतना भेद क्यों?
आचार्य प्रशांत: यह…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में कुछ-न-कुछ कहानियाँ सुनते रहते हैं, आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, श्रीमद्भागवतगीता में दूसरे अध्याय, बीसवें श्लोक में बताया गया है कि शरीरी ना कभी जन्म लेता है, ना मरता है। शरीर का नाश होता है, शरीरी का नहीं। और बाइसवें अध्याय में बताया गया है कि जैसे कपड़ा पहनकर आदमी बदल देता है, पुराने कपड़े छोड़ कर

प्रश्नकर्ता: अगर पुनर्जन्म नहीं होता तो ईश्वर ने किस आधार पर किसी को अमीर और किसी को गरीब घर में पैदा किया है?


प्रश्नकर्ता: जैसे पता चला कि शरीर का होश या देहभाव शुरू से ही होता है तो इससे दूसरी तरफ़ जाने की क्या संभावना है?


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आज हमने शिविर में रीडिंग करते हुए पुनर्जन्म के बारे में पढ़ा। हमने आपका एक वीडियो भी देखा जिसमें आपने बताया है कि आत्मा का कोई जन्म या मरण नहीं होता, प्रकृति का जन्म-मरण बार-बार होता रहता है और मनुष्य एक ही बार जीता है और

दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रश्न है कि – साधक की यात्रा में अच्छे और सुन्दर कपड़े किस सीमा तक महत्व रखते हैं?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुख्य क्या है – शरीर, मन, या आत्मा? तीनों का समन्वय संसार में आवश्यक है, तो कैसे जिएँ? एक को पकड़ो, तो दो छूटते हैं। कृपया मार्गदर्शन करें।



प्रश्नकर्ता: सर, कहते हैं पुराने जन्म में जो हमने कर्म किया है वो अब हम भुगतेंगे इस जन्म में; ये एक तरह से मूर्खता नहीं है? अगर अपने पुराने जन्म में ग़लत काम किए हैं, अगर पुराना जन्म होता है तो वो सज़ा हमें उसी समय मिलना चाहिए। अब ये

साची लिवै बिनु देह निमाणी

प्रश्नकर्ता: सर, प्राण क्या चीज़ होती है और, वो आता कहाँ से है, जाता कहाँ है? क्या प्राण और आत्मा एक ही चीज़ हैं, या अलग-अलग हैं? वो क्या चीज़ है जो इंसान को जीवित बनाती है? क्या वो प्राण है, या आत्मा है? वो क्या है?
आचार्य प्रशांत: एक…

श्रोता: सर, हम अपने दिमाग का सौ प्रतिशत उपयोग क्यों नहीँ कर पाते, जैसे की आइंस्टीन ने किया था तो वो वैज्ञानिक हो गया था? तो हम लोग सौ प्रतिशत उपयोग क्यों नहीं कर पाते?


श्रोता: सर, हमने जब अहंकार के बारे में पढ़ा था तब हमें ये बताया गया था कि जहाँ पर भी ये आ जाये कि ‘मैं हूँ’, वहां पर अहंकार है।

श्रोता: सर, मुक्ति तो आत्मा से होती है, शरीर तो बन्धनों से जुडा ही रहेगा। जिसके पास कुछ नहीं है उसकी हर चीज़ पाने की कोशिश रहेगी और जिसके पास हर चीज़ है वो उसको बचाने की कोशिश करेगा। कुछ तो है जो चलता ही रहेगा, मुक्ति तो सिर्फ आत्मा

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥


एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।


धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।










श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।


अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।




आचार्य प्रशांत: नहीं, आत्मा न रूह है, न सोल है, न स्पिरिट है; आत्मा आत्मा है। अंग्रेज़ी में आत्मा के लिए एक विशिष्ट शब्द होता है – ‘सेल्फ़’; ‘सोल’ नहीं, ‘सेल्फ़’। और आत्मा वेदांत में…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते, आज योग दिवस है तो देश-दुनिया के जितने भी समाचार है हर जगह पर योग को लेकर ही चर्चा हो रही है। तो मैं काफ़ी चीज़ें पढ़ रहा था तो वहाँ पर एक चीज़ मुझे बार-बार पढ़ने को मिल रही थी जहाँ पर लोग कह रहे…
समय तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि समय से आगे जा सको। शरीर तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि शरीर से आगे जा सको। शरीर इसलिए नहीं दिया गया है कि शरीर ही को बचाए पड़े हो, “और दो-सौ साल जिएँगे!” जाते-जाते अपना थोड़ा सा अंश छोड़ गए कि, “इसकी …
अगर कोई महिला ठीक-ठाक भी होती है तो उसको बिगाड़ने का काम उसका प्रेमी या उसका पति कर देता है। देखिए, महिला को सम्मान मिलना चाहिए उसके ज्ञान से, उसके गुणों से, उसकी आंतरिक शक्ति से। लेकिन आप जब उस महिला को महत्व देना शुरू कर देते हो इस वजह…
आचार्य प्रशांत: वैसे तो वर्तमान में आत्मा के बहुत सारे अर्थ प्रचलित हो गए हैं, पर आत्मा का असली, मौलिक अर्थ क्या है, यह उन्हीं…
प्रश्नकर्ता: ओशो कहते हैं कि तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं होता लेकिन शारीरिक मृत्यु के बाद भी मन रहता है और उसी मन का पुनर्जन्म होता है। तो कृपया उस पर थोड़ा प्रकाश डालिए। और इसी तरह का सवाल है कि आप कहते हैं कि मृत्यु के बाद कुछ भी नहीं होता;…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: बुद्धि मन का एक अंग समझ लीजिए और आत्मा सत्य है आपका। मन सो जाता है तो बुद्धि भी सो जाती है। मन के माहौल के अनुसार बुद्धि काम करने लग जाती है, तो बुद्धि छोटी चीज़…
प्रश्नकर्ता: सत्य की साधना में यह मनुष्य का शरीर ही अवरोध बनती है तो इसे ही दुर्लभ क्यों कहा गया है?
आचार्य प्रशांत: मैं सवाल समझा देता हूँ सबको। कह रहे हैं…
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं।
अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः॥ २-१५॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं, यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है वह निष्कलंक मैं ही हूँ
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 2 श्लोक १५)
प्रसंग:
"The Self is abstract intelligence free from thought.…
हर वो चीज़, जो तुमको तुम्हारे नियमित जगत से आगे की याद दिलाती हो, उपयोगी है।
मन का बड़ा स्वार्थ है ये मानने में कि जो दुनिया…
क्योंकि आपको पहले से ही पता है कि तीन अलग-अलग इकाईयाँ हैं- शरीर, मन,…
प्रश्न: आचार्य जी, आत्मा ही परमानन्द स्वरूप हैं, यदि आत्मा न हो तो शरीर से कौन प्रेम करेगा?
आचार्य प्रशांत: श्लोक कहता है कि अगर आत्मा न हो तो शरीर से कौन प्रेम करेगा? शरीर की बात नहीं है, तुम्हे जब भी प्रेम का अनुभव होगा, वो आत्मा से और…
प्रश्न: आत्मा की जो छवि होती है, जिसको हम अपना आत्म कहते हैं, वो छवि होती है जैसे आकाश की छवि घड़े में, पानी में मिल जाती है। तो घड़े को लगता है कि उसके अन्दर आकाश है। वैसे ही हमें लगता है कि हमारे अन्दर आत्मा है क्योंकि वो…
(Without the true love of devotion, the body is without honour)
वक्ता: शरीर किसलिए है? दो शब्दों में शिवसूत्र स्पष्ट कर देते हैं। शरीर क्या है? हवि है। शरीर यज्ञ की ज्वाला में समर्पित होने हेतु पदार्थ है। यज्ञ क्या? यज्ञ वो…
वक्ता: तुमने जो बात उठाई है ना, ये बहुत विवादास्पद बात है। जो मस्तिष्क का…
आचार्य प्रशांत: एक उपनिषदिक् वाक्य है;
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
जो बलहीन है वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता। जो इतना डरपोक, मुर्दा और निर्बल है कि उसको अंतर पड़ने लग जाए कि दस लोग क्या बात कर रहे हैं इधर-उधर की, उसके बस की ये सब बातें नहीं…
श्रोता: अगर कोई भिखारी कहे कि मैं भूखा हूँ, तो…
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।
सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
राम को किसी फ़िल्म, अभिनेता या ऐतिहासिक चरित्र की छवि तक सीमित करना उनके वास्तविक अर्थ को भूलना है। राम कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अहंकार के विगलन और सत्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। बाहर पर्दे पर राम को खोजने के बजाय अपने भीतर उस तड़प को पहचानना ज़रूरी है, जो अहंकार से मुक्त होना चाहती है। जब राम विषय नहीं, हृदय बनते हैं, तभी रामत्व का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।
हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।