जीवन में अगर कई चीज़ें आकर्षित करती हों || आचार्य प्रशांत (2020)

आचार्य प्रशांत: पूछते हैं कि युवा हूँ और अपने जीवन में कई अलग-अलग पहलुओं को पाता हूँ। फिर इनके जीवन में वो अलग अलग पहलू क्या है, उसकी छोटी सी सूची दी है। तो एक पहलू है पढ़ाई और कैरियर का। अगला है गर्लफ्रेंड और प्रेम प्रसंगों का। फिर अगला है अध्यात्म का। फिर अगला है फुटबॉल से लगाव का। और फिर एक और है कि संगीत से लगाव है गिटार से प्रेम है।
तो पूछते हैं कि मैं इन सब जीवन के पक्षों को प्रायरॉटाइज़ (प्राथमिकता) नहीं कर पा रहा, क्या कितना ज़रूरी है मुझे समझ नहीं आ रहा है। सन्तों ने कहा है, “एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।” मैं क्या साधूँ ? कृपया मुझे प्रायरॉटाइज़ करने का विज्ञान बताइए।
इतने ही नहीं हैं और भी होंगे पहलू। ये जिनको तुम जीवन के पहलू कह रहे हो ये सब इच्छाएँ हैं। है न? पढ़ाई कर लूँ कैरियर बन जाए वो एक तरह की इच्छा है। गर्लफ्रेंड दूसरी तरह की इच्छा है। अध्यात्म की ओर भी तुम्हें एक इच्छा खींचती है, फिर फुटबॉल है, संगीत है, गिटार है, ये सब इच्छाएँ है।
ये जितनी इच्छाएँ हैं सब तुमसे कहती हैं कि हमें पूरा करो और सब आकर्षक लगती हैं, सब लुभाती हैं। सब का वादा है कि पूरा करोगे तो बड़ा आनन्द रहेगा। उसको अपनी भाषा में कह सकते हो कि मज़ा ही आ जाएगा , बिलकुल सन्तुष्टि हो जाएगी, मन भर जाएगा, पेट भर जाएगा। ऐसा ही है न?
इच्छा आशा पर जीती है। आशा में एक धुँधलका होता है। धुँधलका इसलिए होता है क्योंकि बात आगत की है, भविष्य की न ? जिस चीज़ की आशा कर रहे हो, उसका अभी अनुभव तो हुआ नहीं। अनुभव नहीं हुआ तो इसीलिए अभी जानते नहीं हो पूरी तरह कि वो इच्छा पूरी होने पर तुम्हें क्या देगी?
और जब धुँधलका रहता है, अस्पष्टता रहती है, नहीं पता होता कि क्या मिल जाना है इच्छा के पूरे होने से तो फिर जैसे हमको अधिकार मिल जाता है, मौका मिल जाता है कि हम इच्छा की पूर्ति को लेकर के बहुत बड़े-बड़े अनुमान लगा लेते हैं। वो अनुमान अक्सर बड़े निराधार होते हैं। लेकिन रोका तो नहीं जा सकता न आपको यूँही कुछ भी सोच लेने से, सपने खड़े कर लेने से?



