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काश! मुझे थोड़ा समय और मिल जाता ('Time Management', 'Work-Life Balance') || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न टाइम मैनेजमेंट (समय प्रबंधन) को लेकर है और उसका जो एक छोटा भाई आता है वह है वर्क लाइफ़ बैलेंस (कार्य संतुलन)। तो कॉर्पोरेट और एकेडमिक दुनिया में यह बहुत चलता है कि टाइम मैनेज करो। इसका कोर्स भी होता है कि एक्सेल शीट पर लिखकर आप कैसे टाइम मैनेज कर सकते हैं।

तो मैं जब करने गया जैसे होता है, तो मैं पूरी तरह से कभी नहीं कर सका और हताशा भी बहुत रही। पिछले साल जब ज़रूरत पड़ी तो मैं अध्यात्म की ओर बढ़ा, सत्य की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो मुझे लगा कि ये जो टाइम मैनेजमेंट हम बोल रहे थे, वो बाइप्रोडक्ट (सह-उत्पाद) जैसा ही हो रहा है। मुझे अलग से कुछ करना नहीं पड़ रहा है। तो क्या अध्यात्म ही एक और एकमात्र उपाय है जिसमें हम टाइम मैनेजमेंट कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: देखिए, हू इज़ द मैनेजर? (प्रबन्धक कौन है?) टाइम मैनेजमेंट आप कह रहे हो। कौन है जो तय करता है कि समय का क्या उपयोग करना है?

आध्यात्मिक प्रश्न तो शुरू यहाँ से होता है न कि डूअर कौन है, कर्ता कौन है, मैनेजर कौन है? मैनेजमेंट की बात तो बाद में आएगी। हू इज़ द मैनेजर ? कौन है जो टाइम मैनेजमेंट करेगा? वो आप हैं। और आप समय वहीं लगाएँगे जहाँ आपके मूल्य हैं। योर टाइम फॉलोज़ योर वैल्यूज़। अहम् जिस चीज़ को वरीयता देता है, सम्मान, मूल्य देता है उसी चीज़ को समय देता है, क्या बात एकदम सीधी नहीं है?

तो टाइम मैनेजमेंट क्या होता है? टाइम मैनेजमेंट क्या हो गया, वैल्यू मैनेजमेंट होना चाहिए न? और वैल्यू किसकी है? (दोहराते हुए) वैल्यू किसकी है? सेल्फ की। सेल्फ माने अहम्। तो वैल्यू मैनेजमेंट फिर क्या हो गया? सेल्फ मैनेजमेंट हो गया। और इस सेल्फ को मैनेज कौन करेगा? सेल्फ ही।

और सेल्फ , सेल्फ को मैनेज करे इसके लिए सेल्फ को सेल्फ का ज्ञान होना चाहिए। तो टाइम मैनेजमेंट इज़ सेल्फ नॉलेज (समय प्रबन्धन है आत्मज्ञान)। इस पूरे समीकरण में कहीं कोई लोच दिखता हो तो बता दीजिए।

लेकिन लोग टाइम मैनेज करना चाहते हैं बिना स्वयं को जाने। उसमें ख़तरा रहता है। साहस नहीं है न उतना, तो कह रहे हैं, ‘ टाइम मैनेजमेंट करना है, टाइम मैनेज नहीं हो रहा है।' अरे भाई! टाइम तुम्हारा वहीं जा रहा है जहाँ तुम चाहते हो कि वह जाए, अपनेआप थोड़ी फिसल गया! ये सब जो हम बेचारगी के तर्क देते हैं न कि मैं चाहता नहीं था लेकिन मेरे दो घंटे ख़राब हो गये — तुम जो चाहते थे वही हुआ है।

अब मैं बताऊँ कि तुम क्या चाहते हो? तुम चाहते हो दो घंटे ख़राब भी कर लिये और दोष भी न आये — 'अरे! मुझे पता नहीं चला कि दो घंटे बह गये।' मज़े पूरे लिये, पता नहीं चला बेटा! दो घंटे मज़े मारे हैं पूरे और जब किसी ने पकड़ा कि ये दो घंटे बर्बाद क्यों किये, तो क्या बोला? 'हमें पता नहीं चला टाइम बह गया।' बहा नहीं है, तुमने बहाया है। तो वेदान्त पहली ही चीज़ कहता है कि स्वीकार तो करो करतूत तुम्हारी है, (दोहराते हुए) स्वीकार करो करतूत तुम्हारी है, टाइम फॉलोज़ योर वैल्यूज़।

तो आपको अगर जानना है कि आप भीतर-ही-भीतर किस चीज़ को मूल्य दे रहे हो तो उसका अच्छा तरीक़ा होता है कि बस इस बात का एक टेबल बना लो, डॉक्यूमेंट कर लो कि टाइम जा कहाँ रहा है।

जब शुरुआत हुई थी, उन दिनों में मैं इस चीज़ की सीधे-सीधे एक एक्टिविटी (गतिविधि) ही करवा देता था कि अभी मिल रहा हूँ, अगले हफ़्ते फिर मिलने आऊँगा और इन सात दिनों में मुझे तुम्हारे एक-एक पल का हिसाब चाहिए, एकदम प्रिसाइज़ली (ठीक रीति से) और ओनेस्टली डॉक्यूमेंट (लिखित प्रमाण) कर के रखना। एक भी पल छोड़ना नहीं और झूठ बोलना नहीं। जहाँ जिस चीज़ में समय लगाया है, पूरा टेबुलर फॉर्म में मुझे दिखा देना। और उससे मैं बता दूँगा तुम कौन हो।

मुझे बताने की ज़रूरत नहीं रहेगी, तुम ख़ुद ही जान जाओगे कि तुम कौन हो। बस ये देख लेना कि पूरा दिन जाता कहाँ है। जहाँ तुम्हारा समय जा रहा है, तुम वही हो, वही तुम्हारी पहचान है। तो टाइम मैनेजमेंट वैल्यू मैनेजमेंट है, वैल्यू मैनेजमेंट सेल्फ मैनेजमेंट है और सेल्फ मैनेजमेंट सेल्फ नॉलेज के बिना हो नहीं सकता।

इसीलिए टाइम मैनेजमेंट इतनी टेढ़ी खीर रहता है ज़्यादातर लोगों के लिए। और इतनी बड़ी-बड़ी किताबें लिख दी जाती हैं, टाइम मैनेजमेंट पर, वर्कशॉप (कार्यशाला) होती है, और चुटकुला ये है कि उनमें कहीं भी सेल्फ की बात नहीं होती। आत्मज्ञान की कोई बात नहीं हो रही है और साहब छ:-छ: घंटे की वर्कशॉप चल रही है टाइम मैनेजमेंट पर, ख़ासतौर पर कॉर्पोरेट्स में। वो पूरा टाइम मैनेजमेंट बता रहे हैं, टाइम मैनेजमेंट ऐसे करो, वैसे करो, उस पर टूल्स (उपकरण) दिये जा रहे हैं।

ऐसी-ऐसी डिवाइसेज़ अब आने लगी हैं जो भयानक तरीक़े से वाइब्रेट करती हैं और पहली बार में तुमने नहीं सुना तो दूसरी बार छील के रख दें। और ये सब अब टूल्स बताये जा रहे हैं कि इनसे टाइम मैनेजमेंट में मदद मिलती है। कोई काम है वो तुमने नहीं कर के रखा, तो ऑटो ईमेल चली जाएगी तुम्हारे बॉस को। ये टाइम मैनेजमेंट टूल है। ये टाइम मैनेजमेंट टूल है? ये क्या है? कुछ नहीं, ऐसे ही।

समझ में आ रही है बात?

जब जान लोगे कि तुमने कौनसी बीमारी पाल रखी है, तभी तो समझ में आएगा न वो बीमारी कितना तुम्हारा समय खा रही है। जब अपनी बीमारी का नहीं पता, तो ये कैसे पता चलेगा कि उस बीमारी की ख़ुराक क्या है? पता चलेगा?

बच्चों के पेट में पड़ जाते हैं कीड़े। और कीड़े पड़ते हैं तो दोनों चीज़ें होती हैं: एक तो यह होती है कि कुछ बच्चे कम खाने लगते हैं और दूसरी यह होती है कि कुछ बच्चे बहुत ज़्यादा खाने लगते हैं। अब बोल रहे हो फूड मैनेजमेंट। पहले पता तो हो कि तुम्हारा फूड खा कौन रहे हैं। तुम्हारा फूड खा रहे हैं कीड़े। कीड़ों का पता नहीं, फूड मैनेजमेंट कर रहे हैं! कीड़े पेट के भीतर हैं, भीतर देखने का कभी अभ्यास करा नहीं, और बाहर है फूड , फूड में पचास तरीक़े के काम कर रहे हैं, वो भी और उनकी अम्मा भी। फूड में काम करने से क्या मिलेगा?

बाहर की आपकी जितनी बीमारियाँ हैं, साफ़-साफ़ समझ लीजिए कि वो वास्तव में भीतर की बीमारियों के प्रतिबिम्ब हैं। भीतर बीमारी न हो तो बाहर बीमारी नहीं हो सकती। मैं शारीरिक बीमारियों की बात नहीं कर रहा हूँ, कैंसर वगैरह की, वो कुछ भी हो सकता है। मैं इस तरह की बीमारियों की बात कर रहा हूँ कि 'भूल जाता हूँ, समय नहीं मैनेज होता, रिश्तें ख़राब हो जाते हैं, धोखा मिल जाता है' — ये सब जो बातें हैं।

समझ में आ रही है बात?

आप जितनी भी चीज़ें ग़लत करते हो उनका स्रोत तो भीतरी ही है न, भले ही वो ग़लतियाँ बाहरी दिखायी देती हों। बाहरी ग़लती का कोई बाहरी उपचार नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी जड़ भीतरी है। तात्कालिक हो सकता है, सतही हो सकता है, दो-चार दिन के लिए हो सकता है; उससे ज़्यादा नहीं।

एक 'समय' पर है कि "प्रेम मगन जब मन भयो, कौन गिने तिथि वार।" ये होता है टाइम मैनेजमेंट कि जब प्रेम आ जाता है जीवन में न, तो समय का पता लगना बन्द हो जाता है और वो होता है ‘अल्टीमेट टाइम मैनेजमेंट’। पता ही नहीं है क्या बज रहा है। "प्रेम मगन जब मन भयो"। न तिथि का पता चलता है न वार का। वार माने? दिन। मंगलवार है कि बुधवार है, आदमी यही भूल जाता है।

आपका टाइम मैनेजमेंट बोलता है, 'ऐसे करो, वैसे करो।' उनका टाइम मैनेजमेंट बोलता है, 'जो सही काम है उससे इतने प्रेम में डूब जाओ कि समय का पता ही न लगे।’ तुम काल की धारा से बाहर आ जाओ। मज़ा आया?

तो टाइम मैनेजमेंट तब है जब टाइम के प्रति ऑब्लिवियस (बेख़बर) हो जाओ, समय के प्रति बिलकुल अनुपस्थित हो जाओ, भूल जाओ कि समय जैसा कुछ होता है। कोई और आकर बता दे कि समय हो गया, तो ठीक है।

अरे! जब तुम उसको मूल्य देना शुरू कर दोगे जो काल से बाहर का है, तो अब कितना काल हुआ, क्या बजा, कौनसा पहर, कौनसी घड़ी इसको मूल्य कैसे दोगे? बताओ। जो अकाल के प्रेम में पड़ गया, वो कैसे अब मूल्य देगा कि ग्यारह बज गया कि बारह बज गया कि आधी रात हो गयी, तीन बज गया, छ: बज गया।

लेकिन जब ये बात मैं बोलता हूँ, तो लोगों को समझ में ही नहीं आता कि मैं किस जगह से बोल रहा हूँ और किस ऊँचाई से बोल रहा हूँ। मैं बोला करता हूँ, 'ये जो तुम अध्यात्म के नाम पर एक सुव्यवस्थित दिनचर्या की बात करते हो ये बहुत आरंभिक स्तर की बात है।' ये शुरू-शुरू में ठीक है कि अब हम आध्यात्मिक आदमी हो रहे हैं — अब हम इतने बजे उठते हैं, इतने बजे खाते हैं, नौ बजे सो जाते हैं, फिर ब्रह्ममुहूर्त में उठते हैं — ये ठीक है, प्राइमरी है, प्राइमरी। छोटू को सिखाने के लिए ठीक है, 'इतने बजे सो जा, इतने बजे उठ जा।' वयस्कों की बातें नहीं हैं। वयस्कों की बात ये होती है कि हमें पता ही नहीं है कि क्या बजा है, हमें नहीं पता।

जो काल में जीते हों वो काल का ख़याल करें। हम जहाँ जी रहे हैं वहाँ समय ही नहीं है, हम कैसे काल का ख़याल करें। ये (स्वयंसेवक को सम्बोधित करते हुए) पगला गया घड़ी बाँध-बाँधकर। अब फिर से भूल गया मैं आज। खरीद के लाया, बोला आप ये बाँधा करिए। ये पता नहीं क्या-क्या जाँच के रखेगी — ब्लड प्रेशर जाँचेगी, डायबिटीज जाँचेगी — पता नहीं क्या-क्या। एक खास घड़ी लेकर आया है, उसके तीन महीने हो गये, मैं पहनता ही नहीं। पीछे-पीछे यहाँ लेकर आ गया, चार्ज कर के रख दी, पर मैं पहनता ही नहीं।

और ये कोई संयोग की बात नहीं है कि आज से लगभग दो दशक पहले मेरी घड़ी छूटनी शुरू हो गई थी; कोई चाहा नहीं था पर हो गया था। कलाई पर काल को बाँधे रहूँ, ये बेहूदा सा लगने लगा था।

समझ में आ रही है बात?

क्या मैनेज करना है? मैनेज तो तब करना होता है जब तराज़ू तोलना है, जब पाँच-सात अलग-अलग चीज़ें हैं तो बोलते हो टाइम मैनेजमेंट, टाइम मैनेजमेंट। क्या टाइम मैनेजमेंट ? जब एक ही चीज़ हो ज़िन्दगी में जीने की वजह, वही दिल है, वही प्राण है, तो समय को बँटना ही नहीं है, क्या टाइम मैनेज करोगे? जब एक को ही मूल्य दे दिया तो समय भी फिर एक हो जाता है; बँटा-बँटा नहीं रहता न कि इतने बजे इसको टाइम देना है, इतने बजे उसको टाइम देना है।

‘अरे! दफ़्तर ख़त्म करो टाइम पर, नहीं तो घर पर बीवी मारेगी।’ ये टाइम मैनेजमेंट यही तो होता है, वर्क लाइफ़ बैलेंस , इसके अलावा कुछ होता है? तुम कर लो बहुत ज़्यादा चिकनी-चुपड़ी सोफिस्टिकेटेड (परिष्कृत) भाषा का प्रयोग, कुल मिलाकर यही होता है पूरा वर्क लाइफ़ बैलेंस कि पैसे भी पूरे कमाने हैं, लेकिन समय का ख़याल कर लेना, नहीं तो घर पर जो भी है — बीवी शौहर जो भी है — वो बहुत पीटता है।

तो पैसे भी आने चाहिए और घर में मामला भी ठीक-ठाक चलना चाहिए, यही तो वर्क लाइफ़ है, और क्या होता है! उसमें आप कहेंगे, 'नहीं, नहीं नहीं, हमें तो घर जाना है। हम घर जल्दी इसलिए जाते हैं, क्योंकि हमें जिमिंग करनी है।' ठीक है, ले लो एक पॉइंट तुम भी, हम कहाँ कह रहे हैं कि हमें नॉकआउट से ही जीतना है, कुछ पॉइंट तुम्हारे ही सही।

आ रही है बात समझ में?

छितरायी ज़िन्दगी जीना बन्द करो। अपने मूल्यों को थोड़ा घनीभूत करो, क्रिस्टलाइज़ करो। ज़िन्दगी जितनी छितरायी हुई रहेगी उतनी अलग-अलग दिशाओं के मुद्दे रहेंगे तुम्हारी टू डू लिस्ट में। अजीब-अजीब तरीक़े के मुद्दे रहेंगे, एकदम छितरायी हुई ज़िन्दगी है, उसमें कहीं कोई केन्द्रीय तत्व नहीं, कोई सेंट्रल थीम नहीं।

अब एक मुद्दा लिख रखा है कि वॉलटायर (एक फ्रांसीसी दार्शनिक) को पढ़ना है और दूसरा मुद्दा क्या लिख रखा है? फ़लाने को सौ रुपये दिये थे उससे उगाहने जाना है। ये दोनों मुद्दे एक ही टू डू लिस्ट में कैसे हो सकते हैं? फिर कहते हो ‘ टाइम नहीं मैनेज होता, एक काम किया दूसरा नहीं कर पाये।’

तुम्हें अगर सही में दर्शन से प्रेम होता तो तुम कैसे इस बात को याद रख सकते थे कि किसी को सौ रुपये दिये उसने वापस नहीं किये? यह तुम्हारा कितना सस्ता दर्शन है कि सौ रुपये पर भी भारी नहीं पड़ पाता? यह कैसा तुम्हारा सस्ता प्रेम है कि इसके आगे तुम सौ रुपये को नहीं भूल पाते? और यही लिखते हो न कि अरे! आज रीडिंग करनी थी तीन घंटे फिलॉसफी (दर्शन शास्त्र) की, टाइम ठीक से मैनेज नहीं हुआ, उसके मारे फिर जाकर के कहीं पर सौ, पाँच सौ, दो हज़ार का कार्यक्रम करना था वह नहीं हो पाया। अब कल वह कार्यक्रम करेंगे और फिलॉसफी नहीं पढ़ेंगे।

यह क्या है? यह एक बँटा हुआ मन है, फ्रेगमेंटेड माइंड है जिसके पास कोई जीने के लिए केन्द्रीय वजह नहीं है, तो वह कभी एक काम इधर का करता है एक काम उधर का करता है।

धूमिल कहते थे, "ये वो लोग हैं जो निष्ठा का तुक विष्ठा से मिलाते हैं।" इनकी ज़िन्दगी में एक चीज़ होती है निष्ठा और दूसरी चीज़ होती है विष्ठा — विष्ठा माने टट्टी, गू। और ये दोनों को एक ही सॉंस में बोल जाते हैं जैसे कविता में होता है न तुक मिलाया जाता है, तुकांत कविता होती है न। 'हे परमात्मा तुझ में है मेरी बड़ी निष्ठा, लेकिन अभी मैं साफ़ कर रही हूँ अपनी डॉगी की विष्ठा,' यह कविता बन गयी?

यह क्या कविता है? यह कविता है? यह शोर है, यह बेहूदगी है और ऐसा हमारा जीवन है जिसमें निष्ठा और विष्ठा एक साथ चलते हैं। और फिर हम कहते हैं, 'दोनों एक साथ हो नहीं पा रहा हैं, टाइम मैनेजमेंट कैसे करें?'

ये दो चीज़ें एक साथ चला काहे को रहे हो? एक को पकड़ो न! 'एक'। एक नहीं समझ में आता? पचास जगह बिखरे रहना ज़रूरी है? क्यों ऋषियों ने बार-बार बोला, "एक है सत्य, दूसरा नहीं है।” अद्वैत का क्या मतलब है, क्यों बोला? यह 'एक' जो शब्द है यह कितनी बार आता है आध्यात्मिक साहित्य में? इसी 'एक' से भरा हुआ है, एक! एक! एक!

"एको अहं, द्वितीयो नास्ति”। 'एक' का क्या आशय था? कि ये जो पूरा तुमने इतना छितरा रखा है; समेटो कोनसॉलिडेट। क्या छितरा रखा है! "एक ओंकार सतनाम"। पचास बातें नहीं करनी, 'एक'।

अब यह सुन करके बताओ कॉर्पोरेट वाले कभी चाहेंगे कि उनके पालतू एंप्लाइज़ (कर्मचारी) तक मेरी बात पहुँचे, चाहेंगे? अब बता तो दिया है मैंने बिलकुल एकदम सटीक टाइम मैनेजमेंट , लेकिन पसंद नहीं आएगा।

छितराये हुए मूल्य, तो छितराया हुआ समय। सही मूल्य, तो सही जगह जाएगा समय। और एक मूल्य, तो एक जगह जाएगा समय।

प्र: आचार्य जी, इससे सम्बन्धित एक प्रश्न है। यह जो एक कहावत है इंडियंस आर ऑलवेज़ लेट; दे आर नोट पंक्चुअल (भारतीय हमेशा देर से आते हैं; वे समय के पाबंद नहीं हैं) तो क्या इसमें भी हम लोग दूर हो गये अध्यात्म से?

आचार्य: अरे! किसने करी यह कहावत? यह कौन से उपनिषद् से है, जनश्रुति उपनिषद्? लोकप्रथा उपनिषद्? 'जनता उपनिषद्', यह ठीक है। ज्ञानियों की बात पर चलना है या भीड़ की कहावत पर? कहावतें तो कुछ भी बोलती हैं, ऐसी-ऐसी कहावतें होती हैं।

और लोग उनको बड़े ठसक के साथ उद्धृत करते हैं, कहते हैं, 'हमारे यहाँ साहब एक कहावत है।' क्या कहावत है? कहावत यह है कि — कुछ भी बना लो, इतने क्षेत्र हैं, हर क्षेत्र की अपनी-अपनी कहावत होती है। ’घर में अगर बच्चा हो काला, तो आगे बनेगा लाला।' बिलकुल आपको इस तरह की कहावत मिल जाएगी, कितनी तरह की चलती हैं। और कई-कई तो ऐसी हैं कि आप कहोगे कि चलायी किसने?

आप फोक कल्चर (लोक संस्कृति) को विज़डम (बुद्धिमत्ता) थोड़ी मान लोगे। फोक कल्चर वही है, फोक। आम आदमी की जो समझ में आया वह कहावत बन जाती है। अब आम आदमी की समझ का कितना तुम भरोसा करोगे, कितना तुम सम्मान करोगे? अध्यात्म एक एलिट (उत्कर्ष) चीज़ होती है अपनेआप में, इसलिए आम आदमी उससे चिढ़ता भी बहुत है। उसमें फोक जैसा कुछ नहीं होता।

कोई आपको मिले जो अपनी बात साबित करने के लिए कहे, 'हमारे गाँव में एक कहावत चला करती है।' वहीं रुक जाइए, कहिए कि तू थम। ‘हमारे गाँव में कहावत चला करती है!’

प्र: आचार्य जी, एक और प्रश्न। जो हमारा टाइम को लेकर सीरियसनेस (गम्भीरता) है, मान लीजिए मैं काम ख़त्म करके बारह बजे बैडमिंटन खेलने गया, तो मैं जहाँ से बिलॉन्ग करता हूँ, कोलकाता से हूँ, तो यहाँ पर एक बारा कल्चर होता है, एक कॉलोनी कल्चर होता है। तो उसमें हर वक़्त एक सरप्राइज सा रहता है लोगों में कि अच्छा इस टाइम पर तुम बैडमिंटन खेल रहे हो! मैं बोलता हूँ कि मैं शोर तो नहीं मचा रहा, मैं सिर्फ़ बैडमिंटन खेल रहा हूँ। तो यह चीज़ टूटती ही नहीं।

आप देखिए, बेंगलुरु में लोग इतने प्रेशर में हैं, जो टेक सिटी है वहाँ पर अभी जो प्ले ग्राउन्ड या फिर कोर्टस हैं उनको खोलना पड़ रहा है सुबह चार बजे पाँच बजे। तो यह जिस तरीक़े से होना चाहिए था उस तरह नहीं हो रहा है। जब लोग प्रेशर में आ रहे हैं, जब एकदम दब जा रहे हैं, तब ये रिजल्ट आ रहा है, मतलब दूसरे तरीक़े से हो रहा है। अगर हम फ्लैक्सिबल (लचीले) होंगे तो ही यह पॉसिबल होगा, सहज तरीक़े से होगा, राइट ?

आचार्य: नहीं समझा, क्या कहना चाह रहे हो?

प्र: मतलब अगर हम टाइम को लेकर फ्लैक्सिबल होंगे तो ये चीज़ बहुत सहज तरीक़े से होगी, स्पोर्ट्स खेलना या फिर म्यूजिक करना।

आचार्य: वो सब अपनेआप हो जाता है। ऐसे थोड़ी होता है कि कोई नियम बनेगा, कुछ होगा। अभी बेंगलुरु में जब शिविर हुआ था तो वहाँ मैं भी रात में तीन-चार बजे जाता था बैडमिंटन खेलने, बहुत अच्छा लगता था, बहुत अच्छी बात है। दो से चार बजे तक बैडमिंटन खेलो, फिर उसके बाद चार बजे भी जाओ तो कोई-न-कोई कॉफी शॉप खुली होती थी रात में तीन-चार बजे। वहाँ अपना बैठकर चाय-कॉफी पिओ, ब्रह्म मुहूर्त में सो जाओ। (श्रोतागण हँसते हैं)

आप हँस रहे हो, इतने में हो गया, काँटा लगा। वह सुना है न, 'काँटा लगा..।' सोच रहा हूँ यह जो हमारी वीडियो एडिटिंग टीम है इनको बोल ही दूँ कि जहाँ-जहाँ ऐसी चीज़ आती है वहाँ तुम पहले ही पीछे से बैकग्राउंड म्यूजिक लगा दिया करो, 'काँटा लगा…।' इससे वो लोग जो तीस-तीस सेकेंड के क्लिप निकालते हैं उनको सुविधा हो जाएगी। पहले ही वहाँ होगा, अच्छा 'काँटा लगा' यहाँ है, इसको निकाल लो।

भाई, मैं तो यह जानता हूँ — मैं कोई बहुत पक्ष नहीं ले रहा हूँ कि आप रात में जगें ही या यह सब करें, बिलकुल नहीं कर रहा हूँ लेकिन — हर चीज़ का अपना महत्व होता है। बिलकुल इस बात का महत्व होगा कि आप रात में एक समय पर सो जाएँ, सुबह एक समय पर उठ जाएँ, मैं उससे इनकार नहीं कर रहा हूँ, लेकिन उससे कहीं-कहीं-कहीं ज़्यादा महत्व होता है ज़िन्दगी की किसी दूसरी चीज़ का। ठीक है?

अब ज़िन्दगी की वह जो दूसरी चीज़ है वह आपकी ज़िन्दगी में है नहीं — न कोई ऊँचा मकसद है न कोई शुद्ध प्रयोजन है जीने के लिए। उसकी जगह कुल आपके पास क्या है? इस तरह का अनुशासन, बाहरी अनुशासन कि मैं आध्यात्मिक आदमी हूँ, मैं तो नौ बजे सो जाता हूँ, चार बजे उठ जाता हूँ। तो इस तरह के अनुशासन पर तो मुझे चुटकुले ही बनाने हैं और कुछ नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मुझे सबको प्रेरित करना है कि रात भर जगे रहा करो। जो रात भर जगते हैं उनको कहीं-न-कहीं प्रकृति इस बात का दंड भी देती है, क्योंकि यह बात सही है कि हम भी जानवरों की तरह जंगल से आये हैं और सब जानवर चाहते हैं रात में सो जाएँ — निशाचर जो होते हैं उनको छोड़कर।

तो जानवर सो ही जाते हैं सूरज ढलने के साथ। हमारा भी जो शरीर है वह लाखों-करोड़ों साल तक जंगल में ही था, तो उसको भी अभ्यास इसी बात का है कि सूरज ढले तो सो जाओ और सूरज उगने वाला हो तो तुम भी उग जाओ। आप जब उसके विपरीत जाते हो तो शरीर पर उस बात का बोझ तो पड़ता ही है।

लेकिन मैं यह भी कह रहा हूँ कि शरीर पर बोझ ले लेना कहीं बेहतर है मन पर बोझ ले लेने से। तो अगर मुझे चुनाव करना पड़ेगा कि शरीर पर बोझ लूँ या मन पर बोझ लूँ, तो मैं तो शरीर पर ले लूँगा, मन पर नहीं लूँगा।

और आज जो स्थितियाँ हैं, जैसी हैं, उसमें कम-से-कम मेरे जैसे लोगों के लिए जो सही समय है काम करने के लिए, पढ़ने के लिए, कुछ भी करने के लिए वो रात का ही रहता है।

कहाँ दिन में बैडमिंटन खेलने जाऊँ, भारत की धूप देखो और धूल देखो और भीड़ देखो और व्यस्तता देखो। कहाँ आपको पीक आवर्स में समय मिलता है कि कहीं जाकर में शांति से बैठ लो? और अगर मैं अकेले हो करके कुछ पढ़ना भी चाहूँ, चुपचाप ध्यान में बैठना भी चाहूँ, तो कामकाजी आदमी हूँ, पूरी एक संस्था है, लोग आते हैं दिनभर, कोई यह पूछ रहा है कोई वह पूछ रहा है, बारह-एक बजे तक तो फ़ुर्सत ही नहीं है।

तो जो भी उसका प्राकृतिक दाम है, रात्रि जागरण का, वह चुकाना होगा। हालाँकि बिलकुल कह रहा हूँ, आदर्श स्थितियों में यह कोई अच्छी बात नहीं है कि आप रातभर जगे।

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