समय मिले तो उसे तत्काल किसी सार्थक काम में लगा दो। समय का एक पल भी अपने लिए बचा लिया, तो मरोगे। व्यक्तिगत समय के अलावा और कोई नर्क नहीं है। हमें बड़ा अच्छा लगता है बोलना, ‘थोड़ा Personal Time मिलना चाहिए न।’ तुम्हारी ज़िंदगी के सब झंझट Personal Time में ही पैदा हुए थे। ये सज़ा मिली है समय चुराने की, कि आज सौ झंझटों से घिरे हुए हो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अभी मैं मास्टर्स कर रही हूँ, सेकंड ईयर में, आई.आई.टी. चेन्नई से रिसर्च कर रही हूँ। एकदम मैकेनिकल हो गए हैं, उसमें कुछ नया ही नहीं लगता। मैं बहुत बोरदम महसूस करती हूँ। कुछ उम्मीद नहीं रहती कि कुछ नया या अच्छा होगा। यदि कभी कुछ अलग-सा घटता है तो फिर उस समय में कुछ ज़िंदा महसूस करती हूँ—चाहे वो अलग सा अच्छा हो, या बुरा। एक ना-उम्मीदी रहती है।
आचार्य प्रशांत: नाउम्मीदी किस चीज़ को लेकर के? आई.आई.टी. चेन्नई में पढ़ाई कर रहे हो, तो पढ़ाई में काफ़ी वक्त जाता होगा?
प्रश्नकर्ता: हाँ।
आचार्य प्रशांत: कुछ बातें मैंने पहले बताई थीं करने के लिए कि यह करनी शुरू करो—वह कर रहे हो या छोड़ दीं?
प्रश्नकर्ता: रेगुलर (नियमित) नहीं हूँ।




