ये काम इतनी आसानी से, और इतनी जल्दी नहीं हो जाता || आचार्य प्रशांत (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप को देखो, पूछो कि तनाव कहाँ है, किधर है।
तो जब खुद से सवाल पूछता था तो सब समस्याएँ खत्म होती नज़र आती थीं, कुछ सामने होता नहीं था। मन में एक हल्का सा आनन्द सा उठता था, पर पाँच मिनट बाद फिर से वो सारी चीज़ों का दोहराव शुरू हो जाता। तो अब वो समझ नहीं आता कि आखिर जो कल के लिए जो तनाव मेरा कम हुआ था, जो मैंने खुद से सवाल करा था। तो उस चीज़ को मैं कैसे बनाये रखूँ?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो बन नहीं सकती है, वो वैचारिक शान्ति है, वो द्वैतात्मक शान्ति है। वो वैसी ही शान्ति है कि तनाव की लहर चलती है तो उसमें ऐसे एक शीर्ष आता है फिर एक घाटी आती है (इशारे से वक्र समझाते हुए), वो वैसे ही शान्ति है, उसमें कुछ नहीं रखा है। तुम सोच-समझकर शान्ति लाना चाहते हो तो वो, आजकल वो सब लेकिन बहुत चलता है, पॉजिटिव थिंकिंग (सकारात्मक सोच) वगैरह।
वही है ये। कुछ ऐसा सोचो जिससे शान्त हो जाओ। बहुत सोचोगे तो बीच-बीच में शान्त हो ही जाओगे, इसलिए नहीं कि तुमने कुछ बहुत बढ़िया या बहुत सही सोच लिया, इसलिए कि सोच होती ही है ज्वार-भाटा की तरह। उसमें दुख का ज्वार आएगा, तो शान्ति का भाटा भी आएगा। वो सब नहीं है। शान्ति इतनी सस्ती चीज़ नहीं होती है कि बैठकर के विचार भर करने से मिल जाएगी। ज़िन्दगी की आहुति देनी पड़ती है।
असल में जो एक बात है वो ये है, आप में से बहुत सारे लोग आ जाते हैं यूट्यूब वीडियो देखकर के और वो साधन भी है, वैसे ही आयेंगे। तो काम बहुत श्रवण आधारित रहता है। कुछ सुना, कुछ सोचा; श्रवण कर लिया, कुछ मनन भी कर लिया, जीवन नहीं किया। मैं जहाँ से देखता हूँ वहाँ श्रवण, मनन, निदिध्यासन उसके बाद आता है जीवन। उसी को समाधि कहते हैं।

![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)



