
माँस यूँ ही तो तुम्हारी थाली पर नहीं आ जाता, न? माँस आने से पहले क़त्ल होता है, हिंसा होती है। हिंसक मन के साथ जिओगे कैसे? एक-एक साँस में बेचैनी रहेगी, तड़पते रहोगे। इसलिए बचो जानवरों को मारने से, या किसी को भी मारने से। किसी भी प्रकार की हिंसा से बचो — किसी और की ख़ातिर नहीं, अपनी ख़ातिर।




प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं ब्रह्मकुमारी में गयी थी, उसमें कहा जाता है कि कोई दीदी या दादी हैं, जिनके शरीर में आत्मा आती है और वही फिर बात करती है तो ये बात मुझे बहुत भ्रमित करती है, ये मेरा पहला प्रश्न है। और दूसरा प्रश्न ये है कि

आचार्य प्रशांत: अगर एक बच्चा पैदा होता है तो वो औसतन अपने जीवनकाल में प्रतिवर्ष अट्ठावन टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करेगा। आज की जो स्थिति है, आज के जो

आचार्य प्रशांत: कुर्बानी, बलि, माँसाहार, इसको लेकर पिछले दिनों मैंने एक बात-चीत शुरु करी है, वो बढ़िया आगे बढ़ रही है। तो उसमें बहुत लोगों के सवाल आये हैं, आपत्तियाँ भी आयीं हैं। और एक सजीव ज़ोरदार चर्चा चल रही है। मैं समझता हूँ ऐसे संवाद बहुत ज़रूरी हैं गम्भीर

प्रश्नकर्ता: अगर पृथ्वी बनाने से पहले भगवान आपसे पूछते कि मैं बनाऊँ, आपको ये दृश्य सारा सब दिखा देते, जो समुद्र में हो रहा है, गाय के साथ हुआ है, आप हामी भरते?

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सो मच आचार्य प्रशांत फॉर जॉइनिंग (जुड़ने के लिए आपका बहुत धन्यवाद आचार्य प्रशांत) सर, आपके व्यूज़ वीगनिज्म

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी! हमारे लिए समय निकालने के लिए। अभी जैसे हम लोग देख रहे हैं कि कोरोना काल चल रहा है और जीवन का भी काफ़ी लॉस (हानि) हुआ है, जीवनी का भी काफ़ी लॉस हुआ है। ये क्या एक कलेक्टिव मॉर्निंग (सामूहिक शोक) जो हो रही…

आचार्य प्रशांत: सौ साल पहले अगर आप माँस खाते थे तो आपको दिखाई पड़ता था कि जानवर का वध किया जा रहा है और जानवर खड़ा है, गला कट रहा है, वो चीत्कार कर रहा है, खून बह रहा है, पंख नोचे जा रहे हैं या हड्डियाँ हटायी जा रही



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये जो होते हैं माँस-मच्छी खाने वाले, इनसे मैंने काफ़ी बार बात की है। जैसे ज़िम में मिलते हैं, या कहीं मिलते हैं। और बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी, इनके पास एक तर्क रहता है कि यह जो माँस-मच्छी होते हैं इनका अमीनो प्रोफाइल

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आईआईटी रुड़की (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की) में ‘आज़ाद भवन’ नामक एक छात्रावास है, जो कि अभी तक पूरा शाकाहारी था, वहाँ के भोजनालय में माँसाहारी खाना नहीं मिलता था। अभी दो दिन पहले ख़बर आयी है कि वहाँ भी माँसाहारी खाना मिलना शुरू हो गया है,

प्रश्नकर्ता आचार्य जी, जब मैं पशु-वध के तथ्यों को देखता हूँ तो मुझे यह उम्मीद होती है कि पढ़े लिखे लोग भी इसे समझेंगे, लेकिन जब हमारे देश में कुछ समय पहले गाय के माँस पर रोक लगाने की बात की जा रही थी तो यही उच्च-मध्यम वर्गीय और पढ़े

आचार्य प्रशांत: अगले प्रश्नकर्ता हैं, कह रहे हैं कि "दुनिया के आठ-सौ-करोड़ लोगों को खिलाने के लिए सब्जी, घास-पात और वीगन सामग्री है कहाँ? इतने लोगों को अगर हम खिलाने लग गए शाकाहारी भोजन, तो जंगलों का क्या होगा? इसलिए माँस खाना तो ज़रूरी है।"

प्रश्नकर्ता: अगर एक गाय के सामने माँस रख दिया जाए तो वह तो नहीं खाएगी पर अगर एक शेर या इंसान के सामने रख दिया जाए तो वह खा लेते हैं, इसका मतलब यह है कि माँस खाना इंसान की कुदरती फितरत है।

आचार्य प्रशांत: सुपर-फ़ास्ट वर्ल्ड न्यूज़ पूछ रहे हैं कि स्वामी विवेकानंद जी

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अभी कुछ दिनों से मैं एक घटनाक्रम को फॉलो कर रहा था। जिसमें एक महिला फिल्ममेकर (चलचित्र निर्माता) हैं जिन्होंने माँ काली पर एक

आचार्य प्रशांत: पृथ्वी पर जो ज़मीन का क्षेत्र है उसमें से करीब आधे पर खेती होती है। यह जिस भाग पर खेती होती है हम उसके बारे में दो चार चीज़ें समझते हैं, जो कि बहुत रोचक है।
बहुत ध्यान से सुनिएगा। यह सोच कर इधर-उधर मत हो जाइएगा कि…




प्रश्नकर्ता: देखिए, ये सब एक ही तो हैं। अध्यात्म में ही ऐसा ही बताया है और विज्ञान भी यही कह रहा है कि सब एक है। तो क्या पौधा, क्या जानवर, क्यों हम भेद कर रहे हैं? हमें बिलकुल पक्षपात नहीं करना चाहिए जैसे हम पौधों को खाते हैं ठीक…

प्रश्नकर्ता: नैतिकता पर मेरा एक प्रश्न है। मैं पाँच सालों से शाकाहारी हूँ और पिछले दो सालों से वीगन। मैं महिलाओं के साथ डेट पर जाता था, जिनसे मैं डेटिंग ऐप पर मिला था। भले ही मैं पशु उत्पादों को नहीं खाता था, लेकिन वो खातीं थी तो मैं उसका

प्रश्नकर्ता: पिछले दिनों आपने कहा कि एक हाथी की जान और एक मुर्गे की जान एक बराबर है, तो फिर एक मुर्गे और एक बैक्टीरिया की जान भी तो बराबर होनी चाहिए न।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं कुछ समय पहले अभी बस्तर गया था, कुछ पचास कि.मि. दूर, गाँव में – कुछ आदिवासियों को समझने के लिए। तो वहाँ पर जो कुछ चीज़ें मैंने

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं आपको पिछले दो महीने से सुन रही हूँ और मेरी जो एक तलाश थी सत्य की, करुणा की और विसडम (बोध) की, वो आप पर आकर ख़त्म हुई है। मैं बचपन से ही मुझे, मैं गौतम बुद्ध की तरफ़ देखती थी और मुझे वही अनुभव


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि आपने बताया कि गोवा में मई के महीने से बारिश शुरू हो जाती है लेकिन अभी जून महीने के अन्त तक यहाँ बारिश शुरू नहीं हुई है। तो मैं अपने जन्म स्थान में आयी हूँ जो कि कर्नाटक में है। मैंने वहाँ देखा कि बारिश

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपका एक वीडियो था, वो अभी हाल ही में आया था और उसको कई सारे साथियों ने देखा। और मैं उस वीडियो के कमेंट्स को पढ़ रहा था तो मैंने वहाँ पर देखा कि कई सारी जिज्ञासाएँ थीं, लोगों के सवाल थे, जो मुझे वहाँ मिले और


प्रश्नकर्ता: पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद। जब मैंने एनिमल क्रूएलिटी (पशु क्रूरता) के सम्बन्ध में काम करना शुरू किया था उन्नीस-सौ-चौरानवे में तो जागरूकता भी बहुत कम थी लेकिन शायद उस तरह की औद्योगिक क्रूरता भी बहुत कम थी जो हम अब देख रहे हैं। तो निरन्तर माँस की

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। नवरात्रि आ रही है तो कन्याओं को पुस्तक देने की सोची। तो उसमें अमर चित्र कथा में पढ़ रहा था, उसमें अंगुलिमाल का एक प्रसंग आता है। उसमें दिखाते हैं कि उसने काफ़ी लोगों की हत्या कर दी। लेकिन बुद्ध के सम्पर्क में आने के बाद


प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, नमस्कार! आपने हमें समय दिया सर, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!




आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता ने तर्क भेजा है, कह रहे हैं, "विटामिन बी12 सिर्फ जानवरों के माँस से ही मिल सकता है और अगर उसको कृत्रिम रूप से लेंगे तो शरीर फिर उसको सोख नहीं पाता।"

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कुछ समय पहले यूनाइटेड नेशंस का एक ट्वीट आया था उसमें उन्होंने कहा था कि माँसाहार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के प्रमुख कारणों में से एक है इसलिए माँसाहार कम करें। तो यह ट्वीट आया और फिर कुछ घण्टों में या एक दिन के अंदर वो ट्वीट

आचार्य प्रशांत: टीवी पर लिसियस और इस तरह की कंपनियाँ हैं वो अब सीधे-सीधे बच्चों का इस्तेमाल करके लोगों को माँस खाने की ओर ललचा रही हैं।


प्रश्नकर्ता: जब मेरे मज़हब में कुछ जानवरों के माँस को हलाल बताया गया है तो फिर मैं माँस क्यों ना खाऊँ?
आचार्य प्रशांत: हलाल बताया गया है माने अनुमति ही तो दी गई है न, अनिवार्य तो नहीं कर दिया गया। अलाउड और कंपलसरी में अंतर होता है न। और…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! हाल ही में एक हथिनी की हत्या के संबंध में देश में बहुत खलबली रही। आचार्य जी उस हथिनी में ऐसा क्या था कि पूरा देश ही भावुक हो गया? वो लोग भी जो रोज़ जानवर खाते हैं वो सोशल मीडिया पर आकर बयान देने लग…



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर को करुणा का सागर कहा गया है, परंतु दुनिया में हर तरफ़ हिंसा ही दिखाई देती है। जीवों की रचना में एक ओर तो हिरण है और दूसरी ओर शेर है। हिरण मासूम है फिर भी शेर उसे बहुत बुरी तरह मारकर खा जाता है। हिरण
अध्यात्म के मूल में करुणा होती है — अपने और सारे संसार के प्रति। 'पीर सबन की एक-सी — मुर्गी, हिरणी, गाय।' आदमी हो, मुर्गी हो, हिरणी हो या गाय — पीड़ा सभी को एक जैसी होती है। अगर तुम अपनी पीड़ा मिटाने को उत्सुक हो, तो दूसरे को पीड़ा कैसे दे सकते हो? यह संभव ही नहीं कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक हो और साथ ही साथ मांस चबाता हो, जानवर का खून पीता हो — हो ही नहीं सकता।
आज के समय में माँस का भक्षण किसी का निजी मसला नहीं है। आपको इस बात की परवाह करनी होगी कि किसी की थाली में क्या है, क्योंकि दूसरा जो खा रहा है, उसका असर पूरी दुनिया पर, पूरे पर्यावरण पर और हर एक की ज़िंदगी पर पड़ रहा है। माँस-भक्षण इस समय दुनिया की सबसे घातक बीमारी है। पृथ्वी की नदियाँ, पहाड़, पर्यावरण, हवा, तापमान, सब कुछ तबाह हो गए — सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आदमी को माँस खाना है।
बुद्ध निर्विकल्प जीवन जीने को कहते थे| निर्विकल्पता में आता है कि पात्र में जो दे दिया विधि ने, वहीं खा लेना है। अगर बुद्ध ने अपवाद खड़ा कर दिया होता, तो भिक्षु निर्विकल्पता का पालन करने से मुकर जाते| तो बुद्ध ने कहा, ‘नहीं, अब आ ही गया है माँस तो खा लो। वैसे भी इसको तुमने मारा नहीं’। पर ये समय सापेक्ष बात है | भूल होती है, जब कहते हैं ‘बाज़ार में जो माँस है, हमने तो मारा नहीं,तो हम उसे खाएँगे।’ ये मत कर लेना, ये केंद्रीय, कालातीत बात नहीं|
आचार्य प्रशांत: नहीं! देखिए, थोड़ा–सा मैं इसमें मुझे अनुमति दीजिएगा, मैं इसमें विस्तार से बोल सकूँ। ये…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि हम बात करते हैं दूध की तो भारत में डेयरी कंजम्पशन (दुग्ध आधारित उत्पादों का उपभोग) बहुत ज़्यादा है और लोग लगभग पूरी तरह से निर्भर है दूध पर। हर घर में दूध का बहुत ज़्यादा कंजम्पशन है। तो दूध एक ऐसी चीज़ हो जाती…
प्रश्नकर्ता: मेरा पक्षियों, जानवरों से बहुत जुड़ाव हो गया है। अब मेरा घर से बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि अगर कभी कोई कसाईघर या माँस की दुकान दिख जाती है तो मेरी नज़र सीधे मासूम पक्षियों और जानवरों की आँखों पर जाकर टिक जाती है और फिर…
अनुभव (प्रश्नकर्ता), इन वीडियोज की…
आचार्य प्रशांत: नहीं साहब, आप जो उदाहरण…
क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण, माने परफ़ेक्ट नहीं होता। तुम उनसे या तो वह सीख लो जो चीज़ें सीखने लायक है या उन बातों पर ध्यान दें लो जिन पर ध्यान नहीं दिया…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कुछ समय पहले यूनाइटेड नेशंस का एक ट्वीट आया था उसमें उन्होंने कहा था कि माँसाहार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के प्रमुख कारणों में से एक है इसलिए माँसाहार कम करें। तो यह ट्वीट आया और फिर कुछ घण्टों में या एक दिन के अंदर वो ट्वीट…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न वीगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार — पशु उत्पादों के उपयोग से परहेज़) के ऊपर है। मैं पिछले सात-आठ महीने से वीगनिज़्म फ़ॉलो कर रहा हूँ। मैंने अपने घरवालों को समझाने का भरसक प्रयास किया, इससे होने वाले वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन जैसे नुक़सान गिनाये। लेकिन वो हैं…
प्रश्नकर्ता: पश्चिम में जानवरों का माँस और जानवरों से उत्पन्न उत्पाद को खाने में प्रचुरता से उपयोग में लाया जाता है। पश्चिम के लोग शारीरिक दृष्टि से भी सम्मृद्ध हैं और आर्थिक दृष्टि से भी।
तो क्या प्रकृति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता? और अगर पड़ता है तो किस…
साँस लेते वक़्त हम न जाने कितने बैक्टीरिया मार डालते हैं, अन्न उगाने की प्रक्रिया में खेती-बाड़ी…
मेनका गांधी: सबसे पहले तो हम शुरुआत करते हैं माँस खाना, दूध पीना, अंडा खाना। हम सोचते हैं कि ये बहुत आम चीज़ है।
आचार्य प्रशांत: हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं हिंसा देखने के, क्रूरता देखने के कि बहुत कुछ हो रहा होता है जानवरों के साथ, जो हमको…
प्रश्न: मनुस्मृति से संबंधित सवाल पूछा गया है।
नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि । धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च । ।
“भक्षण करने योग्य प्राणियों को प्रतिदिन खाने वाला किसी दोष से ग्रस्त नहीं होता;क्योंकि इस लोक में खाने वालों और खाए जाने वाले लोगों की रचना ब्रह्मा जी ने ही की…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे हाथों, मतलब काम करते समय मुझसे ग़लती से एक घोड़े की हत्या हो गयी थी। उस बात को आज ४ साल हो चुके हैं पर आज भी रात को बेचैनी में जाग उठता हूँ उसके ख़्याल से। मैं उसे बहुत प्यार करता था, मेरे बच्चे जैसा…
एक बार आप कहीं के लोगों की आदत डलवा दें, कि तुम्हें माँस-ही-माँस खाना है, बिलकुल सब और तला-भुना भी खाना है। अब क्षेत्र में अगर कोई आकर के सेहतमंद खाना बेचना भी चाहे तो उसका रेस्तराँ बंद हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा?
तो यह लोग जो गंदगी फैला…
“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे,…
बी12 को थोड़ा समझते हैं। देखिए, कोई जानवर अपने शरीर में विशेषतया विटामिन बी12 नहीं…
प्रश्नकर्ता: पौधों में भी तो जान होती है, पौधों में भी तो भावनाएँ होती हैं, और पौधे भी तो दर्द का अनुभव कर सकते हैं। तो हमें उन्हें भी तो फिर भोजन के लिए नहीं मारना चाहिए। तो आप चाहे शाकाहारी हों, वीगन हों या माँसाहारी हों, एक ही बात…
प्रश्नकर्ता: मुझे आपके गुरु के बारे में जानना था। आपने एक वीडियो में बताया था कि आपके टीचर एक मुर्गे हुआ करते थे। उनका नाम 'जीतू' था। तो उन्हीं के बारे में जानना था।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि जैसे लोग किसी को अपना गुरु मानते हैं, उसी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या चिकित्सा के क्षेत्र को अपवाद मानकर जीव-हत्या करना ठीक है? क्या मानव की जान, किसी और जीव से ऊपर है? और अगर नहीं है तो क्या स्वयं को एलोपैथिक के इलाज से दूर रखना स्वयं पर हिंसा नहीं है? कृपया स्पष्टता प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: टेढ़ी…