प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, नमस्कार! आपने हमें समय दिया सर, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!
मेरा आपसे पहला सवाल निजी है। मैं वीगन सेमिनार (शुद्ध शाकाहार पर संगोष्ठी) करता हूँ, जहाँ मैं लोगों को पूरे दिन बताता हूँ कि वीगनिज़्म (शुद्ध शाकाहर) क्यों और उसके फ़ायदें क्या हैं। एनवायरमेंट इम्पैक्ट, क्रुएलिटी इम्पैक्ट, हेल्थ एस्पैक्ट (पर्यावरण प्रभाव, क्रूरता प्रभाव, स्वास्थ्य पक्ष) ये सब बताता हूँ।
तो ऐसे एक सेमिनार (संगोष्ठी) में मेरे बच्चे भी आये थे, जो बीस-इक्कीस साल के हैं। वो नॉनवेज (माँसाहारी) थे, तो सेमिनार के बाद वो वेज (शाकाहारी, जो माँस के अतिरिक्त अन्य पशु उत्पादों का सेवन करे) हो गए। और आज भी अभी उस बात को दो साल हो गए, वो वेज पर ही अटके हैं।
तो मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि शुड आई पुश देम? (क्या मुझे उन्हें धकेलना चाहिए?) क्या मैं उनको बोलूँ कि नहीं, वीगनिज़्म की ओर शिफ़्ट (स्थानान्तरण) करो? क्या मुझे प्रेशर (दबाव) डालना चाहिए? और मेरा एक हिस्सा कहता है कि ये जो है, ये दिल की बात है। जब उनका दिल तैयार होगा, जब वो मानेंगे, तब वो शिफ़्ट होंगे और वो परमानेंट (स्थायी) होगा। आज मैं एक पैरेन्ट (अभिभावक) के तौर पर प्रेशर डालूँगा, तो वो कहीं रिबेल (विद्रोह) न कर जाएँ। तो क्या करना चाहिए मुझे?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सुनने में ये बात बिलकुल सही लगती है कि हर इंसान को अपने दिल पर ही चलना चाहिए, दबाव पर नहीं। लेकिन ये दिल चीज़ क्या है? मन तो दो चीज़ों पर चलता है। एक जो उसकी मूल वृत्ति होती है,




