प्रश्नकर्ता: मेरा पक्षियों, जानवरों से बहुत जुड़ाव हो गया है। अब मेरा घर से बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि अगर कभी कोई कसाईघर या माँस की दुकान दिख जाती है तो मेरी नज़र सीधे मासूम पक्षियों और जानवरों की आँखों पर जाकर टिक जाती है और फिर मैं बहुत गहरा दुख अनुभव करता हूँ, बेबस हो जाता हूँ।
आचार्य प्रशांत: इस बेबसी से तो तुम्हें गुजरना पड़ेगा, इस बेबसी से मैं भी बहुत गुज़रा हूँ, गुज़र ही रहा हूँ। बहुत छोटा था, दो साल-चार साल का, तब से इस विवशता का अनुभव होना शुरू हो गया। मैंने स्कूल जाना कानपुर में शुरू किया था तो जब एकदम छोटा था, रिक्शे में बैठकर स्कूल जा रहा होता था। तो एक जगह से होकर गुज़रते थे जहाँ लोग सुअरों के बाल नोच रहे होते थे और जब उनके बाल नोचे जा रहे होते थे तो वो बहुत मर्मभेदी तरीके से चिल्लाते थे। वो चिल्लाते थे तो मैं बिलकुल तड़प जाता था, रोने लग जाता था।
डर था, सहानुभूति थी पता नहीं क्या था? पर जो भी था बहुत तीव्र था। और ये सिलसिला चलता रहा। फिर लखनऊ का एक दिन याद है मुझे; साइकिल से लौट रहा था स्कूल से तो मैंने पहली बार अपनी आँखों के सामने मुर्गे को कटते देखा फिर उसके बाद उसके बालों को नोचते देखा। मैं साइकिल रोककर के खड़ा हो गया और चेतना पर एक ज़ोरदार झटका सा लगा; शॉक! मैंने किसी से कुछ कहा नहीं तब पर वापस लौटकर गये, खाना नहीं खाया। दो-चार दिन एकदम चुप रहा।
एक ही तरीका है कि मानिए कि ये हमारे ऊपर कर्ज़ है उन सब जानवरों का जो प्रतिपल कट रहे हैं। कर्ज़ है कि जितना ज़्यादा, यथाशक्ति हम कोशिश कर सकते हैं करें, उनको बचाने की। ज़्यादा-से-ज़्यादा संख्या में बचाने की। और बचाने का तो एक ही तरीका है उनको कि जो उनको मार रहे हैं उनकी चेतना में बदलाव लाया जाए, उन तक कुछ जानकारियाँ पहुँचाई जाएँ, उन्हें समझाया जाए। बातचीत करनी पड़ेगी, संवाद करना पड़ेगा और बहुत जान लगानी पड़ेगी।
आज आदमी जितना माँस खा रहा है, इतिहास में उसने इतना कभी नहीं खाया। और इतिहास तो ऐसा लगता है कि हज़ार-लाख साल पहले की बात हो रही है। पिछले पचास साल में ही दुनिया में माँस की खपत कई गुना बढ़ गयी है इसलिए नहीं कि दुनिया की आबादी बड़ी है, प्रति व्यक्ति माँस की खपत भी कई गुना बढ़ गयी है।




