ऊँचाइयाँ हिंसा करके ही मिलेंगी?(एवरेस्ट जीतने वाले वीगन पर्वतारोही से बातचीत)|| आचार्य प्रशांत(2022)

प्रश्नकर्ता: सर, मैं दो बार एवरेस्ट पर चढ़ा हूँ, और जब दो-हज़ार-सोलह में पहली बार चढ़ा तब मैं अपने आहार से पूरी तरह से वीगन था, पर मैंने अपने शरीर पर जो जैकेट पहना था वो दुर्भाग्य से बतख़ो के पंखों का था। वो जैकेट, एवरेस्ट के शिखर पर जो माइनस पचास डिग्री सेल्सियस का तापमान होता है और सौ या एक-सौ-पचास किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से जो हवाएँ बहती हैं, उससे बचाता है और ज़िन्दा रखता है।
दो-हज़ार-बारह से मैंने विश्व की सारी कम्पनियों को लिखना शुरू किया था कि वो लोग मेरे लिए एक जैकेट बनायें जो जीव हत्या से मुक्त हो। पर ज़्यादातर कम्पनियों ने बोला कि आर्थिक रूप से असम्भव है, किसी ने बोला कि तुम एक ही बन्दे हो जो पूरी दुनिया में ये जैकेट माँग रहे हो, बाक़ी कोई माँग भी नहीं रहा है। किसी ने बोला कि ऐसी तकनीक ही उपलब्ध नहीं है तो ये जैकेट बन नहीं सकता।
चार साल हो गये और मैंने एक प्रकार से इस प्रयास को छोड़ दिया था। अपने सपने को साकार करने के लिए एवरेस्ट पर चढ़ गया। जिससे कम-से-कम ये निश्चित हो जाएगा कि एक वीगन एवरेस्ट पर चढ़ सकता है। उस समय पर समझौता कर लिया। उसके बाद ठीक से सो नहीं सका, क्योंकि ज़मीर हमेशा बोलता था, ‘वीगन नहीं थे, जब एवरेस्ट पर चढ़े थे।’
दो-हज़ार-उन्नीस में एक इटेलियन कम्पनी के साथ मिलकर जीव हत्या मुक्त जैकेट बनाया, और वो जैकेट पहनकर मैं एवरेस्ट चढ़ा। और तब मैंने सबको बता दिया कि वीगन की तरह मैंने एवरेस्ट चढ़ लिया। मैं पूर्णता की बात नहीं कर रहा हूँ। मैंने सौ से ज़्यादा प्रतिशत प्रयास डालकर किया।
एक डर लगता है कि भविष्य में भी कुछ ऐसा आया तो क्या मैं अपनी नैतिकता के साथ समझौता कर लूँगा? और एक दुविधा मेरे दिमाग़ में रहती है कि मैंने वो क्यों किया। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्यों मैंने अपने सपने को जानवरों की जान के ऊपर रखा। मैं उसका समाधान नहीं कर पा रहा हूँ।



