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एक मुर्गे से सीख लेते थे आचार्य प्रशांत? || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मुझे आपके गुरु के बारे में जानना था। आपने एक वीडियो में बताया था कि आपके टीचर एक मुर्गे हुआ करते थे। उनका नाम 'जीतू' था। तो उन्हीं के बारे में जानना था।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि जैसे लोग किसी को अपना गुरु मानते हैं, उसी अर्थ में मैंने जी-२ मुर्गे को गुरु मान रखा था।

बहुत सारी बातें हैं जो अपने बारे में पता चल जाती हैं—अगर प्रकृति को देख रहे हो। प्रकृति के पास जाने से फायदे ही यही हैं न? एक तो ये पता चल जाता है कि अपनी वृत्तियाँ कैसी हैं, और दूसरा ये पता चल जाता है कि जिसको हम अपना मन या अपनी हस्ती कहते हैं, उसमें से कितना कुछ प्राकृतिक नहीं है, सामाजिक है। तो बहुत सारे जानवर रहे हैं मेरे साथ, अभी भी हैं, उनमें से एक जी-२ भी था।

उसका नाम ‘जीतू’ नहीं था, उसका नाम था ‘जी-2’। क्यों था? क्योंकि उसका वास्तविक नाम था ‘जी-जी’, बाद में जी-जी बन गया ‘जी-2’। अब जी-जी क्या होता है? जो लोग उन दिनों बोधस्थल में रहे हैं, वो जानते हैं कि जी-जी में पहला ‘जी’ तो ‘जनरली’ था, दूसरा ‘जी’ मैं लिहाज़ के नाते थोड़ा बदलकर बता देता हूँ—‘जनरली गुमशुदा’।

तो वो क्या करता था कि चल रहा है—सीधा चलता जा रहा है, और जाकर खंबे से टकरा जाए। ऐसा नहीं था कि उसकी आँखों में कोई समस्या थी। तो मैं बैठा देखता रहूँ। ये करने में मुझे बड़ा आनंद रहता है कि देखो चल क्या रहा है! उसको देखूँ मैं—वो चलता जा रहा है, गमले हैं, बाकी सब चीज़ें हैं, वो चलता गया, बीच में खंबा खड़ा है, जाकर उससे भीड़ गया। और फिर परेशान हो रहा है जैसे खंबे ने आकर उसको मार दिया हो। वो बोल रहा है—“पक पक पक पक पक”, खंबे को दो-चार चोंच भी मार दी।

वो उस मुर्गे की ही कहानी नहीं, वो हम सब की कहानी है। ऐसे ही हैं न हम? हम सब भी तो जी-२ ही हैं, ‘जनरली गुमशुदा’। कहाँ हमें पता होता है?बिल्कुल ऐसे ही एक मौके पर मैं बैठा देख रहा हूँ—एक लकड़ी का खंबा हुआ करता था, वो आ रहा है, और खंबे से भिड़ गया। तो मैंने कहा, "ये तो ‘जी-२’ है।" फिर लोगों ने उसका ‘जीतू’ बना दिया।

ऐसे ही वो और भी काम करता था। उसे जब संगत चाहिए होती थी, तो जिनको वो जानता था, जैसे अगर मैं बैठा हूँ कुर्सी पर तो पास आए और छलांग मारकर, उड़कर सीधे गोद में बैठ जाए। तो अब ये काम है। आप बैठे हुए हो, साहब आपकी गोद में बैठ गए हैं—साधिकार। और संगति ही चाहने के लिए जिनको वो जानता नहीं था, उनको दौड़ा लेता था।

आप अगर बोधस्थल आ रहे हो, तो पहले आपको जीतू से होकर गुज़रना पड़ता था। आप उसको पसंद आ गए तो प्रवेश मिल जाएगा, नहीं तो आप दौड़ाए जाएँगे। बहुत लोगों की फोटो हैं, वीडियो हैं। बिचारे आते थे सोचकर कि ध्यान करेंगे, कुछ भक्ति का माहौल होगा, और यहाँ वीडियो बन रहा है जिसमें एक मुर्गा दौड़ा रहा है उनको —“ये तो सोचा ही नहीं था कि ऐसा अनुभव होगा, ये आध्यात्मिक जगह है कि क्या है? यहाँ मुर्गें पाए जाते हैं!”

बहुत चीज़ें हुईं थी, हमारे ही कुत्ते थे दो। बंधे नहीं रहते थे। खुले अपना घूमते थे, बीच-बीच में आते थे। एक दिन उनमें से एक ने जीतू पर हमला कर दिया। मैं सो रहा था, उसकी पक-पक-पक की आवाज़ आई, खुला घूमता था तो उठकर जाकर देखता हूँ तो ‘कोहम’ नाम का कुत्ता था हमारा, वो जीतू पर धीरे-धीरे आक्रमण कर रहा है, पंजों से पंखों पर वार कर रहा है। ये बात अजीब थी, होनी नहीं चाहिए थी। फिर गौर से देखा तो पता चला कि कोहम साहब ने एक ‘मिसेज़’ कर ली हैं, और उनको साथ लेकर आ गए हैं, एक कुतिया बगल में खड़ी हुई थी।

प्रकृति का एक और राज़ खुल गया—सारी दोस्ती, सारी पहचान और अपनापन सब गायब हो जाते हैं जब आप गर्लफ़्रेंड कर लेते हैं। ऐसे ही सब चलतीं रहती थीं। उस हमले के बाद बड़ी मुश्किल से उसकी जान बची। पाँच-सात चक्कर लगे डॉक्टर के, बहुत तरह की दवाइयाँ दीं, फिर उसकी बच गई थी जान।

वैसे ही किसी भी पशु को देखो, बहुत कुछ पता चलेगा—पशु के बारे में कम, अपने बारे में ज़्यादा, क्योंकि वो जानवर हमारे भीतर भी मौजूद है। सब जानवर एक हैं, और सब जानवर हम में मौजूद हैं। सब जानवर हम में पूरे-पूरे मौजूद हैं। बस हम में कुछ ऐसा है जो जानवरों में नहीं है। हम में थोड़ी बेचैनी ज़्यादा है। जानवरों में इतनी बेचैनी नहीं होती है। जानवरों को खाना-पीना वगैरह मिल जाए ठीक-ठाक, तो वो संतुष्ट रह जाते हैं; हम उतने में संतुष्ट रह नहीं पाते। हमें कुछ और चाहिए जीवन से। वरना अपनेआप को जानने का बहुत अच्छा तरीक़ा है—पेड़ को देख लो, पत्ते को देख लो, किसी भी जानवर को देख लो। यहाँ कि बंदरों को देख लो, बहुत कुछ जान जाओगे।

कई बार वो चीज़ें सीधे-सीधे ख़ुद में देखने में बड़ी शर्म आती है कि, “हम ऐसे हैं क्या?”, पर वही चीज़ जब जानवर में देखो लो, तो स्वीकार करना आसान रहता है कि “अच्छा, जानवर ने ही तो करा।” सीधे ही बता दिया जाए कि वो जानवर ने नहीं करा है, वो दुनिया का हर इंसान कर रहा है, तो हम विरोध करेंगे।

कसाई के पास से छूटकर भागा था जीतू। खैर, वो तो शायद तुम ये सवाल पूछ रहे हो तो वह वीडियो देखकर ही पूछ रहे हो *(वीडियो - जीतू मुर्गे की अमर कहानी)*।

जैसे प्रकृति में सब कुछ ही ‘जीना’ चाहता है न, वैसे ही हम भी जीना चाहते हैं। इसे 'जिजीविषा' बोलते हैं। हम जीना चाहते हैं। बस जो बाकी जानवर हैं वो इसलिए जीते रहना चाहते हैं ताकि खाएँ-पिएँ, मस्त रहें, संतान पैदा करें—वास्तव में उनके पास कोई उद्देश्य होता नहीं। हमें इसलिए जीना है ताकि हम जीवन से मुक्त हो सकें। यही नर और पशु के बीच का अंतर है।

पशु को यूँ  ही जीना है। उससे पूछो—"क्यों जी रहे हो?" तो उसके पास कोई कारण नहीं, कोई जवाब नहीं। और आदमी को जीना है ताकि ज़िंदगी से ही आज़ाद हो सके। ये आदमी के जीवन का उद्देश्य है। और अगर कोई आदमी ऐसा है जिसके जीवन में ये उद्देश्य नहीं है, तो वो पशु समान है। खाने-पीने के लिए और परिवार बढ़ाने के लिए तो जानवर भी जीते रहते हैं न? और अगर कोई इंसान भी ऐसे ही जी रहा है बस कि कमाओ-खाओ, परिवार बढ़ाओ—तो वो इंसान है ही नहीं, वो जानवर है। कोई जानवर, ‘जानवर’ हो तो इसमें कोई हीनता की बात नहीं, क्योंकि जानवर तो जानवर ही होगा। पर इंसान जानवर हो जाए तो ये बड़े अफ़सोस की बात है, क्योंकि ऐसा इंसान अब बड़ा दुःखी रहेगा।

हम आमतौर पर जब किसी को गाली देते हैं और कहते हैं—“तू आदमी नहीं, दरिंदा है। तू आदमी नहीं कुत्ता है; भेड़िया है,” तो ये सब हम तभी करते हैं न जब उसने कोई हिंसा वगैरह करी हो? हम आदमी को जानवर तभी बोलते हैं जब उसने हिंसा इत्यादि कुछ करी हो। ये बड़ी भूल है हमारी। जानवर होने का लक्षण यही भर नहीं है कि हिंसा कर दी, जानवर होने का बड़े-से-बड़ा लक्षण ये है कि खाया-पीया, मौज मनाई, बच्चे पैदा करे।

लेकिन कोई जाकर किसी की थाली में से खाना छीन ले, लूट ले, तो हम तुरंत कह देंगे कि —"ये तो ‘कुत्तों’ वाली हरकत है।" लेकिन कोई रोज़ नौकरी करता है, कमाता है, खाता है, पड़ा हुआ है, और मौज मना रहा है, चीज़ें खरीदता है उपभोग की, बीवी है, बच्चे हैं—तो हमारे मन में ही नहीं आता कि इसको कहें कि—“तू जानवर है।” जब कि बड़े-से-बड़ा जानवर तो ऐसा आदमी है जो बढ़िया जॉब करता है, कमाता है और ऐश काटता है। इससे बड़ा जानवर कौन होगा?

ये सब बातें समझ में आएँगी अगर जानवरों के साथ रहा करोगे। और जितना जानवरों के साथ रहोगे, जितना देखोगे कि हम भी जानवर ही हैं, बिलकुल हमारे ही जैसा है वो, भाई है, उतना ही फिर मुश्किल हो जाएगा जानवर को दुःख देना, बांधना, उसका शोषण करना, या उसे काटकर खा जाना। अभी तो ऐसा लगता है न कि जानवर नहीं है कोई दूर की चीज़ है; बाहरी चीज़ है, पराया लगता है। तभी तो उसे काटकर खा जाते हो।

भई, इंसान ही इंसान को क्यों नहीं खाता? अगर माँस ही चाहिए, तो आदमी को काटकर क्यों नहीं खाते? क्योंकि कहते हो, “ये जो इंसान है, ये मेरा भाई है।” यही कहते हो न कि ये तो अपनी जात का है? कह देते हो कि —"ये जो है वो आदमज़ाद है, आदमज़ाद को कैसे खा लें? ये तो हमारा ‘अपना’ है।" और जानवर को कह देते हो कि — जानवर ‘पराया’ है, किसी और प्रजाति का है। लेकिन जानवरों के साथ रहो, उनको देखो, तो तुम्हें समझ आएगा कि ये ‘प्रजाति’ वगैरह का अंतर बहुत छोटी बात है। हम और जानवर बिल्कुल एक हैं। उसके बाद जानवर को काटकर खाना उतना आसान नहीं होगा।

जानवर को काटकर खाने के लिए भी बड़ा अहंकार चाहिए—क्या अहंकार? कि हम तो जानवर से अलग हैं, ऊँचे हैं। और जब दिखाई पड़ जाए कि अलग हैं ही नहीं, ऊँचे हैं ही नहीं, उसी जानवर जैसे हैं, बल्कि हो सकता है उससे भी गए गुज़रे हैं, उससे भी नीचे के हैं, तो फिर कैसे जानवर को अलग मानोगे या नीचा मानोगे? कैसे उसे काटकर खा पाओगे? अभी तो बड़ी धौस के साथ कह देते हो न, कि “क्या है, बकरा ही तो है, मछली ही तो है—‘काट’ दो।” जब दिखने लगेगा कि बकरा बिल्कुल भाई है, उसकी भी चेतना बिल्कुल तुम्हारे ही जैसी है; जब अपनी दिनभर की हरकतों को देखोगे और ईमानदारी से कहोगे कि, "बड़े-से-बड़ा बकरा तो मैं ख़ुद हूँ, और वो जो कसाई की दुकान वाला बकरा है, वो तो एक बार में कट जाता है, मैं तो रोज़ कटता हूँ। अगर कसाई वाला ‘बकरा’ है, तो मैं तो ‘महा-बकरा’ हूँ," अब बकरे को कैसे काट दोगे? क्योंकि फिर बकरे को काटने का मतलब होगा ख़ुद को काट देना। फिर बकरे को काटते हुए वैसे ही दिक़्क़त हो जाएगी जैसे किसी आदमी को काटते हुए होती है। आदमी को नहीं खा पाते न?

ये जितने माँसवादी लोग हैं, मैं इनसे पूछता हूँ—“आदमी को क्यों नहीं खाते? दुनिया में सबसे ज़्यादा तो आदमी हो गए हैं अभी, इनको क्यों नहीं खाते?" तब उनके पास कोई जवाब ही नहीं होते। अन्यथा वो बहुत कूद-कूद के बताएँगे—“प्रोटीन चाहिए होता है, ओमेगा-3 फैटी एसिड चाहिए होते हैं। ये चाहिए, वो चाहिए। इसके लिए तो माँस खाना बहुत ज़रूरी है न?” अच्छा, तो आदमी को ही खा लो फ़िर, क्या समस्या है? वैसे भी जितनी नफ़रत आदमी-को-आदमी से है, उतनी किसी और से है नहीं। तो जिनसे नफ़रत है, उन्हें मारते तो हो ही, काट देते हो—बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ होती हैं, लाखों मरते हैं, दंगे होते हैं, लाखों मरते हैं, तो जिनको मार ही रहे हो, उन्हें खा भी लिया करो। खा काहे नहीं लेते? “भई, हम तो औपचारिक तौर पर मारते हैं न लोगों को।” कभी किसी को फाँसी दे दी, कभी युद्ध में मार दिया, दंगों में मार दिया—हज़ार तरीक़े से मारते हैं। तो ये सब जो मर रहे हैं, इनका माँस खाते क्यों नहीं हो? प्रोटीन ख़ूब मिलेगा।

तब कहेंगे—“नहीं नहीं, आदमी का माँस नहीं खा सकते।” हाँ, तो तर्क बताओ, तर्क क्या है? आदमी का माँस क्यों नहीं खा सकते? कम-से-कम जो लोग बीमारी से मर गए हैं—अस्पताल में, उनका माँस खा लो। उनको तो तुमने मारा भी नहीं। कहेंगे—“नहीं, आदमी का नहीं खा सकते।” क्यों नहीं खा सकते? खाओ, प्रोटीन मिलेगा प्रोटीन।

डॉक्टर बताया करते हैं न कि - "देखिए माँस नहीं खाएँगे तो कहाँ से आएगा प्रोटीन, कहाँ से आएगा कैल्शियम, बी-12 की बड़ी कमी हो जाएगी।" तो इतने अस्पतालों में इतने लोग मरते हैं, इन्हीं डॉक्टरों से बोलो कि उन्हीं का माँस खिलाया करें मरीज़ों को। काहे नहीं खिलाते?

क्योंकि बात चेतना की है। जिसकी चेतना तुम्हारे जैसी है, तुम उसका माँस नहीं खा पाओगे, क्योंकि उसका माँस खाने का मतलब होगा अपना माँस खाना। गौर से देखो, इतने अंधे मत बने रहो। देखो कि जानवरों की चेतना भी बिल्कुल तुम्हारे जैसी है, फिर नहीं खा पाओगे जानवरों को। तो पूछते हैं फिर कि वो लेकिन पेड़-पौधे खाते हैं तो उसमे भी तो पेड़-पौधे मरते हैं न? हाँ, बिल्कुल सही बात है। मैं फिर पुरानी बात पर आऊँगा—जैसे तुम कह रहे हो कि पेड़-पौधे खाने से भी तो कोई मारता ही है—तो फिर आदमी को ही खा लो।

बात इसकी नहीं है कि कोई मारता है; बात इसकी है कि कौन मरता है। पेड़-पौधे चेतना के न्यूनतम स्तर पर होते हैं। जो निचले-से-निचला स्तर हो सकता है चेतना का, उसपर होते हैं पेड़-पौधे। और उनको खाना तुम्हारी हस्ती को बचाए रखने की न्यूनतम और अनिवार्य आवश्यकता है। उतना भी नहीं खाओगे तो तुम्हारा ही शरीर गिर जाएगा। फिर तुमने दूसरे को नहीं मारा, खुद को मार दिया। तो इसलिए पेड़-पौधों को खाना पड़ेगा, हालांकि उनको खाने में भी जैसे-जैसे तुम्हारी समझ बढ़ेगी, तुम्हारी चेतना बढ़ेगी, तुम निश्चित रूप से ये चाहोगे कि फल ज़्यादा खाओ। सब्ज़ी- शाक भी वो खाओ जिसमें कि पौधे को या पेड़ को काट ही न देना पड़े। पर वो बहुत आगे की बात है। कम-से-कम अभी ये कुतर्क बंद करो कि— बकरा काटकर खाना और आलू खाना एक ही बात है, क्योंकि दोनों में ही जान तो जा ही रही है न। ये बहुत मूर्खतापूर्ण कुतर्क है।

अगर आलू बराबर बकरा, तो इसी तर्क को आगे बढ़ा दो, बकरा बराबर इंसान। तो अगर आलू खाने से बकरा खाना जायज़ हो गया, तो बकरा खाने से इंसान खाना भी जायज़ हो जाना चाहिए। तो इंसान को भी खाओ न फिर। नहीं, ऐसा नहीं है, हमें कहीं-न-कहीं पर रेखा खींचनी पड़ती है कि क्या खाएँगे, क्या नहीं खाएँगे। रेखा तो माँसभक्षी भी खींचते हैं—वो कहते हैं न कि ‘इतने-इतने जानवर खा लेंगे, और ये जानवर नहीं खाएँगे’। रेखा खींच तो रहे ही हो, कुछ प्राणियों को तो छोड़ ही रहे हो, कि इनको नहीं खाना चाहिए। जैसे कुछ प्राणियों को छोड़ते हो न कि इनको नहीं खाना चाहिए, वैसे ही सब प्राणियों को छोड़ दो कि इनको नहीं खाना चाहिए। जीवित रहने के लिए जो न्यूनतम हिंसा करनी पड़े, उतनी ही करो। अगर न्यूनतम हिंसा कर रहे हो तो फिर वो हिंसा नहीं कहलाती, वो अनिवार्यता हो जाती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अवधूत गीता में जानवरों से कई मौक़ों पर सीख लेने के उदाहरण हैं। पर आज इंसान जानवर को गुरु तो दूर, जीव भी मानने को तैयार नहीं है। आज जानवरों के प्रति जो हिंसा हो रही है, उससे मैं बहुत व्याकुल हूँ। उस हिंसा के सामने अपना व्यक्तिगत दुःख बहुत छोटा लगता है। ऐसे में मैं अवधूत गीता की सहायता कैसे लूँ कि जितना हो सके, जो सही काम है, उसे करने की माध्यम बनूँ।

आचार्य प्रशांत: देखिए,

सच और अहिंसा साथ चलते हैं। अहिंसा अद्वैत का ही दूसरा नाम है। जहाँ द्वैत है, वहाँ हिंसा होगी-ही-होगी। तो जो कोई शास्त्रों की तरफ़ आ रहा है, भले ही उसकी नीयत न हो अहिंसक होने की, लेकिन वो अहिंसक स्वयमेव हो जाएगा। ये हो नहीं सकता कि आपको जीवन का, मन का, अंतर्जगत का सच पता हो, उसके बाद भी आप जानवरों की तरफ़़ हिंसक हो पाएँ।

तो अगर आप पाएँ किसी को कि वो दनादन मुर्गा, बकरा, सांप, पक्षी, बतख़, ख़रगोश उड़ाता रहता है, माँस में ही मुँह दिए रहता है, कहता है—“ये तो ‘फूड’ है”, और कहता है कि “अरे, मैं क्या खा रहा हूँ ये तो मेरी ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ की बात है न, ये तो मेरा व्यक्तिगत मसला है, इसमें तुम क्यों कुछ बोल रहे हो?”, तो ऐसे आदमी को समझ लीजिएगा कि ये बहुत आंतरिक नशे में जी रहा है। क्योंकि बात सिर्फ़ जानवर को काटकर खा जाने की नहीं है, अहिंसा बताती है कि असत्य मौजूद है। अहिंसा इशारा है कि जीवन में झूठ बहुत मौजूद होगा। क्योंकि जैसा हमने कहा, सच और अहिंसा साथ में रहते हैं।

हिंसा जहाँ है, वहाँ झूठ होगा-ही-होगा। हिंसा की मौजूदगी इशारा है झूठ की ओर; असत्य की और। जिसको देखो कि वो जानवरों का माँस खाने में ज़रा संकोच नहीं करता, भकाभक खाए जाता है, उसको जान लेना कि ये आदमी गहरे नशे में है और बड़े आंतरिक दुःख की ज़िंदगी जी रहा होगा। और न सिर्फ़ ये दुःखी है, बल्कि ये ख़तरनाक है, क्योंकि ये आदमी अपने लिए तो दुःख का निर्माण करेगा ही, दूसरों में भी दुःख बाँटेगा। ये आदमी पूरी दुनिया के लिए दुःख का कारण बनेगा। भले ही ये मुर्गा चबाते वक़्त ठहाके मार रहा हो, भले ही उसकी शक्ल पर खूब हँसी-ठट्ठा हो, लेकिन ये आदमी ख़तरनाक है, ये भरोसे का नहीं हो सकता। ये आदमी कभी प्रेम नहीं जानेगा, ये आदमी अपनी औलाद के प्रति भी प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता। कोई वजह थी कि कबीर साहब को इतने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा।

माँसाहारी मानवा परतछ राक्षस संग।

उसकी संगति मत करो, पड़त मनन में भंग।।

~ गुरु कबीर

ये ‘मनन’ को ‘भजन’ भी कई बार कहते हैं।

जो माँसाहारी आदमी है, ये सीधे-सीधे राक्षसी है; इसकी संगति से भी बचना। ये अपने लिए तो ख़तरनाक है ही, ये तुम्हारे लिए भी बहुत ख़तरनाक हो जाएगा। तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी सुंदर होगा, ऊँचा होगा, शुद्ध होगा, ये माँसाहारी आदमी उसके विरोध में खड़ा हो जाएगा।

तो ये भी मत कह देना कि “नहीं भई, अपना-अपना विचार है, अपनी-अपनी ज़िंदगी, अपने-अपने चुनाव हैं। मैं तो देखो बैठ के अपना शाकाहारी भोजन करता हूँ, और मेरे बगल में कोई बैठकर अगर मटन बिरयानी खाता है तो ये तो उसका अपना व्यक्तिगत चुनाव है न। मैं कैसे निर्धारित कर सकता हूँ कि किसकी प्लेट पर क्या है?” तुम ये भले न निर्धारित कर पाओ कि किसकी प्लेट पर क्या है, पर इतना तो निर्धारित कर सकते हो न कि तुम उससे दूर हो जाओगे जिसकी प्लेट पर मटन रखा हो? उसकी संगति मत करो—“*पड़त मनन में भंग*”; मनन में भंग पड़ेगा, माने कुछ समझ में नहीं आएगा तुम्हें। इस आदमी की संगति करोगे तो तुम्हारे सोचने-विचरने की पूरी शक्ति ठप पड़ जाएगी। उसकी संगति बड़ी ज़हरीली है, बचना।

अरे! बक्श दो बेचारे मुर्गे को, मुर्गे को तो ऐसा बना लिया है जैसे वो पैदा ही हुआ है कटने के लिए। और बात सही भी है! ज़बरदस्ती ही तो पैदा किए जा रहे हैं, जैसे फैक्ट्रियों में माल तैयार होता है। करोड़ों मुर्गे रोज़ कट रहे हैं, वो कोई प्राकृतिक तरीक़े से थोड़ी पैदा होते हैं। उन्हें तो ज़बरदस्ती पैदा किया जाता है।

अध्यात्म एक ‘बूटी’ है जिसके फायदे हज़ार हैं। सच आएगा जीवन में तो अहिंसा भी आएगी, अवैर भी आएगा, अपरिग्रह भी आएगा, अस्तेय भी आएगा। ये सब गुण अपनेआप आ जाते हैं।

तो ये मत सोचिए कि अष्टावक्र गीता का इस्तेमाल करके जानवरों को कैसे बचाएँ। जानवर कट ही इसलिए रहे हैं क्योंकि आदमी के जीवन में ‘सच’ नहीं है। हम जानते ही नहीं हैं कि—हम हैं कौन? हम जानते ही नहीं है कि—‘खाना’ माने होता क्या है? अंधों की तरह कुछ भी मुँह में डाले जा रहे हैं।

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