आज के समय में माँस का भक्षण किसी का निजी मसला नहीं है। आपको इस बात की परवाह करनी होगी कि किसी की थाली में क्या है, क्योंकि दूसरा जो खा रहा है, उसका असर पूरी दुनिया पर, पूरे पर्यावरण पर और हर एक की ज़िंदगी पर पड़ रहा है। माँस-भक्षण इस समय दुनिया की सबसे घातक बीमारी है। पृथ्वी की नदियाँ, पहाड़, पर्यावरण, हवा, तापमान, सब कुछ तबाह हो गए — सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आदमी को माँस खाना है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, 'भोजन' और 'अध्यात्म' बहुत बातें होती है इस पर — यह मत खाओ, वह मत खाओ, शरीर शुद्धि इत्यादि। कृपया प्रकाश डालें इस विषय पर।
आचार्य प्रशांत: "जल्दी से खाओ और आगे बढ़ो, बहुत काम करना है" — मेरे देखे तो अध्यात्म और भोजन का यही संबंध है। "जो खाना है जल्दी से खाओ बेटा, काम बहुत करना है, घंटे-भर बैठकर खाते ही ना रहो!" तो मुझसे पूछेंगे अगर, "अध्यात्म में भोजन का क्या महत्त्व है?" तो मैं यही कहूँगा कि भोजन का यही महत्त्व है कि जल्दी-से-जल्दी निपट जाए, ताकि जो करना है उसके लिए समय रहे।
ऐसे भी आध्यात्मिक लोग होते हैं जो दिनभर भोजन का ही प्रबंध करते रहते हैं, जो कहते हैं, "भोजन ऐसे तैयार होना चाहिए, वैसे तैयार होना चाहिए, यह स्वच्छता होनी चाहिए, ऐसे पाक-साफ़ होना चाहिए।" उनसे पूछो, "तुम दिन भर कर क्या रहे हो? देह की तैयारी। यही तुम्हारा अध्यात्म है?"
प्रश्नकर्ता: तो इससे तमोगुण पर कोई असर नहीं पड़ता?




