सुनो, निब्बों! || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी दिल्ली महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आईआईटी रुड़की (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की) में ‘आज़ाद भवन’ नामक एक छात्रावास है, जो कि अभी तक पूरा शाकाहारी था, वहाँ के भोजनालय में माँसाहारी खाना नहीं मिलता था। अभी दो दिन पहले ख़बर आयी है कि वहाँ भी माँसाहारी खाना मिलना शुरू हो गया है, हफ्ते में दो बार। उस पर वहाँ के छात्रों ने विरोध भी किया लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गयी। मैंने भी ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रूड़की’ से पढाई की है, वर्ष २०१३ से लेकर २०१७ तक मैं कैंपस (संस्थान क्षेत्र) में था। तो मुझे याद है कि २०१५ तक पूरा कैंपस ही शाकाहारी था। किसी छात्रावास में, किसी भोजनालय में, किसी कैंटीन (जलपानगृह) में माँसाहारी खाना नहीं मिलता था। २०१५ में पहली बार विरोध करके एक-दो छात्रावास में शुरू करवाया गया था और अब वहाँ के हर एक छात्रावास में माँसाहारी खाना मिलना शुरू हो गया है। एक आख़िरी छात्रावासथा जो पूरा शाकाहारी था, वहाँ भी शुरू करवा दिया गया है।
तो सात सालों के अन्दर एक पूरा शाकाहारी कैंपस माँसाहारी बन गया है। तो मैं इस बात को समझ नहीं पा रहा हूँ कि विरोध तो दोनों तरफ़ से होता है; शाकाहारी भी करेंगे, माँसाहारी भी; तो सात साल में ऐसा क्या हुआ कि पूरा कैंपस ही उन्होंने माँसाहारी बना दिया।
मेरा इस पर एक और सवाल है जो यह है कि पूरा कैंपस जब शाकाहारी भी था, तब भी वहाँ की कैंटीन और वहाँ के भोजनालय में अंडे मिलते थे। तो क्या अंडा मिलना ये शाकाहारी है या यह भी माँसाहार में आता है? क्योंकि वो अंडे को माँसाहार में नहीं गिनते थे। ये दो मेरे सवाल हैं।
आचार्य प्रशांत: देखो, आईआईटी कैंपस की बात कर रहे हो। वहाँ पर जवान स्टूडेंट्स (विद्यार्थी) हैं। ठीक है? आप सत्रह-अठारह की उम्र में कैंपस में जाते हो और यही जो इक्कीस-चौबीस-पच्चीस की उम्र तक कैंपस में रहते हो। तो जो बदलाव आया है इधर पिछले पाँच-सात सालों में, वो ज़्यादा आया है इस पीढ़ी के दिमाग़ में, इस पीढ़ी की संस्कृति में। ये जो पीढ़ी है, ये ज़बर्दस्त तरीक़े से उथली हुई है। इसके मूल्य में गिरावट आयी है। और जहाँ तक मैं देख पाता हूँ, उसके बहुत कारण हैं। लेकिन एक जो बड़ा कारण है, वो है सस्ता और फ़्री डेटा।



