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क्या प्रकृति हिंसा से भरी हुई है? मनुष्य के लिए माँसाहार उचित है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर को करुणा का सागर कहा गया है, परंतु दुनिया में हर तरफ़ हिंसा ही दिखाई देती है। जीवों की रचना में एक ओर तो हिरण है और दूसरी ओर शेर है। हिरण मासूम है फिर भी शेर उसे बहुत बुरी तरह मारकर खा जाता है। हिरण है तो रचना तो सुंदर है परंतु शेर जैसा हिंसक जानवर देखकर उसकी सुंदरता और करुणा समझ नहीं आती। कृपा मार्ग दर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: ये देखने का फेर है। मैं माँसाहार का धुर- विरोधी हूँ, मैं दूध पीने तक को मना करता हूँ, उसका मतलब ये नहीं है कि मैं जानवरों के एक वर्ग का हिमायती हूँ और दूसरे वर्ग का दुश्मन हूँ। तुम हटा दो सब शेर-चीते, तो तुम्हें क्या लग रहा है जंगल बचेंगे? और जब जंगल ही नहीं बचेंगे तो हिरण और ख़रगोश कहाँ से बचेंगे? हिरण, ख़रगोश आपको मासूम लगते हैं, मासूम वो हैं भी एक दृष्टि से, पर अगर शेर नहीं हैं और चीता नहीं हैं तो ये हिरण और ख़रगोश इतने हो जाने हैं कि जंगल ही नहीं बचेगा, और जंगल ही नहीं बचेगा तो ना जाने कितनी प्रजातियाँ ख़तम हो जाएंगी। तो ये तो फिर ख़रगोश ने बड़ी हिंसा कर दी; ख़रगोश के हाथों ना जाने कितनी प्रजातियाँ ख़तम होंगी। ये मत कह दीजिए कि ख़रगोश मासूम है और शेर गब्बर है। शेर भी मासूम है, ख़रगोश भी मासूम है, ये तो प्रकृति वाली मासूमियत है, इसमें क्या किसी को ज़िम्मेदार ठहराएँ।

वास्तव में ये जो शब्द है ‘मासूमियत’ या ‘इनोसेंस’, ये प्रकृति पर लागू होते ही नहीं। प्रकृति में तो मशीनें हैं; यंत्रवत काम चलता है, जो जैविक रूप से जैसा बना है जैनेटिकली, वैसा ही चलेगा। तो वहाँ किसी को क्या अच्छा, किसी को क्या बुरा बोलना। एक तरह की मशीन शेर है, एक तरह की मशीन ख़रगोश है। इनोसेंस या गिल्ट, इनोसेंस या करप्शन, निर्दोषता या दोष, ये शब्द सिर्फ मनुष्य पर लागू होते हैं। मनुष्य अकेला है जो निर्दोष कहा जा सकता है और मनुष्य अकेला है जो दोषी हो सकता है। शेर हिरण को मार दे तो दोषी नहीं कहलाया जा सकता। मनुष्य हिरण को मारेगा तो दोषी कहलाएगा क्योंकि मनुष्य के पास वो चेतना है जो जान सकती है और सही चुनाव कर सकती है। शेर के पास तो बस प्रकृति है और प्रकृति प्रदत्त संस्कार हैं। तो शेर चुनाव कर ही नहीं सकता, उसको दोषी क्या ठहरा रहे हो? हाँ, इंसान मारेगा अगर शेर को, चाहे हिरण को, चाहे ख़रगोश को, चाहे हाथी को, तो इंसान ज़रूर दोषी ठहराया जाएगा क्योंकि इंसान के पास विकल्प था। तुम चाहते तो नहीं मारते, पर फिर भी तुमने मारा, तुम दोषी हो। शेर को दोषी क्यों बोल रहे हो? और भूलना नहीं कि जंगल में सबका होना ज़रूरी है। वास्तव में कई ऐसे जंगल हैं जिनको पुनर्जीवन तब मिला जब उसमें शेर-चीते पुनः प्रविष्ट कराए गए। जब शेर-चीते पुनः आए तो वहाँ पर जो अन्य प्रजातियाँ थीं, घास-पत्ती खाने वाले पशुओं की, वो फिर थोड़ी कम हुईं। जब वो कम हुईं तो वहाँ पर पेड़-पौधे बढ़े क्योंकि अगर घास खाने वाले और पौधे खाने वाले पशु अनियंत्रित गति से बढ़ते रहे तो तुम मुझे बताओ कि घास कहाँ बचेगी और पेड़ और पौधे कैसे बचेंगे?

तो पेड़ और पौधों को कौन बचाता है? शेर बचाता है। तो हिरण और ख़रगोश की तो इतनी परवाह कर रहे हो, पेड़- पौधों की भी तो परवाह कर लो, पेड़-पौधों का दोस्त कौन हुआ? शेर। लेकिन शेर मार दे हिरण को, फिर कह रहा हूँ, कोई बात नहीं, तुम मत मार देना हिरण को।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, परंतु यही तर्क माँसाहार खाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है कि अगर लोग माँस नहीं खाएँगे तो जानवरों की प्रजाति अनियंत्रित हो जाएगी।

आचार्य प्रशांत: ये बात क्या परम मूर्खता की नहीं है? तुम मुर्गियाँ ज़बरदस्ती पैदा कर रहे हो अपने खाने के लिए। मुर्गी क्या जंगल से ला रहे हो तुम कि अपनेआप बढ़ी जा रही हैं वो? मुर्गी तो बेचारी खत्म ही हो जाए अगर तुम्हारे ये पोल्ट्री फार्म बंद हो जाएँ। तुम उनको ज़बरदस्ती पैदा कर रहे हो अपने खाने के लिए और फिर कह रहे हो कि नहीं हम खाएंगे नहीं तो ये ख़तम हो जाएंगी। वो तो कम ही पड़ रही हैं, तभी तो तुम्हें और ज़्यादा पैदा करनी पड़ रही हैं। तुम तो अंडों का यंत्रीकृत उत्पादन कर रहो हो क्योंकि ना करो तो उतने अंडे मिलेंगे ही नहीं।

तुमने जंगल में किसी जानवर की तादाद को बेतरतीब बढ़ते देखा है क्या? प्रकृति संतुलन रखना खूब जानती है और अगर तुम्हें संतुलन ही रखना है तो सिर्फ़ मुर्गे और बकरी का क्यों रखते हो? करोड़ों प्रजातियाँ हैं जानवरों की, सबका संतुलन रखो, सब खाया करो। तुम यही तर्क कुत्तों पर क्यों नहीं लगाते कि अगर हम कुत्ते नहीं खाएंगे तो कुत्ते बेहिसाब बढ़ जाएंगे? यही तर्क हाथी पर क्यों नहीं लगाते? हाथी भी खाओ! यहीं तर्क कीड़ों पर क्यों नहीं लगाते, मकड़े पर क्यों नहीं लगाते? मकड़े भी खाओ! “अगर हम मकड़े नहीं खाएंगे तो मकड़े बेहिसाब बढ़ जाएंगे” — पहली बात तो ये तर्क लंपटपने का है क्योंकि आप ज़बान के स्वाद से प्रेरित हो और दूसरी बात इस तर्क में बड़ी बौद्धिक मूर्खता है; बौद्धिक तल पर ये अतिक्षीण तर्क है।

दो ही प्रजातियाँ हैं क्या दुनिया में कि जिनको मारने की ज़रूरत है ताकि वो बढ़ न जाएँ बहुत ज़्यादा — बकरा और मुर्गी? बाकी प्रजातियाँ अपनेआप संतुलन में रहती हैं, यही दोनों हैं जो पगलाई हुई हैं और बेहिसाब बढ़ रही हैं? तो फिर इंसान ने कहा, "धर्म की रक्षा हेतु आज हम बकरा खाएंगे। क्योंकि ईश्वर ने खासकर बकरे को ऐसा बनाया है कि अगर उसे इंसान ने मारा नहीं तो बकरा कल-परसों या साल भर में आठ-दस हज़ार-करोड़ की आबादी ग्रहण कर लेगा और राष्ट्रपति भवन और व्हाइट हाउस पर भी छा जाएगा, तो बकरे को मारना ज़रूरी है।" जिस तर्क से तुम बकरे को मारते हो, मैं कह रहा हूँ, फिर उसी तर्क से मकड़ा क्यों नहीं खाते? बोलो। कुत्ते भी इतने हैं, कुत्ते क्यों नहीं खाते? पर नहीं, जब कुत्ता मारा जा रहा होता है तब तो तुम्हारी मानवता जागृत होती है, कहते हो — “चीनी लोग बड़े निर्दयी हैं कुत्ता मार रहे हैं, खा रहे हैं”। कुत्ता मारें तो ग़लत और बकरा मारो तो सही, ये क्या बात है?

सबसे ज़्यादा बेतरतीब आबादी इस ग्रह पर किसकी बढ़ रही है? तर्क ये है कि बहुत आबादी बढ़ रही है, इसीलिए मारना ज़रूरी है। ठीक है, हम इस तर्क को स्वीकार किए देते हैं कि — ‘आबादी बहुत बढ़ रही है इसीलिए मारकर खाना ज़रूरी है’, सबसे ज़्यादा बेतरतीब आबादी इस ग्रह पर किसकी बढ़ रही है?

प्रश्नकर्ता: इंसान।

आचार्य प्रशांत: मनुष्य की। तो हमने आपका तर्क माना, सबसे पहले आप आएँ, अगर आबादी नियंत्रित करने के लिए मारकर खाना ज़रूरी है तो सबसे ज़्यादा व्यर्थ आबादी तो इंसान की बढ़ी हुई है — आठ सौ करोड़ हो गए — सबसे पहले तो इन्हीं का माँस बिकना चाहिए।

बोलने से पहले लोग सोचते भी नहीं कि लोग बोल क्या रहे हैं। नैतिकता की दृष्टि से ही नहीं, तुम तार्किक रूप से भी ग़लत हो। बात ना नैतिकता की है, ना अध्यात्म की है, तुम्हारी बात तो तर्कयुक्त भी नहीं है, बुद्धियुक्त भी नहीं है, मूर्खों जैसी बात कर रहे हो। ऐसे तर्क देते हैं लोग!

चूहे बहुत बढ़ जाते हैं कई बार। सूरत में प्लेग (महामारी) फैल गया था चूहों के कारण, तो वो सब चूहे खा जाने चाहिए थे? और कॉकरोच तो घर-घर की समस्या हैं, बढ़े ही रहते हैं, तो अब जब कॉकरोच बढ़ें तो उन्हें खा जाना और कहना कि खाया नहीं तो बहुत बढ़ जाएंगे! टॉयलेट अभियान चल ही रहा है और जहाँ संडास है वहाँ कॉकरोच है। बढ़िया, इसी बहाने ग़रीबों को प्रोटीन मिलेगा, बड़ा तर्क दिया जाता है कि, “अरे, अगर माँस नहीं रहा तो गरीब लोग प्रोटीन कहाँ से पाएंगे?” कॉकरोच! और जो ये प्रोटीन वाला तर्क देते हैं वो बिलकुल छुपा जाते हैं, बेईमानी करके छुपा जाते हैं इस बात को कि जितने रुपए में माँस से मिलता है प्रोटीन मान लो दस ग्राम, उससे आधी राशि में, उससे आधे रुपए में दाल से मिल जाएगा, सब्जियों से मिल जाएगा, कई अन्य स्रोतों से मिल जाएगा। वो कहेंगे, नहीं, जब तक भैंसा नहीं खाया तब तक प्रोटीन कहाँ से मिलेगा और भैंसा सस्ता होता है न? ग़रीबों की अगर तुम्हें इतनी चिंता होती तो ग़रीबों को सबसे सस्ता प्रोटीन तो दाल से मिलता है। सीधी सी बात है स्वाद की! माँस में बढ़िया मसाला डालो, और कामना तृप्त करो और उस कामना को भी जायज़ ठहराने के लिए उल्टे-फुल्टे बेवकूफी भरे तर्क प्रचारित करो।

"अंडा नहीं खाएगा तो प्रोटीन कहाँ से पाएगा?" अच्छा, ज़रूर। ये बैठे हैं सामने, आचार्य जी। मस्तिष्क भी है और बाज़ू भी है। ये बैठा है पहाड़ी (स्वयमसेवक को सम्बोधित करते हैं), मुझसे आधी उमर का है और खेलता है स्क्वाश। जीतता कम है, हारता ज़्यादा है, पूछ लो। अब तो बात पूरी दुनिया को चली गई, पहाड़ी! और ये आचार्य जी अंडा छोड़ दो, दूध भी नहीं छूते कभी। कौनसी कमज़ोरी आ गई है बताओ — मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, कौनसी कमज़ोरी दिख रही है? ‘प्रोटीन नहीं मिलता’, अब तक तो उनको लड़खड़ा के गिर जाना चाहिए था। बैल की तरह काम करते हैं, सांड की तरह जीते हैं, कौनसी कमज़ोरी है, बोलो? और किसी माँस वादी का ज़्यादा आग्रह ही हो मज़बूती पर तो फिर आ जाए सत्र के बाद देख लेते हैं कौन ज़्यादा मज़बूत है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या दूसरे को पराया जानना और इसलिए उसकी मदद ना करना हिंसा है?

आचार्य प्रशांत: दूसरे को पराया जानना और इसलिए उसकी मदद ना करना हिंसा है। जब किसी को पराया जानोगे तो उसके हित-अहित से तुम्हें बहुत मतलब नहीं रहेगा। नहीं रहेगा न? ये हिंसा है। तो फिर अहिंसा क्या है? दूसरे को पराया ना जानना और उसके हित हेतु काम करना जैसे अपने ही हित के लिए काम कर रहे हो, ये अहिंसा है। दूसरे के हित के लिए तत्पर रहना अहिंसा है। अहिंसा के लिए सबसे पहले पता होना चाहिए कि ‘हित’ और ‘अहित’ क्या हैं। दूसरे को मज़े दिलाने में दूसरे का हित नहीं होता, दूसरे की कामनाएँ पूरी कर देने में दूसरे का हित नहीं होता। जो हित तुम्हारा है वही हित दूसरे का भी है। तुम्हारा भी हित है इसी में कि तुम जागो, जानो, व्यर्थ के बंधनों से आज़ाद हो जाओ और दूसरे का भी हित इसी में है। दूसरे को आज़ाद कराने के लिए कभी ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि तुम्हें उसका मन तोड़ना पड़े। ऐसा हो सकता है कि तुम्हें उसकी इच्छाएँ पूरी ना करनी पड़ें, तुम उसकी इच्छाओं के विपरीत ही चले जाओ; वो अहिंसा ही होगी, वो हिंसा नहीं हो गई।

गौर से देखो कि जो भी कोई तुम्हारे आस-पास, इर्द-गिर्द है, उसका वास्तव में हित कहाँ पर है। और जहाँ भी उसका हित है, उसकी पूर्ति के लिए तैयार रहो। लेकिन हित शब्द सुनने में छोटा और तात्पर्य में बहुत गूढ़ है। हम नहीं जानते किसका हित कहाँ है। हम इच्छाएँ जानते हैं, और इच्छाओं की पूर्ति जानते हैं; हित-अहित हम नहीं समझते। आम तौर पर हम ऐसा ही सोचते हैं कि अगर हमने किसी की इच्छाएँ पूरी कर दीं तो यही उसका हित हो गया। दूसरे की इच्छा पूर्ति में उसका हित हो ये आवश्यक नहीं है, बल्कि अधिकांशतः ऐसा होगा कि जो व्यक्ति जिस चीज़ की इच्छा कर रहा है सबसे ज़्यादा, वो वस्तु उसके अहित में ही होगी, तो अहिंसा का मतलब ना मीठी बात, ना मीठा व्यवहार; अहिंसा का मतलब कड़वी बात और कड़वा व्यवहार भी नहीं होता; हमने अहिंसा का संबंध बहुत जोड़ लिया है मृदुल व्यवहार से, चोट ना पहुँचाने से, दर्द ना देने से। लोग कहते हैं, “किसी को दुःख ना दो, किसी को दर्द ना दो, यही अहिंसा है”। ये बिलकुल ग़लत बात है। अहिंसा का कोई संबंध दुःख और दर्द और चोट ना देने से नहीं है; अहिंसा का संबंध है दूसरे के हित के लिए काम करने से। हित हेतु अगर कभी चोट भी देनी पड़े तो ठीक, वो भी अहिंसा ही है।

धर्म की रक्षा के लिए कृष्ण महाभारत करवा देते हैं, कितनी जानें गयीं। वो भी अहिंसा ही है। इसका अर्थ ये नहीं है कि अहिंसा के मूल में रक्तपात है, अहिंसा के मूल में है दूसरे को पराया ना मानना और दूसरे के हित हेतु तत्पर रहना। जहाँ अपना हित देखना, वहीं दूसरे का हित देखना।

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