अध्यात्म के मूल में करुणा होती है — अपने और सारे संसार के प्रति। 'पीर सबन की एक-सी — मुर्गी, हिरणी, गाय।' आदमी हो, मुर्गी हो, हिरणी हो या गाय — पीड़ा सभी को एक जैसी होती है। अगर तुम अपनी पीड़ा मिटाने को उत्सुक हो, तो दूसरे को पीड़ा कैसे दे सकते हो? यह संभव ही नहीं कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक हो और साथ ही साथ मांस चबाता हो, जानवर का खून पीता हो — हो ही नहीं सकता।
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प्रश्नकर्ता: क्या कोई मांसाहारी होकर भी आध्यात्मिक हो सकता है? और अगर कोई शाकाहारी नहीं, तो क्या वो ख़ुद को आध्यात्मिक भी नहीं बोल सकता?
आचार्य प्रशांत: बोलने को तो कोई कुछ भी बोल सकता है, जो बोलना है बोलो, मुँह तुम्हारा है। बोलने से क्या हो जाता है? एक ख़्वाहिश दिख रही है मुझे यहाँ पर; हड्डी चबाने की और साथ-ही-साथ ये घोषणा करने की कि मैं तो साहब बड़ा आध्यात्मिक हूँ।
तुम्हारी ख़्वाहिश है, पूरी कर सकते हो। लोग तरह-तरह की तमन्नाएँ पूरी करते रहते हैं, तुम ये वाली भी कर लो कि एक हाथ से किसी नन्हे पशु की गर्दन मरोड़ रहे हो और दूसरे हाथ में माला फेर रहे हो। एक हाथ में किसी बेज़ुबान जीव का खून लगा हुआ है और दूसरे हाथ से तिलक कर रहे हो, टीका- चन्दन।
जो करना चाहो तुम कर सकते हो, लोगों ने पता नहीं क्या-क्या किया है, और वो सब करने के बाद भी उन्होंने अपने आप को धार्मिक-आध्यात्मिक क्या, गुरु भी बोल दिया है, अवतार भी बोल दिया है। लेकिन सच दूसरी चीज़ होती है, सच का हमारे दावों, हमारे कथनों, हमारे वादों से बहुत कम संबंध होता है। अध्यात्म के मूल में करुणा होती है। करुणा अपने प्रति, करुणा सारे संसार के प्रति। अपने प्रति अगर करुणा नहीं होगी तो तुम अपने दुख को शान्त करने कैसे निकलोगे, बोलो?




