मेनका गांधी: सबसे पहले तो हम शुरुआत करते हैं माँस खाना, दूध पीना, अंडा खाना। हम सोचते हैं कि ये बहुत आम चीज़ है।
आचार्य प्रशांत: हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं हिंसा देखने के, क्रूरता देखने के कि बहुत कुछ हो रहा होता है जानवरों के साथ, जो हमको लगता है कि सामान्य है—इसलिए सामान्य है सिर्फ़, क्योंकि हम उसको रोज़ देख रहे हैं। तो हमको लगता है ऐसा ही तो होता है; पर वो ठीक नहीं है।
और बहुत लोग जो अपने-आपको संवेदनशील बोलते हैं, कंपेशनेट बोलते हैं, वो भी उन चीज़ों को सामान्य मानकर उनकी उपेक्षा करते रहते हैं। उनको लगता है कि ये तो जानवर है, इसके साथ ये होना चाहिए। पर वो वास्तव में जो हो रहा है, वो क्रूरता है; और ये बात हमको बिलकुल भी कौंधती नहीं है। लेकिन अगर ये बात कौंधने लगे, तो बहुत सारे ऐसे लोग होंगे जो फिर उस तरह के कामों से बचेंगे, उनको रोकेंगे।
मेनका जी: मैं भी ख़ुद जब पैदा हुई थी तो एक सिख परिवार में, आर्मी परिवार में पैदा हुई थी। और मेरे लिए माँस खाना तो सामान्य बात थी। किसी ने सोचा ही नहीं कि ये जानवर है; ये आपकी प्लेट पर पड़ी हुआ कोई खाने की चीज़ है बस।
जब मैं अट्ठारह साल की हुई तो मेरी शादी हुई थी। और एक दिन मेरे पति ने मुझे यही बोला, "मैं तंग आ गया हूँ तुम्हें सुनते हुए। पूरे दिन तुम बोलती हो जानवर को बचाओ, जानवर को बचाओ, और रात को आकर के उसको खा लेती हो। तो या तो तुम अपने-आपको बदलो, अगर दुनिया को बदलना चाहती हो तो, या तो तुम बोलना ही बंद कर दो।"
और उस समय मुझे इतना झटका लगा, एकदम से, मेरी ज़िंदगी उसी वक़्त बदल गई; क्योंकि मेरी फिर आँख खुल गई। और झटके की ज़रूरत है।




