नोबल प्राइज़ लाना है तो बकरा चबाना है || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये जो होते हैं माँस-मच्छी खाने वाले, इनसे मैंने काफ़ी बार बात की है। जैसे ज़िम में मिलते हैं, या कहीं मिलते हैं। और बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी, इनके पास एक तर्क रहता है कि यह जो माँस-मच्छी होते हैं इनका अमीनो प्रोफाइल कम्पलीट (पूरा) होता है, यह कहते हैं। जैसे कि ब्रोकली खा लो, एवोकाडो, यह सब चीज़ें, इनमें अच्छा प्रोटीन होता है। कहते हैं, अमीनो प्रोफ़ाइल, जैसे एसेंशियल (आवश्यक) अमीनो एसिड – ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन, वेलिन...
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है, बिलकुल नहीं। मेडिकल साइंस (औषधि विज्ञान) इस पर बहुत स्पष्ट है। तुम्हें जो कुछ भी अपने शरीर के लिए चाहिए वो सबकुछ तुमको प्लान्ट बेस्ड (वनस्पति आधारित) स्रोतों से भी मिल सकता है। तो ऐसा कुछ नहीं है कि तुम जब तक माँस-मछली नहीं खाओगे तब तक तुम्हारा शरीर स्वस्थ ही नहीं रहेगा, बिलकुल व्यर्थ बात है।
हिन्दुस्तान में सबसे ज़्यादा शाकाहारी लोग पाए जाते हैं – हरियाणा में, राजस्थान में, गुजरात में और पंजाब में, और यही वो प्रान्त हैं जहाँ औसत वज़न सबसे ज़्यादा है, औसत ऊँचाई सबसे ज़्यादा है, सारे पहलवान यहाँ से निकलते हैं, सारे मुक्केबाज़ यहाँ से निकलते हैं। और जिन जगहों पर माँस ज़्यादा खाया जाता है उन जगहों को देख लो—जानते हो सबसे ज़्यादा माँस कहाँ खाया जाता है? दक्षिण में तो खाया ही जाता है, बंगाल में खाया जाता है, बिहार में खाया जाता है, उत्तर पूर्व में खाया जाता है। वहाँ तुमको बहुत स्वास्थ्य दिखाई दे रहा है?
एक पंजाबी को, एक बंगाली को आमने-सामने खड़ा कर दो; सम्भावना यही है कि पंजाबी या हरियाणवी शाकाहारी होगा और बंगाली माछ-भात के बिना जी ही नहीं सकता। ये कल्पना करके ही लोगों को हँसी आ रही है कि पंजाबी और बंगाली आमने-सामने खड़े हैं। तुम मुझे बताओ न, माँस खाने से क्या लाभ हुआ।



